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श्रीसद्‌गुरुजी लीला पुरुषोत्तम हैं पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
शनिवार, 18 फरवरी 2012 20:24

 

श्रीसद्‌गुरुजी लीला पुरुषोत्तम हैं

(यह लेख ’श्रीसद्‌गुरु-समर्पण ’ नामक सत्साहित्य का अंश है)


महाप्रभु में महानता व दयालुता के लक्षण अल्प-आयु में ही प्रगट हो गये थे। वे अनेक चमत्कारिक शक्तियों से युक्त थे। वे सभी लोगों को भजन, सुमिरन की प्रेरणा बराबर देते रहते थे। वे प्रभात बेला में बड़े-बूढ़ों की मोह निद्रा भंग कर उन्हें मठों, मंदिरों, गुरूद्वारों आदि धर्मस्थलों में जाकर सत्संग सुनने की प्रेरणा देते रहते थे। उनकी कथनी व करनी से दयालुता ही प्रदर्शित होती थी, इन्हीं कारणों से लोग उन्हें दयावान संत पुकारने लगे थे।
Some are born great, some achieve greatness, and some have greatness thrust upon them.
(विलियम शेक्सपियर लिखित नाटक-Twelfth Night, Quote Act II, Scene V).

श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ का विग्रह उपासकों, शिष्यों के ध्यान और धारणा का मंगलमय आधार है। श्रीसद्‌गुरु भगवान की लीलायें दिव्य हैं। हम लोगों की प्रत्येक चेष्टा में ममता, अहंकार, आसक्ति, स्वार्थ और अभिमान आदि दोष भरे रहते हैं, किन्तु श्रीसद्‌गुरु का चरित्र और लीलायें सदा ही सभी दोषरहित होती हैं। उनका अलौकिक व्यवहार जनहिताय होता है। उनकी लीला से भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान में परिपक्वता आती है और फिर श्रीसद्‌गुरु के दर्शन से शाश्वत आनंद की दिव्यानुभूति होती है।
नाम की महिमा में तुलसीदासजी ने कहा है कि जब भक्तजन आर्तभाव से विभोर होकर श्रीसद्‌गुरु महाराज के बतलाये हुये नाममंत्र का जप करते हैं तो उनके बड़े से बड़े संकट कट जाते हैं और वे श्री सद्‌गुरु की दया से सुखी हो जाते हैं।

जपहिं नामु जन आरत भारी, मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।

 छूटै बन्दी महासुख पावै- श्रीसद्‌गुरु महाराज की दयालुता

ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि जब-जब भक्तों पर संकट पड़ा है, तब-तब प्रभु ने किसी न किसी रूप में दर्शन देकर उनके संकटों को दूर किया है। एक ऐसा ही उदाहरण रामनगर निवासी भक्त मेवालाल का है। वे एक मूर्तिकार थे। वे उस समय हरिद्वार में शान्तिकुन्ज के निकट मठ गड़वाघाट आश्रम की शाखा में काम कर रहे थे। वे अचानक ही एक दिन काम छोड़ कर घर जाने को तैयार हो गये, श्रीसद्‌गुरु के समझाने और मना करने के बावजूद वे काम अधूरा छोड़कर चले गये। दो-चार दिन बाद रामनगर के राजा के यहाँ चोरी हुई। जाँच के लिये पुलिस विभाग से चोरों की शिनाख्त करने वाले एक कुत्ते की सहायता ली गई। मेवालाल के घर के सामने आते ही गली के दूसरे कुत्तों ने उस कुत्ते को दौड़ाया और वह जाँच दल का कुत्ता मेवालाल के घर में घुस गया। पुलिस वाले मेवालाल को पकड़कर किले में ले गये और उससे पूछताछ शुरू की। इतने में उनके घर का कोई सदस्य स्वामीजी के पास आया और उन्हें सारी बात सुनायी। स्वामीजी ने कहा कि मैं तो पहले ही कह रहा था कि काम पूरा करके जाओ लेकिन वह नहीं माना और चला गया। अब तो एक ही सहारा है कि वह एवं उसके परिवार वाले खूब भजन करें, मालिक की दया से सच्चाई सामने आ ही जायेगी और वह छूट भी जायेगा। मालिक की दया से ऐसा चमत्कार हुआ कि दूसरे दिन ही एक लम्बा-चौड़ा व्यक्ति आया जो धोती, कुर्ता पहने हुये था। वह व्यक्ति मेवालाल से नाम पूछकर किले के भीतर चला गया। वही व्यक्ति ५-१० मिनट बाद बाहर आकर मेवालाल से कहता है कि अब तुम घर जाओ। मेवालाल और वह व्यक्ति दोनो साथ-साथ किले से बाहर आये लेकिन अचानक ही वह आदमी गायब हो गया। कोई उसे देख ही नहीं पाया कि वह कौन था। इस तरह स्वामीजी ने मेवालाल मिस्त्री की लाज रखी और उनकी दया से मेवालाल संकट से मुक्त हो गये।

