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मुखपृष्ठ लेख ब्रह्मविद्यालय- श्रीमठगड़वाघाट ("गुरु-शिष्य उपनिषद्‌")

Science of Sant Mat

  Science of Sant Mat ( As explained by my Sat Guru Shrimat Paramahansa Sarananandji ) The spirituality is the continuous process in which GOD refines HIMSELF. For this purpose HE incarnates in the ...

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Contact for Initiation

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Objective

Mission 1. For spiritual aspirant to serve spritual path and peaceful atmosphere to elevate the spirituality .  liberating Self Knowledge to lead the ...

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ब्रह्मविद्यालय- श्रीमठगड़वाघाट ("गुरु-शिष्य उपनिषद्‌") पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
रविवार, 23 नवम्बर 2014 11:12

 

    यह लेख श्री श्री १०८ श्री सद्‌गुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित  "गुरु-शिष्य उपनिषद्‌" का अंश है।
                                                                          

                                    ब्रह्मविद्यालय- श्रीमठगड़वाघाट

कैलाश से दक्षिण दिशा की ओर काशी की गोद में श्रीसद्गुरु महाराज द्वारा रचित एक अद्वितीय दिव्य आश्रम है- श्रीमठगड़वाघाट। श्रीसद्गुरु महाराज ने इसकी भूमि, प्रकृति एवं वायुमंडल को सचेतन किया है। यहाँ रहने वाले योगियों व संन्यासियों में दुर्बलता, वृद्धावस्था, रोग आदि व्याप्त नहीं होते हैं। तपोभूमि गड़वाघाट आश्रम एक सिद्ध योगधाम है, जिसमें प्रकृति के सात्विक वातावरण की झलक सर्वत्र है। यहाँ प्रवेश पाने का अधिकारी वही है, जिसने सद्गुरु द्वारा गुरुदीक्षा में प्रदान की गई दिव्य साधना संपन्न की है।
श्रीगड़वाघाट काशी में सद्गुरु का धाम है।
भक्ति की सुवास यहाँ बहती आठों याम है॥

तपोभूमि गड़वाघाट आश्रम के स्वामी श्रीसद्गुरु महाराज का एकमात्र ध्येय लोक-कल्याण है। इस हेतु श्रीसद्गुरु स्वामीजी निरंतर लोगों को अनमोल ब्रह्मविद्या से दीक्षित कर उनमें आत्म जाग्रति पैदा कर रहे हैं। सद्गुरु महाराज की साधना से निर्मित मनोहारी तपोवन श्रीमठ गड़वाघाट में एक सच्चा साधक ही प्रवेश कर पाता है। यहाँ सच्चे साधक से तात्पर्य धुनी लगाकर बैठने वाला, स्वयं को हठयोग आदि से प्रताड़ित करने वाला अथवा तार्किक पंडित आदि से नहीं है। श्रीसद्गुरु महाराज से दीक्षित आज्ञाकारी व समर्पित शिष्य, जो श्रीसद्गुरु की नाम-साधना द्वारा निर्मल चित्त को प्राप्त हुआ हो, जिसका हृदय प्रेम से सिक्त हो, श्रीसद्गुरु महाराज की प्रसन्नता ही जिसका परम लक्ष्य हो, वही है सच्चा साधक।
श्रीमठगड़वाघाट के स्वामी परमपूज्य श्रीसद्गुरु महाराज कहते हैं कि साधना के नाम पर कर्त्तव्य विमुखता स्वीकार्य नहीं है। सच्चा साधक तो कर्मठ होता है, अन्तर केवल इतना होता है कि उसके कर्म वैयक्तिक न होकर लोक-कल्याणार्थ होते हैं, दूसरे शब्दों में ऐसा कहा जा सकता है कि सच्चा साधक अपने जीवन को श्रीसद्गुरु द्वारा चलायी जाने वाली लोक-कल्याणकारी योजनाओं में तत्पर रहता है। सच्चा साधक वैयक्तिक कर्म में लिपायमान न रहकर आत्मिक कर्म में प्रवृत्त होता है। श्रीसद्गुरु महाराज के द्वारा बतलाये गये नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान ही आत्मिक कर्म हैं। इन आत्मिक कर्मों से ही शिष्य को तृप्तता एवं पूर्णता प्राप्त होती है। श्रीसद्गुरु महाराज की प्रेरणा का अनुसरण करने वाला शिष्य  सत्चिन्तन और सुकर्मों से कभी भी विरत नहीं हो सकता क्योंकि उसके हृदय में प्रतिष्ठित गुरुतत्त्व उसे हर पल सचेत करता रहता है।
सद्गुरु का उपकार है, नाम रतन अनमोल।
तड़ित ऊर्जा नाम की, दिये भेद सब खोल॥


श्रीमठ गड़वाघाट में ब्रह्मविद्या अर्जन के सूत्र


अ भवेत्संगयुक्तानां तथाग्विक्ष्वासिनामपि।

गुरुपूजाविहीनानां तथा च बहुसंगिनाम्।।
मिथ्यावादरतानां तथा च निष्ठुरभाषिनाम्।
गुरुसन्तोषहीनानां न सिध्दि: स्यात्कदाचन।।

शिव संहिता में भगवान् शिव कहते हैं कि- उसको आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी जो भौतिक संसार से जुड़ा है, जिसमें विश्वास का अभाव है, जिसमें अपने गुरु के प्रति कोई भक्ति नहीं, जो सामाजिकता में रमण है, जो असत्य बोलता है, जो कठोरता से बात करता है, जो गुरु की जरूरतों की उपेक्षा करता है।
इसी तथ्य को विधायक रूप में श्रीमठगड़वाघाट के स्वामीजी ने कुछ ऐसा कहा है-
सेवा  सुमिरन  जप भजन, पूजा  दर्शन ध्यान ।
तरकीबें    गुरुदेव   की,  पाने   आतम  ज्ञान ॥

