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Science of Sant Mat

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श्रीसद्‌गुरु से दिव्य प्रकाश का मिलना पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
सोमवार, 19 जुलाई 2010 21:21

 

श्रीसद्‌गुरु से दिव्य प्रकाश का मिलना

(यह लेख ’श्रीसद्‌गुरु-रहस्य ’ नामक सत्साहित्य का अंश है)
       यदि आप अपने भीतर और बाहर प्रकाश चाहते हैं तो जीभ रूपी देवढ़ी पर श्रीसद्‌गुरु   नाम रूपी मणि दीपक को रख दो जिससे भीतर और बाहर प्रकाश ही प्रकाश हो जाय । नाम रूपी मणि एक ऐसी मणि है जिसके भजन, सुमिरन, व ध्यान से बहुत शीघ्र लाभ होता है । श्रद्धापूर्वक, निष्काम भाव, तथा गुप्त रूप से किये गये नम जप का फल तो परम कल्याणप्रद व भगवत प्राप्ति ही है। कलियुग में श्रीसद्‌गुरु  के नाम भजन के सिवाय भगवत्‌ प्राप्ति का ‍कोई दूसरा आधार भी नहीं हैं । श्रीसद्‌गुरु  के नाम भजन भक्ति के प्रकाश के समान कोई दूसरा प्रकाश स्त्रोत नहीं है । इससे अधिक फलदायी कोई दूसरा साधन है ही नहीं  ।
  राम नाम मणि दीप धरि जिह देहरी द्वार ।
  तुलसी भीतर बाहरो जो चाहत उजियार ॥

संत
सद्‌गुरु दयासागर और प्रकाश पुन्ज होते हैं, वे अपने शिष्यों से नाम रूपी मंत्र की साधना करवाकर उसके अज्ञान का निवारण कर उसे प्रकाश पुन्ज बना देते है और फिर अपने में मिला लेते है -" सद्गुरु कर ले आप समान "। इस विश्वास में शास्त्रों तथा संत महापुरूषों के अनुभव का आधार यही है कि किसी मनुष्य के लिये दु्खों से छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय श्रीसद्‌गुरु के नाम की भजन भक्ति है। इस भक्ति से ही शिष्य सदा प्रकाशित रहता है। जिस प्रकार श्रीसद्‌गुरु महाराज चिदानंदमय होते है उसी प्रकार उनका नाम -मंत्र भी शक्ति संपन्न , दिव्य, तथा प्रकाशमय होता है । यह मंत्र अनंत शक्तियों का भंडार होता है । श्रीसद्‌गुरु  जैसे जाग्रत महापुरूषों के मुख से निकले हुये इस नाम मंत्र की तो बात ही क्या है । नामदाता श्रीसद्‌गुरु की शक्ति  के साथ योग होने पर नाम की भक्तिरूपी शक्ति उज्जवल रूप में फूट पड़ती है ।
    
श्रीसद्‌गुरु के नाम की कृपा जिस शिष्य पर हो जाय और उनकी दया से दीर्घकाल तक विधिपूर्वक नाम, भजन, सुमिरन, सेवा, भक्ति आदि हो जाये तो उस सौभाग्यशाली शिष्य के ह्रदय में श्रीसद्‌गुरु आन्तरिक प्रेरणानुसार  परणित होकर स्वयं प्रकाशित होने लगते हैं । श्रीसद्‌गुरु महाराज अकारण दया कर अपने शिष्य का निरंतर उत्थान करते रहते हैं, यही श्रीसद्‌गुरु रहस्य है  ।
  परमहंस प्रभु भये दयाला, अंधकार में भयो उजाला ।
  दासनदास अनेकों आये मन वान्छित फल सब जन पाये ॥
 नियमित रूप से भजन, सुमिरन, सेवा, ध्यान ,पूजा, और दर्शन करने से, साधक के प्रति भगवान में करूणा का अंकुरण होता है और वही मार्गदर्शक के रूप में भक्त के समक्ष प्रगट होता है । यह मार्गदर्शक
श्रीसद्‌गुरु ही होते है । साधक को नाम भजन भक्ति का प्रकाश श्रीसद्‌गुरु की दया से सहज ही  प्राप्त होता रहता है । यदि नाम मंत्र का भावपूर्वक जप तथा साधना अभ्यास नियमित किया जाय तो श्रीसद्‌गुरु की दया रूपी आकर्षण शक्ति व श्रीसद्‌गुरु की सानिध्यता को प्राप्त किया जा सकता है ।  श्रीसद्‌गुरु प्रदत्त नाम संस्कारयुक्त शोधित एक महामंत्र है, जो बराबर प्रकाशमान होता रहता है फलतः यह जाग्रत, प्रकाशवान, तथा शक्ति स्वरूपी है ।

