Hindi (India)English (United Kingdom)
मुखपृष्ठ लेख प्रेम की तड़प

Science of Sant Mat

  Science of Sant Mat ( As explained by my Sat Guru Shrimat Paramahansa Sarananandji ) The spirituality is the continuous process in which GOD refines HIMSELF. For this purpose HE incarnates in the ...

Read more

Contact for Initiation

Contact for Initiation Initiation is given by Sat Guru Shrimat Paramahansa Sarananandji Maharaj, HE is the present Guru of Sant Mat Anuyayi Ashrams. Devotee has to visit personally to ...

Read more

Objective

Mission 1. For spiritual aspirant to serve spritual path and peaceful atmosphere to elevate the spirituality .  liberating Self Knowledge to lead the ...

Read more
More in: Latest, Newsflash
प्रेम की तड़प पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
मंगलवार, 13 अगस्त 2013 21:39

 

प्रेम की तड़प

(यह लेख ’शिष्य का प्रेम-विरह ’ नामक सत्साहित्य का अंश है)
प्रभु के प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता है। यह केवल अनुभव का विषय है, न कि कहने व सुनने का। प्रेम का अनुभव तभी हो सकता है जब मन स्थिर होकर अंदर की ओर मुड़े। श्रीस्वामीजी समझाते हुये कहते हैं कि प्रेम का वृक्ष बिना धरती व बिना बीज के ऊगता व फैलता है, अर्थात्‌ इस रूहानी प्रेम का आधार संसार तथा विषय-विकार नहीं है। प्रेम एक ऐसा दिव्य वृक्ष है जिसमें आत्मिक आनंद के अनगिनत ज्योतिर्मय फल लगे हैं। जिसका स्वाद प्रेमी-शिष्य गुरु की कृपा से लेता है। श्रीस्वामीजी समझाते हुये कहते हैं कि जब मेरे अंदर गुरु प्रेम की लिव लग गई तो मेरा समस्त भ्रम व झूठी धारणायें इस प्रकार दूर हो गईं जैसे वायु के झोकों से बादल बिखर जाते हैं, धान के छिलके उड़ जाते हैं। प्रेम की इस अवस्था को प्राप्त करना मेरी शक्ति में न था, यह तो श्रीसद्‌गुरु की कृपा का सुमधुर फल है।
प्रेम तो परमात्मा का स्वरूप होता है, अतः श्रीसद्‌गुरु के प्रति प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति मानव निर्मित भाषाओं के माध्यम से नहीं हो सकती है। प्रभु असीम है और हम सीमित हैं, यद्यपि असीम की ओर अभिगमन का मार्ग ससीम से होकर ही गुजरता है। जैसे जीव परमात्मा का अंश है उसी प्रकार मानव प्रेम के जितने भी रूप हैं सब उस परमपिता के दिव्य पूर्ण प्रेम के अंश मात्र ही हैं। इस प्रकार की अनुभूति से मानवीय प्रेम भी दिव्य हो जाता है। मानवीय प्रेम के सभी भाव श्रीसद्‌गुरु के प्रति अनिवर्चनीय प्रेम के प्रतीक रूप में ही ग्रहण किये गये हैं।  हृदय में बसे प्रेम की समस्त धाराओं को पूर्णरूपेण श्रीसद्‌गुरु की ओर मोड़ देना ही दिव्य प्रेम व भक्ति प्राप्त करने का उत्कृष्ट साधन है। समस्त प्रेमभावों को अपने गुरु में समर्पित कर देना ही भक्ति है। श्रीसद्‌गुरु की उपासना में श्रद्धा व प्रेम भाव ही प्रधान है और इनकी अभिव्यक्ति ही शिष्यत्व की सामर्थ्यता है। प्रेम व श्रद्धा भाव के बिना भक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती है। प्रेम के साथ श्रद्धा भाव व विश्वास का योग हो जाने से प्रेमाभक्ति का उदय होता है। भजन व सेवा दोनों में अगाध प्रेम का होना आवश्यक है। सेवा आन्तरिक प्रेमभाव का सगुण साकार स्वरूप होता है और सेवा से आन्तरिक साधना को दृढ़ता व प्रेम को प्रगाढ़ता प्राप्त होती है। प्रेमपूर्वक अपना सब कुछ श्रीसद्‌गुरु को समर्पित करके, निष्काम भाव से गुरु की सेवा करना ही प्रेमाभक्ति का प्रमुख अंग है। श्रीसद्‌गुरु के प्रति प्रेम को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है। निष्काम भाव से गुरु से प्रेम करना सर्वोत्तम प्रेम कहा गया है। प्रेम तो जीवन है, संपूर्ण हृदय है और मानसरोवर जैसा निर्मल है।
आत्मा-परमात्मा के प्रेम की स्वाभाविकता को प्रगट करने के लिये संतों व भक्तों ने कमल-जल, मछली-नीर, चातक-मेघ, चकवी-सूर, पतंगा-ज्योति, हिरण-नाद, भौंरा-कमल आदि संबंधों से इसकी उपमा की है। इसी प्रेम को पति-पत्नि, माता-पिता, माता-पुत्र व सखा-बंधु आदि संबंधों द्वारा भी प्रगट किया है। प्रेम धारा दोनों ओर से बहती है। इसी प्रेम में ही प्रेमियों ने अपने प्रीतम से विनोद भी किया है कि प्रेम का कोई छोर नहीं होता है- न पति-पत्नि में पर्दा और न गुरु-शिष्य मे भेद। शिष्य का गुरु के प्रति प्रेम अद्वितीय है क्योंकि यह संपूर्ण समर्पण तथा अपने-आप को मिटा देने की क्रिया है।

