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Science of Sant Mat

  Science of Sant Mat ( As explained by my Sat Guru Shrimat Paramahansa Sarananandji ) The spirituality is the continuous process in which GOD refines HIMSELF. For this purpose HE incarnates in the ...

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Contact for Initiation

Contact for Initiation Initiation is given by Sat Guru Shrimat Paramahansa Sarananandji Maharaj, HE is the present Guru of Sant Mat Anuyayi Ashrams. Devotee has to visit personally to ...

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Objective

Mission 1. For spiritual aspirant to serve spritual path and peaceful atmosphere to elevate the spirituality .  liberating Self Knowledge to lead the ...

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सद्‌गुरु के श्रीमुख से पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
बुधवार, 24 अगस्त 2016 23:42

१५-०८-२०१७

सद्गुरु महाराज के प्रति श्रद्धा, आध्यात्मिक प्रगति के लिये अत्यंत आवश्यक है। स्वयं के अंदर आध्यात्मिक ज्ञान को परिपोषित करने के लिये, सद्गुरु में पूर्ण एवं संदेहरहित श्रद्धा, नितान्त रूप से अनिवार्य है। गुरु के प्रति श्रद्धा ही, सदैव शिष्य की मातृवत् सुरक्षा करती है। गुरु के प्रति श्रद्धा से ही वह बल एवं मानसिक-शक्ति प्राप्त होती है, जिसके सहारे आध्यात्मिक-पथ में आने वाले सभी विघ्नों का सामना कर, उनसे पार जाने में सहायता मिलती है। श्रीसद्गुरु के प्रति पूर्ण आंतरिक श्रद्धा से ही अपने जीवन को पूर्णता की ओर अग्रसर किया जा सकता है। सद्गुरु के प्रति अटल श्रद्धा ही, समस्त आध्यात्मिक-साधनाओं का सार है। श्रीसद्गुरु के प्रति श्रद्धाविहीन शिष्य सुगंध रहित पुष्प, अथवा प्राणहीन जीवन के जैसा ही है। सद्गुरु के प्रति जिस शिष्य का हृदय पूर्ण श्रद्धा से भरा होता है, वह आसानीपूर्वक सद्गुरु महाराज से ज्ञान-प्रकाश को अपनी ओर खींच लेता है।

१४-०१-२०१८

एक निष्ठावान् शिष्य सदैव, गहरी श्रद्धा, प्रगाढ़ भक्ति एवं विनम्रता के साथ गुरु की सेवा में ही, स्वयं को लगाये रखता है और, श्रीसद्गुरुदेव की आज्ञा का अक्षरशः पालन करता है। जिस तरह सूर्य के प्रकाश में कमल खिल जाता है, वैसे ही गुरुसेवा रूपी तप से शिष्य का हृदय-कमल खिल जाता है और, प्रकाश से भर जाता है। बिना किसी स्वार्थ से सद्गुरु महाराज की सेवा करने पर ही, प्रज्ञा में निखार आता है और, सत्य-ज्ञान का उदय होता है। यदि सेवा में सेवक का अंहकार एवं कोई स्वार्थ शामिल हो तो, सेवा फलदायी नहीं होती और व्यर्थ ही जाती है। अतः, सद्गुरु महाराज की सेवा करते समय मन में किसी भी प्रकार का अंहकार विकसित न होनें दें, अर्थात् मन में सेवक होने के अहंकार को भी, न विकसित होने दें। सही मनोभावों से संपादित गुरुसेवा आपको जीवन के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाती रहती है, अर्थात् हर पल, खुद की याद (आत्म-स्मरण) दिलाती रहती है। सद्गुरु महाराज को तन-मन से अपनी सेवा अर्पित करना ही मानव-जीवन में सभी आध्यात्मिक-उपलब्धियों को हस्तगत करने एवं शीघ्रता से मंजिल तक पहुँचने हेतु एक निश्चित मार्ग है। एकमात्र गुरुसेवा से प्राप्त उपलब्धियाँ कई जन्मों के ध्यान, तपस्या आदि साधनाओं के तुल्य होती हैं।

१२-०२-२०१८

श्रीसद्गुरुदेव के चरणों में ही मुक्ति का वास होता है। सद्गुरुदेव के श्रीचरणों में नित्य-ध्यान लगाने वाला, भय एवं पीड़ाओं से सर्वथा मुक्त रहता है। सद्गुरुदेव के श्रीचरण-कमलों की पूजा से शिष्य, प्रकृति के सर्वोच्च सत्य का जानकार हो जाता है। सद्गुरु महाराज के श्रीचरण-कमल, शिष्य के आध्यात्मिक-पथ के सभी व्यवधानों को हटाकर, उसकी राह में ज्ञान-ज्योति का प्रकाश करते हैं और, उसे इस भवसागर अर्थात्, जन्म-जरा-मृत्यु के अंतहीन चक्र से पार ले जाते हैं। सद्गुरु अपने शिष्य के अन्दर ही ज्ञान की ज्योति जलाकर, अंधकाररूपी उसकी अज्ञानता को मिटा देते हैं।

११-०२-२०१८

शिष्य की चेतना-बुद्धि में ऐसे किसी भी कार्य का विचार कदापि नहीं उठना चाहिये, जो सद्‌गुरुदेव के उपदेशों अथवा शिक्षाओं के विपरीत हों। शिष्य को इन मनोभावों को पूर्णता तक ले जाने हेतु सभी प्रयास करना चाहिये, फिर ऐसे आज्ञाकारी शिष्य को सभी संस्कारों से मुक्त करने की जिम्मेदारी सद्‌गुरुदेव स्वयं ही निभाते हैं और, बिना देर लगाये, उसके सभी संस्कारों को मिटा देते हैं। ऐसी आज्ञाकारिता, सद्‌गुरु एवं शिष्य के बीच एक मजबूत कड़ी निर्मित करती है जिसके माध्यम से शिष्य में आध्यात्मिक ज्ञान एवं शक्ति का नित्य प्रवाह स्थापित हो जाता है।

१०-०१-२०१८

‘गुरु-तत्त्व’ इस ब्रह्मांड की एकमात्र परम-शक्ति है जो, इस धरा में चेतना के परिशोधन एवं उत्थान के लिये स्वयं को एक दिव्य-अवतार "सद्गुरु" के रूप में प्रकट करती है, ताकि यह सृष्टि असत्य से सत्य की ओर एवं अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान-प्रकाश की ओर निरंतर बढ़ती रहे। श्रीसद्गुरुदेव ही इस ‘गुरु-तत्त्व’ का देहावतार हैं जो, आत्मा के वैभव (प्रकाश) को ढकने वाली अज्ञान की धुंध परतों को हटाते हैं।  

०९-०१-२०१८

सद्गुरु के चरणों में पूर्ण निष्ठा होने से सभी शुभ, निर्मल एवं सद्-इच्छायें निश्चित ही पूरी होती हैं। श्रीसद्गुरु के पावन चरण-कमलों के स्पर्श मात्र से, शिष्य अपने पूर्व-जन्मों में किये गये बुरे कर्मों के परिणाम-स्वरूप मिले, इस माया-मोह के संसार से सर्वथा मुक्त हो जाता है। श्रीसद्गुरुदेव के चरण-कमलों की आराधना से उन सभी जीवों का उद्धार हो जाता है, जो भवसागर के दलदल में धसे हुए नारकीय-जीवन बिता रहे हैं और, मुक्ति के लिये तड़प रहे हैं। सद्गुरु महाराज के पावन श्रीचरण, कष्टप्रद द्वंद्वात्मक माया का विनाश करने वाले हैं और, दुर्भाग्य से सदा रक्षा करने वाले है। अतः, अति-विनम्र भाव से सद्गुरु के परमपूज्य चरणों में शरण लें एवं जीवन में सुरक्षा प्रदान करने वाले सद्गुरु महाराज के चरणारबिंद में कोटि-कोटि नमन अर्पित करें।

०८-१-२०१८

शिष्य और गुरु के मध्य परस्पर प्रेम ही गुरुभक्ति का आधार है। सद्‌गुरुदेव तो प्रेम की साकार मूर्ति हैं, उनके हृदय में अपने भक्त के लिये कितना प्रेम है, इसे कोई नहीं जान सकता है। शिष्य जितना प्रेम अपने गुरु से करता है, उससे कई गुना प्रेम सद्‌गुरु अपने शिष्य पर लुटाते हैं। सद्‌गुरु परमात्मा तो अपने शिष्य के प्रेम से ही बँधे रहते हैं। श्रीकृष्णजी इसी बात को ऋषि दुर्वासा को समझाते हुए कहते हैं कि-
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतंत्र इस द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥

(श्रीमद्भागवत, ९/६३)
अर्थात्‌, हे विप्र! मैं भक्त के अधीन हूँ अतः पराधीन सा हो जाता हूँ। साधु और भक्तजनों ने मेरे हृदय पर अधिकार कर लिया है, क्योंकि मैं भक्तों का प्रिय हूँ।

०७-०१-२०१८

सद्‌गुरु महाराज के हृदय में प्रेम का अनंत सागर होता है, जो करुणा के रूप में उनके नयनों से सभी के लिये छलकता है। सद्‌गुरु का प्रेम ही शिष्य का आत्मबल होता है। जो शिष्य अपने सद्‌गुरु के प्रेम से जितने गहरे स्तर पर जुड़ा होता है वह उतना ही आत्मबल का धनी होता है। सद्‌गुरु के प्रेम के सहारे ही शिष्य अपनी आध्यात्मिक-यात्रा पूरी करता है। गुरु का प्रेम शिष्य को विचलित नहीं होने देता है, साधना-पथ में चाहे जो भी बाधायें आयें लेकिन गुरु के प्रेम के सहारे शिष्य उन सभी को पारकर अपने लक्ष्य तक पहुँच ही जाता है।

०६-०१-२०१८

आप चाहे सांसारिक जीवन के किसी भी पड़ाव में हों, लेकिन जब गुरुमंत्र से जुड़ जाते हैं तो आप सद्‌गुरु अर्थात्‌ अपने इष्ट तक पहुँच ही जाते हैं। गुरुमंत्र एक बूमरेंग अस्त्र की तरह होता है जो अंत में वहीं पहुँच जाता है जहाँ से वह छूटता है। इसी तरह सद्‌गुरु महाराज से मंत्र ग्रहण कर उस मंत्र से अपने जीवन को जोड़ देने पर गुरुमंत्र साधक को इष्ट सद्‌गुरुदेव तक पहुँचा ही देता है। यह गुरुमंत्र की ही शक्ति है कि साधक चाहे जहाँ भी रहे और चाहे जिस किसी भी व्यापार में संलग्न रहे लेकिन गुरुमंत्र से जुड़कर वह अपने इष्ट सद्‌गुरु तक पहुँच ही जाता है। इसीलिये आवश्यकता इस बात की है हम स्वयं को गुरुमंत्र से जोड़ लें। गुरुमंत्र की संपूर्ण शक्ति एवं दिशा इस तरह समायोजित होती है कि अंत में वह सद्‌गुरु महाराज तक पहुँचा ही देता है।

०५-०१-२०१८

श्रीसद्‌गुरुदेव की अनन्य भक्ति द्वारा शिष्य अपने सद्‌गुरु की देह में असीम सत्ता का, साकार के मध्य निराकार का, व्यष्टि में समष्टि एवं मानवरूप में समायी अनन्त दिव्यता की अनुभूति पाता है। इस अनुभूति से ही शिष्य को अपने अंदर भी उस परमात्म-शक्ति के साक्षात्कार करने की प्रेरणा मिलती है। जिस शिष्य ने गुरुभक्ति के सरोवर में डुबकी लगाकर सद्‌गुरु महाराज की विराटता के दर्शन कर लिये, वह धन्य है। सद्‌गुरु के ज्ञानरूपी अग्निशिखा को जो शिष्य अपने हृदय में बसा लेता है, सद्‌गुरु महाराज के ब्रह्मज्ञान के प्रकाश से वह स्वयं भी प्रकाशित हो जाता है। ब्रह्मज्ञान के संचरण की परंपरा यही है, जिसे गुरु-शिष्य परंपरा भी कहते हैं। जिस तरह किसी कमरे की दीवार ढह जाने से कमरे के अंदर व बाहर का आकाश एक हो जाता है, वैसे ही सद्‌गुरु महाराज की कृपा एवं उनके ज्ञान-वचनों से शिष्य की अज्ञान रूपी दीवार ढह जाती है और उसकी चेतना सद्‌गुरु महाराज की ब्राह्मी-चेतना से मिल जाती है। इसे ही सद्‌गुरु से एकाकार होना अथवा अहंभाव का परमभाव में विसर्जन कहते हैं।

०४-०१-२०१८

सद्‌गुरुदेव तो स्वरूप से ही सत्‌-चित्‌ आनन्दमय होते हैं, इसीलिये वे ब्रह्म से अभिन्न हैं। इसीलिये सद्‌गुरु महाराज के स्वरूप के दर्शन को ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति का उपाय कहा गया है। माया के प्रभाव में पाशबद्ध जीव की तरह मनुष्य स्वयं को अपने आत्म-स्वरूप से भिन्न समझकर, भौतिक वस्तुओं एवं इन्द्रियों के बाह्य नश्वर सुखों की चाह में भटक रहा है। इसी कारण से मनुष्य सर्वदा उद्वेग एवं भय से ग्रस्त है। सद्‌गुरु की कृपाशक्ति से ही यह अज्ञान का आवरण छिन्न-भिन्न होता है और मनुष्य अपने शुद्ध-बुद्ध रूप की अनुभूति पाता है। संसार के बंधनों से मुक्त होकर विस्मृत आत्म-स्वरूप का बोध प्राप्त करना केवल सद्‌गुरु महाराज की दया से ही संभव है। जब शिष्य को सद्‌गुरुदेव की प्राप्ति होती है और वह उनके शरणागत होता है, तभी सद्‌गुरु महाराज की करुणामयी प्रेमशक्ति से आकर्षित होकर वह अनन्य भक्ति की राह में चलने लगता है। सद्‌गुरु के सान्निध्य एवं उनके ज्ञान-उपदेशों में उसके अज्ञान आवरणों का विलय होता होता और आत्म-प्रकाश की झलक दिखाई देने लगती है। गुरुभक्ति के प्रभाव से ही शिष्य की क्षुद्र अहं चेतना का दिव्य चेतना में रूपांतरण होता है। सद्‌गुरुदेव के दिव्य स्वरूप के मनन से शिष्य के अंदर भी सद्‌गुरु महाराज की दिव्य भावनाओं का विकास होता है।

०३-०१-२०१८

परम पावनकारी गुरुभक्ति की सरिता जब शिष्यों के अन्तःकरण में प्रवेश करती है तो उनके कई जन्मों के संचित पापों को मिटाती है और इस जन्म के समस्त संतापों को शांत करती है। परमपावनी गुरुभक्ति के अंतःप्रवाह से कई जन्मों के संचित कर्म एवं मन की कलुषता सदा-सदा के लिये धुल जाती है। शिष्यों का मन गुरुभक्ति के अमृतरस में धुलकर धवल होता है। जीवन में इस निर्मलता का अनुभव बहुत ही दुर्लभ है और वे ही इसका अनुभव कर पाते हैं जिन्होंने अपना सर्वस्व श्रीगुरुदेव की भक्ति में समाहित कर दिया है। गुरुभक्ति अन्तःकरण शुद्धि का सर्वोत्तम मार्ग है। गुरुभक्ति की पावनकारी शक्ति इतनी प्रबल होती है कि इससे गुरुभक्तों का अन्तःकरण तो निर्मल हो ही जाता है, साथ ही गुरुभक्त जिस स्थान में रहता है वह स्थान भी शुद्ध हो जाता है।

०२-०१-२०१८

तत्त्ववेत्ता श्रीसद्गुरुदेव की चरण-रज का मात्र एक कण ही, इस विशाल भव-सागर को पार करने हेतु सेतु बनाने के लिये पर्याप्त है। सभी वेद-उपनिषदों में छुपा रहस्यमय ज्ञान, सद्गुरु महाराज के श्रीचरण-कमलों में समाया हुआ है। जिस तरह सूर्य निरंतर प्रकाश की किरणें बिखेरता रहता है, वैसे ही सद्गुरु महाराज के चरण-कमल, वेदांत के ज्ञान से जगमगाते परम-सत्य को चारों ओर बिखेरते हैं। शिष्य को श्रीसद्गुरुदेव के चरणों में प्राप्त होने वाले अनुभव ही, वेदों में अनमोल-उद्घोषों के रूप में उद्धृत हैं, यथा- ‘तत् त्वम् असि’ (आप ही वे पारब्रह्म परमात्मा हैं), ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ (ज्ञान-चेतना ही ब्रह्म है), ‘अहं ब्रहास्मि’ (ब्रह्म रूप में मेरे अंदर आप ही हैं) एवं ‘अयं आत्मा ब्रह्म’ (ब्रह्म के रूप में आत्मा में आप ही विद्यमान हैं, अर्थात् आत्मा ही ब्रह्म है)।

०१-०१-२०१८

गुरुभक्ति की साधना में अपने मन को इष्ट श्रीसद्‌गुरु महाराज से जोड़ लेना ही परमात्म-तत्त्व अर्थात्‌ गुरु-तत्त्व के बोध की युक्ति है। गुरुभक्ति में नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन एवं ध्यान के अभ्यास से मन को श्रीसद्‌गुरुदेव से जोड़ा जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज से मन जुड़ जाने पर शिष्य में सद्‌गुरुदेव का वास्तविक स्वरूप उभरने लगता है। गुरु-तत्त्व एक अनुग्रहकारी परमात्म-शक्ति है जो जीव को अनंत अगोचर परमात्मा से जोड़ती है। देहधारी श्रीसद्‌गुरु ही गुरु-तत्त्व की साकार मूर्ति हैं। शिष्य का अपने सद्‌गुरु से अभिन्न हो जाना अर्थात्‌ गुरु-तत्त्व से अभिन्न हो जाना है। सद्‌गुरु की अमृतवाणी के श्रवण एवं उनके बतलाये मार्ग पर चलने पर ही गुरु-तत्त्व का बोध होता है। इस तरह एक शिष्य के लिये गुरु-तत्त्व ही साधन-तत्त्व एवं साध्य-तत्त्व भी है। परम प्रेमास्पद श्रीसद्‌गुरुदेव को सर्वभाँति स्वीकार कर लेना ही गुरु-तत्त्व में प्रतिष्ठित होना है। सद्‌गुरु महाराज की वाणी में अविचल आस्था, श्रद्धा और विश्वास होने से गुरु-तत्त्व की प्रतीति गहरी होती है

२७-१२-२०१७

अंशरूप में आत्मा अंशीरूपी विराट परमात्मा का ही अंश है। विराट परमात्मा के साक्षात्कार की राह आत्मबोध से ही गुजरती है। जब हमें अपने अंदर आत्मतत्त्व का बोध होगा, तभी हम विराट परमात्मा का अनुभव कर सकते हैं। आत्मबोध ही पराज्ञान है और यह ज्ञान श्रीसद्‌गुरु महाराज की शरण में ही संभव है। शास्त्र भी आत्मबोध की इसी युक्ति का समर्थन करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भी श्रीकृष्णजी ने अर्जुन से यही कहा है कि आत्मबोध के लिये सर्वप्रथम उन ज्ञानी-महापुरुष की शरण में जाओ जिन्होंने तत्त्वदर्शन किया है। फिर इसके बाद श्रीकृष्णजी ने तीन महत्वपूर्ण निर्देशों के पालन की बात कही है। पहला निर्देश यह है कि उन ज्ञानी-महापुरुष को प्रणिपात करो अर्थात्‌ प्रणाम करो, नमन करो। यहाँ नमन से तात्पर्य है कि अपने मन व बुद्धि को उन्हें समर्पित करो। मन व बुद्धि का यह समर्पण शिष्य के इस भाव की सांकेतिक अभिव्यक्ति है वह सद्‌गुरु के उपदेशों पर, बिना किसी तर्क-वितर्क आदि के, यथावत्‌ अमल करने को राजी है। इसका आशय सद्‌गुरु के उपदेशों का अप्रामाणिक होना नहीं है, अपितु इसका मतलब यही है कि इस प्रारंभिक अवस्था में अपनी मलिन बुद्धि को ज्ञान की कसौटी बनाना शिष्य की मूर्खता ही होगी। श्रीकृष्णजी ने दूसरा निर्देश यह दिया है कि अर्थात्‌ तत्त्वदर्शी सद्‌गु्रुदेव के समक्ष परम विनीत भाव से आत्म-विषयक ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा व्यक्त करो। विनीत भावरूपी पात्र में ही सद्‌गुरु महाराज द्वारा प्राप्त ज्ञान समा सकता है, अतः आत्मज्ञान के इच्छुक शिष्य को विनयपूर्वक ही अपनी जिज्ञासा सद्‌गुरुदेव के समक्ष रखना चाहिये। आत्म-विषयक वे प्रश्न अथवा शंकायें जो शिष्य के हृदय में उठती हैं और जिनका निराकरण पाने के लिये उसका मन व्याकुल रहता है, वे ही वास्तविक प्रश्न हैं। महज औपचारिकता अथवा अपनी बुद्धि के प्रदर्शन हेतु प्रश्न करना कतई उचित नहीं हैं। तीसरा और अंतिम सबसे महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए श्रीकृष्णजी कहते हैं कि, उन ज्ञानी-महापुरुष की सेवा करो। सद्‌गुरुदेव की सेवा सभी आध्यात्मिक-साधनाओं में सर्वश्रेष्ठ साधना है। भौतिक रूप से सद्‌गुरु महाराज की सेवा एवं उनकी आज्ञा का पालन इस सेवा का बाह्य रूप है। सद्‌गुरुदेव के द्वारा बतलायी गयी साधना का अहर्निश अभ्यास आंतरिक सेवा है। सद्‌गुरुदेव की बाह्य एवं आंतरिक सेवा ही ज्ञानोदय का मार्ग है।

२६-१२-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेव की सेवा शिष्य के लिये एक सुनहरा अवसर होता है। श्रीसद्‌गुरु जो भी कार्य अपने शिष्य को सौंपते हैं उसके पीछे कोई न कोई मकसद जरूर होता है, अतः उनके द्वारा दिये गये कार्य को स्वयं ही संपादित करना चाहिये। यही कारण है कि श्रीकृष्णजी एवं श्रीरामजी के पिता तो राजा थे, वे चाहते तो अनेक सेवकों को गुरु की सेवा में लगा सकते थे, लेकिन फिर भी गुरुकुल में सारे कार्य श्रीकृष्णजी एवं श्रीरामजी ने स्वयं अपने हाथों से किया। अल्पकाल में ही सभी विद्याओं में पारंगत होने का यही उपाय है। गुरुगीता में श्रीशिवजी ने भी माता पार्वतीजी को यही उपदेश दिया है-
गुरुकार्ये स्वयं शक्तो नापरं प्रेषयेत्‌ प्रिये ।
बहुभृत्यपरैर्भृत्यैः सहितोऽप्यतिभक्तिमान्‌ ॥
(श्रीगुरु-गीता)
श्रीशिवजी कहते हैं कि, हे प्रिये। जिस पुरुष के ऐसे सेवक हों कि उन सेवकों के भी बहुत सेवक हों, ऐसे उत्तम भक्तिमान्‌ पुरुष को चाहिये कि यदि वह अपने सद्‌गुरुदेव का कोई कार्य स्वयं कर सकता है तो वह कार्य करने के लिये अपने किसी सेवक को न भेजे।

२५-१२-२०१७

स्वयं को निमित्त मानकर अकर्त्ताभाव से सद्गुरु की सभी आज्ञाओं के पालन में स्वयं को न्यौछावर कर देना ही कर्मयोग है। कर्मों का केवल परित्याग कर देने से न तो सिद्धि प्राप्त की जा सकती है और न ही परमपद प्राप्त हो सकता। जब तक जीवन है तब तक किसी न किसी न रूप में कर्म होते ही रहेंगे, चाहे वे कर्म ऐच्छिक रूप से हों अथवा अनैच्छिक रूप से। मनुष्य कर्म किए एक क्षण भी बिना नहीं रह सकता। मनुष्य यदि बाह्य दृष्टि से कर्म न भी करे और विषयों से दूर भी रहे तो भी मन में कर्म-चिंतन चलता ही रहता है। ऐसा मनुष्य दंभी आचरण वाला कहलाता है। ऐसी स्थिति में यदि सभी कर्म सद्‌गुरुदेव के ही निमित्त हों और उनके कर्मफलों को भी श्रीसद्‌गुरुदेव को समर्पित कर दिये जायें तो मनुष्य कर्मदोषों से बच जायेगा।