 
श्री श्री १०८ श्रीसद्‌गुरु स्वामी सरनानंदजी महाराज की हस्तलिपि में इस लेख का अंश

इसको जिस समय भजन सुमिरन ध्यान करने के अभ्यास में सहज समाधि द्वारा आँखो की दोनों पुतलियाँ उलटने लगती हैं तो पहले कुछ रोशनी प्रकाश दिखाई पड़ते है और फिर लोप हो जाते हैं। बिजली जैसी चमक सा प्रकाश सा नजर आता है और ऐसे प्रकाशमान मुकाम पर भजन, सुमिरन, ध्यान में मन खूब लगता है । इसके बाद आकाश में तारों जैसी चमक आयेगी और चाँदनी सा प्रकाश, सूर्य जैसी रोशनी नजर आती है । जिस समय आँखे बिल्कुल भीतर उलट जायेगी तब सूरत शरीर को छोड़कर ऊपर चढ़ेगी और मालिक की सूरत नजर आयेगी ।
श्रीसद्‌गुरु सहस्रदल कमल पर हंस के ऊपर आसीन होकर शिष्य को साधना विधि सिखा सिखाकर आगे बढ़ाते जाते हैं। अभ्यासी इसको देख-देखकर परम खुश होते हैं और श्रीसद्‌गुरु  से प्रार्थना करते हैं कि हे मालिक मुझे इससे आगे चलने का मार्ग बताईये। इस जगह का प्रकाश देखकर साधक बहुत प्रसन्नचित होता है । वह भजन सुमिरन में तल्लीन रहता हुआ गुरु की दया से आगे बंकनाल में पहुँचता है जो कुछ दूर तक सीधी सीधी जाती है फिर नीचे की ओर जाती हुई पुनः ऊपर जाती है । बंकनाल एक टेढ़ा रास्ता है जिसे तय कर साधक भजन अभ्यास करता हुआ अगले मुकाम पर पहुँचता है जिसे त्रिकुटी कहते है । इसे लाहुत-मसलसी भी कहते है । यह लगभग लाख योजन लंबा और चौडा़ है, इसके अनुपम नजारे का क्या कहना । हजार सूर्य व हजार चाँद उसकी रौशनी से लज्जित है । वहाँ आठों पहर ओऽम-ओऽम की ध्वनि और बादलों जैसी गरजना होती रहती है । इस मुकाम का सुहावना दृश्य देखकर साधक को बहुत आनंद मिलता है । कुछ दिन इस मुकाम की सैर करके साधक अपनी सूरत को ऊपर चढा़कर तीसरा दरजा तय कर सुन्न में पहुँचता है, जिसे हूत-लाहूत भी कहते है । इस स्थान की प्रशंसा क्या की जाय इस जगह साधक बहुत दिन तक आनंद का अनुभव करता है। यहाँ का प्रकाश त्रिकुटी से बारह गुना अधिक होता है, यहाँ पर अमृतमय मानसरोवर जगह जगह मौजूद रहते है । बहुत अच्छे अच्छे बाग-बगीचे जिसमें बहुत सुन्दर मधुर मीठे अमृत तुल्य फल लगे है । जगह जगह अप्सराओं का नाच होता रहता है, हर जगह अमृत के झरने बह रहे हैं । इस मुकाम की खनक व सुन्दरता कहाँ तक कही जाय। हीरों के चबूतरे, पन्नों की क्यारियाँ, जवाहरातों के पेड़ नजर आते हैं। वहाँ बड़े बड़े शीश महल बने हुए हैं, इस आनंद को सूरत अनुभव तो कर सकती है पर वर्णन नहीं कर सकती। इस जगह के हाल को संत ही जानते है इससे ज्यादा कहना ठीक नहीं । फिर भजन, सुमिरन करते हुए बहुत दिन बीतने के बाद साधक की सुरत महासुन्न में पहुँचती है, जहाँ दस मील योजन तक अँधेरा है, साधक यहाँ पर श्रीसद्‌गुरु के बताये अनुसार नाम के प्रकाश से प्रकाशित होता हुआ आगे बढ़ता है यहाँ तमाम रिधि-सिद्धि सद्‌गुरु की सेवा करती रहती हैं,  जब संत महापुरूष इस रास्ते से गुजरते हैं तो श्रीसद्‌गुरु के दर्शन उन्हे सदैव होते रहते हैं। साधक की सुरत इस मुकाम से आगे बढ़कर भँवरगुफा में पहुँचती है, वहाँ एक चक्र है जिसको हिन्डोला भी कहते है, सूरतें सदा उस पर झूलती रहती है । इस दर्शनीय मुकाम की संरचना का ज्यों का त्यों वर्णन नहीं हो सकता । जब साधक इस मार्ग पर चलेगा तो स्वयं जान लेगा । श्रद्धा व लगन के साथ सुमिरन ध्यान की कमाई करता हुआ साधक आगे बढ़ता है, साधक की सुरत यहाँ की सुगंधित मलयागिरि के किस्म-किस्म के इत्रों से लिपटती हुई आगे चली जाती है और वहाँ पर होने वाली बंसी की धुन को सुनकर मस्त होती रहती है। यहाँ अमृत से भरी हुई सुनहरी नहरें बहती है, अनेकों सूर्य, चन्द्र, तारे दिखाई पड़ते है। इस मुकाम की अनुपम छटा देखती हुई सुरत सत्यलोक पर पहुँचती है। यहाँ श्रीसद्‌गुरु का दर्शन कर सूरत उनके भजन, सुमिरन, ध्यान में लीन हो जाती है । अब सत्य पुरूष का दर्शन होता है जिनका एक एक रोम इतना प्रकाशवान है कि करोड़ो सूर्य, चन्द्रमा उनसे