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Science of Sant Mat

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गुरु चरण रज का महात्म्य पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
बुधवार, 28 जुलाई 2010 20:42

 

  गुरु चरण रज का महात्म्य

(यह लेख ’श्रीसद्‌गुरु-रहस्य ’ नामक सत्साहित्य का अंश है)
श्रीसद्गुरु महराज की चरणधूलि की महिमा का वर्णन करते हुए श्री शंकरजी पार्वतीजी से कहते है कि
यत्पादरेणु शरीर चिन्तनं , भवेदनन्तस्य शिवस्य चिन्तनं ।
स्वदेशिकस्यैव च नामकीर्तनं ,भवेदनन्तस्य शिवस्य कीर्तनं ॥

श्रीसद्गुरु के चरण कमलों की धूलि का एक कण मात्र ही संसार सागर से पार उतारने के लिए सेतु के समान है । ऐसे पूज्य श्रीसद्गुरु के श्री चरणों की भावपूर्ण ह्रदय से शिष्य को उपासना करते रहनी चाहिये। श्रीसद्गुरु चरणरज का एक कण मात्र ही सर्वस्व देनें में समर्थ होता है । श्री सद्गुरुदेव की दिव्य देह से निःसृत होने वाली रश्मियों से शिष्य सदैव पावन बना रहता है। अतः शिष्य जितना भी प्रबुद्ध एवं सजग होगा वह उतना ही कृतार्थ होता चला जायेगा। श्रीसद्गुरु महाराज की चरणधूलि शिष्य के अंतर्मन को गुरुभक्ति के रस में भिगोती रहती है। शिष्यों के ह्रदय में सद्गुरु समर्पण के स्वर फूटते रहते है । श्रीसद्गुरु की चरणधूलि शिष्य के मन में श्रद्धा व भक्तिभाव का संचार करती रहती है । गुरु चरणधूलि की कृपा के सहारे, श्रीसद्गुरु के बतलाये मार्ग पर चलकर लक्ष्य की प्राप्ति करने से मन में शक्ति पैदा होती रहती है और मन के अंदर आध्यात्मिकता बढ़ती रहती है।
आध्यात्मिक विषयों में प्रयुक्त होने की प्रेरणा मन में जागती रहती है। गुरुकृपा से उपजे सुसंस्कारों के कारण ही श्रीसद्गुरु भगवान ने नालायक, नासमझ साधक को भी कूडे़ के ढे़र से उठाकर अपनी शरण में लेकर उसे अमूल्य रत्न का ढे़र बना दिया, जो दण्डनीय थे उन्हें पूज्यनीय बना दिया । इतिहास व पुराणों में ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण मिलते हैं ।

          बंदऊ गुरुपद कंज, कृपा सिन्धु नर रूप हरि ।
          महामोह तम पुंज, जासु वचन रवि कर निकर ॥

श्रीसद्गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि की वन्दना करता हूँ जो नर रूप में हरि हैं, जो कृपा के समुद्र है और जिनके वचन महामोह रूपी घने अंधकार को नाश करने के लिये सूर्य के समान कार्य करते हैं । श्रीसद्गुरुदेवजी की कृपा जब अपराधियों, डाकुओं, वधिकों, और वेश्याओं का भी उद्धार कर सकती है, तो भला उनकी कृपा से हम क्यों वंचित रहेंगे। वो तो इतने दयालु होते हैं  कि उनकी दयालुता की कोई थाह नहीं है। वे तो दया सागर कहे जाते हैं । बस अपनी संकोच व अपना बड़प्पन ही इस मार्ग के काटें होते है, जो शरण में जाने से बारबार रोकते रहते हैं।
श्रीसद्गुरुदेवजी की चरण धूलि के प्रति विश्वास रखने वाले शिष्य के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। ह्रदय में गुरुचरण धूलि के प्रति पूर्ण श्रद्धा विश्वास हो जाय तो मिट्टी की मूर्ति भी फल प्रदान करती है । यदि एक बार भी गुरु का साक्षात्‌ दर्शन हो चुका हो और उनके चरण कमल को एक बार भी अपने ह्रदय में स्थापित कर लिया हो तो उनके ध्यान कर लेने मात्र से ही मन की मनोकामना पूर्ण हो जाती है । यदि मिट्टी की मूर्ति में इतनी समर्थ प्रगट हो सकती है तो मूर्तिमान ब्रह्म स्वरूप श्री सद्गुरुदेव  की अनन्य भाव से सेवा पूजा और स्तवन करने से प्राप्त होने वाली ब्रह्मविद्या रूपी प्रसाद से गुरुभक्तों को कौन सी वस्तु अप्राप्य हो सकती है । गुरु चरण धूलि ग्रहण करने वालों के लिये कुछ भी अलभ्य नहीं है । यही गुरु रहस्य है ।
सुकृति संभु तन विमल विभूति । मंजुल मंगल मोद प्रसूती ।
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी । किएँ तिलक गुन गन बस करनी ॥