श्रीमठ गड़वाघाट के स्वामी श्रीसद्गुरु महाराज ने उपरोक्त दोहे में ब्रह्मविद्या को प्राप्त करने के उपायों को मंथ कर साररूप में कह दिया गया है। वे साधक जिन्होंने ब्रह्मरस की एक बूँद का भी रसास्वादन किया है, वे सद्गुरु महाराज द्वारा कहे गये उपरोक्त दोहे में छुपे संकेतों को समझ ही जायेंगे। श्रीसद्गुरु का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान भवरोग निवारण की अमोघ औषधि है, साधकों व शिष्यों के लिये परम अमृत है। स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य क्षींण होते हैं जबकि श्रीसद्गुरु का चरणामृत तो पापनाशक एवं उत्तरोत्तर परम शान्तिप्रदायक है जिसके पान से हृदय में श्रीसद्गुरु के दर्शन होने लगते हैं।
यजुर्वेद में कहा गया है-
''विद्यया अमृतम् अश्नुते।''
अर्थात् विद्या से अमरत्व प्राप्त किया जाता है। ब्रह्मविद्या ही वास्तविक विद्या है और सुपात्र ही ब्रह्मविद्या का अधिकारी है। जिज्ञासा भाव की प्रचंडता ही ब्रह्मविद्या की पात्रता है। श्रीसद्गुरु महाराज की शरण ही ब्रह्मविद्या अर्जन हेतु सर्वशास्त्रसम्मत श्रेष्ठतम उपाय है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में कहा गया है कि उसी भक्त में ब्रह्मविद्या का अर्थ प्रकाशित होता है, जिसके अंदर भगवान् एवं गुरु के प्रति एक समान भक्ति होती है, जो पारब्रह्म सद्गुरु  के प्रति पूर्णतया समर्पित है। जिसने सद्गुरु परमेश्वर की आज्ञापालन रूपी धर्म को अपने आचरण में आत्मसात् कर लिया है।
यस्य  देवे  परा  भक्ति  यथा  देवे  तथा  गुरौ।
तस्यैते कथिता हि अर्था: प्रकाशन्ते महात्मन:।।

सभी साधक इस एक बात को गाँठ बाँधकर रख लें कि बिना गुरुकृपा के ब्रह्मविद्या का ज्ञान असंभव है और सद्गुरु महाराज की प्रसन्नता में ही गुरुकृपा छुपी होती है। गुरु ही हमें इस साधना की युक्ति बताते हैं।
इस रचना के माध्यम से ब्रह्मरस के अभीप्सु साधकों के लिये श्रीसद्गुरु महाराज ने पराविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या के उन बारीक पहलुओं पर प्रकाश डाला है, जिनसे साधना-पथ एवं प्रगति के उपाय स्पष्ट होते हैं।
प्रथम चरण : अंतःकरण की शुद्धता
उपाय : नाममंत्र की दीक्षा एवं जप
जप-क्षेत्र : स्वाँस

ब्रह्मविद्या के अर्जन हेतु परम तत्त्व के जिज्ञासु में अंतःकरण की शुद्धता अनिवार्य है। अंतःकरण की शुद्धता हेतु सर्वप्रथम सद्गुरु महाराज से नाममंत्र की दीक्षा लेनी होती है। श्रीसद्गुरु महाराज द्वारा दिया गया मंत्र गुरुशक्ति से अनुप्राणित होता है। श्रीसद्गुरु महाराज के अलावा किसी अन्य स्रोत से प्राप्त मंत्र में शब्दों अथवा वर्णों की समानता तो हो सकती है, लेकिन गुरुशक्ति के अभाव में ऐसा मंत्र निष्प्राण ही होता है। सद्गुरु अपने नाम में ऐसे समाये हैं जैसे स्रोतों में जल, पुष्पों में खुश्बू एवं लकड़ी में अग्नि। इस रहस्य के ज्ञाता श्रीसद्गुरु महाराज ही हैं।
भक्त-जीवन में सद्गुरु के द्वारा प्राप्त नाममंत्र का जप ही ब्रह्मविद्या प्राप्ति का सरल व सर्वोत्तम साधन है। जप का अर्थ है- श्रीसद्गुरु महाराज के नाममंत्र को श्वाँसों में आरोपित करना। इस मंत्र को जपने हेतु ठीक उसी विधि का प्रयोग करना चाहिये, जो दीक्षा के दौरान बतलायी गयी हो। इस मंत्र के जप में होठों व वाणी का प्रयोग नहीं होता है। नाम-जप के साथ-साथ मन में नाममंत्र के अर्थ का भी भाव लाना चाहिये। जप के लिए कोई भी जगह अपवित्र नहीं है, इसीलिये गुरुमंत्र का जप हर समय एवं हर जगह किया जा सकता है। चूँकि स्वाँसों का संबंध अंतःकरण से होता है, इसीलिये स्वाँसों के माध्यम से इस नाममंत्र को अंतःकरण तक भेजने पर अंतःकरण इस नाममंत्र की गुरु-ऊर्जा द्वारा उजला होता जाता है। गुरुमंत्र की महिमा अवर्णनीय है। जगत् के समस्त विकारों का नाश करने के लिए सदगुरु नाम ही जीवन-संजीवनी-सुधा है।
नाम बिना नाहीं होई कमवाँ हो गुरु बिना नाम न लखाय
नाम बिना न परमधमवाँ हो चाहे कोटिन करो उपाय

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)

द्वितीय चरण : मन की लयता से चित्त शांति
उपाय : भजन-दर्शन
भजन-क्षेत्र : मन

जप में मन को लय करके सुरत को ऊपर उठाना ही भजन कहलाता है। 'भजनं नाम रसनम्', भजन अर्थात् स्वाद लेना। 'भजनं नाम आस्वादनम्', भजन यानी रसानुभूति का आनंद लेना। खाते-पीते, उठते-बैठते, सोते-जागते, हर समय भजन चलते ही रहना चाहिये। भजन सधने पर सर्वप्रथम सुबह आँख खुलते ही पहला विचार श्रीसद्गुरु महाराज का ही आता है। श्रीसद्गुरु महाराज के साथ साधक के मन की ऐसी लयता ही अणिमादि सिद्धियों को देने वाली है।
आइये, अब यह समझें कि भजन की अवस्था को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। जैसे कोई गीत किसी धुन में लयबद्ध होकर पूर्ण संगीत बनता है, वैसे ही मन स्वाँसों मे चलने वाली नामधुन में लयबद्ध होकर शांति को प्राप्त होता है। लेकिन साधारणतया तो मन वृत्तियों के माध्यम से बाहरी विषयों में ही भ्रमण करता रहता है। सुरत का इन्द्रियों के सहारे बाहर के संसारी पदार्थों में लिपायमान होना ही बहिर्मुखी वृत्ति है। इसीलिये वृत्तियों पर बैठे मन को अंदर लाने के लिये वृत्तियों को ही अंदर मोड़ना पड़ता है। लेकिन वृत्तियों को अंदर मोड़ने के लिये अन्दर एक ऐसा प्रबल आकर्षण केन्द्र होना चाहिये, जो वृत्तियों को अंदर की ओर आकर्षित करे और अपने आकर्षण से वृत्तियों को बाहर न जाने दे। इस सृष्टि में श्रीसद्गुरु महाराज से अधिक गुरुत्वाकर्षण अन्य कहीं भी नहीं है, इसीलिये वृत्तियों की अंतर्मुखता हेतु अन्तस् में श्रीसद्गुरु के मनमोहक स्वरूप का दर्शन करना होता है।
सन्त हैं सरगुन रूप देखावत
अंदर सोई रूप नाम होवै आखर दो समुझावत
यह सब बात जनाई तबै सतगुरु जे पावत
-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)

