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Science of Sant Mat

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सन्त संग जनाई परमारथ कै बतिया पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
रविवार, 23 फरवरी 2014 10:41

 

१.   सन्त संग जनाई परमारथ कै बतिया

(यह लेख ’गुरुसूत्र ’ नामक सत्साहित्य का अंश है)

 

 

जेहि के करम हैं भरपूर

 

तेहि के सतगुरु लखइहैं ,नाहीं तो बड़ी दूर,

 

सतगुरु सतनाम लखावैं, पढ़ावैं सो है द्रव्यखोर,

 

सतनाम सतसंग सुनावैं ,लेहीं भ्रम के छोर,

ऐसे गुरु कम जगत में, मिलिये उनसे हाथ जोर

 

जब हम किसी तथ्य को ठीक प्रकार से नहीं समझते हैं तो किसी दूसरे को उसे समझाने में बहुत प्रयास करना पड़ता है और फिर भी पूरी तरह समझाना संभव नहीं हो पाता है। हम जितनी मात्रा में किसी तथ्य को समझते हैं, उतनी ही मात्रा में हमें उस तथ्य को दूसरे को समझाने में प्रयास की जरूरत कम होती है। जब हम किसी तथ्य के सभी पहलुओं को पूरी तरह जानते हैं तो अप्रयास ही हम उसे दूसरों को समझा सकते हैं। फिर एक पुष्प का भी तरीका होता है जो अपने अंदर इतनी सुगंध कर लेता है कि वह बाहर को बहने लगती है और आस-पास का पूरा वातावरण ही सुगंधित हो उठता है। वैसे ही मठ गड़वाघाट के श्रीसद्‌गुरु महाराज पूर्ण ज्ञान-स्वरूप हैं, ज्ञान की अमृतधारा उनके रोम-रोम से चारों ओर प्रसारित हो रही है। उनके सान्निध्य मात्र से ज्ञान की वह खुश्बू शिष्य के अंतस्‌ में स्वतः प्रवेश करती है। वहाँ पर ज्ञान के संचरण हेतु प्रवचन आदि की आवश्यकता नहीं होती, वहाँ तो दर्शन मात्र से प्यास शांत हो जाती है। जिस प्रकार चंदन वृक्ष अपने निकट के वृक्षों को भी सुगन्धित बना देता है, उसी प्रकार सद्‌गुरु के सान्निध्य से शिष्य भी प्रज्ञावान्‌ बनते हैं। गुरु अपने अमृत वचनों से, अपने कर्म-व्यवहार से शिष्य को सुसंस्कारित बनाते हैं। उनकी सुवास का चिंतन करके भक्त भी वैसे ही सुवासित होने लगते हैं।

 

मलयगिरि  की पवन  सा, सद्‌गुरु का सत्संग ।

दरस  परस  से  जीव  में, चढ़त  सद्‌गुरु  रंग ॥‍

गुरु के समक्ष अपने-आप को भूल जाना ही सबसे बड़ा ज्ञान हैगुरु के स्पंदन के साथ अपने स्पंदन को एक कर देना ही तो ज्ञान हैगुरु का व्याख्यान मौन होता है फिर भी शिष्य उसको समझ लेता हैश्रीसद्‌गुरु भक्तों पर अनुग्रह करके उनका आध्यात्मिक पोषण करते हैं, ललाट में निजरूप का दीदार कराते हैं, मार्गदर्शन देते हैंश्रीसद्‌गुरु महाराज ही वह युक्ति बताते हैं जिससे मनुष्य सदा अपने ब्रह्म-स्वभाव में रह सकता है। श्रीसद्‌गुरु के नजदीक आते ही हमें अपने गुण-दोष दिखने लगते हैं और जीवन में शांति, आनंद, माधुर्य आदि का रस भी आने लगता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज हमारे दोषों का हरण कर चित्त में आनंद, शान्ति, माधुर्य एवं योग्यता प्रदान करते हैं।