प्रेम- एक हृदयोत्सव
प्रेम कोई वासनात्मक चिन्तन का शब्द नहीं है अपितु यह एक उत्सव है, जीवन सार है, परम सिद्धि है, पूर्णता, श्रेष्ठता एवं भव्यता है। जब हृदय सरोवर में प्रेम कमल खिलता है तो सर्वत्र बसंत आ जाता है। हवायें गुनगुनाने लग जाती हैं, नदियाँ संगीत बिखेरने लगती हैं, झरने कल-कल के साथ गान करने लग जाते हैं और खुशी-खुशी हजारों फूल सुगंधित हो महकने लग जाते हैं। प्रेम के बिना हृदय जागृत हो ही नहीं सकता। सिद्धि, जागृति व सफलता का दूसरा नाम प्रेम है।
हजारों में से किसी एक हृदय में इस प्रेम का झरना फूटता है। ऐसे भाग्यशाली का रोम-रोम थिरकने लगता है, शरीर का प्रत्येक अणु श्रीसद्‌गुरु से निःसृत प्यार की तरंगों में समा जाने को मचलने लगता है। जीवन का अर्थ वही समझ सकता है जिसके अंदर प्रेम जागृत हुआ है। यह एक अपूर्व सफलता, परम सिद्धि तथा ब्रह्म से पूर्णतः साक्षात्कार करने की प्रक्रिया है। इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि प्रेम की पूर्णता को जान लेना अति आवश्यक है। यह प्रेम तो सौभाग्यशाली तीर्थ यात्रा है, इस प्रेम यात्रा से ही आध्यात्मिक मार्ग तय होता है। जो भक्त श्रीसद्‌गुरु से पूर्ण श्रद्धा भाव से प्रेम करता है वही इस आध्यात्मिक मार्ग पर कदम रख सकता है, वही प्रेमी प्रार्थनामय बन सकता है, वही अपने-आप को प्रभु में समर्पित कर सकता है और वही अपने-आप को प्रभु में विलीन कर प्रभु को पा सकता है। इसी को प्रेम की तड़प कहते हैं।  मालिक तक वही शिष्य पहुँच सकता है या उनके साथ एकाकार हो सकता है जो पूर्ण श्रद्धा के साथ गुरुप्रेम में विह्वल होता है ।
जब मैं प्रेम शब्द का प्रयोग करता हूँ तो लोग चौकन्नें होकर देखने लगते हैं कि गुरुदेवजी ने यह क्या कह दिया? उनकी ऐसी प्रतिक्रिया उनके विचारों की संकीर्णता ही है क्योंकि उनके दिमाग में प्रेम का तात्पर्य वासना है। सांसारिक लोगों के लिये प्रेम का मतलब शरीर है, गिद्ध दृष्टि है, इन्द्रिय लोलुपता है, स्वार्थ है, नारी शरीर को निगलने की कुटिल भावना है और चालाकी पर चढ़ा हुआ नकली प्यार का झीना सा आवरण है।