सुरत को संसारी पदार्थों से हटाकर, अन्तस् में उलटकर, मालिक के चरणों में सच्चा प्रेमभाव रखते हुए उनके नाम-धाम-स्वरूप का हर वक्त बोध होना ही दर्शन है। दर्शन का अर्थ है- मन, चित्त एवं दृष्टि से सद्गुरु महाराज के दिव्य स्वरूप को अन्तस् में देखना।
इस तरह चित्त-शांति हेतु मन का नाममंत्र में लय आवश्यक है, मन की लयता हेतु वृत्तियों की अंतर्मुखता आवश्यक है, वृत्तियों की अंतर्मुखता हेतु गुरुदर्शन आवश्यक है। नाममंत्र का जप-भजन प्रेम व पुलक भाव से करना चाहिये। जप व भजन करते वक्त मन में श्रीसद्गुरुदर्शन के अलावा किसी प्रकार की भी लौकिक-पारलौकिक कामना नहीं रखना चाहिये।

तृतीय चरण : अहंकार का विसर्जन
उपाय : सुमिरन
सुमिरन-क्षेत्र : दिल

नाममंत्र के जप, भजन व दर्शन से मन लय अवस्था को तो प्राप्त करता है, लेकिन विलयता को नहीं। मन की लयता व विलयता में अंतर बहुत ही बारीक है, किन्तु साधना की दृष्टि से यह एक बड़ा अंतर है। लयता का अर्थ हम पिघलने से ले सकते हैं। नाममंत्र के जप-भजन-दर्शन के तप से हमारे अंदर गुरुऊर्जा का प्रवेश तो होता है और हमारे मन की सभी जड़तायें एवं पूर्वाग्रह भी पिघलकर शिथिल होते हैं, हृदय में कोमलता भी विकसित होती है, लेकिन अभी भी साधक अपनी अहम् की सीमाओं में ही रहता है। इस कारण से अपरिमित आस्तित्त्व के सिंधु श्रीसद्गुरु महाराज से एकाकार नहीं कर पाता। आइये इसे एक उदाहरण से समझें- जैसे पिघले हुए घी की बूँद द्रव अवस्था में रहने के बावजूद जल में अलग-थलग ही रहती है और जल की तरंगें उस बूँद में आंशिक रूप से ही प्रवेश कर पाती हैं लेकिन पूरी तरह नहीं, कुछ कमीं तो शेष रहती है। इसीलिये कुछ ऐसा मंथन आवश्यक है जो बूँद को झकझोर कर उसकी सीमाओं को तोड़ डाले। इसके लिये साधक को श्रीसद्गुरु महाराज से अपने हृदय के तार जोड़ने होते हैं, जिससे गुरु रूपी सिंधु की तरंगों से साधक का हृदय भी झंकृत होने लगे। इस सेतु के माध्यम से ही मिलन को आतुर सद्गुरु महासिंधु शिष्य रूपी बूँद में समा जाते हैं। इसके पश्चात् साधक अथवा शिष्य अपने गुरु के साथ इस तरह जुड़ा होता है कि गुरु के दर्शन प्रसंग को विचारते ही वह प्रफुल्लित व प्रसन्न होने लगता है एवं विरह प्रसंग को विचारते ही उससे अश्रुपात होने लगते हैं। ऐसे साधक का हृदय नाममंत्र-जप के कम्पन से सदा तरंगित रहता है।
साधक यहाँ इस बात को स्पष्टता से समझ लें कि ऐसी स्थिति हेतु हँसने, प्रफुल्लित होने अथवा रोने की क्रिया नहीं करना है, अपितु यह तो नैसर्गिक अवस्था है। साधक के अहंकार को झकझोर कर मिटा देने वाले मंथन एवं भावों के अविरल प्रवाह हेतु हृदय के तारों का सद्गुरु से जुड़ना एकमात्र गुरु-प्रेम से ही संभव है।
प्रेम से सब होत कमइया
बिना प्रेम से कछु नाहीं होता सुरती नहीं एकठइखा
जब से सब सुरत एक न होती तब से रूप न पइया
पाखण्ड से काम न बनी करो सतगुरु कै दोहइया पइया
-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)
गुरु के प्रति प्रेम ही साधक के हृदय में ऐसे सेतु तैयार करता है जिससे भावों का प्रवाह संभव होता है। लेकिन साधक के मन में अगला प्रश्न उठता है कि हृदय में सद्गुरु के प्रति ऐसा प्रेम कैसे स्थापित हो?
श्रीसद्गुरु महाराज उस उपाय को समझाते हुए कहते हैं कि जब आप गुरु के सत्संग में आते हैं, काफी समय गुरु की सान्निध्यता में रहते हैं, तो आप सद्गुरु के हृदय में जीवमात्र के प्रति निःस्वार्थ प्रेम को देखते हैं और धीरे-धीरे आप उनकी अहैतुकी करुणा से परिचित होते जाते हैं। आपके द्वारा अनुभूत सद्गुरु महाराज के इसी प्रेम व करुणा के प्रभाव से आपमें गुरु-चिन्तन प्रारंभ होता है। गुरु की करुणा व प्रेम के निरंतर चिन्तन-मनन को ही सुमिरन कहते हैं। सुमिरन अर्थात् दिल की जुबान से सद्गुरु एवं उनके नाममंत्र को सतत याद करना। श्रीसद्गुरु के प्रेम-विरह की यादों से साधक के हृदय का भरा होना ही सुमिरन है।
सुमिरन से ही आपके हृदय में प्रेम के अंकुर फूटते हैं। प्रेम से अहंकार का अस्तित्त्व समाप्त होता है। इसका उदाहरण तो हमें संसार में भी देखने को मिलता है कि परिवार के प्रियजनों के बीच पद-प्रतिष्ठा का अस्तित्त्व नहीं होता है, ठीक वैसे ही श्रीसद्गुरु से प्रेम होने पर हमारा समस्त अहंकार सदा के लिये मिट जाता है, क्योंकि गुरु तो सर्वव्यापी हैं। इसीलिये गुरु से प्रेम अर्थात् पूरे जगत् से प्रेम, अर्थात् हमें पूर्ण निरहंकारिता की अवस्था प्राप्त होती है।


