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GURU-SHISHY KATHA प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना
प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना PDF Print E-mail
Written by Administrator   
Saturday, 25 August 2012 10:39
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प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना

भक्त अपनी जिज्ञासा व्यक्त करते हु्ये कहता है कि हे स्वामीजी! आप सदा कहते हैं कि परमात्मा भाव के भूखे होते हैं। ये भाव कौन से हैं? इन भावों को स्वयं में विकसित करने की विधि क्या है? इन भावों को सद्‌गुरु पर समर्पित करने की युक्ति क्या है? मुझ दीन पर दया कर मेरे हित के लिये इन्हें विस्तार से कहिये।
श्रीस्वामीजी के समझाते हुए कहा कि हे भक्त! जिसके जीवन में प्रेम भाव की हिलोरें नहीं होती उसके जीवन का न तो कोई अर्थ होता और न ही कोई मूल्य। जीवन की वह चेतना जिसे गुरुत्व, ईश्वरत्व, ब्रह्मत्व व संपूर्णता कहा गया है उसे प्राप्त करने के लिये अपने अंदर प्रेम, दया, करुणा, श्रद्धा, स्नेह, त्याग, सहनशीलता आदि गुणों का विकास करना पड़ेगा। कहने में यह यथार्थ के अधिक निकट होगा कि अपने अंदर नारीत्व के भाव पैदा करने होंगे। शक्ति संगम तंत्र में बताया गया है कि पुरुष में प्रेम भाव व उसके एहसास की कमीं होती है। उसे प्रेम भाव की प्रेरणा नारी व प्रकृति से मिली है। उसमें यह गुण जन्मजात नहीं है। जन्मजात प्रेम का गुण तो मात्र नारी का है। नारी ही जन्म देने की प्रक्रिया जानती है। नारी स्वयं में एक प्रवाह है। एक ऐसा प्रवाह जो बूँद से दौड़ता हुआ समुद्र बन सकता है। वेदों में दो टूक शब्दों में स्पष्ट लिखा हुआ है कि स्त्री संसार की सर्वश्रेष्ठ रत्न हैं। वराहमिहिर ने कहा है कि संसार में स्त्रीत्व के अतिरिक्त ऐसा कोई बहुमूल्य रत्न है ही नहीं जिसको सुनने से, देखने से, स्पर्श करने से और स्मरण करने से आनंद मिलता है। ऐसा अह्लाद उत्पन्न करने की क्षमता केवल नारी में ही हो सकती है। नारी स्वयं में एक श्रुत है, दृष्ट है, स्मृत है। यदि नारी नहीं तो घर में न अर्थ है, न पुत्र है, न संसार है, न विश्व की कोई क्रिया है और न जीवन का आनंद है।‍
नारी भावों से परिपूर्ण होती है कि ईश्वर उसके प्रेम में नाँचने को भी बाध्य हो जाता है। इसके अनेकानेक उदाहरण भरे पड़े हैं जैसे राम को शबरी के झूठे बेर खाने पड़े। ऐसी ही एक कथा मीरा के बारे में प्रचलित है। वृंदावन के एक मंदिर में मीराबाई ईश्वर को भोग लगाने के लिए रसोई पकाती थीं। वे रसोई बनाते समय मधुर स्वर में भजन भी गाती थीं। एक दिन मंदिर के प्रधान पुरोहित ने देखा कि मीरा अपने वस्त्रों को बिना बदले और बिना स्नान किए ही रसोई बना रही हैं। उन्होंने बिना नहाये-धोये भोग की रसोई बनाने के लिए मीरा को डाँट लगा दी। पुराहित ने उनसे कहा कि ईश्वर यह अन्न कभी भी ग्रहण नहीं करेंगे। पुरोहित के आदेशानुसार, दूसरे दिन मीरा ने भोग तैयार करने से पहले न केवल स्नान किया, बल्कि पूरी पवित्रता और खूब सतर्कता के साथ भोग भी बनाया। शास्त्रीय विधि का पालन करने में कहीं कोई भूल न हो जाए, इस बात से भी वे काफी डरी रहीं। तीन दिन बाद पुरोहित ने सपने में ईश्वर को देखा। ईश्वर ने उनसे कहा कि वे तीन दिन से भूखे हैं। पुरोहित ने सोचा कि जरूर मीरा से कुछ भूल हो गई होगी। उसने भोजन बनाने में न शास्त्रीय विधान का पालन किया होगा और न ही पवित्रता का ध्यान रखा होगा। ईश्वर बोले- इधर तीन दिनों से वह काफी सतर्कता के साथ भोग तैयार कर रही है। वह भोजन तैयार करते समय हमेशा यही सोचती रहती है कि उससे कहीं कुछ अशुद्धि या गलती न हो जाए। इस फेर में मैं उसका प्रेम तथा मधुर भाव महसूस नहीं कर पा रहा हूं। इसलिए यह भोग मुझे रुचिकर नहीं लग रहा है। ईश्वर की यह बात सुन कर अगले दिन पुरोहित ने मीरा से न केवल क्षमा-याचना की, बल्कि पहले की ही तरह प्रेमपूर्ण भाव से भोग तैयार करने के लिए अनुरोध भी किया। सच तो यह है कि जब भगवान की आराधना अंतर्मन से की जाती है, तब अन्य किसी विधि-विधान की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है। अभिमान त्याग कर और बिना फल की चिंता किए हुए ईश्वर की पूजा जरूर करनी चाहिए।
केवल स्मृतियों में ही नहीं भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन में भी शक्ति-परिकल्पना और शाक्त-साधना के रूप में नारी शक्ति की प्रकारान्तर से यथार्थ स्वीकृति रही है। देवी भागवत्‌ में स्त्री-शक्ति को समस्त कलात्मक जगत्‌ का पर्याय माना गया है -
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः,
स्त्रियः समस्ता सकला जगत्सु।
शक्ति संगम तंत्र में शक्ति रूपा नारी का स्वरूप वर्णन करते हुए नारी-विमर्श को सामाजिक संदर्भ में एक विशिष्ट आयाम के रूप में दिशा दी गई है -
नारी त्रैलोक्यजननी नारी त्रैलोक्यरूपिणी।
नारी त्रिभुवना धारा नारी देहस्वरूपिणी॥