वह रज सुकृति (पुण्यवान पुरूष) रूपी शिव जी के शरीर पर सुशोभित निर्मल विभूति है, सुन्दर कल्याणकारी है और आनन्द की जननी है । भक्तों के सुन्दर मन रूपी दर्पण के मैल को दूर करनें वाली, सुख पँहुचाने वाली और तिलक करने से गुणों के समूह को वश में करने वाली है।
      परम पूज्य स्वामी जी कहा करते थे कि गुरु का शरीर शरीर नहीं है , गुरु कोई व्यक्ति नहीं है , गुरु की चरण धूलि कोई साधारण धूल नहीं है वह एक अमृत तुल्य जडी़ है । यह शिष्य के लिये संजीवनी जडी़ बूटी है जो परमशक्ति संपन्न है इसलिये इसे ह्रदय से स्वीकार करना पड़ता है जिससे परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है, मनुष्य जीवन सार्थक होता है । जिसे पाकर कुछ पाना शेष नहीं रहता। यही गुरु रहस्य है और गुरु चरणों की धूलि की यही विशेषता है।
अज्ञान मूल हरणम्‌, जन्म कर्म निवारणम्‌।
ज्ञान वैराग्य सिद्धयर्थं गुरु पादोदकं पीवेत्‌ ॥
गुरु पादाम्वुजं स्मृत्वा, जलं शिरसि धारयेत्‌ ।
सर्वतीर्था वगाहस्य , संप्राप्नोति फलं नरः ॥

श्रीसद्गुरुदेव के चरणों का चरणोदक पान करने का यदि सौभाग्य प्राप्त हो जाय तो जन्मों के पाप और जीवन के सारे बन्धन समाप्त हो जाते हैं । समस्त प्रकार का अज्ञान दूर हो जाता है  और ह्रदय में स्वतः भक्ति ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। उसके लिये अन्य किसी प्रकार के विधि-विधान साधना और सिद्धि प्राप्त करने की कोई जरूरत नहीं होती, क्योंकि साधक के लिये गुरु चरणामृत अति पावनतम्‌ अमृत बूँद है जिसे पाकर उसके सभी संताप दूर हो जाते हैं। जो शिष्य पूर्ण श्रद्धा के साथ श्रीसद्गुरु महराज के चरणामृत को पान करता है व उसे अपने सिर पर धारण करता है उसे संसार के समस्त तीर्थों में स्नान करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है और वह वर्तमान जीवन में ही धर्म, अर्थ, मोक्ष को प्राप्त करता हुआ पूर्ण मानव जीवन सफल करने में समर्थ हो जाता है । श्रीसद्गुरु के चरण कमलों में समस्त तीर्थ निहित है । इस रहस्य को समझकर साधकगण तीर्थों में भटकना छोड़ देते हैं ।
वे लोग बडे़ भाग्यशाली है और साथ ही साथ उन पर श्रीसद्गुरु की महान अनुकम्पा है जिन्हें श्रीसद्गुरु महाराज जी अपनी दया कर अपना सबसे बहुमूल्य नाम धन तथा अपनी चरण धूलि प्रदान कर देते हैं । इस नाम के सतत्‌ सुमिरन तथा चरण धूलि अपने सिर में धारण करने से जीव सहज ही अपने अविचल निज धाम को प्राप्त कर लेता है । नाम जप तथा चरण धूलि को अपने तन तथा मन में धारण करने से ही श्रीसद्गुरु में श्रद्धा, विश्वास तथा एक निष्ठ प्रेम का उदय हो जाता है और फिर गुरु कृपा का लाभ मिलने लग जाता है । जब साधना करते करते उस जीव के मन से संचय और भ्रम का समूल नाश हो जाता है तब श्रीसद्गुरुदेवजी महराज उसे उसके परम लक्ष्य तक पहुँचा कर अपने में लीन कर लेते है । यही है गुरु रहस्य जो केवल सद्गुरु से ही प्राप्त होता है ।
सद्गुरु ने अति कृपा कर बख्शा पावन नाम ।
जाके सुमिरन सहज ही पावे अविचल धाम ॥
जिनके चरण कमल रज सुन्दर, भव दुःख सकल निवारत है ।
सब मिल कीजे सद्गुरु आरती, सकल विघ्न नशावत है ॥