संकटमोचन-श्रीसद्‍गुरुदेव 
यह घटना मठ गड़वाघाट आश्रम के आम मुख्तार भक्त रामलोचनजी के साथ घटी। वे  शिवनाथपुर (चोरमखाँ) के निवासी थे । एक बार वे आश्रम के किसी काम से घर से निकले। नियाँमताबाद के पास दो बदमाशों ने उन्हें घेर लिया और उनके जेब व थैले से रुपया-पैसा व कागजात आदि लूटकर भाग गये। थोड़ी दूर जाने के बाद बदमाशों ने उन्हें यह सोचकर फिर से रोकना चाहा कि हो सकता है अभी इसके पास और भी धन हो। रामलोचनजी भी रिवाल्वर रखे हुए थे, उन्होंने  फौरन रिवाल्वर निकाल ली, लेकिन उन्हें डर था कि ये बदमाश उनकी रिवाल्वर ले लेगें और उनकी जान भी ले लेगें। उनको बड़ी घबराहट हुई और वे ’गुरु महाराज मेरी रक्षा करो, मेरी रक्षा करो’ कहने लगे। तब तक बदमाश नजदीक आ चुका था। रामलोचनजी ने रिवाल्वर निकालकर उस पर तीन गोलियाँ चला दीं लेकिन एक भी गोली बदमाश को नहीं लगी। बदमाश लुटेरे के पास भी बन्दूक थी और उसने भी रामलोचनजी पर गोली चलाने की कोशिश की परन्तु श्रीसद्‌गुरु महाराज की दया से उसकी रिवाल्वर खराब हो गई। ’हे मालिक ! मेरे प्राणों की रक्षा करो ’ ऐसा कहकर श्रीसद्‌गुरु का नाम लेकर रामलोचन जी ने चौथी गोली चलाई तो गोली बदमाश को लग गई और वह गिर पड़ा। इस प्रकार रामलोचन जी के प्राणों की रक्षा हो गई। वे भागते हुये सीधे बनारस कालीमहल पहुँचे और स्वामीजी को सारी घटना बताई। स्वामीजी ने उन्हें सांत्वना दिया और समझाकर भयमुक्त किया। इस प्रकार गुरुदेव ने ठीक समय पर उनकी सहायता की तथा उनके प्राणों की रक्षा की। श्रीसद्‌गुरु महाराज की दया दृष्टि के ऐसे और भी अनेकों उदाहरण हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज अपने भक्तों की भावनाओं के अनुरूप विभिन्न रूप धारण करके उनकी सदा रक्षा करते हैं। हृदय सम्राट श्रीसद्‌गुरुदेव भगवान्‌ की इन विलक्षण लीलाओं में उनके सभी स्वरूप अवलोकनीय हैं।