२४-१२-२०१७

सद्‌गुरु से प्राप्त मंत्र एवं उनके द्वारा बतलायी साधना के अभ्यास से साधक में प्रबल शक्ति एवं असीम सामर्थ्य पैदा होती है। इस शक्ति एवं सामर्थ्य का प्रयोग जिस निमित्त भी किया जाता है, उसमें सफलता निश्चित ही मिलती है। अतः श्रीसद्‌गुरुदेव हमेशा ये सुनिश्चित करते हैं कि इन शक्तियों का दुरुपयोग न हो और न ही चमत्कारों के रूप में इनका प्रदर्शन हो। इस आध्यात्मिक शक्ति का प्रयोग केवल आध्यात्मिक प्रगति के लिये ही किया जाना चाहिये। इन शक्तियों के सदुपयोग केवल सद्‌गुरु महाराज के अनुशासन एवं मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिये। सांसारिक स्वार्थों को सिद्ध करने में यदि इन शक्तियों का उपयोग होता है तो साधक धीरे-धीरे इन शक्तियों को खो देता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सद्‌गुरु महाराज शिष्य को सदैव सचेत करते रहते हैं और आवश्यक होता है तो शिष्य को कड़े अनुशासन में रखते हैं। ये शक्तियाँ आध्यात्मिक अनुप्रयोग होने पर संवर्धित होती हैं और सांसारिक हितों में इनका केवल क्षय ही होता है। जिस तरह दहकते अंगारों की ओर बढ़ते हुए अबोध बच्चे को उसके माता-पिता रोकते हैं, वैसे ही सद्‌गुरुदेव भी अपने शिष्य को गलत राह में जाने से बार-बार रोकते रहते हैं क्योंकि वे इसके परिणाम को जानते हैं। गुरु ऊपर से चाहे जितने भी कठोर हों लेकिन अन्दर से अपने शिष्यों के लिये अपार स्नेह एवं करुणा से भरे होते हैं। गुरु की कठोरता नारियल के फल की भाँति होती है, जो शिष्य अपने गुरु के कठोर अनुशासन को प्रेमपूर्वक सहन नहीं कर सकता, वह उस कठोरता में छुपे पौष्टिक फल एवं मीठे जल के स्वाद से वंचित रह जायेगा। गुरु हमें अज्ञानता की गहरी नींद से जगाते हैं इसीलिये कभी-कभी कठोर प्रतीत होते हैं, लेकिन यदि वे ऐसा न करें तो हम हमेशा सोते ही रहेंगे और ब्रह्म-बेला में ब्रह्मदर्शन से चूक जायेंगे।

२२-१२-२०१७

अपने शिष्य के जीवन को सही राह में लाने के लिये कभी-कभी सद्‌गुरु महाराज का रुख कठोर भी प्रतीत होता है, लेकिन उनकी इस कठोरता के पीछे भी कोमल करुणा ही होती है। उनकी इस कठोरता के पीछे कोमल भाव को पढ़ लेने वाले ही सही मायने में शिष्य हैं। सद्‌गुरु की चाह सदा यही होती है कि शिष्य का जीवन-पुष्प अपनी पूर्णता के साथ खिले। इसीलिये तो गुरु की उपमा कुंभकार से की गई है जो कुंभ को उसका सही आकार प्रदान करने के लिये बाहर से चोट करता है, लेकिन अंदर से सदा अपने हाथों से उसकी सम्हाल भी किये रहता है। यह बात परम सत्य है कि सद्‌गुरु के सभी प्रयास अपने शिष्य को पूर्णता प्रदान करने के लिये ही होते हैं, इसके अतिरिक्त सद्‌गुरु का अन्य कोई स्वार्थ नहीं होता है। इसीलिये गुरु की कृपा को अहैतुकी कहा जाता है। जब कोई शिल्पकार छैनी-हथौड़ी से किसी शिला पर वार करता है तो उसके जेहन में केवल भावी प्रतिमा ही होती है। संसार जब उस प्रतिमा की प्रशंसा करते हैं तो उसका हृदय गद्‌गद्‌ होता है।

२१-१२-२०१७

गुरु-शिष्य का नाता एक दिव्य प्रकाशमयी सुरंग की तरह है जो सीधे अपने लक्ष्य में ही खुलती है। इस मार्ग से शिष्य अंदर ही अंदर बढ़ता जाता है और सीधे अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। संसार में अनेक राहें हैं, सभी राहें आपस में गुत्थम-गुत्था हैं, इनमें व्यक्ति चलता तो बहुत है लेकिन पहुँचता कहीं भीं नहीं है। जबकि गुरु-शिष्य संबंधरूपी यह दिव्य प्रकाशमयी सुरंग सभी भटकावों से सर्वदा रहित है और निश्चित ही जीवन को उसकी वास्तविक मंजिल तक पहुँचाने वाली है।

२०-१२-२०१७

सदगुरु मंत्रशक्ति के रूप में शिष्य के जीवन में प्रवेश करके उसके समस्त पापों को भस्म कर देते हैं और गुरुमंत्र के दिव्य स्पंदन आंतरिक मल को धोकर शिष्य के हृदय को चैतन्यप्रभा से भर देते हैं। शिष्य का हृदय जितनी मात्रा में गुरुभक्ति से भरता जाता है, वह उतनी मात्रा में सद्‌गुरु महाराज के साथ तन्मय होता जाता है। शिष्य का अपने सद्‌गुरुदेव के साथ आत्मीय जुड़ाव श्रेष्ठ सद्‌गुणों, उज्जवल प्रेरणाओं, उत्कृष्ठ भावनाओं एवं निर्विकारी जीवन का स्रोत है। अंतर्ज्ञान की शक्ति का प्रवाह न केवल प्रयासों से और न ही शास्त्रों के केवल पठन-पाठन अथवा श्रवण से हो सकता है। अंतर्ज्ञान की शक्ति का प्रवाह केवल गुरु-शिष्य संबंध के माध्यम से होता है। यह ज्ञान-प्रवाह एक प्रज्वलित दीपक से दूसरे दीपक के प्रज्वलन जैसा है। जैसे एक प्रज्वलित दीपक की अग्निशिखा दूसरे दीपक में प्रसारित हो जाती है, वैसे ही आत्म-तत्त्ववेत्ता श्रीसद्‌गुरुदेव आत्मज्ञान की ज्योति से शिष्य को भी आत्मबोध करवाते हैं। समर्पित शिष्य एक बत्ती की तरह है, जिसमें श्रीसद्‌गुरुदेव आत्मबोधरूपी अग्निशिखा प्रतिष्ठित कर देते हैं। श्रीसद्‌गुरु के प्रति श्रद्धा, प्रेम एवं भक्ति से सिक्त हृदय वाला शिष्य स्वयं तो आत्मज्ञान के प्रकाश से रोशन होता ही है, साथ ही निजबोध के प्रकाश से वह अन्य लोगों को भी प्रकाशित कर सकता है। इस प्रकार से गुरु-शिष्य संबंध ज्ञान-प्रकाश का मार्ग है जो पीढ़ी दर पीढ़ी अंतर्ज्ञान प्रकाशित करता रहता है। पूर्ण समर्पित भाव से सद्‌गुरु महाराज की शरण में जाना चाहिये और अत्यंत विनीत-भाव से आत्मज्ञान की राह दिखाने की याचना करना चाहिये। तत्त्वदर्शी श्रीसद्‌गुरु महाराज के उपदेशों को अपने जीवन में अमल में लाने से शिष्य निश्चित ही आत्मबोध को प्राप्त होता है। ज्ञानप्राप्ति का एकमात्र यही उपाय है।

१९-१२-२०१७

सद्‌गुरु से विरह में शिष्य की जो मानसिक दशा होती है वह प्रेम, भक्ति और आध्यात्मिक अनुभूति की सर्वोच्च अवस्था है। शिष्य केवल अपने सद्‌गुरु का दीवाना होता है, उसे न तो ज्ञानप्राप्ति की आकांक्षा होती और न ही किसी योगसाधना की सिद्धि की चाह। वह तो आठों याम केवल अपने सद्‌गुरु के दर्शन की ललक से भरा होता है। वह अपने समूचे अस्तित्व को सद्‌गुरु की भक्ति में समर्पित कर देता है और परिणामस्वरूप पूर्ण परमात्मा सद्‌गुरु उसके हृदय में समाये रहते हैं। सद्‌गुरु से विरह का शूल शिष्य की सभी वासनाओं को कुरेद-कुरेद कर निकाल देता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के विरह में भक्त का रुदन और गुरुदर्शन को व्याकुल उसके हृदय की आहें ही सच्ची प्रार्थना है। जिस तरह अग्नि के पूर्ण प्रज्वलित हो जाने पर धुँआ का नामो-निशान नहीं बचता, वैसे ही विरह की अग्नि में भक्त के सभी आचार-व्यवहार समाप्त हो जाते हैं और उसे अपनी कोई सुध-बुध नहीं रहती है। हर पल केवल अपने सद्‌गुरु महाराज की यादों में खोया रहता है। विरह की अग्नि से भक्त के सभी दोष भस्म हो जाते है और उसका जीवन खरा सोना की भाँति चमचमाने लगता है। वास्तव में विरह की अवस्था प्रेम-स्वरूप भक्ति की चरमावस्था है। विरह में भक्त सुख एवं दुख दोनों दशाओं से गुजरता है। सुख इस बात का कि सद्‌गुरु की याद उसके हृदय में स्थायी रूप से बस जाती है, उसके नेत्र में हर पल सद्‌गुरु महाराज की छवि ही तैरती रहती है, वह मन ही मन सद्‌गुरु महाराज से बातें भी करता रहता है। विरह में भौतिक रूप से दूर होते हुए भी सद्‌गुरु उसके मन में समाये रहते हैं। विरह में दुःख इस बात का रहता है कि कब श्रीसद्‌गुरु महाराज से रूबरू होगा, उनके प्रत्यक्ष दर्शन पाने में न जाने कितनी और प्रतीक्षा शेष है। अपनी अपात्रता को सोचकर वह दुखी होता है कि सद्‌गुरु से एकाकार कैसे होगा। विरही भक्त सदा आनंद के आँसुओं में सरावोर रहता है। भक्त अपने छोटे से हृदय पात्र में विराट सद्‌गुरु को पाकर सदा अभिभूत रहता है।

१८-१२-२०१७

किसी भी चीज की इच्छा करना, लालसा एवं कल्पना करना; वस्तुतः ये मन के कार्य हैं। मन को संतुष्ट करने के लिये ही इन्द्रियाँ तरह-तरह की भोग-वासनाओं में प्रवृत्त होती हैं और तदनुसार ही जीवन को इन भोग-वासनाओं के बंधन में बाँधती हैं। इसीलिये कहा गया है कि- "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः", अर्थात् मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है। मन की इच्छाएँ और कल्पनाएँ यदि कुमार्ग गामी हों तो मनुष्य का पतन होता है और यदि सन्मार्ग गामी हों अर्थात्‌ सद्‌गुरु महाराज के बतलाये हुए गुरुभक्ति के मार्ग की ओर प्रवृत्त हों, तो यही मन आत्म-कल्याण के मार्ग को प्रशस्त करता है। मानव-जीवन में असंस्कृत मन से बढ़कर अन्य कोई दूसरा शत्रु नहीं है। सद्‌गुरु महाराज द्वारा दीक्षा में दिये जाने वाले महामंत्र की साधना, इस मन को शांत करके सही दिशा में चलाने के लिये लगाम का कार्य करती है। गुरुमंत्र की नियमानुसार साधना से मन संस्कारित होता है और उसकी चाह आत्मोन्मुखी होती है। गुरुप्रदत्त मंत्र का जप अन्तःकरण की शुद्धि हेतु अंतरंग साधन है, अर्थात्‌ गुरुमंत्र आन्तरिक रूप से क्रियाशील होकर मन के मैल हटाता है। मल दोष के निवारण के दो मुख्य उपाय हैं- श्रीसद्‌गुरु महाराज से प्राप्त मंत्र का जप एवं निष्काम-कर्म। अन्तःकरण पर मल की चाहे कितनी भी कठोर एवं मोटी परत क्यों न हो लेकिन गुरुमंत्र के नियमित एवं नियमानुसार जप से यह परत सूखकर एक पपड़ी की तरह अन्तःकरण से अलग हो जाती है। गुरुमंत्र में अपरिमेय पापनाशक शक्ति होती है। श्रद्धा एवं पूर्ण आस्था से किये गये नामजप की साधना से जन्म-जन्मांतरों की संचित पापराशि भी भस्म हो जाती है। मन के मल को हटाने का दूसरा उपाय है निष्काम कर्म। शिष्य के जीवन में केवल एक ही कर्म होता है - सद्‌गुरु महाराज की सेवा। श्रीसद्‌गुरुदेव की निष्काम-भाव से सेवा करने से सुखभोग की वासना निवृत्त होती है। किसी भी तरह के स्वार्थ एवं फलासक्ति के बिना पूर्ण भक्तिभाव से सद्‌गुरु महाराज की सेवा में लगे रहना निष्काम कर्मयोग है। यह भक्तिप्रधान निष्काम कर्मयोग ही मन को निर्मल करता है और जीवन में शांति व आनंद को भरता है।

१६-१२-२०१७

सदगुरु मंत्रशक्ति के रूप में शिष्य के जीवन में प्रवेश करके उसके समस्त पापों को भस्म कर देते हैं और गुरुमंत्र के दिव्य स्पंदन आंतरिक मल को धोकर शिष्य के हृदय को चैतन्यप्रभा से भर देते हैं। शिष्य का हृदय जितनी मात्रा में गुरुभक्ति से भरता जाता है, वह उतनी मात्रा में सद्‌गुरु महाराज के साथ तन्मय होता जाता है। शिष्य का अपने सद्‌गुरुदेव के साथ आत्मीय जुड़ाव श्रेष्ठ सद्‌गुणों, उज्जवल प्रेरणाओं, उत्कृष्ठ भावनाओं एवं निर्विकारी जीवन का स्रोत है। शिष्य को अपने जीवन में केवल एक लक्ष्य ही साधना चाहिये और वह लक्ष्य है- सद्‌गुरुदेव की कृपा प्राप्त करना। शिष्य यदि सद्‌गुरु महाराज की कृपा को ग्रहण करने में सफल हो गया तो सभी साधनायें अप्रयास ही फल देने लगेंगी। श्रद्धा, प्रेम, सेवा, आज्ञाकारिता आदि मिलकर उस तुणीर का निर्माण करती हैं जिसमें सदगुरु महाराज की कृपाशक्ति वास करती है। सद्‌गुरुदेव की कृपा कभी व्यर्थ नहीं जाती। चाहे सूर्य तपना छोड़ दे अथवा चंद्रमा शीतलतारहित हो जाये, चाहे पूरी प्रकृति ही बदल जाये किंतु हर हाल में सदगुरु की कृपा फलित होती ही है। यदि किन्हीं  कारणों से गुरुकृपा को प्राप्त शिष्य की साधना अधूरी भी रह जाये तो भी जन्म-जन्मांतरों में  गुरुकृपा शिष्य के साथ ही रहती है। फिर चाहे शिष्य का जन्म किसी भी देश या किसी भी लोक में हो, गुरु की कृपा सदा शिष्य के साथ ही रहती है और शिष्य को सद्‌गुरुधाम पहुँचाने के अवसर का निर्माण कर मुक्त कर ही देती है।

१५-१२-२०१७

सद्‌गुरु से प्राप्त होने वाले नाममंत्र को संतजन नामडोर भी कहते हैं। नामडोर अर्थात्‌ एक रस्सी जिसका एक सिरा श्रीसद्‌गुरुदेव महाराज से जुड़ा रहता है और दूसरा सिरा साधक से जुड़ा होता है।  जप-साधना के माध्यम से साधक एक ओर शनैः-शनैः इस नाममंत्र की डोर को पकड़कर मुक्तिपद की ओर चढ़ने का प्रयास करता है तो दूसरी ओर श्रीसद्‌गुरु महाराज की कृपाशक्ति निरंतर साधक को अपनी ओर खींचती रहती है। सद्‌गुरु से प्राप्त यह नाममंत्र रूपी डोर मुक्तिपद तक पहुँचने की सीढ़ी है। साधक इस नामडोर से मन को बाँधकर सद्‌गुरु के चरणों का सहारा लेते हुए मुक्त आकाश की ओर अपनी आध्यात्मिक यात्रा तय करता है। सच्चे नामधन को पाकर साधक की सुरत नामडोर पकड़कर परमपद तक पहुँच जाती है। 

१४-१२-२०१७

सद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों के दर्शन के लिये भक्तगण चातक पक्षी की तरह प्रतीक्षा करते हैं। श्रीसद्‌गुरुदेव के चरण-कमलों के दर्शन पाकर सभी की आँखें तृप्त होती हैं और उनकी पूजा व वंदना करके सभी का हृदय अभिभूत हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरण नित्य नवीन ऊर्जा के स्रोत हैं। जो शिष्य सद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों की आध्यात्मिक ऊर्जा से स्वयं को जोड़ लेता है, वह सदा भक्तिसिंधु के अमृतरस से तृप्त रहता है। सद्‌गुरु महाराज की चरण-पादुकाओं से निःसृत आध्यात्मिक अग्नि से सभी पापों एवं दोषों का दहन होता है। वासना के धुएं को हटाकर चेतना की निर्धूम ज्योति प्रकाशित करने वाले गुरुदेव के चरण-पद्म सभी लोकों में वंदनीय हैं।

१३-१२-२०१७

संतजन कहते हैं कि, मानवरूप में सद्गुरु स्वयं ईश्वर ही हैं और, वे ही सभी भक्तों के हृदय में विराजमान आत्मा भी हैं। चूँकि सद्गुरु अंदर व बाहर समान रूप से विद्यमान हैं, अतः उनकी शक्तियाँ भी दोनों (भक्त के अंदर व बाहर) ओर से क्रियाशील रहती हैं। बाह्य गुरु (भौतिक रूप में) शिष्य को उपदेश देते हैं और, उनकी शक्ति शिष्य के ध्यान को आत्म-केन्द्रित करती है। आंतरिक गुरु, शिष्य के मन को पुनः उसके स्रोत की ओर आकर्षित कर, अंततः आत्मा में ही लीन कर देते हैं। सद्गुरु के सत्संग में इच्छाओं को जन्म देने वाली स्वभाव की गुप्त प्रवृत्तियों का शमन होता है, मन स्थिर होता और, समत्व-बुद्धि वाली शांति प्राप्ति होती है। इस तरह शिष्य अपने सद्गुरुदेव की उपस्थिति में ही सत्य-ज्ञान का अनुभव प्राप्त करता है।

०९-१२-२०१७

कोई भी श्रेष्ठ कर्म अथवा उपलब्धि, नाम-साधना के बिना संभव नहीं है। यह शाश्वत् ‘नाम-तत्त्व’, सद्गुरुदेव की कृपा के बिना प्रकट नहीं होता है। हर काल में संत-महापुरुष सदा ही इसी बात पर जोर देते आये हैं कि, चाहे लाखों विधियों को अपनाया जाये और, चाहे लाखों-लाख कर्म किये जायें, लेकिन श्रीसद्गुरु महाराज से गुरुदीक्षा में प्राप्त होने वाले ‘नाम’ के बिना जीवन में परम-लक्ष्य की उपलब्धि संभव ही नहीं है।

०७-१२-२०१७

सत्य के जिज्ञासु को श्रीसद्गुरुदेव की शरण में जाना चाहिये और पूरे जी-जान से उनके उपदेशों का अनुसरण करना चाहिये। श्रीसद्गुरु महाराज में स्वयं को लीन करके और, उनसे एकाकार होकर ही उनसे झरित परमानंद की धारा को अपनी ओर खींचा जा सकता है। श्रीसद्गुरु महाराज से ऐसी ही एकाकारिता, शिष्य के अंदर उस असीम शक्ति, अर्थात् पारब्रह्म के संचरित होने का रहस्य है। गुरु-शिष्य के बीच परस्पर प्रगाढ़ संबंध होने पर ही, गुरु से शिष्य में मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों का संचरण हो सकता है। अदम्य श्रद्धा, संपूर्ण समर्पण, सहृदय गुरुसेवा, सद्गुरु से एकाकार होने का दृढ़-संकल्प, सत्संग और सद्गुरु-साधना का सतत-अभ्यास; ये सभी उस पारब्रह्म परमेश्वर को पाने हेतु उपकरण हैं।

०६-१२-२०१७

सद्‌गुरु महाराज ही निरंतर उपदेश देकर और आध्यात्मिक-साधनाओं में प्रवृत्त रखकर हमें इस योग्य बनाते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी शक्तिशाली पाँच अश्वों को नियंत्रण में रखकर अपने जीवन-रथ को आंतरिक-शांति की ओर बढ़ा सकें। वे सद्‌गुरु महाराज ही हैं जो जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से छुड़ाकर मुक्ति प्रदान करते हैं। हमें सद्‌गुरुदेव को कोटि-कोटि दंडवत करना चाहिये, वे करुणागार हैं।

०५-१२-२०१७

जिस तरह एक चिंगारी सूखी घास के ढेर को जलाकर राख बना देती है, वैसे ही नाममंत्र की पवित्र किरणें, पूर्वजन्मों के सभी पापों को भस्म कर देती हैं। ‘नाम’ अथवा ‘शब्द’ तो अनहद है, अर्थात् असीम है, अनंत है, और सभी उपासनाओं का साररूप है। सभी युगों के संत-महापुरुषों एवं ऋषियों ने इस ‘नाम’ की महिमा का गान किया है और, इस ‘नाम’ की मधुर ध्वनि के साथ योग स्थापित कर, इसमें ही स्वयं को विलीन कर देने में मानव-जीवन की सार्थकता बताई है।

२७-११-२०१७

श्रीसद्गुरु महाराज के चरण-कमलों में शरण पाने के लिये, शिष्य को विनीत भाव से सतत-प्रार्थना करते हुए, उनके प्रति सर्वतोभावेन समर्पित रहना चाहिये। श्रीसद्गुरु के प्रति समर्पण, वास्तव में, ईश्वर के प्रति समर्पण ही है। चूँकि, श्रीसद्गुरु स्वामी ही, शिष्य को उसके निजरूप में ढालने का दायित्व लेते हैं, अतः इस मार्ग में श्रीसद्गुरु के प्रति शिष्य का अटल विश्वास एवं पूर्ण आदरभाव नितान्त रूप से वांछनीय है। जो शिष्य अपने सद्गुरुदेव के वचनों का पालन पूर्ण श्रद्धाभाव से करते हैं, उन्हें लक्ष्य की प्राप्ति निश्चित ही होती है।

०२-११-२०१७

कोई भी श्रेष्ठ कर्म अथवा उपलब्धि, नाम-साधना के बिना संभव नहीं है। यह शाश्वत् ‘नाम-तत्त्व’, सद्गुरुदेव की कृपा के बिना प्रकट नहीं होता है। हर काल में संत-महापुरुष सदा ही इसी बात पर जोर देते आये हैं कि चाहे लाखों विधियों को अपनाया जाये और चाहे लाखों-लाख कर्म किये जायें, लेकिन श्रीसद्गुरु महाराज से गुरुदीक्षा में प्राप्त होने वाले ‘नाम’ के बिना जीवन में परम-लक्ष्य की उपलब्धि संभव ही नहीं है।