लज्जित है । जब एक रोम की ऐसी प्रशंसा है तो संपूर्ण शरीर की प्रशंसा में क्या लिखूँ? कर्ण, नेत्र, नासिका, हाथ, पाँव की शोभा अवर्णनीय है । सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश है, प्रकाश का समुद्र भी कहूँ तो भी प्रशंसा पूर्ण नहीं है। एक पदम पलंग का घेरा है सत्यलोक का, जहाँ हंस बसते है और सत्य पुरूष का दर्शन करते हैं । साधक की सुरत बीन की मधुर आवाज की गूँज सुनती हुई व अमृत की खुराक लेती हुई आगे बढ़ती है । अब वह अलखलोक में पहुँचती है जहाँ अलख पुरूष का दर्शन होता है, जिनके हर रोम में अरब,खरब सूर्यों के तुल्य उजाला होता है । फिर साधक की सुरत वहां से बढ़कर अगमलोक पहुँचती है । जिसका घेरा असंख्य पलंग का है । अगम पुरूष की काया करोडो़ शंख सूर्यों की है । वहाँ के हंस भी एकदम श्वेत व उज्जवल रूप रंग के है, जिन्हें देखते ही मन मोह जाता है । संपूर्ण माहौल आनंदमयी है । इस जगह पर सूरतें बहुत बहुत आनंद लेती हुई आगे बढ़कर अनामी मुकाम पर पहुँचती है । अनामी पुरूष का दर्शन कर सभी सूरतें उन्हीं में समा जाती है । यह अत्यन्त बेअंत है। सन्तों का यही स्थान है । इसको पाकर संत चुप हो गये, इतनी बडी़ गति संत महापुरूषों की है, जो वहाँ पहुँचकर उस मुकाम को भी बेअंत ही बेअंत कहने लगते हैं । यह सब श्रीसद्‌गुरु की दया की ही देन है जो यह सब कुछ साधक को प्राप्त हुआ है और आगे भी जो प्राप्त होगा वह भी श्रीसद्‌गुरुकी दया से ही प्राप्त होगा । इस कृपा की तुलना में साधक की सारी शक्तियाँ नगण्य है । श्रीसद्‌गुरु की शक्ति के प्रभाव से उनके द्वारा दिये गये नाम का संस्कार अपने आप हो जाता है । संस्कारित होने का मतलब है कि छुपी हुई छमता के ऊपर से अज्ञानता के आवरण को हटाकर क्षमताओं का प्रस्फुटित हो जाना, और यही है श्रीसद्‌गुरु रहस्य। श्रीसद्‌गुरु की कृपा से ही साधक की शक्ति व्यक्त होती है। श्रीसद्‌गुरु की कृपा एवं साधक के निष्ठा भाव, श्रद्धा, विश्वास, अनन्य परायणता, नियमित भजन , पूजन, और सुमिरन के अभ्यास से ही वह शक्ति संचित होती है । यह नाम जप की शक्ति प्रसुप्त चेतना को जाग्रत करती है । जीव के स्वरूप पर पड़ा अज्ञानता का आवरण  नाम रूपी  प्रकाश से हट जाता है । श्रीसद्गुरु के नाम-जप साधना का फल समय पर अवश्य मिलता है । गुरु का मुख्य कार्य अपने शिष्य की स्वरूप विस्मृति को उठा कर उसे स्वरूप स्मृति करा देना तथा उसके अन्दर नाम जप, गुरुसेवा , पूजा, दर्शन, व ध्यान की प्रवृति को बढा़ देना है, शिष्य के चित्त को शुद्ध और निर्मल बना देना है, भाव पूर्ण व श्रद्धावान बना देना है ताकि भाव से भाव साधना चलती रहे । यह प्रभाव गुरु प्रदत्त बीज से उत्पन्न  शुद्ध भावमय देह में होता है । इस अवस्था में शिष्य और गुरु दोनो के मध्य द्रवित भाव उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार साधक श्रीसद्‌गुरु की कृपा से नाम जप और श्रद्धा प्रेम के द्वारा ही इस अखण्ड आध्यात्मिक साधना के बल पर आध्यात्मिक चढा़ई चढ़ता चला जाता है । भगवान की दया से भक्त को ज्ञान-भक्ति की प्राप्ति होती है। श्रीसद्‌गुरु की कृपा से ही शिष्य इस अवस्था को प्राप्त करता है। श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्य में श्रद्धा भाव को प्रकाशित करते रहते है और श्रीसद्‌गुरु की  कृपा से ही यह सुलभ भी होता है ।
 १ कृपा दृष्टि प्रभु ऐसी कीन्ही, भक्ति ब्रह्म ज्ञान मोहिं दीन्हीं ।
     भजन सुमिरन अभ्यास सिखायो, तन ममता का त्याग बतायो ॥
२. जब तक शिष्य श्रीसद्गुरुजी का दर्शन ध्यान नहीं करते ।
     तब तक सच्चे प्रेमी अन्न और जल का पान भी नहीं करते ॥
३. सच्ची गुरुभक्ति का नक्शा, गुरुप्रेम उन्हीं में देखा था ।
     हमने गड़वाघाट में खुद, सब कुछ आँखो से देखा था ॥      
  गूढ़ विद्या जगन्माया, देहे चाज्ञान सम्भवः ।
  उदयं स्व प्रकाशेन, गुरु शब्देन कथ्यते ॥