चतुर्थ चरण- हृदय में गुरुतत्त्व का स्थापन
उपाय- गुरुपूजा एवं गुरुसेवा
पूजा व सेवा का क्षेत्र : कर्मभूमि, श्रद्धा एवं भावभूमि

चतुर्थ चरण में प्रवेश लेने वाला साधक शांत-चित्त एवं कोमल हृदय वाला होता है, उसके अहंकार की सीमायें छिन्न-भिन्न हो गयीं होती हैं। वह सदा नाममंत्र के आनंद में मग्न रहता है। वास्तव में यह आनंद स्वयं साधक का नहीं होता है, अपितु यह आनंद तो सद्गुरु प्रेमसागर का होता है और चूँकि इस अवस्था के आने तक साधक के हृदय के तार सद्गुरु से जुड़ चुके होते हैं अतः गुरुप्रेम इसी सेतु से साधक के हृदय में भी प्रवाहित होता रहता है। गुरुदर्शन में निपुण यह साधक गुरु के मनमोहक स्वरूप को हृदय में बसाये रहता है। अब चतुर्थ चरण में साधक को गुरुतत्त्व (गुरु की करुणा, गुरु का प्रेम, गुरु का ज्ञान, गुरु की ओजस्विता एवं गुरु की तेजस्विता) को अपने हृदय में उतारना होता है। यह अत्यंत सूक्ष्म क्रिया है। साधक के पूर्वकर्म इस क्रिया की संपन्नता में व्यवधान पैदा करते हैं। ये प्रारब्ध-कर्म केवल सद्गुरु की सेवा रूपी अग्नि में भस्म होते हैं।
ऐसे गुरु कै करि खिजमतिया
सहजै पार गतिया
बाहर से अंदर खूब जानो गुपत भेद येही को मानो
खुल जाई किसमतिया

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)
श्रीसद्गुरु महाराज की आज्ञानुसार चलना, सदा उन्हें प्रसन्न रखना, उनके रुख को समझते हुए उनकी हर आवश्यकता की उनके बिना कहे ही पूर्ति करना, सद्गुरु के दरबार व भक्तों की सेवा और सद्गुरु महाराज द्वारा जन-कल्याणार्थ चलायी जाने वाली योजनाओं में प्रेम व उत्साह के साथ तन-मन-धन से सहयोग करना सद्गुरु महाराज की बाह्य-सेवा कहलाती है। श्रीसद्गुरु महाराज के द्वारा बतलाये गये नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान की साधना को पूर्ण मन व चित्त के साथ संपादित करना ही सद्गुरु महाराज की आंतरिक सेवा कहलाती है।
निरगुन गाये से कछू न होई सरगुन से जरै संचितिया
सरगुन रूप वोही कहावै सनमुख रूप कुदरतिया

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)
गुरुसेवा से अनेक जन्मों के बुरे कर्मों का भी क्षय हो जाता है। सभी कर्मों के क्षय हो जाने पर साधक का निर्मल हृदय गुरुतत्त्व की स्थापना के योग्य हो जाता है। अब साधक को गुरुपूजा के माध्यम से गुरुतत्त्व का आवाहन करना होता है।
पूजा का अर्थ है मन में सद्गुरु महाराज के प्रति प्रेम, विश्वास व श्रद्धा भाव को जगाना। इस हेतु सद्गुरु महाराज से याचना करनी होती है और स्वयं में एक दासनदास अर्थात् याचक की अवस्था विकसित करनी होती है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि स्वयं को स्वयं से इतना रिक्त करना होता है कि गुरुभाव के अतिरिक्त और कुछ भी न बचे। साधक की इस परम रिक्तता में ही परमप्रिय, करुणासागर, अनंत ज्ञानवान्, परम तेजस्वी श्रीसद्गुरु महाराज साधक के हृदय में गुरुतत्त्व को बीजरूप में रोपित करते हैं। श्रीसद्गुरु महाराज की कृपा के फलस्वरूप साधक के अन्तस् में हुए इस बीजरूप गुरुतत्त्व के रोपण से साधक में उपजे ब्रह्मज्ञान का तेज चारों दिशाओं में फैलने लगता है।
पंचम चरण- गुरुमयता
उपाय- ध्यान
ध्यान-क्षेत्र- सहस्रदल कमल एवं आस्तित्त्व

इस अवस्था में पहुँचे साधक के हृदय के तार सद्गुरु महाराज से जुड़े होते हैं। लेकिन, जब तक कोई जोड़ है तो समझो कि द्वैतभाव है। सद्गुरु से जुड़ना बेशक श्रेष्ठ है, लेकिन उससे भी श्रेष्ठतम है श्रीसद्गुरु महाराज से एकाकार होना। यही है व्यष्टि का समष्टि में पूर्ण विलय। संतों ने इसी पंचम अवस्था अर्थात् गुरुमयता को कुछ इस भाँति कहा है कि "बूँद समायी समुन्द में, सो कित हेरी जाय"। इसी अवस्था में साधक ब्रह्मज्ञान से अंदर-बाहर सरावोर होकर सिद्ध बनता है, यही अवस्था है- अहम् ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि और ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति। यही सच्चिदानंद की अवस्था है। सत् यानि जो सदा से है, जो सार रूप है, चित् यानि जो चेतनायुक्त है, ऐसे सदा रहने वाले सचेतन आनन्द को ही 'सत्- चित् -आनन्द' या सच्चिदानन्द कहते हैं। सच्चिदानंद अर्थात् ऐसा आनंद जिससे सदा चेतना प्राप्त होती हो।
चेतन मूरत तत्त्वज्ञानी कै है तीनके पूजै
वोही रूप हो जातवा
जिसको जानो वोही रूप मानो
जड़ से जड़ चेतन से चेतन हो जातवा

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)
गुरुमयता के लिये ध्यान आवश्यक है। ध्यान कोई क्रिया नहीं अपितु आस्तित्त्व की एक अवस्था है। ध्यान में सुरत सहस्रदल कमल में प्रतिष्ठित परमहंस सद्गुरु महाराज के स्वरूप में लीन होकर अद्वैतता को प्राप्त होती है। इस अवस्था में ज्ञान कोई जानकारी नहीं, बल्कि ऐसा प्रकाश होता है जो लौकिक व पारलौकिक सभी रहस्यों को स्पष्ट करता है। यही ब्रह्मविद्या है, जिसको जानने पर और कुछ जानना शेष नहीं रहता। इस विद्या से अपने अंदर प्रतिष्ठित जानने वाले को ही जाना जाता है। यही आत्मबोध है, यही सद्गुरु का साक्षात्कार है और यही सच्चिदानंद है।
बिन देखे जो ध्यान लगावै मन बुधि ध्यान कहावै
रूप देख के ध्यान लगावै सोई पक्का ध्यान कहावै
यह भेद जानै सोई सतगुरु वही भेद बतावै तबै पावै
पढ़ी सुनी भजन सब करते देखी गुरु बतावै तब पावै