३१-१०-२०१७
श्रीसद्गुरुदेव मानव-देह में घनीभूत हुई, सर्वव्यापी, परम सत्य-शक्ति ही हैं। परमज्ञान के पथ को प्रकाशित करने के लिये, और जिज्ञासुओं को ज्ञान की चरम अवस्था (जिसे ’ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’ कहा गया है) तक पहुँचाने के लिये ही सद्‌गुरु-शक्ति ने मानव-देह धारण की है। इसीलिये सभी महान संतों ने एकमात्र श्रीसद्गुरु महाराज की शरण ग्रहण करने की ही सलाह दी है। सर्वश्रेष्ठ ज्ञान, अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या अथवा पराविद्या की प्राप्ति हेतु, परम-सत्य में प्रतिष्ठित श्रीसद्गुरु महाराज की शरण में जाकर, पूर्ण श्रद्धापूर्वक उनका मार्गदर्शन ग्रहण करना चाहिये। इस ज्ञान के प्रगट होते ही, इसका जानकार अज्ञानता के अंधकार से सदा के लिये मुक्त हो जाता है।

२९-१०-२०१७
माया से जनित अज्ञानता के कारण मनुष्य स्वयं को रक्त व हाँड़-माँस से बना एक स्थूल पिण्ड के रूप में ही मानता है, और माया के इस बन्धन में जकड़ी हुई उसकी आत्मा, सभी दुर्गतियों के कारण, जीवन-मृत्यु के चक्र में सदा फँसी रहती है। जीव की चेतना को देह स्तर से उठाकर आत्मा में प्रतिष्ठित करने का सामर्थ्य एकमात्र सद्गुरु महाराजमें ही होता है। देहधारी सर्वसमर्थ वर्तमान सद्गुरुदेव (जीवित सद्‌गुरु) के प्रति पूर्ण समर्पण ही, माया व जीवन-मृत्यु के चक्र से पूर्ण मुक्ति का एकमात्र उपाय है। सद्गुरु-कृपा के अतिरिक्त किसी अन्य युक्ति से जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होना संभव ही नहीं है।

०४-०९-२०१७

जब श्रीसद्‌गुरुदेव अपने प्रिय शिष्य की सेवा-भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं तब उस पर अपनी कृपा की शीतल वृष्टि कर परमात्मा के सत्यज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं। परम आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न पूर्ण समर्थ सद्‌गुरुदेव के स्मरण मात्र से ज्ञान स्वतः उत्पन्न हो जाता है अतः उन परमात्मा सद्‌गुरुदेव की पूजा, उपासना तथा सच्ची सेवा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है।

०३-०९-२०१७

आध्यात्मिक दृष्टि से सद्‌गुरु का दर्शन तो भीतर ही होता है, उस समय इन चर्मचक्षुओं को मूँदना पड़ता है। तत्त्वदर्शी सन्त सद्‌गुरु की कृपा से गुरुभक्त को जब अन्तर दर्शन प्राप्त होता है तभी ज्ञान की ज्योति प्रकाशित होती है। गुरुदेव का बाहरी दर्शन तो अनेक लोगों के साथ प्राप्त होता है, वह तो भीतरी दर्शन के प्रेरक की भूमिका अदा करता है। असली दर्शन तो भीतर होता है, जहाँ दर्शनार्थी और इष्ट सद्‌गुरु के सिवाय अन्य कोई नहीं होता है, कुछ भी नहीं होता है। यह एकान्तिक साधना है। इसीलिये सन्तों की साधना को गुह्य साधना कहा गया है।

०२-०९-२०१७
शिष्य के लिये करने योग्य कर्म केवल एक है- सद्‌गुरु की ज्ञान रूपी बेदी में अपने अहंकार का हवन करना।

०१-०९-२०१७

मनुष्य जिस प्रकार के कर्म करता है उन सबका प्रतिबिंब उसके मन पर बन जाता है। अतः जब हमारा तन, मन सब कुछ सगुण परमात्मा सद्‌गुरुदेव की बाहरी और आन्तरिक सेवा में लग जायेगा तो मन पर उसी का प्रतिबिंब पड़ता जायेगा, मन स्वतः अन्तर्मुखी होता जायेगा। तब यही मन जो सांसारिक वासनाओं का बोझ ढोता था, अपनी जड़ता त्यागकर तत्त्वमन बन जाता है, उसमें सद्‌गुरु का निवास हो जाता है। वह सांसारिक क्लेशों और चिन्ताओं से पूर्ण रूप से उबर जाता है, अलौकिक उमंग से भर जाता है अथा अनिर्वचनीय परम आनंद में मग्न रहता है। यही भक्ति है, यही मुक्ति है।

३१-०८-२०१७

किसी शिष्य को सद्‌गुरु महाराज से सेवाकार्य प्राप्त होना उसके सौभाग्य का सूचक है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की सभी योजनायें तो उनके सोचने मात्र से ही पूर्ण हो जाती हैं। ऐसे में शिष्य के अन्दर सेवाभक्ति की वृद्धि हेतु सद्‌गुरु उसे जिस सेवाकर्म में प्रवृत्त करते हैं उसे करते हुए शिष्य भूल से भी अपने अंदर कर्त्तापन के भाव को न आने दे। उस कर्म को करने का सामर्थ्य सद्‌गुरु ही देते हैं और उसके परिणाम का निर्धारण भी स्वयं सद्‌गुरु ही करते हैं। अतः शिष्य को अपने सभी कर्म व कर्मफल श्रीसद्‌गुरु के चरणों में सौंपकर पूरी तन्मयता से सेवाकर्म में जुटे रहना चाहिये। यही निष्काम कर्मयोग है और यही है जीवन्मुक्ति का उपाय।

३०-०८-२०१७

शिष्य के भीतर आध्यात्मिक प्रकाश प्रकट होने के लिये एक भावपूर्ण धरातल का होना आवश्यक है। भावना से भरे हृदय में ही भक्तिलता पल्लवित होती है।

२९-०८-२०१७

श्रीसद्‌गुरु से आंतरिक स्तर पर जुड़ाव न होने पर अंतस्‌ में उनका दर्शन असंभव है और जब तक मन की निर्मलता एवं चित्त की एकाग्रता सिद्ध नहीं होगी तब तक अनेकनिष्ठ अवस्था में श्रीसद्‌गुरु से आंतरिक जु़ड़ाव नहीं हो सकता है। यदि हम अपनी पूरी दिनचर्या में केवल ध्यान करते वक्त उनसे जुड़ना चाहेंगे तो उनसे योग करना कठिन होगा, सद्‌गुरु के स्वरूप को ध्यान में स्थिर करने के लिये उनका अनन्य चिन्तन आवश्यक है। सोत-जागते, उठते-बैठते अथवा अन्य दैनिक कार्य की पृष्ठभूमि में निरंतर रूप से सद्‌गुरु अविच्छिन्न चिन्तन चलते रहना चाहिये। यह तभी संभव है जब हमारे सभी कार्य सद्‌गुरु के निमित्त ही हों अर्थात्‌ हम अपने सभी कर्मों और कर्मफलों को सद्‌गुरु को ही समार्पित कर दें। जैसे गाय घास खाने चाहे जितनी भी दूर निकल जाये लेकिन उसका ध्यान निरंतर अपने छोटे बछड़े पर ही होता है व हर वक्त वह मानसिक रूप से अपने बछड़े से ही जुड़ी रहती है और जैसे कि एक माँ का ध्यान घर के सभी कार्यों को करते हुए भी अपने नन्हे शिशु पर ही होता है, ठीक ऐसा ही मानसिक जुड़ाव साधक अथवा शिष्य को सद्‌गुरु के साथ रखना चाहिये। ध्यान अन्य किसी दैनिक कार्यों की भाँति किसी समय विशेष में किये जाने वाला कार्य नहीं है अपितु यह तो सद्‌गुरु से अहर्निश जुड़ने की कला है।

२८-०८-२०१७

शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति के लिये विश्व में मानव देह में अवतरित परात्पर सत्ता सदगुरु स्वामी ही हैं। शिष्य के लिये सदगुरु से प्राप्त नाममंत्र का जप का भजन, पूजा, सेवा, सुमिरन तथा ध्यान में सदगुरु स्स्वरूप का दर्शन पाना ही वास्तविक आध्यात्मिक पूँजी है। नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान से ही चित्त शुद्ध, पवित्र तथा निर्मल होता है। चित्त के शुद्ध व पवित्र हो जाने पर श्रीसदगुरु महाराजजी की कृपा व दया से सहज ही मन में श्रीसदगुरु का दर्शन टिकने लगता है। जिस अनुपात में सद्‌गुरु से जुड़ाव होता जाता है उसी अनुपात में कर्म के बन्धन शिथिल होते जाते हैं और जीवन मुक्तता की ओर बढ़ने लगता है। यह सब गुरुकृपा से ही सम्भव हो पाता है इसलिये सभी साधु-सन्त आन्तरिक दर्शन के लिये सद्‌गुरु की शरण लेने की अनिवार्यता पर जोर देते हैं।

२३-०८-२०१७

संसार का ज्ञान बतलाने वाले तो बहुत मिलते हैं लेकिन आत्मा व परमात्मा का ज्ञान बोध करवाने वाली नित्य एवं अनादि सत्ता केवल सद्‌गुरु ही हैं। अलौकिक ज्ञान की प्राप्ति एवं अनुभूति सद्‌गुरु की कृपा से ही होता है। मानव जीवन की संपूर्णता वस्तुतः मनुष्य मात्र के आत्मज्ञान में ही निहित है। सद्‌गुरु के सहारे से ही जीवन आध्यात्मिक बनता है और मनुष्य का आचरण और चिन्तन पूर्ण शुद्ध होता है। सद्‌गुरु की कृपा से ही जीवन सत्य की राह में चलने को प्रेरित होता है। सद्‌गुरु के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा उपाय नहीं है जो मानव मात्र को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रवृत्त कर सके। स्वरूपसिद्ध सद्‌गुरु की प्रसन्नता ही आध्यात्मिक जीवन की प्रगति का रहस्य है।

२२-०८-२०१७

किसी ग्रंथ आदि से सीखा गया मंत्र का प्रभाव हाथ से फेकी गई कारतूस की तरह होती है जबकि श्रीसद्‌गुरु के मुख से ग्रहण किये गये गया मंत्र का प्रभाव बंदूक से निकले कारतूस की तरह होता है। गुरु के मुख से लिया गया मंत्र चेतना में पड़े सभी मलीन आवरणों को विदीर्ण कर देता है और आत्मचेतना को प्रकाशित करता है।

२१-०८-२०१७

सद्‌गुरु की भूमिका एक कुशल किसान की होती है जो शिष्य रूपी खेत में अति उन्नत चेतना के बीजमंत्र की बुवाई करते हैं। श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्य से काम, क्रोध, मद, लोभ एवं अहंकार रूपी खरपतवार को हटाकर भजन, सुमिरन, दर्शन व ध्यान द्वारा उसे उपजाऊ बनाते हैं और गुरुभक्ति के जल से सिंचित कर उसके जीवन चेतना के वृक्ष को विशाल बनाते हैं। शिष्य के अहंकार के गलने पर ही यह पूर्णता संभव हो पाती है।

२०-०८-२०१७

श्रीसद्‌गुरु की शरण ही गुरुभक्ति की गंगोत्री है। परम पावनकारी गुरुभक्ति की गंगा श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरण-कमलों से निकलकर जब शिष्यों के अन्तःकरण में प्रवेश करती है तो उनके कई जन्मों के संचित पापों को मिटाती हुई इस जन्म के सभी संतापों को शांत करती है। जिस प्रकार गंगा के पावनकारी प्रभाव से साठ हजार सगर पुत्र मुक्त हुए थे वैसे ही परमपावनी गुरुभक्ति के अंतःप्रवाह से कई जन्मों के संचित कर्म एवं मन की कलुषता सदा-सदा के लिये धुल जाती है। शिष्यों का मन गुरुभक्ति के अमृतरस में धुलकर धवल होता है। जीवन में इस निर्मलता का अनुभव बहुत ही दुर्लभ है और वे ही इसका अनुभव कर पाते हैं जिन्होंने अपना सर्वस्व श्रीगुरुदेव की भक्ति में समाहित कर दिया है। जिनके हृदय में सदा गुरुभक्ति छलकती है उनके जीवन में ही विमल ज्ञान प्रगट होता है। शिष्य की हर साँस में गुरुभक्ति का ही प्रवाह होता है, उसकी हर साँस सद्‌गुरु के नामरस से भीगी रहती है। शिष्य के कान केवल गुरुमहिमा के श्रवण से भरे होते हैं और नेत्र गुरुदर्शन के आनंद में निमग्न रहते हैं। उसकी वाणी में केवल गुरु का नाम होता है। इस तरह शिष्य चारों ओर से सद्‌गुरु की ब्राह्मी चेतना से घिरा रहता है।

१९-०८-२०१७

श्रीसद्‌गुरु देहधारी होते हुए भी देहातीत होते हैं। अपनी देह में निराकार ब्रह्म को समाये हुए श्रीसद्‌गुरु इस जगत्‌ के पालनहार हैं। श्रीसद्‌गुरु के नाम का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान में सभी लौकिक एवं अलौकिक शक्तियाँ समाहित हैं। श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्य को हर विषम परिस्थिति से उबारते हैं। जो आध्यात्मिक मंजिल अथक तपस्या एवं दीर्घकालीन साधनाओं से भी हासिल नहीं होती है, सद्‌गुरु-कृपा की एक दृष्टि ही साधक को वहाँ तक पहुँचा देती है। सद्‌गुरु सदा ही अपने शिष्यों की झोली खुशियों से भरी रखना चाहते हैं इसलिये ही वे शिष्यों को सदा जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान में लीन रहने की सीख देते हैं क्योंकि ये ही वास्तविक खुशियों तक पहुँचाने वाली सीढ़ी के पायदान हैं।

१८-०८-२०१७

सद्‌गुरु के प्रति निरंतर अहैतुक प्रेम ही भक्ति है। सभी सन्त-महापुरुषों ने गुरुभक्ति को ही मुक्ति के साक्षात्‌ साधन के रूप में स्वीकार किया है। श्रीसद्‌गुरु के नाम का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान से ज्ञान व वैराग्य आदि सभी साधन स्वयं ही मुक्ति के रूप में फलित होते हैं। मुक्ति का एक ही निश्चित मार्ग है- गुरुभक्ति।

१७-०८-२०१७

जन्म-जरा-मृत्यु से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, संसार में रहते हुए, संसार से सब प्रकार की आशा त्यागकर सर्वभावेन सद्‌गुरु को समर्पित हो जाना। उनके भजन, सुमिरन, सेवा के माध्यम से उनकी कृपा प्राप्त करना, जीते-जी उनमें लय हो जाना ही जीवन्मुक्ति है।

१६-०८-२०१७

जिन्होंने अपने गुरु के उपदेश के अर्थ को निश्चयपूर्वक जान लिया है तथा संन्यासयोग अर्थात्‌ कर्मफल और आसक्ति के त्याग से जिनका अन्तःकरण पूरी तरह शुद्ध हो गया है, वे प्रयत्न करने वाले सभी साधक परमात्मा के धाम में निवास करने के अधिकारी हो जाते हैं और अमृतस्वरूप होकर संसार के बंधन से सदा के लिये पूरी तरह से मुक्त हो जाते हैं।

१५-०८-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेव के श्रीचरणों के प्रति साधक के अन्तःकरण में जो प्रेम होता है वह विषयानंद से अनंतगुना आनन्ददायी होता है किन्तु उस कोटि का प्रेम सद्‌गुरुदेव की कृपा के बिना प्राप्त नहीं होता है।

१४-०८-२०१७

सद्‌गुरु का संग हर प्रकार से जीव का भला करता है। श्रीसद्‌गुरुदेव ज्ञान देते हैं, कर्म की रीति-नीति देते हैं, सुन्दर चरित्र देते हैं, यश-कीर्ति देते हैं और इस सबसे बढ़कर ’नाम’ भक्ति देते हैं जो सभी सुखों का मूल है।

१३-०८-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेव के वचनों को अपने हृदय में धारण करके उन पर अमल करो, आचरण में प्रयोग करो। साधक को दिन-रात सद्‌गुरु महाराज की सेवा करते हुए नाम, भजन की कमाई कर अन्दर में गुरु को प्रत्यक्ष करना है। गुरुभक्ति सबसे उत्तम अभ्यास है। मान, बड़ाई छोड़कर गुरु की आज्ञा को हृदय में धारण करो और उनके स्वरूप को अन्दर बैठा लो तो फिर सारा काम बना समझो।

१२-०८-२०१७

सद्‌गुरुदेव की भौतिक देह का ध्यान करते-करते उस देह के भीतर विराजमान उनकी परमज्ञानमय आत्मा यानी प्रकाशमय तात्त्विक स्वरूप का दर्शन अपने मस्तक के भीतर दिव्य दृष्टि द्वारा इस प्रकार होने लगता है जैसे दर्पण में अपना स्वरूप दिखाई पड़ता है। इस स्वरूप का दर्शन कर गुरुभक्त कृतकृत्य हो जाता है, तदुपरांत उसके लिये कुछ और करना शेष नहीं रह जाता है।

११-०८-२०१७

गुरुभक्ति उपासना का प्राण है और धर्म योग उपासना का शरीर है। चित्त में श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ के प्रति जिस अनुराग के उदय होने से भक्त श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ का सान्निध्य लाभ कर सकता है उसे भक्ति कहते हैं और जिन सब शारीरिक और मानसिक क्रियाओं के अनुष्ठान से चित्त शांत होकर आत्मा के स्वरूप को दिखा सकता है अर्थात्‌ श्रीसद्‌गुरु के स्वरूप का अन्दर में दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है उसे धर्मयोग कहते हैं।

१०-०८-२०१७

इस शरीर के अन्दर गुरुनाम की ज्योति जल रही है तथा अन्दर मनोहर अनहद नामधुन गूँज रही है। उस आवाज को सुनकर एवं प्रकाश को देखकर हमारा मन बिंध जाता है, वश में आ जाता है और अपने ठिकाने में पहुँच जाता है, आत्मा और मन की गाँठ खुल जाती है। जब हम सद्‌गुरु के ज्ञान और अनुभव के अनुसार नेत्रों में सद्‌गुरु के नाम और शब्द का सुरमा लगा लेते हैं तो अज्ञान का अन्धकार हमारे सामने से दूर हो जाता है, सद्‌गुरु का स्वरूप और प्रकाश नजर आने लगता है।

०५-०८-२०१७

जब तक विरहाग्नि हृदय में न जगे और प्रियतम के दर्शन की उत्कट लालसा न हो, तब तक साध्य की सिद्धि नहीं होगी। यदि शिष्य भक्ति व प्रेमपूर्वक श्रीगुरु के चरणकमलों को पकड़ लेता है तो वह कितना ही पंगु क्यों न हो, परमपद के दुर्गम पथ पर सुगमता के साथ चलकर दर्शन पा ही लेता है।

०४-०८-२०१
सद्‌गुरु का नाम ही कलुष-विभंजन और जीव का परमकल्याण करने वाला है। इसी से सारी कठिनाइयाँ दूर होती हैं, जन्म-मरण का बन्धन छूटता है तथा लोक-परलोक में जीव सुर्खरू या प्रकाशमान होता है। अतः हर समय सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते, सभी आवश्यक कामों करते हुए भी ’नाम’ का सुमिरन करते रहना चाहिये। हमारी लोक-परलोक की सारी अभिलाषाओं को पूरा करने की शक्ति ’नाम’ में ही है। इसके अतिरिक्त तीर्थ, व्रत तथा अन्य जितने भी कर्मकांड हैं वे कौड़ी काम के भी नहीं हैं। सद्‌गुरु के ’नाम’ का सुमिरन-भजन ही जीव को सद्‌गुरुधाम अर्थात्‌ मोक्षधाम पहुँचाता है।

०३-०८-२०१७

भक्ति सबसे अमूल्य निधि है जो गुरु के नाम का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा करने से तथा उनकी कृपादृष्टि से प्राप्त होती है। सन्त-महापुरुषों, सद्‌गुरुओं, अवतारों, सभी ने एक ही बात बताई है कि मालिक के चरणों में अपना अहंभाव पूर्णरूप से समर्पित कर उनमें अनन्य प्रेम हो जाना ही भक्ति है। इसीलिये गुरुभक्त यही प्रार्थना करता है कि हे प्रभो! जिस प्रकार मछली का जल के साथ प्रेम है, लोभी का धन के साथ प्रेम है, माता का अपने पुत्र के साथ प्रेम है, वैसे ही आप मुझे प्रिय लगें। यह प्रेमभक्ति कभी भी कम न हो, मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण आपकी पवित्र स्मृति में ही व्यतीत हो।

०२-०८-२०१७

श्रीगुरु द्वारा शिष्य की चेतना रूपी धरा में बोए गये परानामरूपी भक्तिबीज को अंकुरित होने के लिये गर्मी और नमी, दोनों की आवश्यकता होती है। श्रीगुरु के विज्ञानमय स्वरूप का अपने अन्दर माथे में दर्शन प्राप्त करने की उत्कट लालसा, दर्शन न होने पर उनके विरह की अनुभूति- यही विरह का ताप भक्तिबीज के अंकुरित होने के लिये गर्मी का काम करता है। श्रीगुरु के साथ आत्मिक संबंध, उनकी और उनके आश्रम की सेवा, उनको प्रणाम करना, उनका चरणामृत पान करना, उनकी महिमा का अनुभव करके उसको कहना और सुनना, उनके प्रसाद का भाव सहित सेवन, उचित-अनुचित का विचार किये बिना उनकी आज्ञा के पालन में तत्पर रहना, प्रतिदिन नियमानुसार सुमिरन-ध्यान का अभ्यास करना आदि सद्‌गुरु से संबंधित सभी आचार-व्यवहार भक्तिबीज के अंकुरित होने के लिये नमी का कार्य करते हैं। शिष्य की चेतना में पड़ा भक्तिबीज इष्ट के विरह की गर्मी और विभिन्न प्रकार की शारीरिक और भावनात्मक भक्ति-भाव की नमी पाकर समय आने पर श्रीगुरु की कृपा से अंकुरित होने लगता है। शिष्य अपनी गुरुभक्ति को जितना आगे बढ़ाता है, श्रीगुरु के भक्तिबीज का जितना अधिक सुमिरन करके उनको अपनी सुरत की गहराइयों में उतारता है, गुरुवाक्य और गुरुमूर्ति के ख्याल में जितना तन्मय होकर डूबता है, श्रीगुरु उतना ही नहीं, बल्कि उससे कई गुना अधिक ही उसकी चेतना में अपना स्वरूप स्पष्ट करते जाते हैं।

०१-०८-२०१७

श्रीसद्‌गुरु के प्रति सदा किंकर का भाव रखना सेवा का बुनियादी सिद्धांत है। किंकर अर्थात्‌ वह व्यक्ति जो अपने मालिक के प्रति यह भाव रखे, उनकी ओर इस भाव से देखता रहे कि आपकी क्या इच्छा है, आपकी प्रसन्नता के लिये मैं और क्या-क्या करूँ। गुरु की प्रसन्नता ही गुरुसेवक के कर्मों की दिशा होनी चाहिये।

३१-०७-२०१७

सत्संग का अर्थ है सद्‌गुरु का संग और सेवा करना, सद्‌गुरु के वचनों को पूरे चित्त व मन से सुनना, उनकी वाणी को हृदयंगम करना, उनके चरणों में प्रेम एवं वास पाने की चाह से प्रेरित होकर श्रद्धा व सद्‌भाव से काम करना। यह सब बाहरी सत्संग हैं और उनके उपदेशों के अनुसार एकाग्र मन व चित्त से सुरत को ऊँचे मुकामों पर चढ़ाने का अभ्यास आंतरिक सत्संग है।

३०-०७-२०१७

परम आराध्य सद्‌गुरु में अबाध भक्ति ही सुख, शांति और दिव्यता का प्रकाश देती है। इस विषय में सहज निर्मल बुद्धि जितनी आवश्यक है, उतनी अन्य कोई योग्यता नहीं। सद्‌गुरु परम दयालु होते हैं वे अपने सेवक को सब कुछ देने के लिये सदा तत्पर रहते हैं। वे उस पर दयालु होकर अपनी सारी आध्यात्मिक शक्ति उसमें प्रवाहित करते रहते हैं। सद्‌गुरु की वाणी अमर होती है। वे शिष्य को जो भी कहते हैं उससे भी अधिक उसे देते हैं। उनकी वाणी कभी भी खाली नहीं जाती।