सद्‌गुरु के चरनों  तले,  शीतल छाँव अपार ।

भव  अग्नि  के  ताप  से,   जीव पाये उद्धार ॥

सत्संग अर्थात्‌ गुरू का संग। सत्संग से ही शिष्य के मन में स्थिरता आती है, इंद्रियाँ शांत होती हैं और उसे ध्यात्म की गहराइयों का अनुभव होता है। सत्संग के दौरान ही गुरु अपना असीम प्रेम अपने शिष्यों में भर देते हैं। जिस प्रकार पानी सदा नीचे की ओर ही बहता है, उसी तरह मन की प्रवृत्ति भी अधोगामी होती है। जैसे पानी को यन्त्र के द्वारा ऊपर की ओर चढ़ाया जा सकता है, उसी प्रकार नाम-भजन, सुमिरन, सेवा, सत्संग के सहारे मन को सद्‌गुरु के चरणों में लगाया जा सकता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज अपनी अनुग्रहकारिणी शक्ति से शिष्य पर दिव्य शक्तिपात करके उसकी बाहरी यात्रा समाप्त कर देते हैं और उसे दिव्य आन्तरिक यात्रा की ओर अग्रसर करते हैं।

 

भगत सुखी इस जगत में, और सुखी न कोय ।

संगति सद्गुरु की मिले, सपने दुख  न होय ॥

गुरु उस परम-तत्त्व को जानते हैं जिसे जानकर जानने वाला ही परम-तत्त्व हो जाता हैइसलिए गुरु और परमात्मा एक ही हैं, दोनों में कोई भेद नहीं हैगुरु ही परमात्मा है और परमात्मा ही गुरु हैगुरु ही हमें आत्म-तत्त्व की उपलब्धि कराते हैं एवं हमें दिव्यसत्ता से जोडते हैं। पूर्णिमा के चंद्रमा की भाँति जिसके जीवन में केवल प्रकाश है, वही तो अपने शिष्यों के अंत:करण में ज्ञान रूपी चंद्र की किरणें बिखेर सकता है। जो स्वयं में पूर्ण है, वही तो दूसरों को पूर्णत्व दे सकता है। परम-तत्त्व का अनुभव गुरु के बिना असंभव है। इस भौतिक और आध्यात्मिक जगत् का ज्ञान गुरुकृपा से ही संभव है।

बड़भागी को ही मिले, सद्‌गुरु का सत्संग ।

झलके ज्ञान प्रकाश अरु, निखरे भक्ति रंग ॥‍

तत्त्व-स्वरूप श्रीसद्‌गुरु महाराज सर्वव्याप्त अनंत गगन के स्वामी हैं। "प्रज्ञानं ब्रह्म" व "तत्त्वमसि" आदि वेद-महावाक्यों के लक्ष्य श्रीसद्‌गुरु महाराज ही हैंश्रीसद्‌गुरु महाराज स्वयं आनंद-स्वरूप हैं और शिष्यों पर कृपा कर उन्हें भी शाश्वत्‌ आनंद की अनुभूति करा देते हैश्रीसद्‌गुरु महाराज अपने शिष्यों के उत्थान के लिये सदैव तैयार रहते हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज हर पल अपने शिष्यों की निरख-परख करते रहते हैं तथा उनकी आध्यात्मिक चढ़ाई में हर वक्त उनके साथ-साथ रहते हैंश्रीसद्‌गुरु महाराज अपने निर्मल ज्ञान से अपने परमप्रिय शिष्य के कर्म-मल, कारण-मल आदि को नष्ट करते हैं; उसके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय आनंदमय कोषों की जड़ता को दूर कर उसके अन्तस्‌ में विशुद्ध ब्रह्मतेज प्रकाशित करते रहते हैं

सद्‌गुरु  के  सत्संग  से, शांति  मिले  अपार ।

भरम  भेद  सब छूटते, खुलता  मुक्ती  द्वार ॥

हर जीव में परमात्मा विद्यमान हैं, किंतु सच्चे सद्गुरु के बिना उसकी खोज नहीं हो सकती है। यदि सद्गुरु नहीं मिले तो भगवत्‌-अनुभव नहीं हो सकता है। यह परमात्म-ज्ञान प्रवचन, विशिष्ट बुद्धि, सुनने-समझने और अध्ययन आदि से प्राप्य नहीं है, अपितु जिस किसी एक भाग्यवान्‌ का वह स्वयं वरण करता है, उसकी उँगली पकड़कर चलाने लगता है, वही भाग्यवान्‌ उनके निर्देशन में चलकर उसे प्राप्त करता है। ऐसा भाग्यवान्‌ वही हो सकता है जिसने तत्त्वदर्शी सद्गुरु से दीक्षा ग्रहण कर, उनके बतलाये मार्ग का अनुसरण कर उनकी प्रसन्नता प्राप्त की हो।