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)

 

 

    यह लेख श्री श्री १०८ श्री सद्‌गुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित  "गुरु-शिष्य उपनिषद्‌" का अंश है।
                                                                          

                                    ब्रह्मविद्यालय- श्रीमठगड़वाघाट

कैलाश से दक्षिण दिशा की ओर काशी की गोद में श्रीसद्गुरु महाराज द्वारा रचित एक अद्वितीय दिव्य आश्रम है- श्रीमठगड़वाघाट। श्रीसद्गुरु महाराज ने इसकी भूमि, प्रकृति एवं वायुमंडल को सचेतन किया है। यहाँ रहने वाले योगियों व संन्यासियों में दुर्बलता, वृद्धावस्था, रोग आदि व्याप्त नहीं होते हैं। तपोभूमि गड़वाघाट आश्रम एक सिद्ध योगधाम है, जिसमें प्रकृति के सात्विक वातावरण की झलक सर्वत्र है। यहाँ प्रवेश पाने का अधिकारी वही है, जिसने सद्गुरु द्वारा गुरुदीक्षा में प्रदान की गई दिव्य साधना संपन्न की है।
श्रीगड़वाघाट काशी में सद्गुरु का धाम है।
भक्ति की सुवास यहाँ बहती आठों याम है॥

तपोभूमि गड़वाघाट आश्रम के स्वामी श्रीसद्गुरु महाराज का एकमात्र ध्येय लोक-कल्याण है। इस हेतु श्रीसद्गुरु स्वामीजी निरंतर लोगों को अनमोल ब्रह्मविद्या से दीक्षित कर उनमें आत्म जाग्रति पैदा कर रहे हैं। सद्गुरु महाराज की साधना से निर्मित मनोहारी तपोवन श्रीमठ गड़वाघाट में एक सच्चा साधक ही प्रवेश कर पाता है। यहाँ सच्चे साधक से तात्पर्य धुनी लगाकर बैठने वाला, स्वयं को हठयोग आदि से प्रताड़ित करने वाला अथवा तार्किक पंडित आदि से नहीं है। श्रीसद्गुरु महाराज से दीक्षित आज्ञाकारी व समर्पित शिष्य, जो श्रीसद्गुरु की नाम-साधना द्वारा निर्मल चित्त को प्राप्त हुआ हो, जिसका हृदय प्रेम से सिक्त हो, श्रीसद्गुरु महाराज की प्रसन्नता ही जिसका परम लक्ष्य हो, वही है सच्चा साधक।
श्रीमठगड़वाघाट के स्वामी परमपूज्य श्रीसद्गुरु महाराज कहते हैं कि साधना के नाम पर कर्त्तव्य विमुखता स्वीकार्य नहीं है। सच्चा साधक तो कर्मठ होता है, अन्तर केवल इतना होता है कि उसके कर्म वैयक्तिक न होकर लोक-कल्याणार्थ होते हैं, दूसरे शब्दों में ऐसा कहा जा सकता है कि सच्चा साधक अपने जीवन को श्रीसद्गुरु द्वारा चलायी जाने वाली लोक-कल्याणकारी योजनाओं में तत्पर रहता है। सच्चा साधक वैयक्तिक कर्म में लिपायमान न रहकर आत्मिक कर्म में प्रवृत्त होता है। श्रीसद्गुरु महाराज के द्वारा बतलाये गये नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान ही आत्मिक कर्म हैं। इन आत्मिक कर्मों से ही शिष्य को तृप्तता एवं पूर्णता प्राप्त होती है। श्रीसद्गुरु महाराज की प्रेरणा का अनुसरण करने वाला शिष्य  सत्चिन्तन और सुकर्मों से कभी भी विरत नहीं हो सकता क्योंकि उसके हृदय में प्रतिष्ठित गुरुतत्त्व उसे हर पल सचेत करता रहता है।
सद्गुरु का उपकार है, नाम रतन अनमोल।
तड़ित ऊर्जा नाम की, दिये भेद सब खोल॥
श्रीमठ गड़वाघाट में ब्रह्मविद्या अर्जन के सूत्र
अ भवेत्संगयुक्तानां तथाग्विक्ष्वासिनामपि।
गुरुपूजाविहीनानां तथा च बहुसंगिनाम्।।
मिथ्यावादरतानां तथा च निष्ठुरभाषिनाम्।
गुरुसन्तोषहीनानां न सिध्दि: स्यात्कदाचन।।

शिव संहिता में भगवान् शिव कहते हैं कि- उसको आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी जो भौतिक संसार से जुड़ा है, जिसमें विश्वास का अभाव है, जिसमें अपने गुरु के प्रति कोई भक्ति नहीं, जो सामाजिकता में रमण है, जो असत्य बोलता है, जो कठोरता से बात करता है, जो गुरु की जरूरतों की उपेक्षा करता है।
इसी तथ्य को विधायक रूप में श्रीमठगड़वाघाट के स्वामीजी ने कुछ ऐसा कहा है-
सेवा  सुमिरन  जप भजन, पूजा  दर्शन ध्यान ।
तरकीबें    गुरुदेव   की,  पाने   आतम  ज्ञान ॥

श्रीमठ गड़वाघाट के स्वामी श्रीसद्गुरु महाराज ने उपरोक्त दोहे में ब्रह्मविद्या को प्राप्त करने के उपायों को मंथ कर साररूप में कह दिया गया है। वे साधक जिन्होंने ब्रह्मरस की एक बूँद का भी रसास्वादन किया है, वे सद्गुरु महाराज द्वारा कहे गये उपरोक्त दोहे में छुपे संकेतों को समझ ही जायेंगे। श्रीसद्गुरु का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान भवरोग निवारण की अमोघ औषधि है, साधकों व शिष्यों के लिये परम अमृत है। स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य क्षींण होते हैं जबकि श्रीसद्गुरु का चरणामृत तो पापनाशक एवं उत्तरोत्तर परम शान्तिप्रदायक है जिसके पान से हृदय में श्रीसद्गुरु के दर्शन होने लगते हैं।
यजुर्वेद में कहा गया है-
''विद्यया अमृतम् अश्नुते।''
अर्थात् विद्या से अमरत्व प्राप्त किया जाता है। ब्रह्मविद्या ही वास्तविक विद्या है और सुपात्र ही ब्रह्मविद्या का अधिकारी है। जिज्ञासा भाव की प्रचंडता ही ब्रह्मविद्या की पात्रता है। श्रीसद्गुरु महाराज की शरण ही ब्रह्मविद्या अर्जन हेतु सर्वशास्त्रसम्मत श्रेष्ठतम उपाय है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में कहा गया है कि उसी भक्त में ब्रह्मविद्या का अर्थ प्रकाशित होता है, जिसके अंदर भगवान् एवं गुरु के प्रति एक समान भक्ति होती है, जो पारब्रह्म सद्गुरु  के प्रति पूर्णतया समर्पित है। जिसने सद्गुरु परमेश्वर की आज्ञापालन रूपी धर्म को अपने आचरण में आत्मसात् कर लिया है।
यस्य  देवे  परा  भक्ति  यथा  देवे  तथा  गुरौ।
तस्यैते कथिता हि अर्था: प्रकाशन्ते महात्मन:।।

