Hindi (India)English (United Kingdom)
GURU-SHISHY KATHA संदीपक की गुरुनिष्ठा
संदीपक की गुरुनिष्ठा PDF Print E-mail
Written by Administrator   
Thursday, 23 February 2012 22:16
There are no translations available.

संदीपक की गुरुनिष्ठा
प्राचीन काल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने सोचा कि शिष्यों की गुरु के प्रति भक्ति व निष्ठा की परीक्षा ली जाय। वैसे तो सद्‌गुरु अन्तर्यामी होते हैं, उन्हें असल व बनावटी व्यवहार की परख होती है। फिर भी सत्य को उजागर करने हेतु गुरुओं को कभी-कभी अपने साधना बल का भी प्रयोग करना पड़ता है।
वेदधर्म मुनि से उनके शिष्य अक्सर कहा करते थे "गुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्यौछावर हो जाये तो ही हमारे जीवन की सार्थकता है।" वेदधर्म मुनि  ने इसी आधार पर शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही। वेदधर्म मुनि ने यह सोचकर परीक्षा ली कि जब गुरु का जयघोष होता है, फूल-फल, मिठाइयाँ आदि के ढेर लगते हैं, तब तो बहुत शिष्य आसपास होते हैं लेकिन आपत्ति काल में उनमें से कितने शिष्य उनके साथ होते हैं।
वेदधर्म मुनि ने सभी शिष्यों को अपने पास बुलाया और कहा कि - "शिष्यो! मेरे पूर्वजन्म के कुछ पाप-कर्म तो जप-तप, अनुष्ठान आदि से कट गये हैं, लेकिन थोड़ा प्रारब्ध अभी भी शेष है। मैं इन शेष पाप-कर्मों के फल को इसी जन्म में भोग लेना चाहता हूँ। इस कारण से भविष्य में मुझे एक भयानक बीमारी लगेगी, मुझे कोढ़ निकलेगा और मैं अंधा भी हो जाऊँगा। मेरी इच्छा है कि अन्तकाल मैं काशी जाकर इन कर्मों के फल भोगकर वहाँ ही अपने प्राण त्यागूँ।। आप लोगों में से कौन शिष्य मेरे साथ काशी आकर मेरी सेवा करना चाहता है?"
सभी शिष्य सोचने लगे कि वैसे भी गुरु अब लौट के आने वाले तो हैं नहीं, भविष्य में गुरु से कुछ और अधिक मिलने की आशा भी नहीं है। कोई भी शिष्य ऐसी गंभीर स्थिति में गुरु के साथ जाने को तैयार नहीं था, अतः सभी शिष्यों ने चुप्पी साध ली।
वेदधर्म मुनि के शिष्यों में एक शिष्य था संदीपक। संपीदक  गुरु-सेवापरायण, सच्चा भक्त एवं कुशाग्र बुद्धिवाला था। उसने कहा "गुरुदेव! मैं आपकी सेवा में रहूँगा।"

गुरुदेव- "मेरी शेष उम्र इक्कीस वर्ष की है, अतः तुम्हें इक्कीस वर्ष तक मेरी ही सेवा में रहना होगा।"

संदीपक- "इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है।"

वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी नगर में मणिकर्णिका घाट के पास रहने लगे। संदीपक पूरे तन-मन से गुरुसेवा में लग गया।  गुरु की आवश्यकता के अनुसार दातून-पानी, स्नान-पूजन, वस्त्र-परिधान इत्यादि की तैयारी पहले से ही करके रख लेता। प्रातः काल में भिक्षा माँगकर लाता और गुरुदेव को भोजन कराता। कुछ दिनों के बाद ही गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकल आया और फिर संदीपक की अग्नि-परीक्षा शुरु हो गयी। कुछ समय बाद गुरु अंधे भी हो गये। गुरु का शरीर कुरूप और स्वभाव बहुत चिड़चिड़ा हो गया था। लेकिन संदीपक दिन-रात गुरुजी की सेवा खुशी-खुशी करता। वह उनके कोढ़ के घावों को साफ करता, उनमें दवा लगाता। संदीपक हर रोज गुरु को नहलाता, उनके कपड़े धोता और आँगन भी बुहारता था। गुरुजी का स्वभाव दिनों-दिन क्रोधी एवं चिड़चिड़ा होता जा रहा था। वे संदीपक को गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, कभी-कभी डंडे से भी मारपीट करते थे। संदीपक खूब शांति व धैर्य से यह सब सहते हुए दिन प्रतिदिन ज्यादा तत्परता व उत्साह से गुरु की सेवा में मग्न रहने लगा। संदीपक के हृदय में गुरु के प्रति भक्तिभाव और भी प्रगाढ़ होता गया।

संदीपक की ऐसी अनन्य गुरुनिष्ठा देखकर एक दिन काशी के अधिष्ठाता देव भगवा्न्‌ विश्वनाथ उसके समक्ष प्रकट हो गये और बोले‍- "जो गुरु की सेवा करता है, मानो वह मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है, वह मुझे ही संतुष्ट करता है। तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम अति प्रसन्न हैं। इसलिए बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।" संदीपक ने अपने गुरु की आज्ञा के बिना कुछ भी माँगना ठीक न समझा।  शिवजी ने जब पुनः आग्रह किया तो संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और बोला- "शिवजी वरदान देना चाहते है। आप आज्ञा दें तो मैं वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाये।"

गुरु ने संदीपक को डाँटते हुए कहा- "तू मेरी सेवा करते-करते इतना थक गया है कि वरदान माँगता चाहता है जिससे मैं अच्छा हो जाऊँ और तू मुक्त हो आराम से रहे। अरे मूर्ख! मेरा कर्म कभी न कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।"
संदीपक वापस शिवजी के पास जाकर वरदान माँगने से मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित हो कि कैसा निष्ठावान्‌ शिष्य है। शिवजी विष्णुलोक में जाकर भगवान्‌ विष्णु से सारा वृत्तान्त कहा। भगवा‍न्‌ विष्णु भी संतुष्ट हो संदीपक के पास वरदान देने के लिए प्रकटे।
‍गुरुभक्त संदीपक ने कहाः "प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए।" भगवान्‌ ने फिर से आग्रह किया तो संदीपक ने कहाः "आप मुझे यही वरदान दें कि गुरुदेव के प्रति मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन-प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे। इसके अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए।" ऐसा सुनकर भगवान विष्णु ने संदीपक को गले लगा लिया।

संदीपक ने वापस जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अंधापन, न ही अस्वस्थता ! शिवस्वरूप सद्‌गुरु श्री‍वेदधर्म ने संदीपक को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे बोलेः "वत्स! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा। जो कोई भी इस प्रसंग को पढ़ेंगे, सुनेंगे अथवा सुनायेंगे, वे महाभाग मोक्ष-पथ में अडिग हो जायेंगे। पुत्र संदीपक! तुम धन्य हो, तुम सच्चिदानन्दस्वरूप हो।"
गुरु के संतोष से संदीपक गुरुतत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया।
जब तक गुरू का हृदय शिष्य पर संतुष्ट नहीं होता, तब तक शिष्य में ज्ञान प्रकट नहीं होता। उसके हृदय में गुरु का ज्ञानोपदेश पचता नहीं है। गुरु का संतोष ही शिष्य की परम उपासना है, परम साधना है। गुरु को जो संतुष्य करता है, प्रसन्न करता है उस पर सब संतुष्ट हो जाते हैं। गुरुद्रोही पर विश्वात्मा हरि रूष्ट होते हैं। आज संदीपक जैसे सत्शिष्यों की गाथा का वर्णन सत्शास्त्र कर रहे हैं। धन्य हैं ऐसे सत्शिष्य !