विद्यायेंचाहे जितनी भी गूढ़  हों, साधनायें चाहे कितनी भी कठिन  हों, और शिष्य चाहे कितना भी अज्ञानी क्यों न हो , परन्तु वह यदि पूर्ण श्रद्धा के साथ गुरु शब्द का उच्चारण करता है तो मन में स्वतः ही आत्मज्योति प्रकाशित हो जाती है । जिस ज्योति के माध्यम से समस्त गूढ़ विद्यायें गुरु की दया से ही उद्‍भासित होती आई हैं । इसलिये जीवन में गुरु की उपादेयता सिद्ध है । इसी को कहते है
श्रीसद्‌गुरु रहस्य।
शोषणं पाप पन्कस्य जीवनं ज्ञान तेजसम्‌ ।
गुरोः पादोदकं सम्यक्‌ , संसारार्णव तारकं ॥

श्रीसद्‌गुरु चरणोदक साधक के समस्त कीचड़ रूपी पाप को धोने के लिये , ज्ञान रूपी प्रकाश को प्रज्जवलित करने के लिये तथा संसार सागर से पार उतरने के लिये एकमात्र साधन है । साधकों के जीवन के जितने भी पाप है उन सभी का समन करने के लिये ह्रदय में ज्ञान का दीपक जलना आवश्यक है और यह केवल श्रीसद्गुरु के श्रीचरणों का स्पर्श करनें , गुरु की आज्ञा पालन करनें और गुरु के कथनानुसार गतिशील होने से ही ज्योर्तिमय हो सकता है ।
  अज्ञान तिमिरान्धस्य, ज्ञानाञ्जन शलाकया ।
  चक्षुसन्मीतितं येन, तस्मै श्री गुरुवे नमः ॥
शिष्य के अज्ञानरूपी अंधकार से ग्रस्त नेत्र को ज्ञानरूपी अंजन शलाका द्वारा खोल देने वाले
श्रीसद्‌गुरु को बारंबार नमन है। मुझ शिष्य को न तो  साधना करनी आती है ,न ही पूजा, और न ही पूर्ण रूप से मंत्रोच्चारण आता है, मुझमें तो श्रीसद्गुरु ही इस अज्ञानरूपी अंधकार के नाश के लिये ज्ञानभक्ति का दीपक प्रज्वलित करते हैं। इस प्रकाश से शिष्य का जीवन पूर्णतः जाज्वल्यमान हो जाता है । यही है श्रीसद्‌गुरु  रहस्य । श्रीसद्‌गुरु कितने दयालु हैं कि साधक के विकास के लिये सभी प्रकार की प्रेरणा सदैव देते रहते है ।
अज्ञान तिमिरान्धस्य, विषयाक्रान्त चेतसः ।
ज्ञानप्रभा प्रदानेन प्रसादं कुरू मे प्रभो ॥