श्रीसद्गुरु महराज की चरण धूलि को ह्रदय तथा सिर पर धारण करने से शिष्य का अंतर्मन गुरु भक्ति से सदा भीगा रहता है । उसके ह्रदय में भक्ति के भाव तथा श्रीसद्गुरु के प्रति समर्पण के स्वर फूटते रहते है। शिष्य के मन, प्राण तथा ह्रदय से श्रीसद्गुरुदेव के लिये अपने सर्वस्व को न्यौछावर करने की उमंग जागती रहती है । अंतर्चेतना में श्रीसद्गुरु की चेतना झलकने तथा छलकने लगती है। जिन जिन शिष्यों ने गुरु की चरण धूलि की अनुभूति पाई है उन सभी का यही मत है । साधनायें अनेक हैं, मत और पंथ भी अनगिनत हैं, लेकिन गुरु भक्तों के लिये यही एक मंत्र है कि वे अपने श्रीसद्गुरुदेव का नाम, भजन, सुमिरन, ध्यान, सेवा, पूजा, व दर्शन करें ।
उनका यही प्रधान कर्म है । उनमें सदा एक मात्र अपने श्रीसद्गुरुदेव के प्रति संपूर्ण समर्पण का भाव सदा ही विद्यमान रहता है। जिन्दगी के सारे रिश्ते नाते, सभी संबंध श्रीसद्गुरुदेव में ही होते हैं । उनके सिवाय श्रीसद्गुरुदेव के लिये त्रिभुवन में न कोई सत्य है, और न कोई तथ्य है । भगवान भोलेनाथ माता पार्वतीजी से कहते है कि जब अन्तःकरण में श्रीसद्गुरु की चेतना के उदय होने मात्र से बलवान वायु तत्क्षण स्वयं प्रशमित हो जाती है तब भला दुःख देने वाले, रोग उत्पन्न करने वाले, प्राणायाम आदि का भला क्या प्रयोजन है? श्रीसद्गुरु के चरण को धो-धोकर पीना चाहिये क्योंकि इससे सहज ही आत्मलाभ हो जाता है, यह बडे़ भाग्यशाली को ही प्राप्त होता है। अपने श्रीसद्गुरुदेवजी का सदैव ध्यान करते रहना चाहिये । श्रीसद्गुरु का स्मरण और उनमें अपना पूर्ण समर्पण ही शिष्य के जीवन का सार है । इतनी सरल और समर्थ साधना से शिष्य को सबकुछ अनायास ही मिल जाता है।  गुरुभक्ति की इस साधना की महिमा के अगले क्रम को स्पष्ट करते हुये भगवान सदाशिव जगन्माता पार्वती से कहते है कि -
           सर्वपाप विशुद्धात्मा, श्री गुरोः पादसेवनात्‌ ।
           देही ब्रह्म वेद तस्मात्‌, तत्‌ कृपार्थ वदामि ते ॥

वर्तमान व पूर्व जीवन के समस्त प्रकार के पाप केवल श्रीसद्गुरु महराज के नाम, भजन, स्वरूप के ध्यान तथा श्रीसद्गुरु के चरण कमलों का ध्यान करने मात्र से ही समाप्त हो जाते है । शिष्य की आत्मा पूर्ण रूप से ब्रह्ममय हो जाती है, गुरुकृपा प्राप्त होते ही वह स्वयं ब्रह्म स्वरूप बन जाता है और उसका जीवन सार्थक व धन्य हो जाता है । देवता भी इस प्रकार की प्राप्ति के लिये लालायित रहते हैं ।
         शोषणं पाप पंकस्य, जीवनं ज्ञानतेजसाम्‌ ।
         गुरोः पादोदकं सम्यक , संसाराण्वि तारकम्‌ ॥

श्रीसद्गुरु का चरणोदक साधक के समस्त पाप रूपी कीचड़ को धोने के लिये, गुरु की भक्तिरूपी ज्ञान के प्रकाश को स्वयं में प्रकाशित करने के लिये, तथा संसार सागर से पार उतरने का बहुत बडा़ संबल है । शिष्य के अन्दर नाम रूपी मणि यानी ज्ञान का दीपक प्रज्वलित होना परम आवश्यक है जो केवल श्रीसद्गुरु के नाम के भजन, सुमिरन, सेवा, ध्यान, पूजा, और दर्शन करने से ही प्रज्वलित हो सकता है ।
        श्री गुरु पद नख मनि मन जोती । सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती ॥
        दलन मोह तम सो सप्रकासू । बडे़ भाग उर आवइ जासू ॥ 