प्रेम गली अति साँकरी जा में दो न समायें-

भगवान्‌ श्रीराम ने भी नारदजी से कहा है कि मैं अपने भक्तों की रक्षा व देखरेख सदैव इस प्रकार करता हूँ जैसे कि एक माता अपने प्राणों से भी अधिक प्यारे बालक की रक्षा करती है। जब कोई अपना सर्वस्व अर्पण कर श्रीसद्‌गुरुदेवजी के शरणागत होता है तब श्रीस्वामीजी की दया से उसके हर बिगड़े कार्य बनने लग जाते हैं। जिस तरह माँ के आँचल तले पल रहे बच्चे को भी कुछ पता नहीं रहता कि उसकी भलाई किसमें है? जीव व शिष्य भी जब इसी तरह अबोध बनकर खुद को अपने इष्टदेव पर अर्पण कर देगा तब श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ उसकी रक्षा करेगें। जहाँ बुद्धि और चतुराई वाली बात है वहाँ भगवान नहीं आते। वे तो दीन-भक्तों के साथ हर घड़ी, हर स्वाँस में सदा रहते हैं। श्रीसद्‌गुरुदेवजी तो जड़ तथा चेतन दोनों में ही विद्यमान हैं। फिर मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि इतने निकट होकर भी वे दिखाई क्यों नहीं देते? लेकिन जैसे लोहे तथा पारस के बीच एक महीन कागज का पर्दा भी उनके संस्पर्शन में अवरोध पैदा करता है, फिर चाहे वह अंतराल लाख कोस दूरी का हो या कम दूरी का हो, आखिर है तो मिलन में रोड़ा ही।
लोग सत्संग तो सुनते हैं पर ध्यान से नहीं सुनते। यदि आप पूरे ध्यान से सत्संग सुनें व उसका चिन्तन, मनन करें तो निश्चय ही व फलदायी होगा। जैसा कि गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है- "सुनत नसावहिं काम, मद, दम्भा।" आप सभी ने कई बार रामचरितमानस का पाठ सुना है तो क्या आपके काम, मद और दम्भ का नाश हो गया है, यदि नहीं तो क्यों? गोस्वामी तुलसीदास ने बिल्कुल सत्य ही लिखा है लेकिन हमारे सुनने का ढ़ंग ही ठीक नहीं है। जब सत्संग सुना जाय तो दृष्टि व ध्यान वक्ता की ओर ही होना चाहिये और उसकी वाणी का श्रवण पूर्ण सचेत होकर करना चाहिये। तब वक्ता की बात आपके समझ में आयेगी और उससे ही आपका कल्याण होगा। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यदि कथा सुनाने वाले वक्ता ने प्रभु की कृपा से काम, क्रोध, मद, दम्भ पर विजय पा ली है तो अवश्य ही उसके उपदेशों से आपके भी काम, क्रोध, मद और दम्भ का नाश हो जायेगा।
हम लोग श्रीसद्‌गुरु महाराज की शरण में हैं, उनकी हम लोगों पर अहैतुकी कृपा है। हम सभी श्रद्धावान्‌ जिज्ञासु हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज ने अपनी दया से हम लोगों को नाममंत्र के संस्कार से संस्कारित किया है। नाममंत्र पाने का अधिकारी तो वह है जिसमें पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा हो। हममें ये सद्‌गुण न होने के बावजूद श्रीसद्‌गुरु महाराज ने हम पर अहैतुकी दया करके नाम-दान किया है और हमें यही प्रेरणा बराबर देते रहते हैं कि यदि जिज्ञासु गुरुभक्ति के रास्ते पर चलते रहेंगे तो एक न एक दिन गुरुभक्ति के गुण उनमें आ ही जायेंगे। श्रीसद्‌गुरु महाराज की कृपा से श्रद्धालु भक्त भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान करके भव सागर से पार हो ही जायेंगे।
निश्चल हृदय में गुरु -वचन को, जो तू अगर बसायेगा।
 निश्चय ही भवसागर से, प्राणी एक दिन तर जायेगा॥