प्रेम तो स्वयं को गलाकर मिटा देने की क्रिया है। श्रद्धा व समर्पण भावों से युक्त प्रेम ही सात्त्विक होता है। प्रेमियों के परस्पर समर्पण से ही प्रेम का प्रस्फुटन होता है, प्रणय की सुवास होती है, प्रीति की सुगंध होती है। प्रेम तो एक बीज है। ईश्वर का नामरूपी बीज जब जीव के अंदर अंकुरित होता है तब श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ की प्राप्ति होती है। प्रेम एक प्रार्थना है, समर्पण है तथा स्वयं को विसर्जित कर देने की क्रिया है। प्रेम अत्यन्त सुखद और आनंददायक अनुभूति है।
प्रेम उस आँसू की बूँद है जो आँखों से ढुलकती है लेकिन पलक उसे अपने पास रोक लेती है क्योंकि उसमें उसे प्रीतम का बिम्ब दिखाई पड़ता है। प्रेम निरहंकारिता है व संपूर्ण जीवन का गौरव है, जो दोनों बाँहे फैलाकर पूरे ब्रह्माण्ड को अपने-आप में भर लेता है। प्रेम प्रणव है क्योंकि इसी के सहारे आकाश की सुदूर ऊँचाईयों को पाया जा सकता है, अनंत आकाश में उड़ा जा सकता है और संपूर्णता के साथ श्रीसद्‌गुरु से एकाकार होकर जीवन की सार्थकता को प्राप्त किया जा सकता है।
वे बड़े भाग्यशाली होते हैं जिन्हें श्रीसद्‌गुरु के साथ प्रेम हुआ है। लाखों-करोड़ो में से कोई एक भाग्यशाली होता है जिसके नसीब में प्रेम होता है। जिन्होंने जीवन में प्रेम नहीं किया है वे जीवन में खुशी प्राप्त ही नहीं कर सकते हैं, वे ध्यान या समाधि में डूब ही नहीं सकते हैं। सही अर्थों में ऐसे लोग गुरु-तत्त्व अर्थात्‌ ईश्वर को प्राप्त करने के अधिकारी ही नहीं हैं।
इसीलिए मैं कहता हूँ कि जीवन का श्रेष्ठ तत्त्व प्रेम है। संपूर्ण मनुष्यता का मूल उत्सव प्रेम है। हृदय को हिलोरों से आडोलित करने वाली क्रिया प्रेम है। प्रेम तो बसंत है, फागुन मास की पुरवाई है। प्रेम ही ध्यान में अंदर उतरने या ब्रह्म को पहिचानने का आध्यात्मिक राजपथ है। प्रेम तो अनुग्रह, त्याग, समर्पण तथा ’पूर्णमदः-पूर्णमिदं’  की सही व्याख्या है। मेरी दृष्टि में प्रेम एक श्रद्धा है, जीवन की संपूर्णता है, स्वर्ण कलम से लिखा हुआ सौभाग्य है। जीवन के आनंद का उत्सव है। प्रेम श्रीसद्‌गुरु में लीन होने की क्रिया है, श्रीसद्‌गुरु ब्रह्म से साक्षात्कार करने की क्रिया है।
वेदों की व्याख्या करना सरल है, उपनिषदों को परिभाषित करना सुविधाजनक है, पर प्रेम व विरह की तड़प पर बोलना व लिखना बहुत कठिन है अर्थात्‌ इसे समझना बुद्धि से परे है। फिर भी इस ग्रंथ में श्रीसद्‌गुरु संग प्रेम की तड़प को समझाने का प्रयास किया गया है और भक्ति व प्रेम के मानसरोवर में सुखद डुबकी लगाने के आनंद को वर्णित करने का प्रयास किया गया है।