श्रीसद्गुरु महाराज के चरण नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है। जिसके स्मरण करते ही ह्रदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अंधकार को नाश करने वाला है । यह प्रकाश जिनके ह्रदय में आ जाता है वे बडे़ भाग्यशाली हैं ।
     उघरहिं विमूल विमोचन ही के । मिटहिं दोष दुःख भव रजनी के ॥
     सूझहिं राम चरित मनि मानिक । गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक ॥

उसके ह्रदय में आते ही ह्रदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसार रूपी रात्रि के दोष दुःख मिट जाते है एवं श्री रामचरित्र रूपी मणि और माणिक्य, गुप्त अथवा प्रगट जहाँ जो जिस खान में है , सब दिखाई पड़ने लगते है।
      जथा सुअंजन अंजि दृग, साधक सिद्ध सुजान ।
     कौतुक देखत सैल बन, भूतल भूरि निधान ॥

जैसे सिद्धाञ्जन को साधक नेत्रों में लगा कर  सिद्ध व सुजान बन जाता है और पर्वतों, वनों, व पृथ्वी के अन्दर की बहुत सी खानों को खेल खेल में ही देख लेते है।
 गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिअ दृग दोष विभंजन ॥
 तेहिं करि विमल विवेक विलोचन । वरनउँ रामचरित भव मोचन ॥

पग धूलि प्रभु चरनन केरि ।करत निवारन विपत्ति घनेरि ॥
चरन विभूति सर्व दुःख भंजन । दिव्य दृष्टि देत एहि अंजन ॥

वैसे ही इस चरण रज रूपि अंजन को जो भी अपने नेत्र में लगाता उसे ज्ञान दृष्टि प्राप्त हो जाने के कारण श्री सद्गुरु के व्यापक स्वरूप का दर्शन प्राप्त हो जाता है। उसे कहीं कोई दूसरी वस्तु दिखाई नहीं देती। कण कण में उसे श्री सद्गुरु ही दिखाई पड़ते है । इस प्रकार उसके भीतर एकत्वभाव आ जाने के कारण वह अपने में सबको और सब में अपने को देखने लगता है। श्रीसद्गुरु में एकनिष्ठ प्रेम का यही सर्वव्यापी स्वरूप है। यही प्रेम रूपी ज्योति सदा सदा शिष्यों को प्रकाशित करती रहती है और चरण धूलि के प्रति श्रद्धा बढ़ती रहती है।
जिन्ह इन अंजन नेत्र लगायो । हर मूरति व्यापक हरि पायो ॥
दीखत ताहि न दूसर कोई । आपहिं आप सर्व में होई ॥

ऐसे परम पवित्र सर्वव्यापी, विश्वरूप श्रीसद्गुरुदेव नररूपहरि वर्तमान काल में श्री गड़वाघाट आश्रम की सन्त परंपरा में साक्षा‍त्‌ विराजमान रहते है । जो बराबर अपने जीवों के कल्याण करने के लिये सदा प्रयत्नशील रहते है। सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान प्रभु अपने सगुण स्वरूप में अवतरित होकर जीवों का कल्याण कर रहे हैं। उनके चरण कमलों में कोटि कोटि प्रणाम है। उनकी उपासना, आरती, पूजा करने से आर्तजनों के भय की निवृति हो रही है, उनका भक्त ही नहीं उसके परिवार के सदस्य भी तथा आने वाले वंशज भी सांसारिक व्याधियों से छुटकारा पा रहे है ।   
आरत करत प्रेम वश जबहिं । कुल परिवार तरत है सबहिं ॥
श्रीसद्गुरु महाराज के चरणों की रज कोमल है और सुन्दर नयनामृत अन्जन है, जो नेत्रों के दोषों का नाश करने वाला है। उस अन्जन से विवेकरूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसार रूपी बन्धनों से छुडा़ने वाले श्रीसद्गुरु महाराज जी के चरण धूलि का वर्णन करता हूँ।
श्रीसद्गुरुदेव की कृपा को उद्‌घाटित करने वाले इन मंत्रों में अनगिनत गूढ़ अनुभूतियाँ समाई हैं। इन अनुभूतियों को गुरु भक्तों की भाव-चेतना में संप्रेषित करते हुये भगवान महादेवजी के वचन है श्रीसद्गुरुदेवजी की चरण धूलि का एक छोटा सा कण भव सागर पार करने के लिये नौका के समान है। उस चरण धूलि की मैं वंदना करता हूँ कि उन श्रीसद्गुरुददेवजी कि उपासना मै करूँगा । ऐसा भाव प्रत्येक शिष्य को रखना चाहिये या करना चाहिये, यही गुरु रहस्य है।
जिनके अनुग्रह मात्र से तथा श्रीसद्गुरुदेव  की कृपा से ही महान से महान अज्ञान का नाश हो जाता है । श्री सद्गुरुदेवजी ही सभी प्रकार के अभीष्ट की सिद्धि देने वाले होते हैं । उन श्रीसद्गुरुदेवजी महाराज को बारंबार डण्डवत प्रणाम करना प्रत्येक शिष्य का कर्त्तव्य होता है।
गुरोः पादोदकं पीत्वा, गुरोरुच्छिष्ट भोजनम्‌ ।
गुरोः मूर्ति सदा ध्यानं, गुरोमन्त्रं सदा जपते ॥

