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GURU-SHISHY KATHA गुरु की आज्ञा
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Written by Administrator   
Sunday, 01 June 2014 10:55
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गुरु की आज्ञा
एक प्राचीन आश्रम में एक गुरु अपने अनेकों शिष्यों के साथ रहा करते थे। इन शिष्यों में से अनेक स्वयं को उनका उत्तराधिकारी के योग्य मानते थे। गुरु वृद्ध हो चुके थे और वे गुरुपद पर किसी योग्य शिष्य को ही बैठाना चाहते थे।
एक दिन गुरु ने सभी शिष्यों को पास बुलाया और कहा, 'तुम सभी एक चबूतरा बनाओ, मैं उसे देखूँगा।'
सभी शिष्यों ने बढ़िया चबूतरे बनाए। गुरु ने चबूतरों का मुआयना किया, लेकिन उन्हें  कोई भी चबूतरा पसंद नहीं आया। गुरु ने सभी को फिर से नया चबूतरा बनाने को कहा।
सभी शिष्यों ने फिर चबूतरे बनाए। गुरु ने चबूतरों का पुनः निरीक्षण किया और यह कहकर सभी चबूतरों को तोड़ने का आदेश दिया कि उन्हें इनमें से भी कोई चबूतरा पसंद नहीं आया। गुरु ने अपने शिष्यों को पुनः नये चबूतरों के निर्माण की आज्ञा दी।
चार-पाँच बार चबूतरे बनाने के बाद शिष्यों का धैर्य टूटने लगा। अगली बार गुरु जब निरीक्षण को आये, तब उन्होंने देखा कि मात्र आधे शिष्यों ने ही चबूतरे बनाये हैं। लेकिन गुरु के  ये चबूतरे भी पसंद नहीं आये और उन्होंने इन चबूतरों को भी तोड़कर नये चबूतरों के निर्माण की आज्ञा दी।
बीस-तीस चबूतरे बनाने व तोड़ने के बाद शेष शिष्य भी आपस में बातें करने लगे कि गुरु बूढ़े होने के कारण ठीक से विचार करने की क्षमता खो बैठे हैं। वे सभी निराश होने लगे और केवल दो-तीन शिष्यों ने ही प्रयास जारी रखा। केवल एक शिष्य गुरुदास को छोड़कर शेष सभी के चेहरे में उदासी व हतोत्साह स्पष्ट दिखता था। वहीं गुरुदास हरेक बार पूरे उत्साह
से चबूतरे बनाता।
चालीस-पचास चबूतरों के निर्माण के बाद अब केवल गुरुदास ही चबूतरा बनाता। शेष सभी शिष्यों ने उस कार्य में औचित्यहीनता देखकर उस कार्य में रुचि लेना छोड़ दिया। जबकि शिष्य गुरुदास हर बार बड़ी तल्लीनता से भजन गाता हुआ चबूतरा बनाता और जब गुरु को पसंद नहीं आता तो उनकी आज्ञा होने पर उतने ही आनंद व तल्लीनता से उन्हें तोड़ देता।
एक बार सभी शिष्यों ने गुरुदास से कहा,' तुम क्यों चबूतरा बनाये और तोड़े जा रहे हो?  ऐसे औचित्यहीन आदेश का पालन कर तुम अपनी नासमझी ही प्रगट कर रहे हो।'
शिष्यों की बात सुनकर गुरुदास ने कहा 'भाइयो! गुरु की आज्ञा का पालन मेरा धर्म ही नहीं अपितु आनंद भी है। मैं उनके प्रत्येक बार दी जाने वाली आज्ञा से अनुगृहीत होता हूँ। अब अगर गुरुदेव सारी उम्र भी मुझसे चबूतरे बनवाते और तुड़वाते रहें, तो यह तो मेरा आनंद का ही विषय है।'
गुरु ने उनसे ७० से अधिक चबूतरे बनवाये और तुड़वा दिए, लेकिन गुरुदास को गुरु की आज्ञा के पालन में तनिक भी आलस्य नहीं आया।

एक दिन गुरु आए और गुरुदास को गले लगाकर बोले 'तू मेरा सच्चा शिष्य है और गद्दी का वास्तविक अधिकारी है।'
गुरु ने अन्य शिष्यों से कहा, 'गुरु के आदेश पर विचार नहीं, अमल किया जाता है। गुरुजनों के तर्कहीन लगने वाले आदेश के अत्यंत गहरे अर्थ हो सकते हैं। हमें हमेशा गुरु से कुछ सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए।'