श्रीसद्‌गुरु महाराज के वचनों पर आस्था रखकर सदा ही उनकी  भक्ति करनी चाहिये। कहा गया है कि- "एक वचन गुरुदेव का जाके मता अगाध।" यह कोई मामूली बात नहीं है कि हम  श्रीसद्‌गुरु महाराज की बातों को पूर्णत: समझ लें जैसा कि बहुत से लोग कहते हैं कि हम श्रीसद्‌गुरु महाराज की बात को पूरी तरह समझते हैं।

एक शब्द गुरुदेव का, ताको अनंत विचार।
थाके मुनिजन पण्डिता, वेद गये सब हार॥


गुरु, शिष्य दोनों में ही परमात्मा उक्त भाव से विद्यमान हैं। गुरु उसका प्रत्यक्ष अनुभव करता है और शिष्य को भी परमात्मा का अनुभव कराने में गुरु का ही गुरुत्व है। इसलिये गुरु व ईश्वर में भेदबुद्धि रखने को निषेध किया गया है। यद्यपि शिष्य स्वयं में ब्रह्म से अभेद-भाव की अवस्था को जाग्रत करता है किन्तु व्यवहार दृष्टि से बाह्य गुरु में पूर्ण श्रद्धा भाव रखना आवश्यक है।
गुरु-शिष्य परंपरा हमारी भारतीय विचारधारा एवं हमारे सत्‌-साहित्यों में मौजूद है। गुरु व शिष्य अपने अन्तस्‌ में परम-तत्त्व (ईश्वरतत्त्व, गुरुतत्त्व, जीवतत्त्व आदि) का अनुभव करते हैं परन्तु इन विभिन्न अनुभूतियों को एक ही गुरुतत्त्व की अनुभूति समझनी चाहिये।
जब साधक वेद-सार, परमपुरुष श्रीसद्‌गुरु महाराज के दर्शन कर लेता है, तो वह अपने सभी कर्मफलों से निवृत्त होकर निरंजन स्वरूप पारब्रह्म की साम्यता को प्राप्त कर लेता है अर्थात्‌ -"ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति।"  इस अनुभव में भी मूलतः अनुभवकर्त्ता तो साधक के प्राण रूप में श्रीसद्‌गुरु महाराज ही हैं, जिनका प्रकाश सभी साधकों में चमक रहा है। वह साधक फिर अतिवाद नहीं करता है। वह क्रियावान साधक अपने अन्तस्‌ में श्रीसद्‌गुरु महाराज के साथ क्रीड़ा करता है तथा अंदर ही अंदर भजन, सुमिरन, पूजा, दर्शन, ध्यान व मानसिक पूजा करता रहता है। यह सारा कार्य जो हो रहा है वह श्रीसद्‌गुरु महाराज की दया का ही उद्‌भाव है।

दयाधार बरसावैं सद्‌गुरु-

ईश्वर से उद्‌भूत आध्यात्मिक शक्ति का ही नाम श्रीसद्‌गुरु है। इसी आधार पर मुण्डकोपनिषद्‌ की श्रुतियाँ भी अनुभव में आने वाले श्रीसद्‌गुरु के स्वरूप को यानी परमात्मा के स्वरूप को प्राण की संज्ञा देती हैं। उस श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ की परा-शक्ति का वर्णन अनेक नामों से सुना जाता है जो स्वाभाविक, ज्ञानमयी, बलवती और क्रियावती है। जब श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ साधक को अपनी दया से भजन, सुमिरन, पूजा, सेवा, दर्शन, ध्यान की साधना करवा-करवा कर शक्तिपात द्वारा उसकी कुण्डलिनी-शक्ति को जाग्रत करते हैं तो साधक अपने अंदर उस ज्ञानमयी शक्ति का अनुभव करता है और उसको श्रीसद्‌गुरु की दया से उसकी प्रतीति हो जाती है। जो शक्ति देह को संचालित करती है वह वास्तव में श्रीसद्‌गुरु महाराज की कृपा रूपी ज्ञानमयी शक्ति है। इन ज्ञानमयी क्रियाओं में ज्ञानस्वरूप, दयास्वरूप श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ का स्पष्ट आभास होता है। इस कुण्डलिनी-शक्ति की संचार-शक्ति को उपनिषद्‌ में प्राण की ही क्रिया बताया गया है। यही ज्ञानमयी शक्ति है, ऐसा ही समझना चाहिये। सर्वज्ञता शक्ति का धर्म है और सर्वज्ञ तो ज्ञानस्वरूप श्रीसद्‌गुरु परमात्मा ही हैं। जैसे सब शक्तियों का सर्वशक्तिमान में केन्द्रित होना सिद्ध होता है वैसे ही उस निर्विशेष ज्ञान में सर्वज्ञता समझनी चाहिये।