शंकरोपनिषद्‌ में भगवान्‌ शंकर ने स्वयं कहा है कि नारी भाव के समान न कोई सुख है, न गति, न जप, न तप, न भाग्य, न राज्य, न तीर्थ और न ही मंत्र है। वही इस संसार की पूज्यनीय है क्योंकि वह पार्वती का रूप है। नारी शक्ति है और नारी ही एकमात्र पूर्णत्व है। नारी भाव तो मातृत्व से परिपूर्ण है, एक संपूर्ण कोमलता का समावेश है। पूरा संसार सिमट कर उसमें पल सकता है। वही एक ऐसी शक्ति है जिसने महावीर, महात्मा बुद्ध और ईसा जैसी महाविभूतियों को रचा है। इस संसार का जितना भी विकास हुआ है वह नारीत्व की वजह से हुआ है। संसार में जितना भी उच्चकोटि का ज्ञान व चेतना का प्रादुर्भाव हुआ है वह नारी की वजह से हुआ है। नारीत्व में उन गुणों का समावेश है जो प्रवीणता व पूर्णता के द्योतक हैं। इसीलिये संसार के श्रेष्ठतम काव्य नारी पर ही लिखे गये हैं। श्रेष्ठतम इतिहास नारी पर ही लिखे गये हैं। नारी अपने-आप में दया की खान होती है। नारी एक सजृनात्मक शक्ति है। शंकराचार्य जैसे उद्‌भट विद्वान, विश्वामित्र, वसिष्ठ, रामकृष्ण परमहंस, कणाद, पुलस्त्य, परमहंस दयालजी, परमहंस श्रीस्वरूपानंदजी, परमहंस श्रीआत्मविवेकानंदजी, स्वामी हरसेवानंदजी, स्वामी हरशंकरानंदजी महाराज नारी की ही अप्रतिम कृति हैं। स्नेह, ममता, वात्सल्य, धैर्य, सहनशीलता, सेवा आदि गुणों से लेकर मंत्र, अनुष्ठान, पूजा आदि स्त्रैण तत्त्व हैं।
इसी भाव को सूरदास ने कहा है कि मैं तो अपने कृष्ण की प्रेमिका हूँ। मीरा ने कहा है कि प्रिय ही मेरा सब कुछ है। कृष्ण ही मेरी स्वाँस, धड़कन व चेतना है। रक्त के कतरे-कतरे में कृष्ण है। कबीर ने कहा है कि मैं अपने राम की बहुरिया हूँ जब मैं उनको स्मरण करता हूँ तो मन में भक्ति भाव की चेतना पैदा होती है। इसी चेतना के माध्यम से मैं अपने जीवन के उस लक्ष्य को प्राप्त कर सकूँगा जो मेरे जीवन का ध्येय है। गुरु से प्रेम मेरे जीवन को उर्ध्वगति देता है।
 

Last Updated on Saturday, 25 August 2012 10:53