संतमत एवं प्रेम
गुरुमत या संतमत में प्रेम भक्ति की बड़ी महिमा है एवं इसे सभी यत्नों से उत्तम माना जाता है, इसीलिये इसे प्रेममार्ग या भक्तिमार्ग कहा गया है। श्रीस्वामीजी समझाते हुये कहते हैं कि जिस जीव को प्रेम की युक्ति का पता नहीं है उसे जप, तप, संयम, व्रत का कोई लाभ नहीं होता है। श्रीस्वामीजी अपने सत्संग में बार-बार यही कहते थे कि कोई कितना भी सुन्दर हो, बुद्धिमानी, ज्ञानी व धनवान्‌ क्यों न हो, पर यदि उसके हृदय में श्रीसद्‌गुरु की सच्ची प्रीति नहीं है तो वह मृतक के समान ही है।
संतमत में प्रेम को गुरु-भक्ति व गुरु-सेवा का सार माना गया है और हृदय में गुरु के लिए प्रीति पैदा करने में ही जोर दिया गया है। प्रीतम (सद्‌गुरु) पर समर्पण प्रेम का स्वाभाविक गुण है। प्रेमी के लिये सदा प्रीतम की इच्छा ही प्रधान होती है। वह अपने-आप को बिना किसी शर्त के सद्‌गुरु संग प्रीति की रजा में सौंप देता है। शिष्य अपने बल, बुद्धि के स्थान पर गुरु की दया रूपी शक्ति, समर्थ, ज्ञान व कृपा का आसरा लेता है। सांसारिक सहारे तो जीव को कमजोर व आश्रित बनाते हैं लेकिन श्रीसद्‌गुरु का सहारा एक शक्तिशाली अटल विश्वास को जन्म देता है, जो प्रेमी को निश्चिन्त बना देता है। सद्‌गुरु का सच्चा प्रेमी सदा सुखी रहता है। जहाँ गुरु के साथ प्यार होता है, वहाँ अदब, लिहाज व सत्कार भी होता है। सच्चा प्रेम प्रेमी के हृदय में प्रीतम के प्रति भाव भी पैदा करता है। परम पिता परमात्मा का प्यार हृदय में अपार श्रद्धा पैदा करता है। प्रेम कटुता को मधुरता में बदल देता है। प्रेम दुःख की दवा और रोग विनाशक औषधि है। प्रेम रूपी अमृत के घूँट से मरते हुए में भी जान पड़ जाती हैं।
प्रेम देश, समय, स्थान, जाति, रंग, वंश आदि भेदों से परे होता है। बिना किसी भेद-भाव के कोई भी व्यक्ति अपने हृदय को प्रेम के रंग में रँग सकता है। प्रेम की तड़प आन्तरिक साधना है। श्रीसद्‌गुरु प्रेम का ही स्वरूप होता है। प्रेम आत्मा का स्वाभाविक गुण है जो हर प्रकार के बाहरी बंधनों से मुक्त होता है। कोई व्यक्ति किसी भी समय अपने अंदर प्रेम का भाव पैदा कर सकता है। प्रेम तो नीचे को ऊँचा उठाने वाला महामंत्र है। भक्ति भाव में केवल प्रेम का सिक्का चलता है।