२९-०७-२०१७

संसार में जितने भी मन्त्रों का जप किया जाता है वे यदि गुरु से दीक्षा द्वारा प्राप्त किये गये हों तो ही वे फलदायी होते हैं। गुरु से दीक्षित हुए बिना कोई भी तपस्या सफल नहीं होती है। सद्‌गुरुदेव के द्वारा सिष्य के अन्तःकरण में बैठाई गयी दीक्षा शिष्य के भौतिक, आध्यात्मिक सभी कार्यों को सफल कर देती है।

२८-०७-२०१७

सन्त-साधना का केन्द्रीय बिन्दु गुरुतत्त्व ही है। सद्‌गुरु मात्र ज्ञानदाता ही नहीं, मुक्तिदाता भी होते हैं। वे साधना के शिक्षक नहीं अपितु साध्य हैं, वे ही इष्ट हैं। श्रीगुरुदेव ही सगुण परमात्मा हैं। साधक के हृदय में निरन्तर सद्‌गुरु में परमात्मभाव बना रहना आवश्यक है। यही साधना का मूल है।

२७-०७-२०१७

सद्‌गुरु का चरणामृत ही वह निर्मल सरोवर है जिसमें मुक्ति रूपी कमल खिलता है। सद्‌गुरु के श्रीचरणों में जिसके नेत्र गड़े रहते हैं उसका हृदय निर्मल हो जाता है। यही मुक्ति का मूल है। मनुष्य को भवसागर से पार उतारने में एकमात्र सद्‌गुरु ही समर्थ हैं। जीव का उद्धार ही उनका विरद है, सद्‌गुरु इसके लिये ही नरदेह धारण करते हैं।

२४-०७-२०१७

तत्त्वदर्शी सदेह सद्‌गुरु ही दीक्षागुरु होते हैं क्योंकि वे ही जीव की व्याकुलता देखकर उस पर कृपा करते हैं और उसे आत्मोन्नति का पथ दिखलाते हैं।

१८-०७-२०१७

किसी भी आध्यात्मिक साधना में मन की शुद्धता अनिवार्य अंग है। अन्य योग ही साधनाओं की अपेक्षा गुरुभक्ति या नाम-साधना में मन की सफाई सरल ढंग से हो जाती है। जब तन-मन सब कुछ सद्‌गुरु को अर्पण कर दिया जाता है तो मन अपना न होकर गुरु का हो जाता है। अब मन का हुक्म नही चलता, गुरु का हुक्म ही चलता है। सद्‌गुरु के सतत ध्यान के अभ्यास से गुरु जब सदा सामने विद्यमान रहते हैं तो मन की दौड़-धूप समाप्त हो जाती है, गुरुमुखता के सामने मनमुखता समाप्त हो जाती है। एक बार मन शुद्ध हो जाने पर भजन-सुमिरन के निरंतर अभ्यास से आत्मा निर्मल हो जाती है और धीरे-धीरे अपने सहज-स्वरूप को प्राप्त कर लेती है। शुद्ध मन ही इष्ट का मन्दिर होता है। भक्तिमार्ग में सद्‌गुरु की कृपा ही सबसे बड़ा सम्बल है।

१७-०७-२०१७

श्रीसद्‌गुरु की विश्वमोहिनी छवि युक्त स्वरूप को जिस प्रेमी ने अपने ह्रुदय में स्थापित कर लिया तथा सदा उस मनोहारी रूप के चिन्तन में मग्न रहने लगा तो गुरु की विशुद्ध मूर्ति के ध्यान से उसका मन पवित्र हो जाता है। यही तेजस या अग्नितत्त्व की शुद्धि है।

१६-०७-२०१७

यदि किसी अवरोधवश श्रीसद्‌गुरुदेव स्वामी के रूप का ध्यान न आये तो भी श्रीसद्‌गुरु महाराज का सुमिरन निरंतर करते रहना चाहिये। गुरु के नाम के सुमिरन से मन और प्राण पवित्र हो जाते हैं। इस प्रकार सतत अभ्यास करने से श्री गुरुमहाराज के परमपावन चरण-कमलों में अनन्य प्रेम उत्पन्न हो जाता है। नामजप या सुमिरन की सहज विधि यही है कि अपने श्वास-प्रश्वास के आने-जाने की ओर ध्यान रखकर श्वास-प्रश्वास के साथ ही साथ अपने आराध्य श्रीसद्‌गुरुदेव के नाम का स्मरण और जप, जैसा बतलाया गया हो, करता रहे। यह साधना उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते सब समय की जा सकती है। अभ्यास दृढ़ हो जाने पर चित्त निरंतर श्री गुरुमहाराज के चिन्तन में अपने-आप ही लग जायेगा। सभी भक्तों, सन्तों और महात्माओं ने इसी विधि को ही अपनाया है। यही सर्वमान्य श्रेष्ठ साधना है।

१५-०७-२०१७

एकमात्र तत्त्वज्ञानी श्रीसद्‌गुरु महाराज ही जीव के मालिक हैं, वे ही जीव का उद्धार करते हैं। ऐसे श्रीसद्‌गुरुदेव के स्वरूप को सहसदल कमल पर देखना ही वास्तविक सत्संग है, यही नाम-साधना है। इस सत्संग व नाम-साधना से ही जीव के संचित पाप नाश होते हैं और जीव निजरूप को पहचान लेता है।

१४-०७-२०१७

वे धन्यभाग हैं जिन्हें सद्‌गुरु के चरण-कमलों में आश्रय मिल गया है क्योंकि उनके इहलोक और परलोक दोनों सँवर जाते हैं। जीवन में सद्‌गुरुदेव का पदार्पण न होने पर मनुष्य की अपरिमेय ऊर्ध्वगामिनी संभावनायें बन्ध्या ही रह जाती है और वह माया की लुभावनी चकाचौंध में फँसकर अपना सर्वनाश कर लेता है। जीवन को दुर्गति से बचाकर सुगति देने वाले श्रीसद्‌गुरु महाराज की भक्ति ही जीव का सबसे बड़ा संबल है।

१३-०७-२०१७

सद्‌गुरुकृपा का दूसरा स्वरूप जो सबसे महत्वपूर्ण है और जो सीधे मनुष्य के परमलक्ष्य स्वरूप आत्मसाक्षात्कार का साधन बनता है, वह गुरु द्वारा नाममंत्र प्राप्त करना है। उनसे भजन, ध्यान, सुमिरन और सेवा का सन्मार्ग प्राप्त करना है। उनकी आज्ञानुसार पारमार्थिक साधना और लौकिक आचार का समुचित पालन करना है। उनके हर वचन को ब्रह्मवाणी समझकर निःसंशय स्वीकार करना और बिना किसी तर्क-वितर्क के उस दिव्य वचन का पालन करना है। जिस जीव पर उनकी परम कृपा होती है उसे ही गुरु का सामीप्य प्राप्त होता है और उसे ही ’नाम’ रूपी अक्षय, अमूल्य निधि प्राप्त होती है।

१२-०७-२०१७

सद्‌गुरुदेव में सुरति के लीन हो जाने पर जिस अनुभव का उदय होता है उससे सभी कर्मों का नाश हो जाता है, सभी संशय और भ्रम दूर हो जाते हैं और सद्‌गुरुदेव की ब्रह्मरूपता प्रकाशित हो जाती है।

११-०२-२०१७

पराविद्या एवं परमात्मा की प्राप्ति पूर्णगुरु द्वारा ही संभव है और पूर्ण गुरु की उपासना, भजन, सुमिरन और सेवा के अतिरिक्त इस लक्ष्य को पाने की दूसरी विधि भी नहीं है। लक्ष्य एक है तो मार्ग भी एक ही है। सद्‌गुरु की परम कृपा से उन्हें खोज पाना, उनसे पराशब्द की दीक्षा लेना, सुरति द्वारा उन्हीं का सुमरन भजन और सेवा करना एवं अंत में उन्हीं का रूप हो जाना यही राजयोग है, आध्यात्मिक गंतव्य तक पहुँचने का यही राजमार्ग है। यही सनातन साधना है, यही सन्तमत है

१०-०७-२०१७

परमतत्त्व यद्यपि सर्वत्र समाया हुआ है परन्तु उसका पता तभी चलता है जब भाग्य से सद्‌गुरुदेव की शरण प्राप्त हो जाती है। जो तत्त्व सबके भीतर गूँज रहा है उसे ही शब्दतत्त्व कहते हैं लेकिन उसकी कुंजी केवल सद्‌गुरु के हाथों में होती है। बिना उनकी कृपा के उसका बोध नहीं हो सकता है।

०९-०७-२०१७

सद्‌गुरु की उपासना से वैसे तो सब कुछ प्राप्त हो जाता है परंतु सद्‌गुरु-भक्ति का मुख्य लक्ष्य परमात्मतत्त्व की प्राप्ति ही है; अतः सद्‌गुरु में परमात्मा की भावना निरंतर बनाये रखना परमावश्यक है। इसी भावना के साथ सद्‌गुरु की उपासना का विधान है।

०७-०७-२०१७

मनुष्य का उद्धार करने के लिये परमपुरुष स्वयं गुरु रूप में अवतीर्ण होते हैं और शिष्य रूप में स्वीकार कर उसे भी अपने स्वरूप बनाते हैं, यही उनकी महान करुणा है। जैसे एक ज्योति से अनेक ज्योतियाँ जलती हैं उसी प्रकार गुरु से शिष्य में होती हुई सन्त-परंपरा जाग्रत रहती है। यह परंपरा शाश्वत है, नित्य है, इसीलिये संतों को नित्यावतार कहा जाता है।

०५-०७-२०१७

परमात्मा के सगुण रूप सद्‌गुरु, शरीरी परमात्मा हैं। वे ज्ञान-स्वरूप हैं। पराविद्या के जिज्ञासु के लिये परमात्मा स्वरूप समय के सद्ड्ड्गुरु की शरण में जाना इसीलिये आवश्यक है कि जन्म-मरण के बन्धन को कारणरूप कर्म-श्रंखला को पूर्ण रूप से समाप्त करने की क्षमता केवल समय के सद्‌गुरु में ही है; किसी कथा, प्रवचन, जप, तप, योग, यज्ञ से कर्म नहीं जलते उन्हें तो ज्ञान स्वरूप सद्‌गुरु ही जलाते हैं।

०४-०७-२०१७

सत्‌-शिष्य के सभी कर्म श्रीगुरु की अर्चना हैं, क्योंकि श्रीगुरु ही आत्मा के रूप में उसके शरीर में विराजमान हैं। अपने सद्‌गुरुदेव में संपूर्ण रूप से स्थित सत्‌-शिष्य के सब कर्म सद्‌गुरुदेवरूपी आत्मा की तृप्ति लिये होते हैं। जब श्रीसद्‌गुरुदेव प्रसन्न होकर स्वप्रकाशरूप से मस्तक में दर्शन देते हैं तब सभी तत्त्व शुद्ध हो जाते हैं अर्थात्‌ सभी तत्त्व पूर्ण चेतन आत्मा की भिन्न-भिन्न भूमिकाओं के रूप में अनुभूत होते हैं। इस अनुभूति के स्वाभाविक फल को परमानंद कहते हैं। यह अवस्था अत्यंत दुर्लभ है।

०३-०७-२०१७

सद्‌गुरु द्वारा दिया गया नाममंत्र ही महामंत्र है। यही तारक मंत्र है जिसके भजन, सुमिरन और गुरु की बाह्याभ्यंतर सेवा से मनुष्य जीवन्मुक्त होता है। सद्‌गुरु के मुख से निःसृत हर वाक्य, हर शब्द और हर वचन अमृतमय होता है, उनकी वाणी में जीवोद्धारक शक्ति भरी होती है, उसे हृदय में धारण करने से ज्ञान-भक्ति का बीज हृदय में अंकुरित हो जाता है, अन्तरात्मा प्रकाशित हो उठती है। भक्तिबीज का एक बार हृदय में आरोपण हो जाने के बाद फिर उसका कभी नाश नहीं होता है।

०२-०७-२०१७

साधना अभ्यास का ही दूसरा नाम है। इसमें निरन्तरता होनी चाहिये, इसे सतत चलना चाहिये। कठिन अवश्य है, परन्तु बार-बार के अभ्यास से यह भजन बाधाहीन हो जाता है और अंत में सहज रूप से अपने-आप चलने लगता है। समय की प्रतिबद्धता अभ्यास का पहला चरण है। सुमिरनविहीन समय का बीतना चिन्ता का विषय होना चाहिये। हर क्षण को इष्ट श्रीसद्‌गुरु महाराज से जिड़ने का प्रयत्न करना चाहिये।

०१-०७-२०१७

श्रीगुरुत्व पद से श्रेष्ठ और कोई परम पद नहीं है, जिसे वेदों ने नेति-नेति कहा है। ऐसे श्रीसद्‌गुरुदेव के गुरुत्व की मन, वाणी और कर्म से नित्य आराधना करनी चाहिये।

३०-०६-२०१७

सद्‌गुरु का वास्तविक स्वरूप ’शब्द’ या ’नाम’ ही है और शिष्य का वास्तविक स्वरूप वह सुरत ही है जो उसके श्वास-प्रश्वास में सहज रूप से निरंतर निनादित होने वाले नाम के अनुसार, या अनुगूँज के साथ समरस होकर यानी उसे पकड़कर, अपनी आध्यात्मिक यात्रा संपन्न करती है।

२९-०६-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेव से जो भक्ति का बीज परानाम प्राप्त हुआ है उसके दोनों अक्षरों को श्रीसद्‌गुरुदेव द्वारा उपदेश की हुई विधि के अनुसार भीतर-बाहर आती-जाती साँस में आरोपित कर मन ही मन में स्मरण य जप करना ही भजन है।

२८-०६-२०१७

सभी संत-सद्‌गुरु की वाणियों में नाम-तत्त्व की ही महिमा गायी गयी है। नाम, सतनाम और सद्‌गुरु एक ही हैं। जो नाम का यशोगान है, वही सद्‌गुरु का यशोगान है।

२७-०६-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज के स्वरूप का ध्यान करने मात्र से वर्तमान एवं पूर्वजन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और शिष्य की आत्मा पूर्णरूप से ब्रह्ममय हो जाती है।

२५-०६-२०१७

जैसे चन्दन के संपर्क में आते ही अन्य सूखी लकड़ी भी सुगंधित हो जाती है, वैसे ही श्रीसद्‌गुरु के सत्संग में जीवन निर्मल चैतन्यता से परिपूर्ण होने लगता है।

२३-०६-२०१७

स्वाँसों में गुरुमंत्र का जप, हृदय में सद्‌गुरु का सुमिरन, मन में श्रीसद्‌गुरु स्वरूप का दर्शन और सहसदल कमल पर सद्‌गुरु का ध्यान यही सच्ची आंतरिक साधना है। श्रीसद्‌गुरु की आज्ञा का पालन और भक्तिभाव से गुरुसेवा, यही प्रमुख बहिर्साधना है। आंतरिक और बहिर्साधनाओं को संपादित करते हुए गुरु के श्रीचरणों में जीवन निर्वाह करना ही शिष्यता है।

२२-०६-२०१७

ब्रह्मवेत्ता श्रीसद्‌गुरु महाराज ही प्रत्यक्ष देवता हैं। श्रीसद्‌गुरु के चरणकमलों का स्पर्श मात्र पावनकारी है। उनके पुण्य प्रभाव से सभी स्थान पवित्र हो जाते हैं। वे जहाँ निवास करते हैं वह संपूर्ण क्षेत्र चेतनायुक्त हो जाता है। अतः शिष्य को प्रयास करके सद्‌गुरु के श्रीचरणों में ही आश्रय लेना चाहिये।

२१-०६-२०१७

साधक का पहला और अन्तिम कर्त्तव्य यही है कि वह वही काम करे जिससे गुरु को संतुष्टि हो। साधक गुरु की इच्छानुसार ही उनकी सेवा करे। शिष्य उसी प्रकार से भजन, सुमिरन, ध्यान करे जिस प्रकार से गुरु द्वारा निर्दिष्ट हो। गुरु की आज्ञानुसार चलने वाला शिष्य समस्त सिद्धियों का स्वामी हो जाता है।

१९-०६-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेव इस संसाररूपी सागर से शिष्य को उतारने में सक्षम होते हैं क्योंकि वे शास्त्रों, युक्तियों और अपनी अनुभूतियों के द्वारा शिष्य के हृदयगत्‌ अज्ञान को नष्ट कर देते हैं।

१८-०६-२०१७

मालिक को दिल देना ही असली प्रेम है, यही भक्ति है। इसी भक्तिरूपी रसामृत में हर प्रकार माधुर्य निहित है। जो भक्त इस रसामृत का सेवन करता है उसी सभी प्रकार से सुख, शान्ति तथा मन की एकाग्रता प्राप्त हो जाती है। भक्ति रस के बिना सभी साधन फीके लगते हैं।

१६-०६-२०१७

सृष्टि के मालिक श्रीसद्‌गुरुदेव अनमोल नामरत्न को मुक्तहस्त लुटा रहे हैं। इस समय जो नहीं पा सकेगा, उसे न जाने कितने जन्मों तक पश्चाताप करना पड़ेगा। बुद्धिमान्‌ वही है जो सब कुछ त्यागकर भी गुरुदेव से मिला यह अमर प्रसाद पाकर अपने जीवन को धन्य बना ले।

१५-०६-२०१७

श्रीसद्‌गुरु के दिव्य स्वरूप का ध्यान अपने माथे में कर लेना ही नामभक्ति अथवा योगभक्ति है। ऐसा होने पर मन गुरु के अधीन हो जाता है। जो ध्यान अंदर दिखाता है उसे ही अपना स्वरूप भी कहते हैं। इस वस्तु को गुप्त भेद गूढ़ तत्त्व कहते हैं।

१४-०६-२०१७

जो साधक श्रीसद्‌गुरुदेव से नाममंत्र ग्रहण कर श्वास-प्रश्वास में ध्यान जमाकर गुरुमंत्र को निरंतर जपता है, निश्चय ही ऐसा क्षण उसके जीवन में आ ही जाता है कि उसे मालिक पारमार्थिक दर्शन हो जाता है।

१३-०६-२०१७

साँसों के द्वारा भजन करने को ही सद्‌गुरुदेव द्वारा मन्त्र का उपदेश दिया जाता है। अतएव श्रीसद्‌गुरु के निर्देशानुसार ही विधिपूर्वक उपदेश का स्मरण करते रहना चाहिये। उसमें भूलकर भी किसी प्रकार की भेदबुद्धि या शंका नहीं करनी चाहिये।

१२-०६-२०१७

सद्‌गुरु की दया से सत्‌-असत्‌ के निर्णय में सक्षम विवेकयुक्त बुद्धि जिसका सारथि हो उसका मन नियंत्रित हो जाता है, फिर वह उस पद को प्राप्त कर लेता है जहाँ से संसार का में लौटना नहीं होता अर्थात्‌ वह साधक सद्‌गुरु को पाकर उनके सेवा भजन और सुमिरन से भवचक्र से छुट्टी पा लेता है।

११-०६-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज के चरण-कमलों का चरणोदक पान करने का सौभाग्य यदि प्राप्त हो जाये तो जन्मों के पाप एवं जीवन के सारे बंधन समाप्त हो जाते हैं।

१०-०६-२०१७

बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी जन्म-जन्मांतर नाना प्रकार के प्रयत्न करके भी आत्मज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते किन्तु श्रीसद्‌गुरु की कृपा जिस जीव पर हो जाती है वह क्षण भर में अपने चित्त में अपने आत्मस्वरूप श्रीसद्‌गुरुदेव की अपरोक्ष अनुभूति पा लेता है।

०९-०६-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाम का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान से शिष्य अपना सर्वोन्मुखी विकास करता है। सद्‌गुरु-साधना सुलभ एवं सरल है लेकिन इसकी विधि श्रीसद्‌गुरु महाराज ही समझा सकते हैं क्योंकि वे स्वयं इस मार्ग के रचियता हैं। श्रीसद्‌गुरु के मार्ग निर्देशन के बिना इस मार्ग पर प्रगति असंभव है।

०८-०६-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज की भक्ति ऐसी अमूल्य निधि है जिसके प्राप्त हो जाने पर शेष सभी उपलब्धियाँ स्वतः हो जाती है। श्रीसद्‌गुरु ही धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के प्रदाता है अतः विवेकी शिष्य को श्रीसद्‌गुरु महाराज की भक्ति का ही अवलंबन लेना चाहिये।

०७-०६-२०१७

श्रीसद्‌गुरु ही साक्षात्‌ ब्रह्म परमेश्वर हैं। ब्रह्मा, विष्णु एवं महादेव शिव स्वयं श्रीसद्‌गुरुदेव में समाहित रहकर श्रीसद्‌गुरु महाराज की इच्छा अनुरूप सृष्टि की रचना, पालन एवं परिशोधन का धर्म निभाते हैं। राम एवं कृष्ण स्वयं सभी दृष्टि से समर्थवान्‌ होते हुए भी गुरु आज्ञा के आधीन रहकर अपने जीवन का निर्वाह किया है। श्रीसद्‌गुरुदेव की महिमा अनादि एवं अनंत है, उनसे अधिक महिमावान्‌ कोई अन्य नहीं है।
देह मनुज धारण किये, प्रगटे गुरु भगवान्‌।
हरण करें दुख जीव के, करें नाम का दान॥

०२-०६-२०१७

मानवमात्र के जीवन को सत्पथ पर अग्रसर कराने वाले सद्‌गुरु भगवान्‌ ही हैं। गुरु के बिना ज्ञान और ज्ञान के बिना मनुष्यत्व भी नहीं, क्योंकि पशु और मनुष्य में अंतर है तो केवल ज्ञान का है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य भी पशु ही है, कोई भेद नहीं रहता। गुरु ही पशुत्व से उठाकर मनुष्यता की श्रेणी में लाता है। गुरुदीक्षा, गुरुशिक्षा, गुरु-उपदेश सबका उद्देश्य मनुष्य के जीवन को सुधारना, उसके लौकिक कल्याण के साथ ही, उसके आत्मोत्कर्ष का सुमार्ग प्रस्तुत करना, संसार से उठाकर उसके परम लक्ष्य तक पहुँचा देना है। इसीलिये हर शिष्य का कर्तव्य है कि गुरुदीक्षा में प्राप्त नाम का भजन-सुमिरन करे, सद्‌गुरु सेवा में चित्त लगाये और गुरुवचन को ईश्वरीय आदेश मानकर उसके अनुसार आचरण करे।

०१-०६-२०१७

गुरुकृपा से गुरु के प्रति हृदय में जब प्रेम का उदय हो जाता है तभी उन्हें प्राप्त करने की सच्ची साधना का प्रारंभ होता है। प्रेम ही मालिक की सुखद गोद में स्थान पाने की साधना का प्रारंभ भी है और प्रेम ही साधना का परिणाम भी है। प्रेमयुक्त मन जितना निर्मल होता जायेगा प्रेम भी उतना ही शुद्ध होता जाता है। सद्‌गुरु द्वारा जगाया गया प्रेम ही परमार्थ का मूल और भक्ति का एकमात्र साधन है।

३१-०५-२०१७

श्रीसद्‌गुरु की भजन-भक्ति से मनुष्य पूर्णता को प्राप्त होता है, देवस्वरूप को प्राप्त करता है और परमा परितृप्ति की प्राप्ति करता है। यही मनुष्य का कर्म व धर्म भी है।
 

३०-०५-२०१७

श्रद्धा, विश्वास और सेवा से भरे हुए आन्तरिकभाव दृष्टि से गुरुदर्शन और उनकी सेवा से तात्त्विक दृष्टि से सद्‌गुरु को जान जाना ही प्रज्ञान है। यही ब्रह्मज्ञान है क्योंकि सद्‌गुरु और परब्रह्म दो नही एक ही हैं। वर्तमान सद्‌गुरु का दिव्य शरीर इसी सत्य को समझने  का सरल, सुबोध साधन है।