सभी साधक इस एक बात को गाँठ बाँधकर रख लें कि बिना गुरुकृपा के ब्रह्मविद्या का ज्ञान असंभव है और सद्गुरु महाराज की प्रसन्नता में ही गुरुकृपा छुपी होती है। गुरु ही हमें इस साधना की युक्ति बताते हैं।
इस रचना के माध्यम से ब्रह्मरस के अभीप्सु साधकों के लिये श्रीसद्गुरु महाराज ने पराविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या के उन बारीक पहलुओं पर प्रकाश डाला है, जिनसे साधना-पथ एवं प्रगति के उपाय स्पष्ट होते हैं।
प्रथम चरण : अंतःकरण की शुद्धता
उपाय : नाममंत्र की दीक्षा एवं जप
जप-क्षेत्र : स्वाँस

ब्रह्मविद्या के अर्जन हेतु परम तत्त्व के जिज्ञासु में अंतःकरण की शुद्धता अनिवार्य है। अंतःकरण की शुद्धता हेतु सर्वप्रथम सद्गुरु महाराज से नाममंत्र की दीक्षा लेनी होती है। श्रीसद्गुरु महाराज द्वारा दिया गया मंत्र गुरुशक्ति से अनुप्राणित होता है। श्रीसद्गुरु महाराज के अलावा किसी अन्य स्रोत से प्राप्त मंत्र में शब्दों अथवा वर्णों की समानता तो हो सकती है, लेकिन गुरुशक्ति के अभाव में ऐसा मंत्र निष्प्राण ही होता है। सद्गुरु अपने नाम में ऐसे समाये हैं जैसे स्रोतों में जल, पुष्पों में खुश्बू एवं लकड़ी में अग्नि। इस रहस्य के ज्ञाता श्रीसद्गुरु महाराज ही हैं।
भक्त-जीवन में सद्गुरु के द्वारा प्राप्त नाममंत्र का जप ही ब्रह्मविद्या प्राप्ति का सरल व सर्वोत्तम साधन है। जप का अर्थ है- श्रीसद्गुरु महाराज के नाममंत्र को श्वाँसों में आरोपित करना। इस मंत्र को जपने हेतु ठीक उसी विधि का प्रयोग करना चाहिये, जो दीक्षा के दौरान बतलायी गयी हो। इस मंत्र के जप में होठों व वाणी का प्रयोग नहीं होता है। नाम-जप के साथ-साथ मन में नाममंत्र के अर्थ का भी भाव लाना चाहिये। जप के लिए कोई भी जगह अपवित्र नहीं है, इसीलिये गुरुमंत्र का जप हर समय एवं हर जगह किया जा सकता है। चूँकि स्वाँसों का संबंध अंतःकरण से होता है, इसीलिये स्वाँसों के माध्यम से इस नाममंत्र को अंतःकरण तक भेजने पर अंतःकरण इस नाममंत्र की गुरु-ऊर्जा द्वारा उजला होता जाता है। गुरुमंत्र की महिमा अवर्णनीय है। जगत् के समस्त विकारों का नाश करने के लिए सदगुरु नाम ही जीवन-संजीवनी-सुधा है।
नाम बिना नाहीं होई कमवाँ हो गुरु बिना नाम न लखाय
नाम बिना न परमधमवाँ हो चाहे कोटिन करो उपाय

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)

द्वितीय चरण : मन की लयता से चित्त शांति
उपाय : भजन-दर्शन
भजन-क्षेत्र : मन

जप में मन को लय करके सुरत को ऊपर उठाना ही भजन कहलाता है। 'भजनं नाम रसनम्', भजन अर्थात् स्वाद लेना। 'भजनं नाम आस्वादनम्', भजन यानी रसानुभूति का आनंद लेना। खाते-पीते, उठते-बैठते, सोते-जागते, हर समय भजन चलते ही रहना चाहिये। भजन सधने पर सर्वप्रथम सुबह आँख खुलते ही पहला विचार श्रीसद्गुरु महाराज का ही आता है। श्रीसद्गुरु महाराज के साथ साधक के मन की ऐसी लयता ही अणिमादि सिद्धियों को देने वाली है।
आइये, अब यह समझें कि भजन की अवस्था को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। जैसे कोई गीत किसी धुन में लयबद्ध होकर पूर्ण संगीत बनता है, वैसे ही मन स्वाँसों मे चलने वाली नामधुन में लयबद्ध होकर शांति को प्राप्त होता है। लेकिन साधारणतया तो मन वृत्तियों के माध्यम से बाहरी विषयों में ही भ्रमण करता रहता है। सुरत का इन्द्रियों के सहारे बाहर के संसारी पदार्थों में लिपायमान होना ही बहिर्मुखी वृत्ति है। इसीलिये वृत्तियों पर बैठे मन को अंदर लाने के लिये वृत्तियों को ही अंदर मोड़ना पड़ता है। लेकिन वृत्तियों को अंदर मोड़ने के लिये अन्दर एक ऐसा प्रबल आकर्षण केन्द्र होना चाहिये, जो वृत्तियों को अंदर की ओर आकर्षित करे और अपने आकर्षण से वृत्तियों को बाहर न जाने दे। इस सृष्टि में श्रीसद्गुरु महाराज से अधिक गुरुत्वाकर्षण अन्य कहीं भी नहीं है, इसीलिये वृत्तियों की अंतर्मुखता हेतु अन्तस् में श्रीसद्गुरु के मनमोहक स्वरूप का दर्शन करना होता है।
सन्त हैं सरगुन रूप देखावत
अंदर सोई रूप नाम होवै आखर दो समुझावत
यह सब बात जनाई तबै सतगुरु जे पावत
-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)