शिष्य का कर्त्तव्य यह है कि वह अपने संपूर्ण जीवन में श्रीसद्गुरुदेव के नाम का भजन, सुमिरन, ध्यान, सेवा, पूजा, व दर्शन करे और उनकी आज्ञा का अक्षरशः पालन करे तथा श्रीसद्गुरुदेव के चरणों को धो, धोकर उसका पान करे। गुरु के भोजन करने के बाद बचे हुये उच्छिष्ट भोजन को सीत प्रसाद समझ कर स्वीकार करे, यानी पूर्ण श्रद्धा के साथ ग्रहण करे । हर क्षण गुरु के नाम का भजन, सुमिरन, ध्यान करता रहे । ऐसा शिष्य स्वयं देवता स्वरूप बन जाता है । जिसके भाग्य की देवता भी प्रशंसा करते है क्योंकि पूर्णता तो शिष्य की श्रद्धा, निष्ठा, अटूट प्रेम व श्रीसद्गुरुदेव  की दया में निहित है ।
गुरु शिष्य के जीवन में प्रत्येक युग में, प्रत्येक काल में प्रगट होते रहते हैं। प्रत्येक समय में शिष्यों ने गुरुकृपा को अपने अस्तित्व में फलित होते हुये देखा है । ऐसा ही गुरु शिष्य के बीच का एक उदाहरण अपने युग के प्रसिद्ध सन्त महापुरूष श्री स्वामी १००८ श्री श्री हरसेवानंदजी महाराज परमहंसजी व उनके परमप्रिय शिष्य स्वामी श्रीहरशंकरानंदजी का है । काशी निवासी सन्तों में श्री श्री १००८ श्री स्वामी हरसेवानन्दजी महाराज परमहंसजी का नाम बडी़  ही श्रद्धा के साथ लिया जाता है ।
     काशी धन्यतमा विमुक्ति नगरी, याऽलङकृता गंगया ।
     जीवन मुक्तिविधायिनः, सुगुरवो ह्यत्रैव सन्त्यादितः ॥

गंगा तीरमनुत्तमं हि सकलं, तत्रापि काश्युत्तमा ।
तत्रास्ते गडवादिघाट सुमठे, श्री सद्गुरुर्मुक्तिदः ॥
देवानामपि दुर्लभं स्थलमिदं, पापौघनाशक्षमं ।
पूर्वोपार्जित पुण्यपुन्जगमकं, पुण्यैजनैः प्राप्यते ॥
श्री हरसेवानन्दं सद्‌गुरुं, वन्दे दयानिधिम्‌ ।
भबाव्धेस्तारकंयस्मात्‌, कामाद्याः संकुचन्ति हि ॥

तीनों लोकों में पूज्यनीय काशीधाम धन्य है, जो देवनदी गंगा से सुशोभित है । इसी काशीपुरी में जीवनमुक्ति प्रदान करने वाले तत्वज्ञानी महापुरूष सन्तसद्गुरु आदिकाल से होते आये हैं। वैसे तो गंगा के संपूर्ण तट श्रेष्ठ है किन्तु उसमें भी काशी क्षेत्र सबसे उत्तम माना जाता है। उस काशी क्षेत्र में गड़वाघाट नाम का एक सुन्दर मठ है। जिसमें जीवनमुक्ति के दाता श्रीसद्गुरुदेवजी विराजमान रहते हैं । पापों का नाश करने में समर्थ यह स्थान देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। पूर्वजन्मों के संचित पुण्यों से बडे़ पवित्र मनुष्य को ही इस स्थान की प्राप्ति होती है। मैं श्रीसद्गुरुदेव श्री श्री१००८ श्री स्वामी हरसेवानन्दजी महाराज परमहंस को सादर डण्डवत्‌ प्रणाम करता हूँ जो दया के सागर हैं तथा जीवों को संसार सागर से पार उतारने के लिये नौका स्वरूप हैं । उनकी कृपा दृष्टि पड़ते ही काम, क्रोध आदि छहों शत्रु निस्तेज होकर संकुचित हो जाते है और जीवों को अपने कुप्रभाव से विकारयुक्त नहीं कर पाते।
उनके  शिष्य सारे हिंदुस्तान तथा विदेशों में भी फैले हुये थे। उन्हीं विशिष्ट महानुभावों के बीच सत्‌शिष्य श्रीहरशंकरानन्दजी भी थे। वे बहुत पढे़ लिखे तो नहीं थे पर आध्यात्मिकता में बहुत आगे थे और उनका ह्रदय सदा ही अपने सद्गुरुदेव के प्रति विह्वल रहता था ।
 स्वामी श्री हरशंकरानन्दा, स्तदनु जीविनः ।
 आश्रमस्याति महति, चक्रुः सेवा सुदुष्कराम्‌ ॥