२९-०५-२०१७

आत्म-साक्षात्कार कोई चमत्कारिक घटना नहीं हैं, जिन महापुरुषों ने भी इसे प्राप्त किया है उनकी सफलता के पीछे उनकी आध्यात्मिक यात्रा एवं गुरु के प्रति उनके पूर्ण समर्पण के इतिहास का आधार रहा है। गुरु की दृष्टि तो कृपा से परिपूर्ण ही रहती है, उनके सभी क्रिया-कलाप तो सदा जीव हित में ही होते हैं लेकिन फिर भी अपनी आध्यात्मिक उपलब्धि के लिये शिष्य को निरंतर प्रयासरत रहना पड़ता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाममंत्र का जप-भजन ही शिष्य की आध्यात्मिक यात्रा का राजपथ है। निःसंदेह आध्यात्मिक यात्रा अवरोधों एवं भटकावों से भरी होती है लेकिन सद्‌गुरु महाराज की कृपा इसे सहज, स्पष्ट और निर्बाध बनाती है। शिष्य की तप-साधना को श्रीसद्‌गुरु महाराज की दया रूपी छाया सदैव शीतलता प्रदान करती है और हर भटकाव से पहले निश्चित ही सद्‌गुरु महाराज का मार्गदर्शन मिलता रहता है।

२८-०५-२०१७

श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन एवं ध्यान की साधना को समझाते हुए सदा इसी बात पर जोर दिया कि श्रीसद्‌गुरु के सत्य-स्वरूप का दर्शन केवल ध्यान के माध्यम से अंतर्दृष्टि द्वारा ही संभव है, बाहरी नेत्रों से उनके विराट स्वरूप का दर्शन असंभव है। सद्‌गुरु परमात्मा की दिव्य ज्योति को देखने की लिये बाहरी विषयों के प्रति आँखें मुँदी होनी चाहिये, सांसारिक शोर-शराबे के प्रति कान उदासीन होने चाहिये। आँखें एवं कान केवल श्रीसद्‌गुरु के दर्शन एवं उनके अमृतवचन श्रवण में ही लगे रहना चाहिये। जिव्हा में केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज के भजन-संकीर्तन की ही रसना हो, वाणी केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज की महिमागान से भरी हो और रोम-रोम उनके पावन स्पर्श के अनुभव से रोमांचित हो। यही है सद्‌गुरु महाराज से मिलन अर्थात्‌ सद्‌गुरुभक्ति-योग।


२७-०५-२०१७

जीवन में कोई भी अभिलाषा अथवा इच्छा का होना एक रिक्तता की भाव दशा है, जीवन में जब तक यह रिक्त भाव है तो जीवन अपूर्ण ही रहता है। फिर इच्छाओं को भरने में जीवन में चाहे कितनी भी उपलब्धियाँ हो जायें, रिक्त भाव विद्यमान ही रहता है। यह रिक्त भाव ही जीव को संसार में इधर से उधर दौड़ाता रहता है और समस्त सांसारिक संपदाओं के मिलने पर भी रिक्त भाव शेष ही बचता है और जीव खाली हाथ ही लौट जाता है पुनः नया जीवन लेकर इसी रिक्त भाव को भरने के लिये। यही जीवन-मरण का आवागमन है। यह रिक्त भाव केवल सद्‌गुरु की दया से ही मिटता है। दयावान्‌ श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा दीक्षा में दिये जाने वाले महामंत्र के जप-भजन द्वारा ही यह रिक्त भाव मिटता है। इसीलिये संतों ने सद्‌गुरु के नाममंत्र को कामधेनु, कल्पवृक्ष और  चिन्तामणि के नाम से संबोधित किया है। केवल नाममंत्र से ही रिक्त भाव मिटता है। सभी चिन्ताओं, इच्छाओं एवं तृष्णाओं को मिटाकर जीवन को तृप्त करने एवं पूर्णता से भर देने का सामार्थ्य केवल श्रीसद्‌गुरु के श्रीमुख से ग्रहण किये गये नाममंत्र में है। इसीलिये इसे अमोलक धन भी कहते हैं क्योंकि इसकी तुलना में ऐसा अन्य कोई धन नहीं है जो जीवन को पूर्णता से भर दे।

२५-०५-२०१७


‍जग से हो निर्बंध जो, रहे गुरु में खोय।
कर्म अकर्त्ता सा करे, सोई निष्कामी होय॥
जो शिष्य जगत्‌ के सभी रिश्ते-नातों से अनासक्त होकर अपने सद्‌गुरु के प्रेम में ही खोया रहता है और जो अपने सभी कर्मों को सद्‌गुरु के चरणों में अर्पित कर अकर्त्ता भाव से युक्त होता है वही सही मायने में निष्काम कर्मयोगी है। ऐसे ही सत्‌शिष्य के ऊपर ‍सद्‌गुरु की कृपा अहर्निश बरसती है। ऐसे गुरुभक्त की आध्यात्मिक-साधना सहज ही विकसित एवं फलित होती हैं। उसके अन्तस्‌ में गुरुतत्त्व का प्रकाश जगमगाने लगता है और वह गुरुकृपा से समस्त आध्यात्मिक एवं यौगिक ऐश्वर्यों का स्वामी बन जाता है

२४-०५-२०१७

शिष्य के जीवन के प्रत्येक कर्म सद्‌गुरु की आज्ञा के अनुसार ही प्रतिपादित होते हैं अर्थात्‌ वह जो भी करता है गुरु की आज्ञा से ही करता है, गुरु की मौज में करता है और गुरु को ही अर्पित करता है। कर्मयोग के इस तरह अभ्यास से कर्म करने वाले में कर्त्तापन चला जाता है वह अहंकार से रहित हो जाता है। कर्त्ताभाव और फलाकांछी न होते हुए भी एक गुरुभक्त नियत कर्मों को पूरी चेतना एवं उत्साह के साथ करता है, इसीलिये गुरुभक्त का हर कर्म कौशलपूर्ण होता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की दया से ऐसे गुरुभक्त के जीवन में लौकिक उपलब्धियों के पुष्प तो लगते ही हैं साथ ही साथ उसका जीवन पारलौकिक खजाने से भरा होता है।

२३-०५-२०१७

परम कृपालु श्रीसद्‌गुरु महाराज में जिस ब्रह्म चेतना का अधिष्ठान है, वही इस सृष्टि की संचालक है। श्रीसद्‌गुरु महाराज साक्षात्‌ शिव रूप हैं, वे ही सच्चिदानंद हैं, उन्हीं से इस जगत्‌ का अस्तित्व है और वे ही सभी संबंधों के आधारभूत हैं। श्रीसद्‌गुरु विश्वरूप हैं, उन्हीं में सब कुछ समाया है। उनके इस रूप को जानना अत्यंत कठिन है। जो उनकी लौकिक क्रियाओं को देखकर ही ऐसा कहता है वह श्रीसद्‌गुरु को जान लिया है तो वह उन्हें बिल्कुल ही नहीं जानता है। श्रीसद्‌गुरु को तो ध्यान और प्रेम की उस अतल गहराई में ही अनुभव किया जा सकता है जब जानने वाला पूरी तरह उनमें खो जाता है। श्रीसद्‌गुरु से एकाकार होना ही उन्हें जानना है, उस स्थिति में ज्ञाता विलीन हो जाता है और केवल गुरुप्रेम ही शेष रहता है। यह स्थिति अवर्णनीय है। श्रीसद्‌गुरु से मिलन अद्वैत की स्थिति है, प्रेम की अनुभूति है। जिस स्थिति में पहुँचकर सभी भेद समाप्त हो जाते हैं, सभी संशयों का निराकरण हो जाता है और सभी द्वंद्व विलीन हो जाते हैं, वही स्थिति का नाम है गुरु-शिष्य मिलन।

२२-०५-२०१७

गुरु-शिष्य संबंध कोई सांसारिक संबंध नहीं है जो मत्यु के साथ ही समाप्त हो जाये अपितु यह तो युग-युगान्तर तक चलने वाला शाश्वत संबंध है, एक अटूट क्रम है। एक बार सद्‌गुरु से संबंध जुड़ जाने पर हर जन्म में सद्‌गुरु अपने शिष्य को जोड़े रहने का प्रयत्न करते रहते हैं और जब तक उसे जन्म-मरण से मुक्ति नहीं दिला देते उसे सत्य पथ पर लाने के लिये प्रयत्नशील रहते हैं। अज्ञानता में संसार में दर-दर भटकते जीव को स्वयं से मिलाने की युक्ति सद्‌गुरु बिठाते रहते हैं। श्रीसद्‌गुरु एक कुशल कुंभकार की तरह अपने शिष्य को गढ़ते रहते हैं और एक हाड़-माँस की देह को अमृत का एक ऐसा घट बना देते हैं जो उनके प्रेम, करुणा व दया से सदा भरा रहता है। इस घट में गुरुप्रेम रूपी अमृत को शिष्य तो सदा चखता ही रहता है, साथ ही साथ जो भी उसके संपर्क में आते हैं वे भी गुरु प्रेमामृत से तृप्त होते हैं। सद्‌गुरु का सारा जीवन अपने शिष्यों को परमार्थ के पथ पर चलाने के लिये ही समर्पित होता है। ऐसे जीवन्त पूर्ण चैतन्य श्रीसद्‌गुरु महाराज की प्राप्ति परम सौभाग्य है। श्रीमठ गड़वाघाट आश्रम में सद्‌गुरु के चरणकमलों का आश्रय मिल जाना जीवन की परम उपलब्धि है। गुरु-शिष्य संबंध स्थापित हो जाने पर ही भजन-भक्ति की अविरल-साधना प्रारंभ होती है और आध्यात्मिक सिद्धियों की बरसात होती है। जहाँ श्रीसद्‌गुरु महाराज हैं वहीं जीवन हैं, वहीं सब कुछ है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की दया से शिष्य को गुरुदीक्षा में मिलने वाले नाममंत्र के सहारे शिष्य गगनचुंबी आध्यात्मिक शिखरों पर निर्बाध पहुँचता है।

२१-०५-२०१७

जिसका हृदय गुरुभक्ति से भरा होता है और इष्ट श्रीसद्‌गुरु के परम पावन श्रीचरणकमलों में जिसका प्रगाढ़ प्रेम होता है उसका जीवन लौकिक, पारलौकिक सु्खों से सदा घिरा रहता है। इसीलिये मालिक से सदा उनके प्रति अविचल प्रेम की ही याचना करना चाहिये। प्रेम-साधना ही सन्तों की साधना है। सद्‌गुरु के चरणकमल में विशुद्ध प्रेम ही साधक का अभीष्ट है, वही साध्य है। श्रीसद्‌गुरुदेव ही परमात्मा के सगुण अवतार हैं, परमपिता परमात्मा और सद्‌गुरु एक ही हैं। साकार सद्‌गुरु ही परमात्मा का प्रगट रूप हैं। जो प्रगट है वही प्रेम का आश्रय बन सकता है और हमारी मनोवृत्तियों को अपनी ओर आकृष्ट कर उन्हें निर्मल कर सकता है। श्रीसद्‌गुरु के प्रति प्रेम की मस्ती शिष्य को संसार से हटाकर सद्‌गुरु परमात्मा से जोड़ देती है। जब चित्त पूर्ण रूप से मालिक में ही लग जाता है तो जगत्‌ के सभी बंधन शिथिल हो जाते हैं। यही एकाग्रता का श्रेष्ठ उपाय है जो साधक को निर्बाध रूप से आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है। सद्‌गुरु के प्रेम में अपने अस्तित्व को विलीन कर देना ही योग की अन्तिम परिणति है।

२०-०५-२०१७

वास्तव में मोक्ष कोई भौतिक स्थान अथवा धाम नहीं है अपितु मोक्ष तो एक अवस्था है। मोक्ष एक ऐसी अवस्था है जहाँ मन के सभी द्वंद्व तिरोहित हो जाते हैं, सारे भ्रम व संशय मिट जाते हैं, जीव सभी सांसारिक बंधनों से स्वयं को मुक्त महसूस करता है। मोक्ष की यह अवस्था तब आती है जब अज्ञानता की गाँठ खुल जाती है। अज्ञानता की गाँठ खोलने का उपाय है सद्‌गुरु के नाममंत्र का जप। नाममंत्र के जप द्वारा पैदा हुई ऊर्जा से मन एवं हृदय में लगी सभी गाँठें शिथिल होने लगती हैं और अपने स्वयं के जिन पूर्वाग्रहों में जीव फँसा होता है वे विलीन हो जाते हैं जिससे जीव हल्का महसूस करता है। मन-मस्तिष्क में अंधविश्वासों, पूर्वाग्रहों, अहंकार एवं कुतर्कों की गाँठ एवं हृदय में मोह आदि बुरे भावों की गाँठ बन जाने से चेतना इन गाँठों में फँस कर रह जाती है और अंदर ही अंदर इन दुर्गुणों एवं दुर्भावों को परिपोषित करती रहती है जिससे ये और भी अधिक बढ़कर एक दुष्चक्र बना लेते हैं जो निरंतर जीव को अनेक प्रकार के बंधनों में बाँधता जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के नामजप, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन एवं ध्यान से ही ये बंधन सुलझते हैं और जीवचेतना मुक्त होकर अपना प्रकाशन कर पाती है।

१८-०५-२०१७

मन को सभी संकल्पों-विकल्पों से खाली कर एकमात्र श्रीसद्‌गुरु महाराज के चिन्तन, मनन, भजन व सुमिरन में लगा देने पर ही सच्चा सुख मिलता है। चाहे कोई कितना भी बड़ा सम्राट क्यों न हो लेकिन यदि जीवन में भक्ति का सुख नहीं मिला तो उसका जीवन अपूर्ण ही रहता है। सिकन्दर जैसे सम्राट भी विश्व विजय करने के बाद भी खाली हाथ ही गये। जब तक जीवन सांसारिक कामनाओं की पूर्ति में लगा रहता है तब तक उसमें परमात्मा का प्रकाश कैसे आ सकता है। गुरुभक्ति ही जीवन में पूर्णता लाती है।
मनुष्य जीवन अनमोल है इसे कौड़ी के मोल लुटाना समझदारी नहीं है। न जाने कब जीवन की शाम आ जाये और पछताने का समय भी न मिले। जैसे मोती अगर टूट जाये तो उसे फिर जोड़ा नहीं जा सकता, फल यदि टहनी से टूट जाये तो उसे फिर नहीं जोड़ा सकता है वैसे ही अनमोल समय बीत जाने पर पुनः उसे वापिस नहीं लाया जा सकता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज कहते हैं कि इस जीवन को भजन-ध्यान की अक्षय पूँजी से भर लो यह इस लोक के साथ परलोक में भी काम आयेगी। मालिक के नाम-सुमिरन में डूबना ही इस जीवन का सार है।

१६-०५-२०१७

उन श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी की बलिहारी है जो गुरुभक्ति की डगर में चलाकर शिष्य को आत्म-साक्षात्कार कराते हैं और पूर्णब्रह्म सद्‌गुरु परमात्मा की अपरोक्षानुभूति दिलाते हैं। यह गूढ़ रहस्य शिष्य की सोच से परे है कि किस तरह सद्‌गुरु शिष्य के अन्दर के सभी कलुष मिटा देते हैं एवं उसके सभी संशयों व शोकों का उन्मूलन कर उसे अभयदान देते हैं। जिसका जीवन एकमात्र श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों के आश्रय पर ही अवलंबित है और जिसकी श्वासों में सदा सद्‌गुरु की नामधुन का संगीत बजता रहता है, वह निश्चित ही जन्म-मरण के चक्र को लाँघकर मुक्त हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाम का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन एवं ध्यान ही जीवन को मोक्ष तक पहुँचाने वाले सच्चे संगी-साथी हैं।

१५-०५-२०१७

साधक अथवा शिष्य की जीवन ऊर्जा जितनी मात्रा में सद्‌गुरु की सेवा में लगती है उसी अनुपात में श्रीसद्‌गुरु की दिव्य शक्ति का संचार उसके अंदर होता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज कहते हैं कि कदाचित साधक कर्मफलों को अनिश्चितता एवं भय वशात्‌ श्रीसद्‌गुरु को सौंप भी देता है लेकिन अपने कर्मों को सद्‌गुरु को सौपने वा्ले शिष्य बिरले ही होते हैं। जब तक कर्मों को सद्‌गुरु महाराज को न सौपा जाये तब तक कर्त्तापन सदैव साथ रहता है और अहंकार के रूप में अपनी जड़ें मजबूत करता रहता है। कर्म एवं कर्मफलों के सद्‌गुरु को सौंपकर ही निष्काम सेवा हो सकती है और बिना निष्काम सेवा के आध्यात्मिक प्रगति संभव ही नहीं है। सद्‌गुरु को प्रसन्न करने के सिवाय किसी अन्य भाव अथवा हेतु से की जाने वाली सेवा निष्काम सेवा के दायरे में नहीं आती है।

१४-०५-२०१७

कुछ साधक इस आड़ में ही अकर्म अवस्था को अपना लेते हैं कि सब कुछ तो गुरुकृपा से ही होना है तो भला फिर साधना का औचित्य ही क्या है और ऐसा मानकर वे चमत्कार की प्रतीक्षा करते रहते हैं। ऐसे साधक तैल रहित दीपक के समान हैं जो अग्निशिखा के स्पर्श से भी प्रज्वलित नहीं हो पाता है। साधक को नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान रूपी साधन से अपना ईंधन (पात्रता) सदा बढ़ाते रहना चाहिये ताकि गुरुकृपा रूपी अग्निशिखा के स्पर्श मात्र से वह प्रज्वलित हो सके। श्रीमठ गड़वाघाट की धरा सदा से ही ऐसे तपस्वी एवं सुपात्र सत्‌-शिष्यों में गुरुकृपा के योग की साक्षी रही है। श्रीश्री १००८ श्री स्वामी हरशंकरानंदजी महाराज परमहंस ने अपने सद्‌गुरुदेव श्रीश्री १००८ श्री स्वामी आत्मविवेकानंदजी महाराज परमहंस के पावन स्पर्श से अखण्ड समाधि अवस्था को प्राप्त किया। इसी तरह श्रीश्री १००८ श्री स्वामी हरसेवानंदजी महाराज परमहंस ने अपने सद्‌गुरु महाराज श्रीश्री १००८ श्री स्वामी हरशंकरानंदजी महाराज परमहंस की दयाशक्ति के स्पर्श से ब्रह्म अनुभूति लाभ पाया।

१३-०५-२-१७

श्रीसद्‌गुरु के दर्शन से शरीर के साथ-साथ प्राण भी प्रफुल्लित हो जाते हैं। श्रीसद्‌गुरु के अमृतवचन प्राणों के शुद्ध करने का रसायन हैं। सद्‌गुरु के उपदेश से प्राण निर्मल होते हैं और प्राणों के निर्मल होने से आचरण पवित्र व दिव्य बनते हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज में सभी देवी-देवता समाहित हैं। जो भी श्रीसद्‌गुरु महाराज के अपने हृदय में बसा लेता है वह सद्‌गुरु की दिव्य चेतना एवं पूर्णता से आप्लावित हो जाता है।

११-०५-२०१७

जब शिष्य अपने सद्‌गुरु के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित हो जाता है तो उसे अपने अंदर ही सद्‌गुरु के दर्शन होने लगते हैं, अन्तस्‌ में सद्‌गुरु का सत्संग सधने लगता है और भक्ति राह में आगे बढ़ने के लिये सद्‌गुरु का मार्गदर्शन मिलने लगता है। ध्यान की गहरी अवस्था में वह सद्‌गुरु से प्रेरणा लेकर अन्दर ही अन्दर आध्यात्मिक राह में बढ़ने लगता है। सद्‌गुरु की कृपा से जिसे नामज्योति का प्रकाश मिलने लगता है उसके जीवन से अज्ञान रूपी अँधेरा सदा के लिये तिरोहित हो जाता है। सद्‌गुरु के नामरस का अथाह आनंद बाहरी विषयों के क्षुद्र सुखों का अतिक्रमण कर जाता है और मन गुरुभक्ति के अथाह आनंद व असीम शांति में डूब जाता है। यही अमन की अवस्था है, यही जीव का विश्राम है।

१०-०५-२०१७

श्रीसद्‌गुरु जिस घाट की ओर इशारा कर रहे हैं उस घाट पर जाकर आत्मा को सद्‌गुरु के नाम से जोड़ दो। मनमुखता छोड़कर गुरुमुखता अपना लो क्योंकि गुरुमुख के रास्ते में अवरोधों का नामो-निशान नहीं होता है। सद्‌गुरु से नाम मिलने के पश्चात्‌ भी यदि मनमुखता नहीं छोड़ी तो जीवन व्यर्थ ही बीत जायेगा और अंत में यम के धक्के खाना पड़ेगा। नामडोर से मन को बाँधकर सद्‌गुरु के चरणों का सहारा लेकर मुक्त आकाश की ओर छ्लांग लगा दो और तुम निश्चित ही अपनी आध्यात्मिक यात्रा में सफल होगे।

०९-०४-२०१७

माया की ठगी से बचाने वाले एकमात्र श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी ही हैं। श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी नामरूपी अस्त्र देकरजीव को जन्म-मृत्यु रूपी शिकारी से मुक्ति दिलाते हैं। जीते-जी सद्‌गुरु के नाममंत्र से नौ-द्वार के चक्रव्यूह के तोड़कर मुक्त हो जाना ही इस मानवदेह की सार्थकता है। सद्‌गुरु के नाम के अलावा ऐसा कोई अन्य अस्त्र नहीं है जिससे सांसारिक माया के मजबूत जाल को तोड़ा जा सके। चाहे कोई भी युक्ति अपना लो लेकिन जब तक नाम के सुमिरन से चेतना को निर्मल नहीं बनाते तब तक जगत्‌ मलीनता के भार से दबी चेतना को ऊपर नहीं उठा सकते। सद्‌गुरु महाराज के नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान से चेतना परिशुद्ध होकर स्वतः ऊपर उठने लगती है। ऊर्ध्वगमन तो निर्मल चेतना का स्वभाव है अतः गुरुभक्ति द्वारा चेतना को निर्मल करके सद्‌गुरुधाम में प्रवेश पाओ, यही मार्ग है मोक्ष का।

०८-०५-२०१७

सभी संत-महापुरुषों ने एकमत से नामभक्ति को ही मुक्ति का सहज-मार्ग बताया है। यह एक प्रज्वलित दीपक से दूसरे दीपक के प्रज्वलित होने जैसा है। श्रीसद्‌गुरु महाराज जो स्वयं अपने श्रीसद्‌गुरुदेव की नामभक्ति के रस में सदा इस प्रकार घुल हैं कि वे नामशक्तिरूप ही हो गये हैं, उस नामशक्ति को जब वे दीक्षा के दौरान अपने श्रीमुख से शिष्य के अन्तस्‌ में प्रतिष्ठित करते हैं तो शिष्य के अंदर भी सोई हुई नामशक्ति का जागरण हो जाता है जो कालान्तर में नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान से एक प्रखर ज्योति का रूप ले लेती है जिसके प्रकाश में शिष्य निरंतर अपनी आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ता हुआ अपने लक्ष्य अर्थात्‌ इष्ट श्रीसद्‌गुरु से एकाकार होता है। यही सहज-योग है। जिस प्रकार समुद्र के मंथन से अमृत-कलश प्रगट हुआ था, ठीक वैसे ही सद्‌गुरु से प्राप्त उपदेशों के चिन्तन, मनन, सुमिरन आदि से ज्ञान-प्रकाश प्रगट होता है।