न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥

                                                                                         (श्वेताश्वतरोपनिषद्‌ ६#८)

करुणा सागर कृपा निधाना, गुरु हैं ब्रह्मरूप भगवाना।
दे उपदेश करैं भ्रम नाशा , दया देत सुख सागर वासा॥


श्रीसद्‌गुरु बहुत दयावान्‌ होते हैं। वे अपने भक्तों, शिष्यों को अमूल्य नाम-महामंत्र प्रदान कर उन्हें सदा-सदा भजन, सुमिरन, पूजा, सेवा, दर्शन, ध्यान करने की प्रेरणा देते रहते हैं तथा उसे अनवरत रूप से करवाते रहते हैं। इसी नाम के भजन, सुमिरन, ध्यान की स्थिति को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। श्रीसद्‌गुरु का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना करने वाला, सब प्रकार से श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ के ही श्रीचरणों में समर्पित तथा उनके अमृततुल्य चरणामृत पान करने वाला साधक, जिज्ञासु उनकी कृपा का पात्र बन जाता है। श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ अपनी दया से जीव को काग से हंस बना देते हैं, भक्त से भगवान्‌ बना देते हैं, शिष्य से सद्‌गुरु बना देते हैं तथा ब्रह्मानुभूति करा देते हैं।   
श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ अपने शिष्यों के सारे उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं और अपने भक्तों, शिष्यों को नाम के भजन-भक्ति की शक्ति से पाँचों पुरुषार्थ प्राप्त करने का अधिकारी बना देते हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज के बतलाये हुये नाम के महामंत्र यानी मंत्रराज को भजने तथा उनकी सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना करने वाला साधक श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ का परमप्रिय शिष्य बन जाता है।
 
कृपा-पात्र मोहिं कीजिये , सद्‌गुरु दीनदयाल ।
बरषे नित चहुँ ओर, इतनी कृपा दीजिये डाल ॥


श्रीसद्‌गुरु की कृपा तो सदा अपने सेवक पर रहती ही है और साथ ही श्रीसद्‌गुरु महाराज स्पष्ट रूप से यह वरदान स्वरूप आशीर्वाद भी देते हैं कि उनका शिष्य सभी विधि से सर्व-विद्याओं में पारंगत हो जाये एवं भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान की साधना से प्राप्त भक्ति की ज्योति साधक के भीतर प्रतिष्ठित हो जाये। यह सदा याद रखना चाहिये कि श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ भक्त की जिज्ञासा की शान्ति का एक मात्र दरवाजा होते हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज इतने दयालु और लोकहितकारी हैं कि सद्‌गुरु प्राप्ति के लिये शिष्य की बैचेनी देखकर स्वयं बिना बुलाये ही चले आते हैं, यह श्रीसद्‌गुरु की कृपादृष्टि एवं उनके प्रेम के आकर्षण शक्ति की देन ही तो है।

हाथ जोड़ विनती यही, सद्‌गुरु कृपानिधान ।
प्रेम भक्ति  वरदान दो , हे सद्‌गुरु भगवान्‌  ॥

प्रेमभक्ति पथ दृढ़ कियो, श्री दयालु करुणेश ।
चरण शरण में ठौर दी , दीन बंधु परमेश ॥