श्रीस्वामी १००८ श्री श्री हरशंकरानन्दजी महाराज परमहंसजी तो सदा ही श्री श्री १००८ श्री स्वामी हरसेवानन्दजी महाराज परमहंसजी को देख देख कर जीते थे । उन्होंने अपने श्रीसद्गुरु महाराजजी के आश्रम की अतिशय, महान, और अत्यन्त दुष्कर सेवाएँ की ।
   गुढ़विद्या जगन्माया, देहे चाज्ञानसम्भवः ।
   उदयं स्वप्रकाशेन, गुरुशब्देन कथ्यते ॥

विद्यायें चाहे कितनी भी गूढ़ हों, साधनायें चाहे कितनी भी कठिन हों, और चाहे शिष्य  कितना भी अज्ञानी क्यों न हो परन्तु यदि वह पूर्ण श्रद्धा के साथ सद्गुरु के बतलाये हुये गुरु मंत्र का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, ध्यान करता है तो मन के अन्दर स्वतः आत्मज्योति प्रकाशित हो जाती है । जिस ज्योति के प्रकाश से समस्त गूढ़ विद्यायें या गूढ़ से भी गूढ़ साधनायें स्वतः सिद्ध हो जाती है और वे गूढ़ विद्यायें श्री सद्गुरु की दया से सदा सदा प्रकाशित होती रहती है और प्रकाशित होती रहेंगी । इसलिये जीवन में सद्गुरु की उपयोगिता है ।
          प्रकान्ड विद्वान श्री राममूर्ति त्रिपाठीजी ने ’गुरुमहिमा’ नामक पुस्तक में उनके वर्णन लिखे हैं । गुरु का शिष्य उसके लिये विस्मयजनक, जीती जागती अमूल्य निधि है । जिसका मोहनीय दृश्य साधक को आनंद से अभिभूत कर देता है, उन लोगो के अन्दर नूतन चेतना का संचार कर देता है। किन्तु स्वामीजी के सामने महान एवं विस्मयकारी जीवन्त जीव की क्या तुलना हो सकती है। स्वामीजी के योग ऐश्वर्य से सभी चमत्कृत थे । प्रायः सभी को स्वामी जी संकटों व आपदाओं से उबारते रहते थे । लेकिन परम सत्‌शिष्य श्री स्वामी हरशंकरानन्जी के लिये तो उनकी अपनी गुरु भक्ति ही पर्याप्त थी । श्री गुरुचरणों की सेवा, गुरुनाम का भजन, सुमिरन, दर्शन, पूजा, व ध्यान उनके लिये सब कुछ था। श्रद्धा से विभोर होकर उन्होनें श्रीस्वामी हरसेवानन्दजी महाराज परमहंस की चरणधूलि को इकट्ठाकर एक बहुत बडे़ डब्बे में रख लिया था । स्वामीजी के खडा़ऊँ उनकी पूजा बेदी में थे । इनकी पूजा करना, गुरुचरणों का ध्यान करना और गुरुचरणों की रज अपने माथे पर लगाना और उसे खाना उनका नित्य नियम था ।
 राम नाम कलि कामतरु, राम भगति सुर धेनु ।
    सकल सुमंगल मूल जग, गुरु पद पंकज रेनु ॥
 चरण धूलि माथे धरू, सत्‌ सत्‌ कोटि प्रणाम ।
     जग तारण भव हरण, जीवन धन्य सुख धाम ॥

इसके आलावा उनको किसी और योग विधि से मतलब नहीं था। केवल अपने गुरु का नाम, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान तथा आज्ञा का पालन करना ही उनके लिये महामंत्र था । इसी का वे जप तथा भजन के रूप में कीर्तन भी कर लेते थे ।
 