०७-०५-२०१७

सद्‌गुरु स्वामीजी नाम के भेदी हैं अर्थात्‌ वे ही नाम के रहस्य को जानने वाले हैं। नामरस की अटूट धारा सभी के अंदर बह रही है लेकिन श्रीसद्‌गुरु महाराज की दया के बिना इसका एहसास नहीं हो सकता है। सद्‌गुरु महाराज की कृपा से ही अन्दर की श्रवण इन्द्री जागती है और नामधुन स्पष्ट सुनाई देती है। अपनी सुरत अर्थात्‌ चेतना को इस नामधुन से जोड़ देना ही आध्यात्मिक साधना है। मन जीव चेतना को भटकाता है और चेतना को बाहरी विषयों में भटकाता है। लेकिन इसके लिये मन को दोष देना उचित नहीं है क्योंकि मन चेतना को उसी दिशा में ले जाता है जहाँ मनुष्य की चाह होती है। जब यही चाहत श्रीसद्‌गुरु महाराज से जुड़ जाती है तो श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी के प्रबल प्रेमाकर्षण  के प्रभाव से संपूर्ण चेतना के सहित मन अंदर की ओर खिच जाता है। फिर यही मन श्रीसद्‌गुरु महाराज से मिलने वाले प्रेम के आनंदरस में इस तरह सरावोर हो जाता है कि उसकी बाहर की दिशा में गति पूरी तरह रुक जाती है और वह हर पल सद्‌गुरु में ही खोया रहता है। श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी जो नामशक्ति का साकार रूप हैं उनसे जुड़ने पर आध्यात्मिक साधना स्वचालित हो जाती है। यही गुरुभक्ति का मार्ग है। गुरुभक्ति के मार्ग की यह विशेषता होती है कि इसमें किसी तप, साधना आदि करनी नहीं पड़ती केवल अविचलित रूप से इस मार्ग पर अर्थात्‌ गुरुभक्ति में स्वयं को खड़ा रखना पड़ता है, प्रगति स्वतः होती जाती है क्योंकि भक्ति तो सद्‌गुरु की कृपाशक्ति से संचालित होने वाली आध्यात्मिकता की गतिशीलता ही है अतः समस्त मंजिलें स्वतः भक्त तक पहुँचती रहती है। इसीलिये भक्त को चाहिये कि वह अपने-आप को सद्‌गुरु के नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान में हर पल प्रतिष्ठित रखे।

०१-०५-२०१७

ज्ञान-अभिमान की भाँति भक्ति-अभिमान भी भक्तिपथ पर हानिकारक है। यदि श्रीसद्‌गुरु महाराज की निकटता प्राप्त कर कोई अभिमानी हो जाये और अन्य भक्तों व श्रद्धालुओं को छोटा समझकर उनका तिरस्कार करने लगे तो यह अपराध उसे आम व्यक्ति की दशा से भी नीचे गिरा देता है। सच्चे भक्त की सहृदयता एकदिशीय नहीं होती है अर्थात्‌ ऐसा संभव ही नहीं कि सच्चा भक्त केवल सद्‌गुरु के प्रति प्रेम से भरा हो और अन्यत्र कठोर भावनाओं से। भक्तिपथ पर प्रगति की पहिचान ही यही है कि हृदय के भाव कोमल होते जाते हैं और भक्त जीवमात्र के प्रति प्रेम से भरता जाता है। सच्चा भक्त सर्वत्र अपने सद्‌गुरु के ही दर्शन करता है और इसीलिये उसके सेवाकर्मों की सीमा नहीं होती है।

३०-०४-२०१७

भक्ति को प्राप्त करके व्यक्ति किसी अन्य वस्तु की अभिलाषा नहीं करता। वह न चिन्ता करता है, न किसी के प्रति द्वेषभाव रखता है, न किसी विषय में आसक्त होता है और न अन्य किसी पदार्थ के लिए उत्साह रखता है। सद्‌गुरु के प्रति चित्तवृत्तियों का अक्षुण्ण आकर्षण ही भक्ति है। सद्‌गुरुदेव स्वामीजी का सतत निष्ठापूर्वक चिन्तन-मनन करने से वृत्तियाँ भी प्रेमभावों से आवेशित होकर उनके प्रति उन्मुख हो जाती हैं। ऐसी भावधारा की उत्तरोत्तर प्रगाढ़ता भक्ति है। जैसे-जैसे सद्‌गुरु से सामीप्य सधता है तो उससे मिलने वाले आनंद के कारण सांसारिक सुखों की तुच्छता प्रगट होने लगती है और गुरुभक्त सांसारिक तृष्णाओं से  दूर होता जाता है। भक्त में सद्‌गुरु की भक्ति प्राप्त करने के अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा नहीं होती। ऐसा भक्त ही सभी कुण्ठाओं से मुक्त होकर जीते-जी वैकुण्ठ लाभ प्राप्त करता है। भक्ति के इस रहस्य को समझकर नहीं अपितु उसमें उतरकर ही पाया जाता है।

२९-०४-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज से मिलन का मार्ग वैराग्य और अभ्यास के द्वारा ही तय होता है। मन से सांसारिक विषयों का छूटना वैराग्य है और मन को सद्‌गुरु से जोड़ना ही अभ्यास है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के ज्ञान-उपदेश से सार-असार का ज्ञान होता है और मन असार विषयों से छूट जाता है। सांसारिक विषय-भोगों से हटे मन को यदि श्रीसद्‌गुरु महाराज से नहीं जोड़ा तो वह पुनः वापस चला जायेगा। नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान द्वारा मन को श्रीसद्‌गुरु महाराज से जोड़ा जाता है। यही साधना है और यही अभ्यास है। यह अभ्यास जब दृढ़ हो जाता है तो चित्त विक्षेपरहित होकर निरंतर सद्‌गुरु के चिंतन में लग जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के स्वरूप, महिमा, गुण, लीला एवं नाम का निरंतर तैलधारा की तरह चिंतन ही अखण्ड भजन है।

२८-०४-२०१७

गुरुभक्ति के मार्ग में अग्रसर होने के लिये श्रीसद्‌गुरु महाराज की कृपा नितान्त आवश्यक है। जो भी भक्तराज भक्तिमार्ग पर आगे बढ पाये हैं, वे सभी गुरुकृपा का आश्रय लेकर ही ऐसा कर पाये हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति निष्काम, एकनिष्ठ एवं अनवरत प्रेम से ही गुरुकृपा बरसती है। सद्‌गुरु महाराज की कृपा तो सर्वत्र बरसती है लेकिन भक्त अपने श्रद्धा के अनुपात में ही गुरुकृपा का वरण कर पाता है। जीवन का रस, भक्ति का स्वाद, धर्म का सार, ज्ञान का तत्त्व; ये सभी श्रद्धा से ही प्राप्त होते हैं। श्रद्धा की शक्ति अपरिमित है, भक्त की श्रद्धा ही निराकार शब्द ब्रह्म का साकार सद्‌गुरु के रूप में साक्षात्कार करा देती है। श्रद्धा प्रेम की दिशा को मोड़ देती है।  इन्द्रियों के आकर्षण को नाशवान् पदार्थों से मोड़कर श्रीसद्‌गुरु के शाश्वत्‌ प्रेम में लगा देने की शक्ति श्रद्धा में ही होती है। मन जब श्रीसद्‌गुरु के प्रति प्रेमभक्ति से भरा होता है तो कर्मों में सेवाभक्ति की भावना स्वयं जागती है। भक्त का मन सद्‌गुरु के नाममंत्र से जुड़ जाने पर तन सेवाभक्ति में रत हो जाता है। इस तरह जब सभी कर्म गुरुसेवा में बदल जाते हैं तो अहंकार लुप्त हो जाता है और पूर्ण शरणागति की अवस्था प्राप्त होती है। यही है पूर्ण शरणागति की यात्रा जो भक्त की श्रद्धा से प्रारंभ होती है।

२७-०४-२०१७

जब हमारी इच्छा स‍द्‌गुरु महाराज की इच्छा के साथ एकरस हो जाती है तो हमारे सम्पूर्ण कर्म सच्चिदानंद श्रीसद्‌गुरु भगवान् को समर्पित हो जाते हैं और कर्मों के इस समर्पण से हमारा जीवन सुनिश्चित रूप से दिव्यता को प्राप्त होने लगता है। हमारी इच्छा और कर्मों का उद्‌भव श्रीसद्‌गुरु महाराज से तभी संभव है जब हमारा हृदय उनके प्रति गहरे प्रेमभाव से सिक्त हो। इच्छा, कर्म व प्रेम जब ये तीनों श्रीसद्‌गुरु महाराज से जुड़ जायें तभी गुरु-शिष्य का सचेतन मिलन होता है। शिष्य का सद्‌गुरु महाराज की सचेतन सत्ता से मिलन ही भक्ति है और संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान की बुनियाद है। इस तरह भक्तियोग में कर्मयोग एवं ज्ञानयोग दोनों ही समाहित रहते हैं। गुरुभक्ति अमृतरस का स्वाद केवल गुरुभक्त ही जानता है। गुरुभक्ति ऐसा निर्मल रस है जिसकी धारा अविच्छिन्न रूप से आनन्द स्वरूप सद्‌गुरु से जुड़ी रहती है। इसे पीकर भक्त की आत्मा सदा तृप्त रहती है। इस आनंदरस को चखने पर समस्त सांसारिक तृष्णायें सदा के लिये छूट जाती हैं।

२६-०४-२०१७

भक्ति अनमोल है और समय के पूर्ण सद्गुरु में ही भक्ति की दात देने का सामर्थ्य होता है। श्रीसद्गुरु महाराज के समक्ष जो भी श्रद्धा से अपना दामन फैलाता है, वे भक्ति की दात से उसका दामन भर देते हैं। इसलिये गुरुकृपा का पात्र बने रहने के लिये यत्न करते हुए उनके दिखाये भक्तिपथ पर निरंतर चलते रहना चाहिये।
धन भक्ति सद्‌गुरु धनी, जे पावैं वे धन्य।
सुख शांति आनंद संग, बरसे प्रेम अनन्य॥

२५-०४-२०१७

कई जन्मों के सौभाग्य से जब सद्‌गुरुदेव की पावन संगति मिलती है, तब ही धन-सम्पदा, पदाधिकार, शारीरिक सुख-सुविधाओं तथा ऐन्द्रिक रसभोग आदि की नीरसता प्रगट होती है। तभी पता चलता है कि जिस सुख व आनन्द की चाह में हम अब तक दौड़ रहे थे वह मृग-मारीचिका ही थी। एकमात्र श्रीसद्‌गुरु महाराज की भक्ति ही आनंद-सरोवर है जिसमें डुबकी लगाने से ही जीवन आनंद से सरावोर होता है। सुख, आनन्द और शांति यदि कहीं है तो वह गुरुभक्ति में है। इसलिए पूर्ण सद्गुरु की चरण-शरण ग्रहण करो और उनसे भक्ति की दात प्राप्त करके अपना यह जीवन भी सुख आनन्द और खुशी से भरपूर कर लो और अपना परलोक भी सुहेला कर लो।

२४-०४-२०१७

भक्ति एक पवित्र भावना होती है। भक्ति उच्च स्तरीय चेतना का प्रवाह है इसमें ऐसी विशिष्टता होती है कि यह जिधर भी प्रवेश करती है उसे उच्च अर्थों वाला बना देती है। भक्ति ही भोजन को प्रसाद, भूख को व्रत, जल को चरणामृत, सैर को तीर्थयात्रा, संगीत को कीर्तन, घर को मन्दिर और कर्म को सेवा की गरिमा दिलाती है। जन्मों के पुण्य सार्थक होने पर ही भक्ति का अवतरण होता है। भक्ति की महिमा यह है कि इसमें सभी कुछ समाहित रहता है। हृदय को शीतलता प्रदान करने वाली भक्ति विरह की अग्नि से भी धधकती रहती है।

२३-०४-२१०७

श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाममंत्र का जप, सतत-स्मरण, दर्शन, प्रार्थना व निरन्तर ध्यान में स्वयं को लगा देने से सभी दोषों का शमन होने लगता है और श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी के सान्निध्य से हमारे गुण-कर्म-स्वभाव सुधरते जाते हैं। भक्तिपथ पर चलाने वाले श्रीसद्गुरु ही जीव के परम हितकारी हैं इसीलिये जो जीव गुरु की चरण-शरण में पा गये हैं, जिन्हें उनके सत्संग की प्राप्ति हो गई है उनके अत्युत्तम भाग्य हैं। ईश्वर भक्ति ईश्वर की पूजा व उसका सत्कार है। गुरुभक्त अपने जिन क्रिया-कलापों से अपने सद्‌गुरुदेव को प्रसन्न करने की चेष्टा करता है वे सभी कर्म भक्ति के अन्तर्गत ही आते हैं।

२२-०४-२०१७

प्रेम में खोना और पाना दोनों ही घटना घटित होती हैं। श्रीसद्‌गुरु के दीदार में उनके स्नेह में भक्त स्वयं को और संसार को खो देता है, वहीं दूसरी ओर वह सब कुछ खोकर अपने प्रियतम श्रीसद्‌गुरु को पा लेता है। इस तरह प्रेमभक्ति में शिष्य सभी निरर्थक तत्त्वों को खोकर एकमात्र सार्थक तत्त्व अर्थात्‌ श्रीसद्‌गुरु महाराज को पाता है। खुद को हारकर श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी के दिल को जीत लेना ही प्रेम है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के दिल को जीत लेना ही परमजीत है। प्रेम, श्रद्धा व समर्पण ये तीन उपाय हैं जिनसे सद्‌गुरु महाराज की प्रसन्नता प्राप्त की जाती है। श्रीसद्‌गुरु महाराज को प्रसन्न कर लेना ही सबसे बड़ी सिद्धि है। यही आध्यात्मिकता का मूल है।

२१-०४-२०१७

समर्पण ही प्रेम की जड़ है। जिस तरह जड़ जितनी गहरी जाती है वृक्ष उतना ही मजबूत और ऊँचाइयों को छूता है। वैसे ही समर्पण जितना गहरा होता प्रेम उतना ही प्रगाढ़ होता है। प्रेम एवं समर्पण दोनों एक साथ घटित होते हैं। जिस तरह दो-पलड़े वाले झूले में एक पलड़े का ऊपर जाना व दूसरे का नीचे आना एक साथ घटित होता है और दोनों घटनायें परस्पर संबंधित है, ठीक वैसे ही प्रेम व समर्पण युगपद अर्थात्‌ एकसाथ घटित होने वाली पारस्परिक घटनायें हैं। ऐसा असंभव है कि किसी से प्रेम हो जाये लेकिन उसके प्रति समर्पण के भाव न हों। प्रेम का प्रगटीकरण अथवा अनुभव चाहे जितना भी हो, किन्तु यदि  समर्पण के भाव नहीं है तो वह सच्चा प्रेम नहीं है। समर्पण प्रेम की कसौटी है। जिसके प्रति प्रेम भाव होते है, उसके प्रति कुछ त्याग अथवा समर्पण की इच्छा भी अवश्य होती है। प्रेम जितने शिखर तक पहुँचता है समर्पण भाव भी उसी अनुपात में गहराता है। प्रेम के बिना समर्पण एवं समर्पण के बिना प्रेम की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जिसके प्रति सच्चा-प्रेम भाव होगा उसके प्रति समर्पण और सेवा का भाव उदय होना स्वाभाविक है। भक्ति कोई कर्मकांड नहीं बल्कि दिव्य प्रेम से युक्त गुरुसेवा का स्वरूप है। भक्त सदा पूर्ण वैराग्य व हर स्थिति में मन के समत्व भाव में स्थित रहता है। संपूर्ण शुद्धता, समर्पण व वैराग्य की धरा पर उपजी भक्ति के प्रभाव से सभी बंधन स्वत: छिन्न-भिन्न हो जाते हैं।

२०-०४-२०१७

सद्‌गुरु प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति हैं। सद्‌गुरु महाराज के स्वरूप में भक्त के हृदय में रोपित प्रेम लता भक्ति के सिंचन द्वारा पल्लवित होकर सर्वत्र छा जाती है। सच्ची साधना का परिणाम प्रेम ही है और प्रेम भावनाओं की पराकाष्ठा ही भक्ति है। गुरुभक्ति साधना का लक्षण ही यही है कि भक्त के अन्तःकरण में प्रेम की सुधारा अनवरत रूप से प्रवाहित तो होती ही है साथ ही साथ उसके प्रभाव से चारों ओर भी प्रेमपूर्ण परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं। भक्त का हृदय संपूर्ण सृष्टि के प्रति प्रेम से आप्लावित रहता है और वह सर्वत्र सद्‌गुरु परमात्मा के ही दर्शन करता है। सच्चे भक्त को घट-घट में सद्‌गुरु ही नजर आते हैं। हृदय में प्रेम भावना की वृद्धि ही गुरुभक्ति की गहराई का माप है। 

१९-०४-२०१७

सद्‌गुरुदेव जिस ’नाम’ का उपदेश देते हैं उस नाम का अमल (अभ्यास) करने से वह कल्पलता के समान फलदायी हो जाता है, लौकिक-पारलौकिक सभी कामनाओं की पूर्ति करता है। नाम की कीर्ति और यश की गणना नहीं की जा सकती है। नाम-अमल का सबसे बड़ा फल यह है कि वह अभ्यासी सेवक और शिष्य को भी सद्‌गुरु बना देता है।

१८-०४-२०१७

बिना गुरु के भक्ति असंभव है। आकर्षण अथवा सौन्दर्यबोध के बिना प्रेम उत्पन्न नहीं होता, इसीलिये भक्ति सगुण आश्रय के सहारे ही चल सकती है। अध्यात्म के क्षेत्र में दैहिक नही अपितु आध्यात्मिक सौन्दर्य की प्रमुखता है। आध्यात्मिक सौन्दर्य श्रीसद्‌गुरुदेव के अलावा अन्यत्र दुर्लभ है। अतः प्रेम देहधारी गुरु के प्रति ही होता है और वही अन्तर में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचकर पराभक्ति का रूप ग्रहण करता है।

१७-०४-२०१७

गुरुभक्ति की धारा में अपने समस्त कर्मों व कर्मफलों को विसर्जित करके जीवन को श्रीसद्‌गुरु महाराज की मौज व कृपा में छोड़ दो तो ही जीवन में सुख, शांति और पूर्णता की प्राप्ति होगी।

१६-०४-२०१७

जितने भी सन्त-सद्‌गुरु हुए हैं वे सभी महापुरुष अपने सद्‌गुरुदेव के ध्यान, सुमिरन और सेवा द्वारा उन्हें अपने भीतर प्रगट करके उन्हीं का रूप बन गये, स्वयं सद्‌गुरु बन गये, उनकी नरदेह न रहने पर उनके द्वारा हो रहे जीवोद्धार का पवित्र कार्यभार अपने ऊपर ले लिया, क्योंकि वे वही हैं, भेदरहित और अखण्ड। आदिकाल से यही क्रम चला आ रहा है।

१५-०४-२०१७

जीव को ब्रह्मस्वरूप का अनुभव गुरु के सान्निध्य से ही संभव है। बिना सद्‌गुरु की शरण में गये आत्मबोध असंभव है। सद्‌गुरु स्वयं अकर्त्ता हैं, उनके दर्शन मात्र से, उनके समीप रहने से जीव की जड़ता बिखरने लगती है और सच्चिदानंद स्वरूप झलकने लगता है। जब साधक सच्चे हृदय से, श्रद्धाभाव से एकाग्रतापूर्वक श्रीसद्‌गुरु का भजन, सुमिरन, ध्यान करता है तब दिव्यचक्षु वाले गुरुदेव को तत्काल संवेदन होता है कि साधक की ओर से प्रार्थना और उन्नत विचार का प्रवाह हो रहा है और हृदय को स्पर्श कर रहा है। उसी समय जैसे एक बर्तन से दूसरे बर्तन में तेल की धारा बहती है वैसे ही श्रीसद्‌गुरु के करुणामय हृदय से साधक की ओर आध्यात्मिक विद्युतधारा का प्रवाह होने लगता है और साधक को अलौकिक आनंद मिलने लगता है।

१४-०४-२०१७

जिस पर श्रीसद्‌गुरुदेव महाराज की कृपा होती है उसी का मन शुद्ध होता है, स्थिर होता है। श्रीसद्‌गुरु स्वयं प्रसन्न होकर सेवक के हृदय में कल्याण-कारिणी बुद्धि उत्त्पन्न करते हैं। मुमुक्षु के लिये सद्‌गुरुदेव से बढ़कर कोई अन्य तत्त्व नहीं है। अतः भजन, सुमिरन, सेवा में नित्य तत्पर रहकर गुरु के चरण-कमल में सभी शुभाशुभ कर्म अर्पित करना चाहिये, यही जीवत्व का समर्पण है, यही जीवन्मुक्ति का सहज साधन है।

१३-०४-२०१७

दीक्षा में सद्‌गुरु महाराज से प्राप्त नाममंत्र के अर्थ की भावना करते हुए जब उस मंत्र की आवृत्ति की जाती है यानि लगातार मानसिक जाप किया जाता है तो मन में श्रीसद्‌गुरुदेव के संपूर्ण स्वरूप का स्मरण स्थिरता के साथ होने लगता है और तभी शिष्य को ध्यान करने की योग्यता प्राप्त होती है। इसी स्मरण को सन्तजन सुमिरन कहते हैं।

१२-०४-२०१७
जब सद्‌गुरु की प्रसन्नता ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य हो जाये तो समझो जीवन में भक्ति का प्रवेश हो गया। यदि शिष्य सद्‌गुरु की चरण-शरण में रहकर उनकी सेवा करे तो उसमें क्रमशः अपने गुरु के संकेत व चेष्टाओं का अभिप्राय समझने की योग्यता आती जाती है। तब वह उनके बिना कहे ही उनके मनोभाव समझकर उनके मन का काम कर सकता है और यह बात गुरुदेव को प्रसन्न रखने में कितनी सहायक हो सकती है, सहज ही समझ में आ जाता है। गुरुदेव की प्रसन्नता ही आध्यात्मिक साधना की सफलता का मूल स्रोत है अतः साधक को परम विनीत भाव से गुरुसेवा करते हुए गुरुदेव की प्रसन्नता की अभिलाषा रखनी चाहिये। सद्‌गुरु की नित्य एवं अन्तरंग सेवा में रहने वाले संतों ने बतलाया है कि शिष्य को गुरुदेव की चेष्टा व व्यवहार को देखकर उसका मर्म समझने की चेष्टा करनी चाहिये।

११-०४-२०१७

इष्ट अथवा आराध्य तक पहुँचने के सभी पथों में भक्ति का पलड़ा भारी रहता है क्योंकि भक्ति प्रेमभावों से पल्लवित होती है। प्रेम एक ऐसा तत्त्व है जिसकी तुलना किसी से नहीं हो सकती। पूजा, पाठ, जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि का एकमात्र उद्देश्य सद्‌गुरु के प्रति अपनी निष्ठा को गहरा करना है क्योंकि निष्ठा गहरी होने पर प्रेम भाव बढ़ता जाता है। यही प्रेम भाव धीरे-धीरे परिपक्व होकर भक्ति का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार गुरुभक्ति की सभी उपासनाओं का मूल तात्पर्य सद्‌गुरु के प्रति प्रेम का विकास करना ही है।

१०-०४-२०१७

जब तक शिष्य का हृदय श्रीसद्‌गुरु के प्रति प्रेम से सिक्त नहीं होता तब तक उसकी श्रेणी एक जिज्ञासु की ही होती है। प्रेममयी हृदय से श्रीसद्‌गुरु महाराज से जुड़ना ही भक्ति है। भक्ति कोई दिनचर्या, कर्मकांड अथवा कोई अनुष्ठान नहीं है अपितु भक्ति तो भक्त का जीवन है। भक्त के हर कर्म में सद्‌गुरुदेव निहित होते हैं। श्रीसद्‌गुरु की कृपा की ही भाँति शिष्य की भक्ति भी अहैतुकी होती है।

०८-०४-२०१७

जीव अपने ही विभिन्न कोषों में बद्ध रहता है और अपनी संकुचित समझ व धारणा के अनुसार ही  वह मन में इस जगत्‌ की परिकल्पना किये रहता है। जैसे कुएँ का मेंढक कुएँ की सीमा को ही सृष्टि के अंतिम विस्तार के रूप में जानता है, वैसे ही पंचकोषों में घिरा जीव कोषों से बाहर मुक्त जीवन की कल्पना भी नहीं कर पाता है। जीव को मुक्त अवस्था के अनुभव करवाने में देहधारी श्रीसद्गुरु महाराज की भूमिका एक झरोखे की तरह होती है। श्रीसद्गुरु महाराज अपने अनंत व सर्वव्याप्त आकाश रूप जिसमें जड़-चेतन सभी समाये हैं अपने उस स्वरूप की अनुभूति सर्वप्रथम अपनी स्थूल विग्रह में करवाते हैं। ऐसा समझिये मानो जीव कमरे रूपी कोष में बंद है और सद्गुरु की देह उस कमरे का झरोखा है। इस झरोखे द्वारा सद्गुरु अपने अनंत विस्तृत आकाश स्वरूप में जीव को प्रवेश दिलाते हैं। सद्गुरु एक ओर जीव से जुड़े रहते हैं तो दूसरी ओर अपने अनंत रूप को धारण किये रहते हैं। जीव के लिए इस झरोखे में सीमित आकाश को समझना आसान होता है क्योंकि उसकी समझ सीमित होती है। वह झरोखे की ओर गति कर सकता है और इसके माध्यम से अनंत आकाश से जुड़ सकता है।