गड़वाघाट   विराजते, संतन  के  सरकार ।

आठों याम सजता जहाँ, भक्ति का दरबार ॥

गुरु की सेवा करो तो ही ज्ञान मिलता हैकिताबों से ज्ञान नहीं मिलता हैकिताबों से तो जानकारी मिलती है, लेकिन ज्ञान तो गुरु की सेवा के अलावा कहीं अन्यत्र नहीं मिलता हैगुरु के साथ रहने से एवं उनकी सेवा करने से ही हम उस परमात्मा के पास होते हैंगुरु के साथ-साथ रहने से, हर कदम में गुरु का ही अनुसरण करने, श्वाँस-श्वाँस में गुरु को पी लेने से, हर पल गुरु का ही चिंतन करने से, हर कर्म में गुरु, हर विचार में गुरु, गुरु गुरु गुरु और बस गुरु होते ही शिष्य भी एक दिन गुरु हो जाता हैयही तो गुरु-परम्परा है

 

सद्‌गुरु  दीपक  ज्ञान के, खिंचते जीव पतंग ।

अहम्‌  समाया  परम  में, जैसे  सिंधु  तरंग ॥

श्रीसद्‌गुरु एक उजले दर्पण हैं, इसी दर्पण में ही शिष्य निज-स्वरूप को देख पाता है। यह श्रीसद्‌गुरु महाराज की कृपा ही है कि वे हमें हमारे सत्य स्वरूप की पहिचान कराते हैं। हमारे सभी भ्रमों व गलत अवधारणाओं को तोड़कर हमारे यथार्थ स्वरूप का प्रकाशन करते हैं। इस संदर्भ में एक प्रीतिकर कथा है- जंगल में एक गर्भवती बाघिन एक गड्ढे को पार कर रही थी। छलांग लगाते समय शेरनी गड्ढे में गिर पड़ी और उसी जगह एक बच्चे को जन्म देते समय उसकी मौत हो गई। बाघिन का नवजात अनाथ बच्चा किसी तरह गड्ढे से बाहर आया। वह भूख से तड़प रहा था। तभी वहाँ से बकरियों का एक झुंड गुजर रहा था। उस बच्चे को किसी बकरी ने अपना दूध पिलाया और शेर का बच्चा फिर उसी झुंड में रहने लगा। बकरी के दूसरे मेमनों की ही तरह वह खेलता, मेँ-मेँ की आवाज करता। बकरियों की तरह वह भी घास, पत्तियाँ आदि खाने लगाधीरे-धीरे वह बच्चा बड़ा हो गयाएक दिन जंगल में इन बकरियों के झुंड पर एक दूसरे बाघ ने शिकार हेतु आक्रमण कर दिया। वह बाघ अपनी ही जाति के बच्चे को बकरियों के झुंड में घास खाता देख आश्चर्य में पड़ गया दौड़कर उसने उस शेर के बच्चे को पकड़ा तो वह मेँ-मेँ की आवाज में चिल्लाने लगा, लेकिन फिर भी शेर उसे घसीटकर अपने साथ ले जाने लगा। वह उसके साथ जाने को राजी न था, मुड़-मुड़कर बकरियों की ओर ही देख रहा था। शेर उस बच्चे को एक जलाशय तक ले गया और कहा- तू इस जल में अपना मुँह देख, देख तू भी मेरे समान  है, तू इस जंगल का राजा है, ले यह थोड़ा सा माँस है, इसे खा ले। पर वह किसी भी तरह माँस खाने को राजी न था, वह मेंमने की तरह ही चिल्लाता रहाफिर बड़े शेर ने छोटे शेर से कहा कि सुन! तू भी मेरी तरह दहाड़ सकता है, ऐसा कहते हुए बड़ी जोर की दहाड़ लगाई। उस दहाड़ को सुनते ही उस बच्चे ने भी दहाड़ लगा दी। उस बच्चे को अपना विस्मृत स्वरूप याद आ गया। एक पल में ही उसकी सुप्त सिंह शक्ति वापस आ गई। इस तरह उस छोटे शेर ने स्वयं को पहचान लिया कि वह भी एक शेर ही है। तब उस बड़े बाघ ने कहा- जो मैं हूँ, तू भी वही है, अब आ मेरे साथ जंगल में चल।