श्री श्री १०८ श्रीसद्‌गुरु स्वामी सरनानंदजी महाराज की हस्तलिपि में इस लेख का अंश
एक दिन प्रातः जब वे हर रोज की भाँति श्रीसद्गुरु महाराजजी की चरण रज माथे पर धारण कर भजन, सुमिरन, ध्यान कर रहे थे कि तभी उनके अस्तित्व में कुछ आश्चर्यकारी एवं विस्मयजनक दृश्य वाली शक्ति ज्योति के रूप में प्रगट हुई। उन्होंने अनुभव किया कि दोनों भौंहों के ऊपर और माथे के बीच में गोल आकार का श्वेतपुन्ज (प्रकाशपुन्ज) प्रकाश बहुत ही चमकीला चमकता हुआ आकर स्थिर हो गया। यूँतो यह प्रकाश पहले भी कभी कभी आया करता था। संपूर्ण ध्यान की अवस्था में यानी संपूर्ण साधनावधि में भी यह प्रकाश बना रहता था, पर आज उसकी सघनता प्रकाशित तथा चमक कुछ ज्यादा ही थी। उसका आश्चर्य तो कुछ नहीं था क्योंकि यह क्रिया तो और पहले से हो रही थी पर उसमें कुछ विशेषता यह थी कि गोल आकार के रूप में श्वेत प्रकाश में हल्का सा विस्फोट हो गया और उसमें एक श्वेत कमल खिल उठा। गुरु नाम धुन के साथ ही ये श्वेत पंखुड़ियाँ खुल गयीं और उसके अंदर से प्रकाश की सघन रेखा उभरी। इसी के पश्चात उनको अनायास ही अपने आश्रम में सिंघासन पर आसीन ध्यानस्थ बैठे हुये दर्शन दिये। जो दर्शन ह्रदय अंदर के मंदिर में हो रहा था वही दर्शन बाहर आश्रम के अंदर सिंघासनाशीन पे मिला। अपने मन में ग्लानी की स्थिति में योग-विद्या से अनभिज्ञ दासनदास को यह सब अचरज भर लगा। दिन में जब दर्शन खुला तो अवसर देखकर श्रीसद्गुरुमहाराज के दर्शन करने गये तो डण्डवत्‌ प्रणाम करने के बाद उन्होंने रात यानी ब्रह्म मुहुर्त में भजन, सुमिरन, ध्यान की सारी बातें बताई जो ध्यान में घटी थीं। दासनदास की सारी बाते सुनने के बाद श्रीस्वामीजी मुस्कुराये और बोले बेटा, इसे आज्ञाचक्र और सहसदल का जागरण कहते है । अब जब तुम ध्यान लगाना तो सहसदल कमल पर आसीन श्रीसद्गुरु का ध्यान लगाना । जब जिस रूप में चाहोगे तब उसी रूप में दर्शन मिलेगा ।
श्री स्वामीजी के इस कथन के उत्तर में दासनदास के कहा कि हे मेरे श्रीसद्गुरुदेव मेरे प्राणदाता, जीव उद्धारक मैं तो सदा सदा आपको ही तथा आपके श्रीचरणों को ही देखते रहना चाहता हूँ। मुझे तो इतना मालूम है कि मैं सदा सदा आपके श्रीचरणों की धूलि को अपने माथे पर लगाया करता था, यह जो कुछ भी है आपके श्रीचरणों की धूलि का चमत्कार है। अब तो यह नयी बात जानकर मेरा विश्वास और भी पक्का हो गया कि श्रीसद्गुरु  के चरणों की धूलि से शिष्य बड़ी आसानी से भवसागर पार कर सकता है । इसमें श्रीसद्गुरु की असीम कृपा तथा श्रीसद्गुरु  के श्रीचरणों की धूलि का प्रताप है।
        मेरे कोई और न दूजा , निस दिन होय आपकी पूजा ।
        बिनु आप कोई और न जानूं , छिन छिन मन में आपको मानू ॥

जिस प्रकार पतिव्रता नारी अपने पति के अतिरिक्त दूसरे पुरूष पर दृष्टि डालना पाप समझती है ,उसी प्रकार हे प्रभु ! अपने दास में ऐसा भाव, भक्ति पैदा कर दें कि आपको छोड़कर किसी मनुष्य या देवी देवता पर भी किसी प्रकार का भरोसा रखना हमें अपराध मालूम होने लगे । हम एक ही व्रत को धारण करें और वह हो गुरुव्रत । हे मालिक यदि आपमें अचल विश्वास हो तो अन्य किसी से आशा रखने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। हे भगवान मेरे मन में बारंबार आपके श्रीचरणों के ही दर्शन हों तथा आपके चरणों का चरणामृत व चरण धूलि का सदा सदा सेवन करता रहूँ क्योंकि इस चरण रज रूपी अंजन से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है।
पग धूलि प्रभु चरणन केरि, करत निवारन विपति घनेरि ॥
चरण विभूति सर्व सुख भंजन , दिव्य दृष्टि देत एहि अंजन ॥