२३-०३-२०१७

शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि से संबंधित सासांरिक विषयों के आकर्षण में प्रवृत्त होकर जीव अपने मूल रूप को विस्मृत कर देता है। लेकिन जब गुरु के प्रति अनुराग हो जाता है तो सभी चाहतें गुरु की ओर ही मुड़ जाती हैं।  शिष्य अपने गुरु के वचन, गुरु के सत्संग, गुरु के दिव्य रूप, गुरुभक्ति के रस, सद्‌गुरु के ज्ञान-सुवास की ओर आकर्षित होता जाता है। यही आकर्षण उस शिष्य को जीवन में सार्थकता, श्रेष्ठता, आनंद, शांति और पूर्णता देता है।  जीवन में श्रीसद्‌गुरु के आगमन से ही शिष्य ज्ञान एवं दिव्य प्रेम की फुहार से भीगने लगता है। श्रीसद्‌गुरु के द्वारा दीक्षा में प्राप्त नाम के जप, भजन, सुमिरन के माध्यम से शिष्य गुरुकृपा और गुरुप्रेम से आंतरिक रूप से परिपूर्ण हो जाता है।

२२-०३-२०१७
गुरुभक्ति का प्रारंभ श्रद्धा से होता है। श्रद्धा भक्ति-सरिता का उद्‌गम स्रोत है। श्रद्धा हमेशा श्रेष्ठ के प्रति ही होती है। श्रद्धा एक ऐसी वृत्ति है जिसमें श्रेष्ठ को बिना तर्क-वितर्क के अकारण ही यथारूप स्वीकार कर लिया जाता है। श्रद्धा गहरी निष्ठा की अवस्था है। किसी पर श्रद्धा होने का अर्थ है कि उसे बेशर्त व बेतर्क स्वीकार कर लेना। जैसे बसंत के मौसम में संपूर्ण प्रकृति खिल उठती है, वैसे ही जब हृदय में श्रद्धा रूपी मौसम के आगमन से भक्ति का पल्लवन होता है। कहा जाता है कि गुरुवचनों में श्रद्धा होनी चाहिये, इसका सीधा अर्थ यही है कि सद्‌गुरु स्वामीजी की शिक्षाओं को जीवन में बिना तर्क के स्वीकार कर लेना। समर्पण की अवस्था का पहला कदम है श्रद्धा। श्रद्धा से आस्था, आस्था से प्रेम और प्रेम से समर्पण, इसी क्रम में भक्ति यात्रा तय होती है। गुरुभक्ति हृदय में श्रद्धा, आस्था, प्रेम व समर्पण की पवित्र भावनाओं का ऐसा उफान है जो गुरुभक्त को उच्च स्तरीय चेतना की ओर बहा ले जाता है और श्रीसद्‌गुरु महाराज की परमचेतना से जोड़ देता है। समर्पण भक्त की स्वयं को श्रीसद्‌गुरुदेव में समाहित करने की दशा होती है। समर्पण की अवस्था में  भक्त सद्‌गुरु महाराज से अभिन्न हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु से यह अविभक्त अवस्था ही भक्त होने का असल अर्थ है।

२१-०३-२०१७

सद्‌गुरु एवं भक्त का प्रेम अलौकिक होता है। प्रेम से भजन, सुमिरन, दर्शन व ध्यान अप्रयास होते हैं। जैसे एक प्रेमिका के मन में हर पल अपने प्रेमी के ही विचार आते हैं, उसका हृदय हर पल प्रेमी की यादों से भरा होता है, प्रीतम की छवि सदा उसके नयनों में तैरती रहती है, इन सभी के लिये उसे कोई प्रयास नहीं करना पड़ता अपितु प्रेम के प्रभाव से यह सब स्वतः घटित होते हैं। वैसे ही शिष्य की अवस्था में जो आध्यात्मिक साधनाएँ अपेक्षित होती हैं वे प्रेमीभक्त के जीवन में स्वयं संचालित होती रहती हैं। एक साधक आध्यात्मिक राह कदम-कदम चलकर तय करता है जबकि भक्त की ओर तो आध्यात्मिक मंजिल स्वयं गतिमान रहती है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति भक्त का प्रेम इतना गहन होता है कि प्रेम के आकर्षण से सद्‌गुरु स्वयं उससे मिलने को खिंचे चले आते हैं। सोते-जागते, उठते-बैठते हर पल उसके अन्तस्‌ में सद्‌गुरु महाराज का स्मरण अटूट रूप से चलता रहता है। उसके जीवन में सद्‌गुरु के प्रति लालसा में कोई अंतराल नहीं होता है। उसके जीवन का प्रत्येक कर्म सद्‌गुरु महाराज से जुड़ा होता है। हृदय में श्रीसद्‌गुरु के अनन्य प्रेम, मन में श्रीसद्‌गुरु का अनन्य चिन्तन और चित्त में सद्‌गुरु का सतत-स्मरण के द्वारा शिष्य अपने सद्‌गुरु से एकाकार हो जाता है। इस एकाकारिता में ही शिष्य भक्त कहलाता है।

२०-०३-२०१७
श्रीसद्‌गुरु महाराज की कृपा के बिना सांसारिक माया से निष्प्रभावित रहना असम्भव है। श्रीसद्‌गुरु महाराज अपने प्रबल प्रेम आकर्षण से शिष्य को भक्तिमार्ग में दृढ़ता से स्थापित करते हैं। वे शिष्य को नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना में पारंगत करते हुए उसकी चेतना को अंतर आयामी बनाते हैं। जिन्होंने निष्कपटभाव से सर्वात्मना सद्‌गुरुदेव के श्रीचरणों की भक्ति का सहारा लेकर उनकी दयादृष्टि को प्राप्त करते हैं वे ही लोग अहंता-ममता से छूटकर भवमाया से पार लगते हैं। संत सद्‌गुरु प्रेम का साकार रूप होते हैं । वे हमारे आत्मिक विकास के लिए प्रेम और भक्ति के मार्ग पर चलाते हैं और सेवाभक्ति का स्वाद चखाकर उस अमृत से अपने जीवन को भर लेने की इच्छा जगाते हैं। गुरुभक्त सदैव सद्‌गुरु महाराज की सेवा प्राप्त करने के लिये लालायित रहता है। श्रीस्वामीजी कहते हैं कि मानसी सेवा सर्वोत्कृष्ट सेवा है, मन व चित्त का गुरोन्मुख होना ही मानसी सेवा है। श्रीसद्‌गुरु की दैहिक सेवा एवं उनके कल्याणकारी कार्यों में तन व धन के सहयोग से मानसी सेवा फलित होती है। जो नदियाँ  समुद्रोन्मुखी होकर निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं वे अंत में समुद्र में विसर्जित हो पाती हैं, वैसे ही शिष्य की मानसिक वृत्तियों का श्रीसद्‌गुरु के प्रति अखंड प्रवाह उसे गुरुभक्ति के अथाह सिंधु में डुबो देता है।

१९-०३-२०१७
सर्वसमर्थवान्‌ देहधारी श्रीसद्‌गुरु परमात्मा के रूप एवं गुणों के ध्यान से मानस में ब्रह्म चेतना का प्रवाह होता है। ब्रह्म चेतना के निरंतर प्रवाह से ब्रह्ममय अंतःकरण का विकास होता है जिससे शिष्य के लिये संपूर्ण प्रकृति ब्रह्ममयी हो जाती है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के दिव्य रूप का ध्यान, उनके लोकोत्तर सौन्दर्य, अनुपम माधुर्य एवं अद्‌भुत महिमाओं के प्रेमपूर्वक चिन्तन से शिष्य का मन सद्‌गुरु महाराज के प्रेम में विभोर हो जाता है। इस प्रेम के आकर्षण से श्रीसद्‌गुरु महाराज के निर्गुण, निराकार और सर्वव्यापक अस्तित्व भी सुग्राह्य हो जाता है। जैसे आकाश में स्थित सूर्य तो स्थूल है लेकिन उसका प्रकाश एवं ताप सर्वाकार एवं सर्वव्यापक है और सूर्य के सन्मुख रहने पर उसके प्रकाश एवं ताप की प्रतीति होती है वैसे ही श्रीसद्‌गुरु महाराज के  स्थूल विग्रह के सत्संग व ध्यान से शिष्य उनके ज्ञान-प्रकाश व दिव्य चेतना से जुड़ जाता है। ज्ञान-प्रकाश व चेतना से योग कराने वाला यही साधन भक्तियोग है। इस योग को साधने के लिये साधक में तृणमात्र भी अहंकार नही होना चाहिये क्योंकि अहंकारी के लिये सद्‌गुरु का ब्रह्म-स्वरूप वैसे ही दुर्ग्राह्य होता है जैसे बधिर के लिये शब्द एवं जन्मांध के लिये रूप दुर्ग्राह्य होता है।

१८-०३-२०१७
गुरुभक्त को कभी भी अपनी आध्यात्मिक मार्ग की सफलताओं का घमंड नहीं होना चाहिये। सभी आध्यात्मिक सफलताएँ तो गुरुकृपा से ही प्राप्त होती हैं। सच्चे भक्त तो श्रीसद्‌गुरु के प्रति प्रेमभाव को भी अपने हृदय में ही सहेज कर रखते हैं, वे अपने प्रेम का न तो बखान करते और न ही उसका प्रदर्शन करते हैं। वे तो मौनभाव से श्रीसद्‌गुरु महाराज की सेवा में लीन रहते हैं। वाणी में अग्नि का वास होता है, वाणी से जो भी चीज कह दी जाती है वह जलकर भस्म हो जाती है फिर चाहे वे स्वयं के सद्‌गुण हों अथवा दुर्गुण। हृदय गृह में जो प्रेम प्रकाशित होता है वह वाणी रूपी दरवाजे पर आकर बुझ जाता है। इसीलिये गुरुप्रेम को अपने हृदय में बसाकर बढ़ाते रहना चाहिये, जैसे कच्चा फल ही कालांतर में पके फल के रूप में परिवर्तित होता है वैसे ही गुरुभक्ति हृदय में निरंतर सहेजकर रखने से प्रेममयी अनन्य भक्ति के रूप में संवर्धित होती रहती है।

 

१६-०३-२०१७

अनन्यता का भाव शिष्य के आश्रय अथवा आलंबन में भी दिखता है। जब शिष्य की आस्था अपने श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति अटूट होती है तो वह पूरी तरह सद्‌गुरु पर ही आश्रित होता है, उसे अपने साधना-बल पर किंचितमात्र भी विश्वास नहीं होता, वह अपनी जीवन-नैया श्रीसद्‌गुरु महाराज के हाथों में पकड़ा कर निश्चिंत हो जाता है। जैसे विडाल-शिशु (बिल्ली प्रजाति के शिशु) अपनी माता पर ही पूर्ण तरह आश्रित होता है, उसकी माता ही उसे अपने मुँह में पकड़कर सभी जगह ले जाती है और वह पूर्ण समर्पित रूप से माता के साथ निश्चिंत रहकर यात्रा करता है। इसके विपरीत वानर-शिशु स्वयं अपने हाथों से अपनी माता को पकड़े रहते हैं, लेकिन इस दशा में यात्रा के दौरान नन्हें हाथों की पकड़ कमजोर होने पर उसके छूटकर गिर जाने की आशंका सदैव रहती है। इसी तरह जो शिष्य सर्वस्व समर्पण कर श्रीसद्‌गुरु के आसरे ही रहता है वह सुरक्षित रूप से मंजिल तक पहुँच जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीसद्‌गुरु के प्रति आस्था, समर्पण व भक्ति इतनी प्रगाढ़ होनी चाहिये कि गुरु स्वयं उसे पकड़कर आध्यात्मिक मंजिल तक पहुँचा दें। अनन्यता तो तभी होगी जब शिष्य को श्रीसद्‌गुरु के अलावा न तो स्वयं और न ही किसी अन्य का आसरा हो।  जब बालक स्वयं पिता का हाथ पकड़कर चलता है तो उसके गिरने की सम्भावना हो सकती है, परन्तु जिस बालक का हाथ पिता स्वयं पकड़कर चलते हैं  तो वह निर्भय होकर गंतव्य तक सुरक्षित पहुँचता है।

१५-०३०२०१७

अनन्य भक्ति वह अवस्था है जिसमें भक्त को अपनी योग्यता, बल, बुद्धि आदि का किंचित मात्र भी सहारा न हो अपितु केवल इष्ट श्रीसद्‌गुरु का ही आश्रय हो; चित्त, मन व हृदय में केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज का चिन्तन, मनन व ध्यान चलता रहे, सद्‌गुरु के दर्शन की व्याकुलता सदैव बनी रहे और उनके बिना एक पल को भी चैन न पड़े। इस व्याकुलता में अनंत जन्मों के अनंत पाप भी भस्म हो जाते हैं। ऐसे अनन्यचित्त वाले  नित्य-निरंतर श्रीसद्‌गुरुदेव का ही चिंतन करने वाले भक्त के समस्त योगक्षेम का वहन स्वयं सद्‌गुरु महाराज करते हैं। ऐसे भक्त ही श्रीसद्‌गुरु को यथारूप जान पाते हैं। यहाँ जानने का अर्थ सद्‌गुरु महाराज को अपनी बुद्धि की परिधि के अंतर्गत कर लेना नहीं है बल्कि जानने की शक्ति (ज्ञानशक्ति) का श्रीसद्‌गुरु महाराज से परिपूर्ण हो जाना है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की प्रतीति अपने अन्तस्‌ में सदैव करना अनन्य भक्ति का सीमित रूप है, सच्ची अनन्यता तो वही है जब शिष्य को न केवल अपने अंदर अपितु बाहर जहाँ कहीं भी उसकी नजर जाये, हर वस्तु में हर जीव में और प्रकृति के हर अंग में सद्‌गुरु महाराज की ही समरस प्रतीति हो और सद्‌गुरु में ही संपूर्ण जगत्‌ को देखे। इस अनन्यता में ही सद्‌गुरु महाराज को देखा जा सकता है और उन्हें प्राप्त किया जा सकता है।

 

१४-०३-२०१७

अनन्य भक्त को एकमात्र श्रीसद्‌गुरु की दया का ही आसरा होता है, उसे अपनी साधना का न तो अभिमान होता है और न ही उसकी किंचिन्मात्र ऐसी धारणा होती है कि केवल साधना के बल से स्वयं का उद्धार संभव है। गुरुभक्त की जीवन-नैया  खेवनहार श्रीसद्‌गुरु की पतवार रूपी कृपा के सहारे ही गति करती है। ऐसे भक्त पर ही श्रीसद्‌गुरु महाराज की कृपा बरसती है और वह सहज ही भवसागर को पार कर लेता है।
जब शिष्य में श्रीसद्‌गुरु के प्रति अनन्य भक्ति जगती है, तो उसकी श्रीसद्‌गुरु के सान्निध्य के अतिरिक्त अन्य किसी के संग की इच्छा ही नहीं होती है। उसे श्रीसद्‌गुरु महाराज के चिंतन, दर्शन और ध्यान के अलावा शेष सब असार लगने लगता है। वह बड़े उदासीन भाव से संसार में रहता है, उसके सारे भाव एकमात्र श्रीसद्‌गुरु में ही केन्द्रित रहते हैं। यहाँ तक की वह स्वयं को भी भूल जाता है और उसका संपूर्ण अस्तित्व श्रीसद्‌गुरु महाराज में ही खो जाता है। श्रीसद्‌गुरु के प्रति यही अनन्यता अव्यभिचारिणी भक्ति है जिसके हृदय में ऐसी भक्ति उपजती है, उसके हृदय को श्रीसद्‌गुरुदेव ज्ञान के प्रकाश से भर देते हैं।

१३-०३-२०१७

सच्चा गुरुभक्त सदैव श्रीसद्‌गुरु महाराज के दर्शन  की चाह में ही रहता है और प्रेमपूर्वक सद्‌गुरु के दिव्य स्वरूप के दर्शन में ही मन को स्थिर करता है।  श्रीसद्‌गुरु महाराज की शरण ग्रहण कर जो भक्त अनन्य भाव से उनकी सेवा करते है, वे उनके ऊपर विशेष कृपालु रहते हैं। गुरुभक्त का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह देश और काल का विचार किये बिना अनन्य भाव से सद्‌गुरुदेव का ही चिंतन करता रहता है, उसे साधना के लिये तीर्थ आदि पवित्र स्थानों की आवश्यकता नहीं होती अपितु वह जहाँ भी रहता है उसके चारों ओर भक्ति का वातावरण ही रहता है। अन्य मार्ग के अभ्यासियों को जिन व्यवधानों का सामना करना पड़ता है, गुरुभक्त के सामने उन व्यवधानों का कोई अस्तित्व नहीं होता है।

१२-०३-२०१७
चित्त की छितरी दशा में भक्ति नहीं हो सकती है। गुरुभक्ति के लिये एकाग्र चित्त द्वारा श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाम-भजन, सुमिरन, दर्शन व ध्यान आवश्यक है। सामान्यतः मन की चंचलता के कारण मनुष्य का चित्त अनेक विचार तरंगों से भरा रहता है। तरंगायित चित्त में न तो नाम-जप हो सकता और न ही सुमिरन, दर्शन अथवा ध्यान घटित हो सकता है। जिस तरह तरंग युक्त सरोवर में कोई भी छवि स्थिर नहीं हो सकती, उसी प्रकार अनेक विचारों से तरंगायित चित्त में श्रीसद्‌गुरुदेव को धारण करना असंभव है। जब तक चित्त में इष्ट श्रीसद्‌गुरुदेव का अनन्य रूप से वास नहीं होता है तब तक गुरुभक्तियोग दुर्लभ ही है। स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण अपने भक्तर्जुन से कहते हैं-
“अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।”श्रीमद्भगवद्गीता -अध्याय ८/१४
अर्थात्‌, जो पुरुष मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम का स्मरण करता है, ऐसे नित्य मुझमें युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ प्राप्य हूँ ।
श्रीसद्‌गुरु महाराज को अनन्य रूप से चित्त में धारण करने के लिये उनके प्रति प्रेमभाव प्रथम आवश्यकता है। यह एक नैसर्गिक सत्य है कि मनुष्य को जिसके प्रति भी प्रेमभाव होता है, उसके तरफ विचार का प्रवाह भी अप्रयास ही होता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के द्वारा प्रदान की जाने वाली नाम-जप की साधना के विधिवत्‌ अभ्यास मन व चित्त स्थिर होते हैं और सद्‌गुरु के प्रति गहरा प्रेमभाव दूसरे विचारों को चित्त में आने नहीं देता है। स्थिर चित्त में सद्‌गुरु महाराज के साथ अनन्य भाव से पनी चेतना को जोड़ना ही गुरुभक्तियोग है। अनन्य चित्त में सद्‌गुरु महाराज के साथ जुड़ जाने पर शिष्य को सद्‌गुरु की कृपा निरंतर मिलती रहती है और वह सद्‌गुरु महाराज की समस्त शक्तियों से जुड़ जाता है।

११-०३-२०१७

यदि कोई साधक केवल ज्ञानयोग की साधना करता है तो उसके भटकाव की संभावना अधिक होती है क्योंकि ज्ञानयोगी में पुरुष गुणों की प्रधानता रहती है। माया को नारी के स्वभाव का माना जाता है इसीलिये एक ज्ञानयोगी को माया कई रूप से प्रभावित कर सकती है। जबकि भक्ति में नारी गुणों की प्रधानता अधिक होती है। समवर्ग होने के कारण भक्त माया से प्रभावित नहीं होता है। काम, क्रोध, लोभ आदि का प्रभाव भक्त में नहीं पड़ता क्योंकि भक्त का संपूर्ण रस अपने प्रीतम श्रीसद्‌गुरु पर ही होता है।
मोह न नारि नारि के रूपा, पन्नगारि यह नीति अनूपा।
माया भगति सुनहु तुम दोऊ, नारिवर्ग जानहिं सब कोऊ। श्रीरामचरितमानस
इसीलिये भक्तियोग में इष्ट श्रीसद्‌गुरुदेव को अपने प्रीतम परम पुरुष के रूप में स्वीकार कर उनकी आराधना की जाती है, इसीलिये मायाजनित कारक भक्त के ऊपर प्रभावहीन होते हैं। एक सच्चा गुरुभक्त एक विरहणी नारी की तरह अपने प्रीतम श्रीसद्‌गुरु के दर्शन को व्याकुल रहता है, गुरुदेव को हर हालत में प्रसन्न रखना ही उसकी अभीप्सा होती है। श्रीसद्‌गुरु के प्रति ऐसा तीव्र आकर्षण भक्त के मन व चित्त को श्रीसद्‌गुरुदेव से इस तरह जोड़े रखता है कि शेष सांसारिक बंधन स्वयमेव ही शिथिल होकर मिट जाते हैं। भक्तियोग की साधना का यह एक रहस्यमय पहलू है।

०९-०३-२०१७
जब तक ब्रह्मवेत्ता श्रीसद्‌गुरु महाराज शिष्य के अन्तःकरण का संचालन नहीं करते तब तक आत्म-साक्षात्कार या तत्त्वबोध  संभव नहीं है। अज्ञान अवस्था में संचित अनुभवों एवं मिथ्या धारणाओं के कारण हृदय संकुचित हो जाता है, सोचने -समझने की शक्ति कलुषित व सीमित हो जाती है और ज्ञान चेतना के प्रवाह में अवरोध आ जाता है। गुरु, अपने शिष्य के हृदय को खोल देते हैं जिससे शक्ति का प्रवाह ऊपर की तरफ होने लगे और साधक चेतना की उच्च अवस्था में पहुँच जाए। हृदय के खुलते ही सभी पूर्वाग्रह समाप्त हो जाते हैं, पूर्वाग्रह रहित होने पर ही भौतिक एवं आध्यात्मिक जगत्‌ का सत्य रूप समझ व अनुभव में आता है। यह सत्य प्रतीति ही ज्ञान है।
श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति पूर्ण श्रद्धा, निष्काम प्रेम और अटल आस्था से परिपूर्ण होने पर शिष्य में समर्पण की घटना घटती है और तभी सद्‌गुरु व शिष्य के बीच हृदय सेतु स्थापित होता है। इस हृदय सेतु से ही सद्‌गुरु अपने चैतन्य ज्ञान को शिष्य के अंत:करण में प्रवाहित करते हैं। गुरुभक्ति साधना का कुल प्रयोजन इसी सेतु का निर्माण करना है। इस सेतु निर्माण की अवधि शिष्य के उत्साह, साधना की निरन्तरता एवं समर्पण पर आधारित होती है। गुरु-शिष्य के मध्य हृदय सेतु  निर्मित होते ही ज्ञान प्रवाह की क्रिया स्वयमेव ही स्थापित हो जाती है। इसीलिये शिष्य को चाहिये कि वह अपने श्रीसद्‌गुरु महाराज को हृदय में बसाकर, शेष सब तरफ से अपने चित्त हटाकर सद्‌गुरु की सेवा और उनकी प्रसन्नता में ही स्वयं को समर्पित कर दे। ज्ञान की धारा गुरुभक्ति के कुंड से ही निकलती है। सद्‌गुरु की भक्ति ही  ज्ञान प्राप्ति का एक प्रामाणिक उपाय है।  इसी गुरुभक्ति की युक्ति से ही शिष्य विल्वामंगल (सूरदास) ने श्री माधवाचार्यजी से, संत कबीर और संत रैदास ने गुरु रामानंदजी से, मीराबाई ने गुरु श्रीरैदासजी से, सहजोबाई ने गुरु श्रीचरणदासजी से, विवेकानंदजी ने गुरु रामकृष्णजी परमहंस से और संतमत अनुयायी आश्रम श्रीमठ गड़वाघाट के सभी सत्‌-शिष्यों ने पवित्र गुरु-परंपरा से ज्ञान प्राप्त किया है।