हे प्रभु अज्ञानरूपी अंधकार में अंधे हुए और विषयों से अंक्रान्त चित्त वाले मुझ जीव को ज्ञान का प्रकाश देकर कृपा करें।
श्रीसद्‌गुरु की कृपा से शिष्य को आत्मानुभूति हुयी जिससे शिष्य श्रीसद्‌गुरुदेवजी से आशीर्वाद के लिये प्रार्थना याचना करता है कि, मैं इस अज्ञानरूपी अंधकार में अंधा होकर कई जन्मों से भटक रहा था तथा इस सान्सारिक विषयों को ही सत्य स्वरूप मानकर उन्हें भोगकर संतुष्ट हो रहा था । हमारे श्रीसद्‌गुरु महराज ने मुझे वह आत्मज्योति दी जिससे मेरे जन्मों जन्मों का अज्ञानरूपी अंधकार मिट गया। हे प्रभु आप मुझे यूँ ही ज्ञान का प्रकाश देकर मुझ पर कृपा करते रहें । इसमें यह एक बात समझ लेना आवश्यक है कि अज्ञान का मिट जाना पर्याप्त नहीं है। उसमें श्रद्धा भाव तथा ज्ञानभक्ति का आना अति आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना मोक्ष संभव नहीं है। श्रीसद्‌गुरु की रंचमात्र दया हो जाने पर अज्ञान से तो निवृत्ति मिल ही जाती है तथा यह भी बोध हो जाता है कि इससे भी आगे की अवस्था मालिक की भक्ति व भक्ति का ज्ञान है । जिस प्रकार सूर्योदय होने से थोडी़ देर पहले ही अंधकार तो मिट जाता है लेकिन इसी से यह नहीं मान लेना चाहिये कि सूर्योदय हो गया है। जब सूर्य का उदय होता है तभी इस वास्तविकता का ज्ञान होता है कि यह उसका ही प्रकाश है तथा पूर्व प्रकाश भी उसका ही था । उस परम ज्योति स्वरूप परमात्मा का प्रत्यक्ष होना ही पूर्ण ज्ञान अवस्था है । शिष्य उसी ज्ञान के प्रकाश के लिये प्रार्थना करता है यही श्रीसद्‌गुरु रहस्य है ।
एक बार
श्रीसद्‌गुरु की शरण ग्रहण करने के पश्चात्‌ शिष्य को एकमात्र उन्हीं का सहारा लेना चाहिये । एकमात्र श्रीसद्‌गुरुदेवजी ही ज्ञान, भक्ति तथा सर्वसुख दाता है फिर अन्यत्र भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है। श्रीसद्‌गुरुदेवजी  के चरणामृत का पान कर तथा शेष बचे हुये को अपने मस्तक पर धारण करने से सभी तीर्थों का फल मिल जाता है । श्रीसद्‌गुरुदेवजी ही जीवन्त तीर्थ है ।
      ज्ञान शक्ति समा रूढ़ं , तत्वमाला विभूषितम्‌ ।
      भक्ति मुक्ति प्रदातारं , तस्मै श्री गुरुवे नमः ॥

जो पूर्ण ज्ञान की शक्ति अपने आप में समाये हुये हैं, जो समस्त शास्त्रों का तप स्वयं में लिये हुये हैं, जो एक साथ ही संसार के समस्त भोग और उनसे मुक्ति देने में समर्थ हैं, जो एक साथ ही धर्म, अर्थ, और मोक्ष प्रदान करने में समर्थ हैं, उनको छोड़कर अन्य किसी की पूजा आराधना साधना क्यों करें ? साधक के सामने तो संपूर्ण विश्व के चराचर भगवान
श्रीसद्‌गुरुदेवजी साक्षात उपस्थित हैं, ऐसेश्रीसद्‌गुरुदेवजी को  कोटि-कोटि प्रणाम है । 

--- सत्‌गुरुसरनानंद

 

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