ठीक इसी तरह गुरू भी जीव को उसके वास्तविक स्वरूप से अवगत कराने के लिये अनेक युक्तियाँ अपनाते हैं। गुरु की कृपा हो जाने पर जीव भी निज-स्वरूप को पहचान लेता है, गुरु अंतर में सारे भेद खोल देते हैं और बता देते हैं कि क्या सत् है और क्या असत्

दरपन  सद्गुरु  दया  का, दरसन  होत अनूप ।

पुलकित होवै आत्मा, निरख सहज निज रूप ॥

श्रीसद्‌गुरु महाराज के सत्संग रूपी ज्ञानान्जन शलाका से शिष्य की चेतना पर पड़े सभी आवरण नष्ट हो जाते हैं, जिससे जीवन के यथार्थ स्वरूप का बोध स्पष्ट होता है। श्रीसद्‌गुरु का सत्संग पारस है, श्रीसद्‌गुरु महाराज की वाणी के एक-एक शब्द को सुनना चाहिये। पूरे होश के साथ एक-एक शब्द को पी जाना चाहिये। श्रीसद्‌गुरु महाराज के रोम-रोम से प्रसारित दिव्य गन्ध और मुखारविन्द से उच्चरित प्रेममय, शुद्ध, शान्त, अमृतमय, रसपूर्ण, दिव्य और आकर्षक शब्द लहरी के आनन्दमय स्पर्श से शिष्य के मन की शुद्धि होती है 

लै  के   माटी   प्रेम  की,  सना  गारा  सत्संग ।

सद्‌गुरु    की   कारीगरी,  सेवा   भक्ति   रंग ॥

श्रीसद्‌गुरु का सत्संग एक परिवर्तनकारी शक्ति है जो जीव को मनुष्य, मनुष्य को सज्जन, सज्जन को शिष्य, शिष्य को साधक, साधक को साध्य अर्थात्‌ इष्ट में परिवर्तित कर देती है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की सान्निध्यता से शिष्य की बहिर्मुखी वृत्तियाँ अन्तर्मुखी होती हैं जिससे शिष्य आत्म-निष्ठ और धैर्यवान्‌ बनता है। सांसारिक विषयों को भोग करने वाली वृत्तियाँ सद्‌गुरु महाराज की दया से अन्दर की ओर मुड़कर निज-स्वरूप में आकर्षित होती हैं जिससे शिष्य को ब्रहानन्द का अनुभव मिलता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज अपनी अमोघ अनुग्रह शक्ति से अपने शिष्यों के सभी क्लेशों का विनाश करते हैं। जहाँ गुरु की कृपा है, वहाँ विजय अवश्य ही है।

भक्ति पताका  सद्‌गुरु,  सोहे  गड़वाघाट ।

प्रेम भक्ति में जग जुटा, सीख गुरु से पाठ ॥

श्रीसद्‌गुरु महराज की चरण धूलि को हृदय तथा सिर पर धारण करने से शिष्य का अंतर्मन गुरुभक्ति से सदा भीगा रहता हैउसके हृदय में भक्ति के भाव तथा श्रीसद्‌गुरु के प्रति समर्पण के स्वर फूटते रहते है। शिष्य के मन, प्राण तथा हृदय से श्रीसद्‌गुरुदेव के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने की उमंग जागती रहती हैअंतर्चेतना में श्रीसद्‌गुरु की चेतना झलकने तथा छलकने लगती है। वर्तमान व पूर्व जीवन के समस्त प्रकार के पाप केवल श्रीसद्‌गुरु महराज के नाम का भजन तथा श्रीसद्‌गुरु के चरण कमलों का ध्यान करने मात्र से ही समाप्त हो जाते हैशिष्य की आत्मा पूर्ण रूप से ब्रह्ममय हो जाती है, गुरुकृपा प्राप्त होते ही वह स्वयं ब्रह्म स्वरूप बन जाता है और उसका जीवन सार्थक व धन्य हो जाता है

 

संगति  सद्‌गुरु  की  मिले, जिनके  बड़े ललाट ।

पाप  ताप  सब  छूटते, बसे   जो  गड़वाघाट ॥

छाँव  मिली  सद्‌गुरु  की, धन्य  हमारे भाग ।

सुरत  उड़े  आकाश  में, काट  जगत  के राग ॥

--- सत्‌गुरुसरनानंद

 

 

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