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गुरु और गुरु युक्ति की महिमा पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
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शनिवार, 18 फरवरी 2012 12:03

गुरु और गुरु युक्ति की महिमा

नारदजी प्रायः देवताओं की सभा में जाया करते थे और सभा समाप्त होने के पश्चात्‌ स्वर्ग से वापस आ जाते थे। एक दिन ऐसा हुआ कि सभा से वापस आने के बाद नारदजी को किसी कारणवश दोबारा वहाँ जाने की आवश्यकता पड़ गयी। तब नारदजी ने देखा कि सभा के दौरान वे जिस स्थान पर वह बैठे थे उस स्थान पर गढ्ढा खोदा जा रहा है और वहाँ की मिट्टी हटायी जा रही है। यह देखकर नारदजी ने वहाँ उपस्थित देवताओं से पूछा कि आप लोग ये क्या कर रहे हैं? तब सभी देवताओं से नारदजी को कहा कि यह तो आपकी वजह से हमें रोज ही करना पड़ता है क्योंकि आप निगुरा (जिसका कोई गुरु ना हो ) हैं। अतः आपके बैठने से स्थान अपवित्र हो जाता हैं। नारद जी ने कहा कि गुरु का इतना महत्व है और मैं अब तक इस सत्य से अनभिज्ञ था। फिर उन्होंने सलाह ली कि किसे गुरु बनाया जाये? तब देवताओं ने कहा कि यह तो स्वर्ग है, सद्‌गुरु तो जीवों के कल्याण हेतु मृत्युलोक में ही निवास करते हैं। अतः तुम्हें मृत्युलोक में जाकर ही सद्‌गुरु बनाना होगा। तब नारदजी ने देवताओं से पूछा कि मैं गुरु को कैसे पहिचान पाऊँगा। तब सभी देवताओं ने कहा कि कल सुबह तुम्हें सबसे पहले जो भी व्यक्ति मिले उसी को गुरु बना लेना। नारद जी सहमत हो गये और गुरू की खोज करने मृत्युलोक में आ गये। नारदजी ने संकल्प लिया कि मुझे प्रभातकाल में जो सर्वप्रथम मिलेगा उसको मैं गुरू मानूँगा। प्रातःकाल में सरिता के तीर पर गये। नारदजी ने देखा कि एक आदमी स्नान करके आ रहा है। नारद जी ने मन ही मन उसको गुरू मान लिया। नजदीक पहुँचे तो पता चला कि वह धीवर (मछ्ली पकड़ने वाला) है, हिंसक है (हालाँकि श्रीसद्‌गुरुदेवजी स्वयं ही वह रूप लेकर आये थे)। नारदजी ने उसे सारी कथा व अपने संकल्प के बारे में बताया और हाथ जोड़कर कहा कि "हे मल्लाह ! मैंने तुमको गुरू मान लिया है।"
मल्लाह ने कहा -  हम नहीं जानते गुरू क्या होता है ? हमें तो गुरू का मतलब भी नहीं मालूम है। मुझे जाने दो, मैं यह सब कुछ नहीं जानता हूँ।
नारदजी ने मल्लाह के पैर पकड़ लिये और बोले "गु अर्थात्‌ अन्धकार और रू अर्थात्‌ प्रकाश। जो अज्ञानरूपी अन्धकार को हटाकर ज्ञानरूपी प्रकाश कर दें उन्हें गुरू कहा जाता है। आप मेरे आन्तरिक जीवन के गुरू हैं।" ‍
"छोड़ो मुझे !" मल्लाह बोला।
 नारदजी ने कहा- "आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लो गुरूदेव!"
मल्लाह ने जान छुड़ाने के लिए कहाः "अच्छा, स्वीकार किया, अब जा।"
नारदजी फिर स्वर्ग आ गये। सभी देवी-देवताओं ने नारदजी को देखा और पूछा कि-
"नारदजी ! क्या आपको गुरु मिल गये? अब आप निगुरा तो नहीं हैं ?"
नारदजी को सकुचाते हुये बताना पड़ा कि गुरु तो बना लिया लेकिन.........(वह धीवर है )।
अभी वह लेकिन.... ही कह पाये थे कि सब देवताओं ने कहा, नारद जी तुमने अनर्थ कर दिया, गुरु में लेकिन...... लगाने से अब तुम्हें लख चौरासी भोगनी होगी, आपको चौरासी लाख जन्मों तक माता के गर्भों में नर्क भोगना पड़ेगा। गुरु जैसा भी हो, उसमें लेकिन किन्तु परन्तु नहीं करते।
नारद रोये, छटपटाये किन्तु सभी देवताओं ने कहाः "इसका इलाज स्वर्ग में नहीं है। स्वर्ग तो पुण्यों का फल भोगने की जगह और नर्क पाप का फल भोगने की जगह है। कर्मों से छूटने की जगह तो केवल  गुरूओं के पास वहीं मृत्युलोक में हैं ।"
नारदजी मृत्युलोक आये और उस मल्लाह के पैर पकड़ कर बोले-  "गुरूदेव ! उपाय बताओ। चौरासी के चक्कर से छूटने का उपाय बताओ।"
गुरूजी ने पूरी बात जान ली और कुछ संकेत दिये। नारद उनसे मुक्ति की युक्ति पाकर सीधे वैकुण्ठ आ गये। गुरु के बताये अनुसार नारद विष्णुजी के पास पहुँचे और बोले कि भगवान्‌ ये लख चौरासी बार-बार सुनी है, ये होती क्या है? भगवान्‌ उनको समझाने लगे और नारद गुरु के बताये अनुसार सब समझते हुये भी न समझने का नाटक करते रहे और अंत में बोले, प्रभो! यह लख चौरासी मुझे ठीक से समझ नहीं आ रही है अतः ठीक से समझाने के लिये आप चित्र बनाकर दिखा दें। भगवान्‌ ने जमीन पर लख चौरासी का चित्र बना दिया और नारद ने गुरु के बताये अनुसार चित्र पर लोटपोट कर चित्र मिटा दिया।
भगवान्‌ ने कहा कि- नारद ये क्या कर रहे हो?
नारद ने कहा कि-  भगवान! वह चौरासी भी आपकी बनाई हुई है और यह चौरासी भी आपकी ही बनायी हुई है। मैं इसी में चक्कर लगाकर अपनी चौरासी पूरी कर रहा हूँ, जो गुरु के प्रति नीचा भाव रखने से बन गयी थी।
भगवान ने कहाः "महापुरूषों के नुस्खे भी लाजवाब होते हैं। यह युक्ति भी तुझे उन्हीं से मिली नारद। महापुरूषों के नुस्खे लेकर जीव अपने अतृप्त हृदय में तृप्ति पाता है। अशान्त हृदय में परमात्म शान्ति पाता है। अज्ञान तिमिर से घेरे हुए हृदय में आत्मज्ञान का प्रकाश पाता है।"

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