श्रीसद्‌गुरुदेवजी महाराज दया के सागर मनुष्य रूप में साक्षात्‌ भगवान्‌ होते हैं‍, पारब्रह्म होते हैं। उनके श्रीचरणों की मैं वंदना करता हूँ कि हे मालिक ! आपकी कृपा रूपी अमृतवाणी सूर्य की किरणों के समान हैं जिससे साधक के बड़े से बड़े मोह का अज्ञानरूपी अंधकार नष्ट हो जाता है। हे मेरे मालिक ! आपकी अमृतवाणी जीवों के जीवन को बदल देती है। हे मालिक ! आप मुझ जैसे अज्ञानी पर भी अपनी कृपा की वर्षा कर-कर के आत्मज्ञान की ज्योति जला देते हैं। हे मालिक ! आपकी दयाभरी एक वाणी ने मुझ नापाक की जीवन दशा बदल डाली। न जाने कितने साधकों को आपने साधु बना दिया। आपकी एक ही वाणी ने वाल्मीकि को डाकू से संत बना दिया। रामदेव को गायक से संत बना दिया, वूल्लू को गाय से साधक बना दिया,  श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ ने केवल अपने उपदेशामृत से बुल्लेशाह के समस्त जीवन को परिवर्तित कर दिया, उनके जीवन में स्फूर्ति ला दी। श्रीसद्‌गुरुदेव भगवान्‌ के श्रीवचन बुल्लेशाह की चित्तवृत्तियों का केन्द्र बन गये। श्रीसद्‌गुरु की अमृतवाणी में बहुत शक्ति है, वे जीव सुधार हेतु ही उपदेशामृत की गंगा बहाया करते हैं, इसीलिये तो संत सद्‌गुरु की आवश्यकता सदैव ही होती है। यही सदुपदेश समय-समय पर संत महापुरुष देते आये हैं, दे रहे हैं और देते ही रहेगें। महापुरुष कहते हैं-

दीपक सद्‌गुरु वचन है, लेकर चले जो साथ ।
जगत अंधेरी कोठरी , कवहुँ न भटके पाथ ॥


श्रीस्वामीजी कहते हैं कि श्रीसद्‌गुरु का दिया हुआ नाममंत्र का जप सदा कल्याण करने वाला तथा समस्त सुखों का भंडार है। नाम के सुमिरन से समस्त पापों का नाश हो जाता है। इसलिये मालिक के दिये हुये नाममंत्र के भजन, सुमिरन, पूजा, सेवा, दर्शन व ध्यान की साधना खूब करो क्योंकि नाम-जप ही सब सुखों की खान है।

नानक दुखिया सब संसारा, सुखी वही जो नाम अधारा।

इसीलिये जो हर समय श्रीसद्‌गुरु के नाममंत्र का स्मरण करता रहता है उसे गुरु की भक्ति मिलती रहती है तथा उसका जीवन सदा खुशियों से भरपूर रहता है।

 भक्तिसुख  इस लोक में,  परलोक सँवारे संग।
रची  रहे   चादर   मेरी , श्री  सद्‌गुरु   के  रंग ॥


उठते, बैठते, सोते, जागते हर समय श्रीसद्‌गुरु के बतलाये हुये नाम का भजन, सुमिरन, ध्यान सदा करते रहना चाहिये। मार्ग में चलते हुये भी मालिक का नाम सदा जपते रहना चाहिये तथा मालिक की महिमा को सदा सुनते रहना चाहिये। इसलिये कहा गया है कि श्रीसद्‌गुरु की शरण ग्रहण कर अपनी सुरत को हर समय भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान की साधना में लगाये रखें। इससे जीवन सुखमय बनेगा तथा आत्मा परमात्मा से मिलकर एकरूप हो जायेगी और सांसारिक आवागमन के चक्कर से सदा- सदा के लिये छुटकारा मिल जायेगा। यही संतों, महापुरुषों का उपदेश है।

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुःख जाय।
कह कबीर सुमिरन किये, साँई माहिं समाय॥ 


--- सत्‌गुरुसरनानंद



  
 

 

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