सुरत को संसारी पदार्थों से हटाकर, अन्तस् में उलटकर, मालिक के चरणों में सच्चा प्रेमभाव रखते हुए उनके नाम-धाम-स्वरूप का हर वक्त बोध होना ही दर्शन है। दर्शन का अर्थ है- मन, चित्त एवं दृष्टि से सद्गुरु महाराज के दिव्य स्वरूप को अन्तस् में देखना।
इस तरह चित्त-शांति हेतु मन का नाममंत्र में लय आवश्यक है, मन की लयता हेतु वृत्तियों की अंतर्मुखता आवश्यक है, वृत्तियों की अंतर्मुखता हेतु गुरुदर्शन आवश्यक है। नाममंत्र का जप-भजन प्रेम व पुलक भाव से करना चाहिये। जप व भजन करते वक्त मन में श्रीसद्गुरुदर्शन के अलावा किसी प्रकार की भी लौकिक-पारलौकिक कामना नहीं रखना चाहिये।

तृतीय चरण : अहंकार का विसर्जन
उपाय : सुमिरन
सुमिरन-क्षेत्र : दिल

नाममंत्र के जप, भजन व दर्शन से मन लय अवस्था को तो प्राप्त करता है, लेकिन विलयता को नहीं। मन की लयता व विलयता में अंतर बहुत ही बारीक है, किन्तु साधना की दृष्टि से यह एक बड़ा अंतर है। लयता का अर्थ हम पिघलने से ले सकते हैं। नाममंत्र के जप-भजन-दर्शन के तप से हमारे अंदर गुरुऊर्जा का प्रवेश तो होता है और हमारे मन की सभी जड़तायें एवं पूर्वाग्रह भी पिघलकर शिथिल होते हैं, हृदय में कोमलता भी विकसित होती है, लेकिन अभी भी साधक अपनी अहम् की सीमाओं में ही रहता है। इस कारण से अपरिमित आस्तित्त्व के सिंधु श्रीसद्गुरु महाराज से एकाकार नहीं कर पाता। आइये इसे एक उदाहरण से समझें- जैसे पिघले हुए घी की बूँद द्रव अवस्था में रहने के बावजूद जल में अलग-थलग ही रहती है और जल की तरंगें उस बूँद में आंशिक रूप से ही प्रवेश कर पाती हैं लेकिन पूरी तरह नहीं, कुछ कमीं तो शेष रहती है। इसीलिये कुछ ऐसा मंथन आवश्यक है जो बूँद को झकझोर कर उसकी सीमाओं को तोड़ डाले। इसके लिये साधक को श्रीसद्गुरु महाराज से अपने हृदय के तार जोड़ने होते हैं, जिससे गुरु रूपी सिंधु की तरंगों से साधक का हृदय भी झंकृत होने लगे। इस सेतु के माध्यम से ही मिलन को आतुर सद्गुरु महासिंधु शिष्य रूपी बूँद में समा जाते हैं। इसके पश्चात् साधक अथवा शिष्य अपने गुरु के साथ इस तरह जुड़ा होता है कि गुरु के दर्शन प्रसंग को विचारते ही वह प्रफुल्लित व प्रसन्न होने लगता है एवं विरह प्रसंग को विचारते ही उससे अश्रुपात होने लगते हैं। ऐसे साधक का हृदय नाममंत्र-जप के कम्पन से सदा तरंगित रहता है।
साधक यहाँ इस बात को स्पष्टता से समझ लें कि ऐसी स्थिति हेतु हँसने, प्रफुल्लित होने अथवा रोने की क्रिया नहीं करना है, अपितु यह तो नैसर्गिक अवस्था है। साधक के अहंकार को झकझोर कर मिटा देने वाले मंथन एवं भावों के अविरल प्रवाह हेतु हृदय के तारों का सद्गुरु से जुड़ना एकमात्र गुरु-प्रेम से ही संभव है।
प्रेम से सब होत कमइया
बिना प्रेम से कछु नाहीं होता सुरती नहीं एकठइखा
जब से सब सुरत एक न होती तब से रूप न पइया
पाखण्ड से काम न बनी करो सतगुरु कै दोहइया पइया
-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)
गुरु के प्रति प्रेम ही साधक के हृदय में ऐसे सेतु तैयार करता है जिससे भावों का प्रवाह संभव होता है। लेकिन साधक के मन में अगला प्रश्न उठता है कि हृदय में सद्गुरु के प्रति ऐसा प्रेम कैसे स्थापित हो?
श्रीसद्गुरु महाराज उस उपाय को समझाते हुए कहते हैं कि जब आप गुरु के सत्संग में आते हैं, काफी समय गुरु की सान्निध्यता में रहते हैं, तो आप सद्गुरु के हृदय में जीवमात्र के प्रति निःस्वार्थ प्रेम को देखते हैं और धीरे-धीरे आप उनकी अहैतुकी करुणा से परिचित होते जाते हैं। आपके द्वारा अनुभूत सद्गुरु महाराज के इसी प्रेम व करुणा के प्रभाव से आपमें गुरु-चिन्तन प्रारंभ होता है। गुरु की करुणा व प्रेम के निरंतर चिन्तन-मनन को ही सुमिरन कहते हैं। सुमिरन अर्थात् दिल की जुबान से सद्गुरु एवं उनके नाममंत्र को सतत याद करना। श्रीसद्गुरु के प्रेम-विरह की यादों से साधक के हृदय का भरा होना ही सुमिरन है।
सुमिरन से ही आपके हृदय में प्रेम के अंकुर फूटते हैं। प्रेम से अहंकार का अस्तित्त्व समाप्त होता है। इसका उदाहरण तो हमें संसार में भी देखने को मिलता है कि परिवार के प्रियजनों के बीच पद-प्रतिष्ठा का अस्तित्त्व नहीं होता है, ठीक वैसे ही श्रीसद्गुरु से प्रेम होने पर हमारा समस्त अहंकार सदा के लिये मिट जाता है, क्योंकि गुरु तो सर्वव्यापी हैं। इसीलिये गुरु से प्रेम अर्थात् पूरे जगत् से प्रेम, अर्थात् हमें पूर्ण निरहंकारिता की अवस्था प्राप्त होती है।


चतुर्थ चरण- हृदय में गुरुतत्त्व का स्थापन
उपाय- गुरुपूजा एवं गुरुसेवा
पूजा व सेवा का क्षेत्र : कर्मभूमि, श्रद्धा एवं भावभूमि