श्रीसद्‌गुरु से प्रेम करने का मतलब श्रीसद्‌गुरु के दिये गये उपदेश से प्रेम करना अर्थात्‌ ’नाम’ या ’शब्द’ से प्रेम करना है। श्रीसद्‌गुरु के नाम का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना करना ही प्रेम में फलीभूत होना है। जब सुरत श्रीसद्‌गुरु के प्रेम व विरह से तड़पती हुई नाम-भजन, सुमिरन व ध्यान के सहारे रूहानी चढ़ाई शुरू करती है तो आत्मा का परमात्मा के प्रति प्रेम दृढ़ होता जाता है। जब यह प्रेम विश्वास से ऊपर उठकर अनुभव के दायरे में आता है तब इसको एक अडिग आधार मिल जाता है। श्रीसद्‌गुरु की दया व भजन-भक्ति की शक्ति से जब जीवात्मा मन और इसके विकारों को पूरी तरह से जीत लेती है तो मन पर चढ़े कर्मों के सभी पर्दे उतर जाते हैं और आत्मा अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप में प्रगट होती है। आत्मा के अंदर पूर्ण परमात्म जागता है। इस अवस्था में आत्मा एक पल के लिये भी परमात्मा से बिछोह नहीं सहन कर सकती है।
प्रेम विरह भी प्रेम को ही जागृत करता है व दृढ़ भी करता है। वियोग की तड़प भी इस बात का प्रतीक है कि हमारा आस्तित्त्व पूरी तरह से अपने प्रीतम (गुरु) पर निर्भर है। प्रेम की तड़प अपने-आप को प्रीतम में लीन कर देने की स्थिति है। इस तड़प का ताप तृष्णा, मोह व मत्सर को जला देता है और मन मंदिर को स्वच्छ करके उसे प्रीतम यानी गुरु का निवास स्थल बना देता है। इसीलिए स्वामीजी ने इसी को विरह तथा प्रेम की तड़प का जजबा कहा है।
गुरु की प्रेमाभिव्यक्ति ही जीव पर अहैतुकी दया और शिष्य को स्वयं में मिलाने का प्रबंध है। श्रीस्वामीजी का हुक्म भी परमात्मा से प्रेम का ही रूप है क्योंकि उस कर्त्ता ने अपने हुक्म से जगत्‌ को इस प्रकार बनाया है कि जीव कभी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं होता है और उसके हृदय में सदा अपने मूल में समाने की तड़प बनी रहती है। यह तड़प भी वह प्रीतम स्वयं पैदा करता है और इस तड़प की तृप्ति का हुक्म व प्रबंध भी वह स्वयं करता है। श्रीसद्‌गुरुजी के प्रेम और हुक्म की दयामय कार्यशीलता के दर्शन आध्यात्मिक लोक पहुँचने पर होते हैं परंतु उस कार्यशीलता को शब्दों में वर्णन करना असंभव है।
प्रभु प्रेम स्वरूप हैं और वे ही सच्चे प्रेम के स्त्रोत भी है। श्रीस्वामीजी कहते हैं कि श्रीसद्‌गुरु ही प्रेम का रूप होता है और प्रेम परमात्मा का रूप होता है। गुरु और प्रेम दोनों अगम व अगाध होते हैं।
श्रीस्वामीजी समझाते हुए कहते है कि गुरु जीव के प्रति अपना प्रेम अपनी दया के रूप में प्रगट करते हैं। गुरु हमें आत्मा, शरीर, जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि, आकाश आदि अनेक रूपों में दया प्रदान करते हैं। अपने से मिलाप की सच्ची चाह, तड़प या लगन भी वे स्वयं बख्शते हैं।
--- सत्‌गुरुसरनानंद


 

LAST_UPDATED2