गुरोः पादोदंक युक्त्वा , सोऽसौऽक्षय वटः ।
तीर्थ राज प्रयागश्च , गुरो मूर्ति नमो नमः ॥

श्रीसद्गुरु महाराज का चरणामृत पान करना सदा ही कल्याणकारी होता है । जो अक्षय कल्पवृक्ष के समान अनवरत फल प्रदान करने वाला होता है और श्रीसद्गुरु महाराज के चरणामृत का पान तो सारे तीर्थों के जल पीने से भी ज्यादा हितकारी है। इसलिये सारे संसार में सर्वश्रेष्ठ विभूति को गुरु कहा गया है जो संसार का कल्याणकारी होता है। ऐसे दयावान कृपासागर श्रीसद्गुरु को डण्डवत प्रणाम करने से पूर्णता प्राप्त होती है। श्रीसद्गुरु महाराजके श्रीचरण कमलों  का चरणामृत पीने से जन्म-जन्मान्तरों के पापों का नाश हो जाता है, काशी में वास पाता है और शिष्यों के भावों में विनम्रता आती है। ऐसे विनम्र ह्रदय में भक्ति, भाव, व ज्ञान का संचार होता है।    
काशी क्षेत्रं तन्निवासो, जाह्नवी चरणोदकम्‌ ।
गुरुः विश्वेश्वरः साक्षात, तारकं ब्रह्म निश्चितम्‌ ॥

काशी में निवास करने से, गंगाजी में स्नान करने व उनके जल पीने से जो सिद्धि व फल प्राप्त होता है और ब्रह्मा, विष्णु, महेश की सेवा, पूजा व साधना से जो फल प्राप्त होता है, वह सब कुछ केवल श्रीसद्गुरु महाराजजी के चरणामृत पान करने से ही प्राप्त हो जाता है । श्रीसद्गुरु का चरणामृत शिष्य के जन्म-जन्मान्तरों के सारे कलिमल कलुष को साफ करके साधक से सिद्ध बना देता है और सिद्ध से इष्टत्व प्रदान करते हुये ब्रह्मत्व को प्राप्त करा देता है ।
      सर्व तीर्थावगाहस्य, सम्प्राप्नोति फलं नरः ।
      गुरोः पादोदकं पीत्वा, शेषं शिरसि धारयन्‌ ॥

श्रीसद्गुरुदेवजी के चरणामृत को पीकर व बचे हुये चरणामृत को सिर पर धारण करने से साधक सभी तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त कर लेता है और निर्मल मन वाला बन जाता है। गुरुतत्व विशुद्ध और पावनतम रहस्यमय ज्ञान है और यह गुरुज्ञान शिष्यों को अपने स्वरूप का बोध कराता है । शिष्य की अज्ञानता को नष्ट करके व शिष्य को उसके निज स्वरूप से परिचित करवा कर, सारे कर्म बंधनों से विमुक्ति देना श्रीसद्गुरु का ही कार्य है।
 न पादुकापरो मन्त्रो न देवः श्री गुरोः परः ।
नहि शाक्तात परा दिक्षा, न पुण्यं कुलपूजनात्‌  ॥

श्री‍सद्गुरुदेव की पादुकाओं की स्मृति से जुडे़ उनके दिये मंत्र से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है। श्रीसद्गुरु से श्रेष्ठ कोई देव नहीं है। श्रीसद्गुरु की दी हुई दीक्षा से बढ़कर कोई दीक्षा नहीं है तथा श्रीसद्गुरु के बताये हुये नाम मंत्र के भजन , सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, और ध्यान से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है। श्रीसद्‌गुरुदेवजी की स्तुति, गान सदा करते हुए उन्हें भजते रहना चाहिये। उनके सतत्‌ भजन व चिन्तन से साधक की बुद्धि स्थिर हो जाती है। बुद्धि स्थिर होने से शिष्य अपने स्वरूप को पहिचान जाता है। श्रीसद्‌गुरुदेवजी का निरंतर चिन्तन करनें से शिष्य की बुद्धि  श्रीसद्‌गुरुदेवजी के प्राणों से जुड़कर पवित्र होती जाती है। इस पावन बुद्धि से ही श्रीसद्‌गुरुदेवजी का ब्रह्ममय स्वरूप प्रगट होकर शिष्य का सदा कल्याण करता है। तब दासनदास की यह अनुभूति हम सब गुरुभक्तों की अनुभूति भी बन सकती है। साधक के हृदय में केवल सघन प्रेम एवं उत्कट भक्ति ही चाहिये, क्योंकि फिर तो असंभव को संभव करने वाली गुरुवर चेतना की महिमा तो अनंत है।
--- सत्‌गुरुसरनानंद


 

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