चतुर्थ चरण में प्रवेश लेने वाला साधक शांत-चित्त एवं कोमल हृदय वाला होता है, उसके अहंकार की सीमायें छिन्न-भिन्न हो गयीं होती हैं। वह सदा नाममंत्र के आनंद में मग्न रहता है। वास्तव में यह आनंद स्वयं साधक का नहीं होता है, अपितु यह आनंद तो सद्गुरु प्रेमसागर का होता है और चूँकि इस अवस्था के आने तक साधक के हृदय के तार सद्गुरु से जुड़ चुके होते हैं अतः गुरुप्रेम इसी सेतु से साधक के हृदय में भी प्रवाहित होता रहता है। गुरुदर्शन में निपुण यह साधक गुरु के मनमोहक स्वरूप को हृदय में बसाये रहता है। अब चतुर्थ चरण में साधक को गुरुतत्त्व (गुरु की करुणा, गुरु का प्रेम, गुरु का ज्ञान, गुरु की ओजस्विता एवं गुरु की तेजस्विता) को अपने हृदय में उतारना होता है। यह अत्यंत सूक्ष्म क्रिया है। साधक के पूर्वकर्म इस क्रिया की संपन्नता में व्यवधान पैदा करते हैं। ये प्रारब्ध-कर्म केवल सद्गुरु की सेवा रूपी अग्नि में भस्म होते हैं।
ऐसे गुरु कै करि खिजमतिया
सहजै पार गतिया
बाहर से अंदर खूब जानो गुपत भेद येही को मानो
खुल जाई किसमतिया

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)
श्रीसद्गुरु महाराज की आज्ञानुसार चलना, सदा उन्हें प्रसन्न रखना, उनके रुख को समझते हुए उनकी हर आवश्यकता की उनके बिना कहे ही पूर्ति करना, सद्गुरु के दरबार व भक्तों की सेवा और सद्गुरु महाराज द्वारा जन-कल्याणार्थ चलायी जाने वाली योजनाओं में प्रेम व उत्साह के साथ तन-मन-धन से सहयोग करना सद्गुरु महाराज की बाह्य-सेवा कहलाती है। श्रीसद्गुरु महाराज के द्वारा बतलाये गये नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान की साधना को पूर्ण मन व चित्त के साथ संपादित करना ही सद्गुरु महाराज की आंतरिक सेवा कहलाती है।
निरगुन गाये से कछू न होई सरगुन से जरै संचितिया
सरगुन रूप वोही कहावै सनमुख रूप कुदरतिया

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)
गुरुसेवा से अनेक जन्मों के बुरे कर्मों का भी क्षय हो जाता है। सभी कर्मों के क्षय हो जाने पर साधक का निर्मल हृदय गुरुतत्त्व की स्थापना के योग्य हो जाता है। अब साधक को गुरुपूजा के माध्यम से गुरुतत्त्व का आवाहन करना होता है।
पूजा का अर्थ है मन में सद्गुरु महाराज के प्रति प्रेम, विश्वास व श्रद्धा भाव को जगाना। इस हेतु सद्गुरु महाराज से याचना करनी होती है और स्वयं में एक दासनदास अर्थात् याचक की अवस्था विकसित करनी होती है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि स्वयं को स्वयं से इतना रिक्त करना होता है कि गुरुभाव के अतिरिक्त और कुछ भी न बचे। साधक की इस परम रिक्तता में ही परमप्रिय, करुणासागर, अनंत ज्ञानवान्, परम तेजस्वी श्रीसद्गुरु महाराज साधक के हृदय में गुरुतत्त्व को बीजरूप में रोपित करते हैं। श्रीसद्गुरु महाराज की कृपा के फलस्वरूप साधक के अन्तस् में हुए इस बीजरूप गुरुतत्त्व के रोपण से साधक में उपजे ब्रह्मज्ञान का तेज चारों दिशाओं में फैलने लगता है।
पंचम चरण- गुरुमयता
उपाय- ध्यान
ध्यान-क्षेत्र- सहस्रदल कमल एवं आस्तित्त्व

इस अवस्था में पहुँचे साधक के हृदय के तार सद्गुरु महाराज से जुड़े होते हैं। लेकिन, जब तक कोई जोड़ है तो समझो कि द्वैतभाव है। सद्गुरु से जुड़ना बेशक श्रेष्ठ है, लेकिन उससे भी श्रेष्ठतम है श्रीसद्गुरु महाराज से एकाकार होना। यही है व्यष्टि का समष्टि में पूर्ण विलय। संतों ने इसी पंचम अवस्था अर्थात् गुरुमयता को कुछ इस भाँति कहा है कि "बूँद समायी समुन्द में, सो कित हेरी जाय"। इसी अवस्था में साधक ब्रह्मज्ञान से अंदर-बाहर सरावोर होकर सिद्ध बनता है, यही अवस्था है- अहम् ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि और ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति। यही सच्चिदानंद की अवस्था है। सत् यानि जो सदा से है, जो सार रूप है, चित् यानि जो चेतनायुक्त है, ऐसे सदा रहने वाले सचेतन आनन्द को ही 'सत्- चित् -आनन्द' या सच्चिदानन्द कहते हैं। सच्चिदानंद अर्थात् ऐसा आनंद जिससे सदा चेतना प्राप्त होती हो।
चेतन मूरत तत्त्वज्ञानी कै है तीनके पूजै
वोही रूप हो जातवा
जिसको जानो वोही रूप मानो
जड़ से जड़ चेतन से चेतन हो जातवा

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)
गुरुमयता के लिये ध्यान आवश्यक है। ध्यान कोई क्रिया नहीं अपितु आस्तित्त्व की एक अवस्था है। ध्यान में सुरत सहस्रदल कमल में प्रतिष्ठित परमहंस सद्गुरु महाराज के स्वरूप में लीन होकर अद्वैतता को प्राप्त होती है। इस अवस्था में ज्ञान कोई जानकारी नहीं, बल्कि ऐसा प्रकाश होता है जो लौकिक व पारलौकिक सभी रहस्यों को स्पष्ट करता है। यही ब्रह्मविद्या है, जिसको जानने पर और कुछ जानना शेष नहीं रहता। इस विद्या से अपने अंदर प्रतिष्ठित जानने वाले को ही जाना जाता है। यही आत्मबोध है, यही सद्गुरु का साक्षात्कार है और यही सच्चिदानंद है।
बिन देखे जो ध्यान लगावै मन बुधि ध्यान कहावै
रूप देख के ध्यान लगावै सोई पक्का ध्यान कहावै
यह भेद जानै सोई सतगुरु वही भेद बतावै तबै पावै
पढ़ी सुनी भजन सब करते देखी गुरु बतावै तब पावै

-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)

 

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