०८-०३-२०१७

यथार्थतः ज्ञान का अर्जन नहीं होता, मनुष्य की आत्मा खुद ही ज्ञान स्वरूप है। आत्मा का प्रकाश ही ज्ञान है, इस प्रकाश में अंदर-बाहर के सभी रहस्य वैसे ही खुल जाते हैं जैसे सूर्य के प्रकाश के आते ही सभी वस्तुएँ दिखाई पड़ने लगती हैं। जिस तरह गहरे काले बादलों की ओट में सूर्य का प्रकाश नहीं दिखता है वैसे ही अहंकार रूपी अज्ञानता के आवरण में आत्मा का प्रकाश दिखाई पड़ता है। अज्ञानताओं के इन्हीं आवरणों को गलाने का रसायन है गुरुभक्ति। गुरुभक्ति में भक्त के हृदय से स्रवित गुरुप्रेम, श्रद्धा, समर्पण आदि के प्रभाव से अहंकार रूपी अज्ञानता की परत गल जाती है और आत्मा का प्रकाश स्वयं झलकने लगता है। अहंकार भाव को गलाने वाले इन रसायनों के स्राव हेतु ही श्रीसद्‌गुरु महाराज नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, सुमिरन, पूजा, दर्शन और ध्यान के अभ्यास सिखाते हैं। यही भक्ति साधना है और साध्य भी है। इन भक्ति-साधनों के सधते ही ऊषाकाल में सूर्योदय की भाँति ही जीवन में ज्ञानोदय होता है अन्यथा बिना भक्ति के ज्ञान तो केवल बातों का विषयमात्र है। संत तुलसीदासजी कहते हैं- ज्ञान हो जाने पर भी भक्ति के बिना उसकी शोभा नहीं होती। ज्ञान, वैराग्य, धर्म और कर्म यह सभी भक्ति से ही सुशोभित होते हैं। उनके बिना सब निरर्थक हो जाते हैं। भक्ति के बिना ज्ञान तो उस नौका के समान से भटकती रहती है जिसमें नाविक नहीं होता है। भक्ति ही ज्ञान को दिशा एवं गति प्रदान करती है।
“रामप्रेम बिनु सोह न ज्ञाना। कर्णधार बिनु जिमि जलयाना।।”श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड

०७-०३-२०१७
ज्ञानकोष और ज्ञान-प्रकाश के बीच एक बड़ी दीवार है- अहंकार। अधिकांशतः तथाकथित ज्ञानी अहंकारवश ज्ञानकोष बनकर रह जाते हैं और ज्ञान अनुभव से वंचित ही रहते हैं।जिस तरह पकवान बनाने की विधि की जानकारी से पकवानों अथवा व्यंजनों का स्वाद नहीं मिलता है उसी तरह केवल शास्त्रों के पठन-पाठन से सत्य के संदर्भ में सूचनाओं अथवा जानकारियों का संग्रह तो हो सकता है लेकिन सत्य का बोध अथवा ज्ञानानुभूति नहीं हो सकती है। जीवन में सत्य तत्त्व की अनुभूति तो वही दिला सकता है जो उस तत्त्व के अनुभव को प्राप्त करने का मार्ग जानता हो और इतनी गहराई व सूक्ष्मता से जानता हो कि दूसरों को भी उस मार्ग पर चलाकर सत्य को चखा सकता हो। इस हेतु जिज्ञासु में उन स्वाद इन्द्रियों का भी विकास अनिवार्य है जो सत्य को चखने में समर्थ हों। एक समर्थ सद्‌गुरु ही अपने अनुभव के आधार पर इस कार्य का सफल संपादन कर सकते हैं। इसीलिये सत्य के जिज्ञासु को विनीत एवं याचक भाव से सद्‌गुरु की शरणागति प्राप्त करके ज्ञान प्राप्त करने हेतु प्रार्थना करनी चाहिये। ज्ञान की अनुभूति हेतु इसी युक्ति का समर्थन सर्वत्र प्रतिपादित है।

२८-०२-२०१७

मात्र शारीरिक रूप से की गई सेवा तो परिचर्या तक ही सीमित होती है जबकि सेवाभक्ति तो ऐसी सेवा है जिसके संपन्न होने पर सद्गुरु की प्रसन्नता प्राप्त होने के साथ-साथ भक्त के हृदय में आनंद रस भी स्रवित होता है। जब गुरु की प्रसन्नता के कारण शिष्य में आनंदरस का स्राव होने लगे तो समझो कि भक्ति सिद्ध हो गई। ऐसी भक्ति से ही अन्तरात्मा की शुद्धि और ज्ञान की उत्पत्ति होती है।

 २७-०२-२०१७

समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली गुरुभक्ति की महिमा अगाध है। श्रीसद्गुरु महाराज के श्रीचरणों की सेवा गुरुभक्ति प्राप्त करने का प्राथमिक साधन है। गुरुभक्ति या सद्गुरु सेवा का मार्ग आध्यात्मिक प्रगति का पथ है। श्रीसद्गुरु की निष्काम सेवा से ही शिष्य आध्यात्मिकता के उस उच्च शिखर तक पहुँच जाता है जो अन्य किसी पथों पर चलकर अनेक जन्मों की कठिन साधनाओं के संपन्न होने पर भी दुर्लभ है। भक्ति से ही श्रीसद्गुरु महाराज के परम कल्याणकारी, दिव्य एवं विराट रूप का दर्शन संभव है, भक्तिरहित ज्ञानवान् के लिये यह दर्शन असंभव है। श्रीकृष्णजी अपने शिष्य अर्जुन से इसी रहस्य को कहते हैं
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ श्रीमद्भागवत्गीता, ११/५३-५४
अर्थात्, मेरे दिव्य एवं विराट रूप को न वेदों के अध्ययन से, न तपस्या से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जाना संभव है। केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही मेरा साक्षात् दर्शन किया जा सकता है, वास्तविक स्वरूप को जाना जा सकता है और इसी विधि से मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता है।

२६-०२-२०१७

जीवमात्र के प्रति निष्काम प्रेम से युक्त, प्रपंचगत माया-मोह से मुक्त, सुख-दुख आदि सभी द्वंद्वों के प्रति समत्व बुद्धि रखने वाला, मन व इन्द्रियों को वश में किया हुआ, निरहंकारी, क्षमाशील, शांत, करुणायुक्त, समस्त कर्मों व कर्मफलों को सद्गुरु महाराज के श्रीचरणों में अर्पित करने वाला श्रद्धासमन्वित, अनन्य शरणागति भाव से भरा गुरुभक्त ही ज्ञानी गुरुभक्त है। सच्चा गुरुभक्त अनन्य भाव से सद्गुरु के नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान करता हुआ तन्मयासक्ति पूर्वक आनंदमग्न रहता है। श्रीसद्गुरु महाराज के गुणों का सतत-स्तवन, तन्मयतापूर्वक कीर्तन, सद्गुरुदेव के जीव कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में तन-मन-धन से सहयोग करना ही सच्चे भक्त की जीवनचर्या होती है। गुरुभक्त का सारा जीवन गुरुसेवा का क्षेत्र बन जाता है। निःस्वार्थ भाव से की गई ही भक्ति सच्ची और सार्थक होती है। श्रीसद्गुरु महारज के आदर्शों पर चलने और उनके प्रयाजनों में काम आने पर ही भक्ति वास्तविक कहलाती है।

२५-०२-२०१७

साधक की आध्यात्मिक उन्नति वस्तुतः चित्तशुद्धि पर निर्भर करती है। जितनी मात्रा में साधक की बुद्धि शुद्ध होती जाती है उस पर सांसारिक जीवन का प्रभाव उसी अनुपात में कम होता जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की बताई विधि के अनुसार नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान के अभ्यास से साधक की बुद्धि निःस्वार्थ व निष्कलुष होती जाती है और वह गुणोत्कर्ष करता हुआ अपने लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ता जाता है। श्रीसद्‌गुरु द्वारा दिये गये नाममंत्र के अर्थ सहित मानसिक जाप से शिष्य की प्रज्ञा निखरती है। श्रीसद्‌गुरु द्वारा बतलाये इन भक्ति साधनों के अभ्यास से चित्त सर्वतोभावेन निर्मल होता है, श्रीसद्‌गुरु की कृपा से चित्त में भक्ति भाव उदित होता है और उनके बतलाये मार्ग पर निरंतर चलने से भक्ति भाव का विकास होता है। श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में शरणागति ही भक्ति की पूर्ण सफलता है।

२४-०२-२०१७

श्रीसद्‌गुरु से प्राप्त परानाम में ही परब्रह्म समाया हुआ है। श्रीसद्‌गुरु की बताई हुई विधि से भजन, सुमिरन, ध्यान करने से तथा उनकी सेवा, पूजा में निमग्न रहने से अंतःकरण में परब्रह्म प्रकाशित हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु से प्राप्त नाम ही अक्षर ब्रह्म है। जो इस नाम को जान लेता है, उसे ग्रहण कर लेता है वह भौतिक, आध्यात्मिक जिस किसी वस्तु की इच्छा करता है, उसे प्राप्त कर लेता है।
 

२३-०२-२०१७

निर्गुण एवं सगुण तत्त्व की अवधारणा कुछ हद तक चुंबक और चुंबकत्व के उदाहरण से स्पष्ट हो सकती है। जैसे लोहे के टुकड़े में चुंबकत्व शक्ति होने पर उसमें चुंबकीय गुण आ जाता है, इसीलिये उसे चुंबक कहा जाता है। चुंबकत्व शक्ति का अस्तित्व होने पर भी भौतिक चक्षुओं से उसे देखा नहीं जा सकता है अतः वह निराकार है लेकिन उसका प्रभाव ही चुंबक के रूप में साकार है। इसी प्रकार गुरुतत्त्व एक निराकार शक्ति है जो सद्‌गुरु के रूप में साकार है। जैसे आकाश का ओर-छोर न देख पाने के कारण उसे निराकार कह दिया गया वैसे ही परमात्म-तत्त्व आकार में अनंत सूक्ष्म एवं अनंत विराट होने के कारण दृष्टि, बुद्धि, विचार एवं अनुमान की सीमा से परे है, इसीलिये उसे निराकार की संज्ञा दे दी गई। दृष्य-जगत्‌ में कोई तुलना न मिलने पर परमात्म-तत्त्व को निराकार का संबोधन मिला। वस्तुतः निर्गुण निराकार परब्रह्म ही सगुण साकार सद्‌गुरु में व्यक्त है अतः निर्गुण व सगुण में कुछ भेद  नहीं है।

२२-०२-२०१७

जीवों के कल्याणार्थ ही श्रीसद्‌गुरुदेव अपनी लीलाशक्ति से परम मनोहर दिव्य रूप में प्रगट होते हैं। जैसे छोटे बच्चों के उपचार के लिये चिकित्सक औषधि को शर्करा में लपेटकर खिलाता है, वैसे ही मनोहर शब्द, स्पर्श, रूप, रस गन्धादि विषयों में आसक्तचित प्राणियों के मन को अपने निर्गुण, निराकार एवं सर्वव्यापक रूप निजस्वरूप से जोड़ने के लिये सर्वभाँति दिव्यता सम्पन्न देह धारण करते हैं। अपनी अचिन्त्य लीलाशक्ति के योग से अनामी एवं अरूपी श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ ही दिव्य नामरूप रूप में प्रकट होते हैं। सकल माधुर्य एवं सौन्दर्य से युक्त श्रीसद्‌गुरु के देहावतार में चित्त के आसक्त होने के अनन्तर यही निर्गुण, निराकार एवं सर्वव्यापी परम तत्त्व सुस्पष्ट रूप में व्यक्त हो जाता है।


२१-०२-२०१७

मात्र ज्ञानबुद्धि के सहारे भवसागर को पार करना तैरकर जाने के समान है, इसमें अनंत श्रम है, साधक के सीमित जीवनकाल और सीमित सामर्थ्य के कारण असफलता की संभावना बहुत अधिक है। जबकि प्रेमभक्ति तो ऐसी नैया है कि उसके खेवनहार श्रीसद्‌गुरु की कृपा से भक्त का भवपार होना निश्चित ही होता है। प्रेमी गुरुभक्त तो सद्‌गुरुदेव के दिव्य चरण-कमल के अवलम्बन से अनायास ही भवसागर को तर जाता है। प्रेमीभक्त की आध्यात्मिक यात्रा इतनी सुहानी होती है कि वह सद्‌गुरु के प्रेम में डूबकर भवपार करने की लालसा को भी तिलांजलि दे देता है। प्रेमी शिष्य केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज के चरणों की भक्ति की ही चाह रखता है अथवा ऐसा कहना अधिक उचित होगा कि सद्‌गुरु की प्रेमभक्ति से भवसागर सूख जाता है।

२०-०२-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन एवं ध्यान की समग्र साधना गुरुभक्ति है किन्तु इनमें भी सेवा को ही भक्ति का प्रधान का अवयव माना गया है। यह सेवा केवल शारीरिक रूप से ही नहीं अपितु मन, इन्द्रियों और प्रेमभावों से युक्त निष्काम सेवा है। यही सच्ची सेवा अथवा पराभक्ति कहलाती है। ऐसी भक्ति से न केवल ब्रह्मबोध होता है अपितु शिष्य का अपने सद्‌गुरु से एकाकार हो जाता है।


१९-०२-२०१७

जब शिष्य करुण और विनीत भाव से सद्‌गुरु महाराज को पुकारता है तो सद्‌गुरु स्वयं उससे मिलने की युक्ति बिठाकर उसे दर्शन देते हैं। मुक्ति प्रदाता, स्वयं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मसरूप श्रीसद्‌गुरुदेव अपने प्रेमी शिष्य की हर अभिलाषा पूरी करने को सदा तत्पर रहते हैं। सद्‌गुरु सम्मिलन की उत्कट कामना में व्याकुल शिष्य निश्चित ही सद्‌गुरु भगवान्‌ को प्राप्त करता है।  प्रेम के उत्कट हो जाने पर तत्क्षण सद्‌गुरु दर्शन देते हैं। भक्त और भगवान्‌ का रिश्ता ऐसा ही होता है। सद्‌गुरु अपने शिष्य के प्रेमी में इतने आभारी होते हैं कि उसकी झोली में स्वयं को ही डाल देने पर भी उनके देने की लालसा चुकती नहीं है। संपूर्ण सृष्टि के स्वामी श्रीसद्‌गुरुदेव तो अपने शिष्य के प्रेम में पराधीन होते हैं। सद्‌गुरु स्वामीजी के हृदय भाव अपने शिष्य प्रेम के लिये कुछ ऐसे होते है-
 प्रेमी के तो कर बिकूँ, यह तो मेरा असूल।
चार मुक्ति दूँ ब्याज में, देय सकहुं नहिं मूल।।
अर्थात्‌ मैं प्रेमी के हाथ में तो बिका ही रहता हूँ। चारों प्रकार की मुक्तियाँ (सायुज्य,सामीप्य, सालोक्य और सारूप्य) ब्याज के रूप में उसकी झोली में डाल देने पर भी उसके प्रेम रूपी मूलधन को नहीं चुका सकता।
भक्तवत्सल सद्‌गुरु अपने सम्पूर्ण ज्ञान, अनन्त सामर्थ्य और अतिशय प्रेम लिए प्रति पल अपने शिष्य के साथ होते हैं। शिष्य के हृदय के तार सद्‌गुरु परमात्मा से जुड़ते ही उनकी सम्पूर्ण शक्ति शिष्य के कवच के रूप प्रकट हो जाती है। सद्‌गुरु भगवान्‌ अपनी अनन्त शक्ति और अपरिसीम प्रेम से शिष्य का पोषण करते रहते हैं।

१८-०२-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज की निष्काम सेवा की कसौटी पर खरा उतरने के लिये उनकी  सेवा में अपने-आप को मिटा देना चाहिये। जो जीव इस कसौटी में सफल होते हैं वे फिर जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते। मात्र अपने गुणों और सामर्थ्य के बलबूते पर मालिक के रूप में लीनता संभव नहीं है अपितु जिन जीवों पर सन्त सद्गुरु की विशेष दया और कृपा होती है उन्हीं की कमाई फलवती सिद्ध होती है। वे ही जीव निजधाम में पहुँच सकते हैं। जीव को सन्त सद्गुरु की दया व कृपा प्राप्त करने की अर्हता सद्गुरु की निष्काम सेवा से ही प्राप्त होती है। जीवों को निष्काम सेवा रूपी मुक्तिमार्ग में चलाना ही उनकी सबसे बड़ी कृपा और अनुकम्पा है। जिस सेवक पर यह कृपा उतरती है उसका कल्याण होने में कोई सन्देह नहीं।

१७-०२-२०१७

समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली गुरुभक्ति की महिमा अगाध है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों की सेवा गुरुभक्ति प्राप्त करने का प्राथमिक साधन है। गुरुभक्ति या सद्गुरु सेवा का मार्ग आध्यात्मिक प्रगति का पथ है। श्रीसद्‌गुरु की निष्काम सेवा से ही शिष्य आध्यात्मिकता के उस उच्च शिखर तक पहुँच जाता है जो अन्य किसी पथों पर चलकर अनेक जन्मों की कठिन साधनाओं के संपन्न होने पर भी दुर्लभ है। गुरुभक्ति जीव का काया-कल्प का मार्ग है। अज्ञान अवस्था में अपने मूल स्वरूप को भूला जीव सद्‌गुरु महाराज की भक्ति द्वारा अपने मूल स्वरूप को प्राप्त करता है, यही आत्मिक उन्नति है, यही आत्मिक उत्कर्ष है। सन्त सद्गुरु की सेवा-भक्ति औरउनके प्रति प्रेम ही आत्मिक उत्कर्ष के साधन हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज ही अपने आध्यात्मिक अनुभवों का सूत्रपात कर भक्ति मार्ग सुनिश्चित करते हैं जिस पर चलकर जीव को निज-स्वरूप और सच्चिदानन्द परमात्मा का बोध होता है। लौकिक मंत्र-तंत्र का उपदेश देने वाले तो अनेक होते हैं लेकिन जो शिष्य को जीवन के परम सत्य का बोध कराते हैं‍ वे ही सच्चे सद्‌गुरु होते हैं।

१६-०२-२०१७

अपने इष्ट श्रीसद्‌गुरुदेव के प्रति अनन्य एवं अखण्ड प्रेम ही भक्ति है। काया, वाणी व मन से गुरु की सेवा में रत रहना, गुरु की हर इच्छा की पूर्ति हेतु आतुर हो जाना, दिन-रात उनकी स्मृति में मग्न रहना, नाम सुमिरन की सतत धार को अक्षुण्ण बनाये रखना ही भगवत्‌ प्रेम का पुष्ट आहार है।
१५-०२-२०१७

गुरुशक्ति तत्त्वतः निराकार है लेकिन जीवों को भव से मुक्त करने के लिये यही गुरुशक्ति देह वरण कर श्रीसद्‌गुरुदेव के रूप में अवतरित होती है। श्रीसद्‌गुरुदेव भव के तापों से संतप्त जीवों को भक्ति रूपी शीतल मधुमयी छाया प्रदान करते हैं और अपने शिष्यों को भक्ति-गंगा में अवगाहन करवा कर उनके मूल-स्वरूप का साक्षात्कार करवाते हैं। इसीलिये भक्तिमार्ग की साधना में श्रीसद्‌गुरुदेव के प्रति भक्ति को जो उच्चतम प्रशंसा मिली है, उपनिषद्‌ भी उसका ही समर्थन करते हैं-
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥ श्वेताश्वतर उपनिषद्‌ , ६/२३
अर्थात्‌ जिस परम भक्ति के भाव से परमेश्वर की भक्ति की जाती है, वैसी ही भक्ति जिस साधक में सद्‌गुरु के प्रति होती है, ऐसे महात्मा-मनस्वी पुरुष के हृदय में ही सद्‌गुरु द्वारा कहे गये आध्यात्मिक रहस्यों के अर्थ प्रकाशित होते हैं।

१४-०२-२०१७

गुरुदर्शन ही शिष्य की परम जिज्ञासा होती है। शिष्य सदा इसी भावना से प्रार्थना करता है कि हे मालिक! मैं कब पवित्र और एकाग्र मन वाला होकर आपके सत्य, आनंदमय स्वरूप का साक्षात्‌ दर्शन करूँगा। मैं कब आपके अनन्त आनंदमयी रूप में अंतर्भूत- तदात्मभूत हो पाऊँगा? हे स्वामीजी! आपके पावन अनुग्रह से ही मेरी यह अभिलाषा पूर्ण हो सकती है, अतः मैं आपसे ही भक्तिमयी प्रार्थना करता हूँ।


१३-०२-२०१७

सच्चा गुरुभक्त अपने सद्‌गुरु की आज्ञा पालन करने में तत्पर एवं समर्पित  होता है, उसे अपने सद्‌गुरु से अधिक प्रिय और कोई नहीं होता, उसका जीवन एवं उसके समस्त क्रियाकलाप सद्‌गुरु को ही समर्पित होते हैं। जो साधक एक श्रीसद्‌गुरुदेव को छोड़कर तरह-तरह के देवी-देवताओं में चित्त रमाता है उसका मन भ्रम और भटकाव में फँस जाता है। इसके विपरीत जो शिष्य अपने श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति अपने प्राणों की आहुति लगाने के लिए भी तैयार है, श्रीसद्‌गुरु ही जिसके सर्वस्व होते हैं, उसे ही 'सद्‌गुरु प्रणिधान' कहते हैं। सद्‌गुरु प्रणिधान का अर्थ है स्वयं को सद्‌गुरु परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देना। श्रीसद्‌गुरु को ही अपना स्वामी, माता-पिता, सर्वस्व मानकर, अपनी समस्त इच्छाओं का त्याग कर, सदैव श्रीसद्‌गुरुदेव की आज्ञा का पालन करना एवं स्वयं को उनके अधीन मानना, सद्‌गुरु से प्रेम करना एवं भक्तिपूर्वक उनका गुणगान करना, यही शरणागति है। समस्त आध्यात्मिक साधनों में सद्‌गुरु-शरणागति ही एक ऐसा सशक्त साधन है कि इसके आचरण मात्र से ही परमात्मबोध हो जाता है। गुरु सदा ही ऐसे शरणागत भक्त के साथ होते हैं।

१२-०२-२०१७

‍गुरु बनाने मात्र से मनुष्य का विवेक नहीं जागता है। विवेक जागरण के लिये सद्‌गुरु का सत्संग आवश्यक है, सद्‌गुरु के बतलाये मार्ग का अनुसरण आवश्यक है, हर घड़ी उनकी शरणागति आवश्यक है। गुरु उपदेश, गुरुमहिमा आदि श्रवण का सतत अभ्यास करने से शिष्य के मन में विवेक उत्पन्न होने लगता है। तब वह सत्य-असत्य, नित्य-अनित्य का मनन करने लगता है, इससे ही विवेक-बुद्धि जाग्रत होती है। सद्‌गुरु की श्रीवाणी से निकले उपदेश पर आचरण से ही अंत:करण शुद्ध होता है और शुद्ध अंतःकरण से गुरुभक्ति करने पर ही जीव उद्धार होता है। सत्संग से मनुष्य का स्वभाव परिवर्तित हो जाता है। सत्संग से ही मनुष्य का भक्त के रूप में नया जन्म होता है। जीवन में सद्‌गुरु  की भक्ति और उनके प्रति प्रेम बढ़ाने के लिए सद्‌गुरु के कल्याणकारी वचनों को श्रद्धा एवं प्रेम से सुनना ही सत्संग है। आध्यात्मिक उन्नति सत्संग से ही होती है। निष्काम कर्म और उपासना से अंतःकरण शुद्ध होता है और गुरुकृपा मिलती है। सद्‌गुरु के उपदेश को जीवन में उतारने से उनकी कृपा आत्मसात्‌ होती है। श्रीसद्‌गुरुदेव की सेवा सच्चे प्रेम व बिना किसी स्वार्थ के साथ करनी चाहिए।

११-०२-२०१७

उपदेश श्रवण  के द्वारा श्रीसद्‌गुरुदेव शिष्य के हृदय में प्रवेश करते है इसलिए श्रवण भक्ति को श्रुति मार्ग भी कहते है। श्रुति द्वारा श्रीसद्‌गुरु महाराज का प्रेम स्वरूप एवं  ज्ञान स्वरूप दोनों ही ग्राह्य है। श्रीसद्‌गुरु के वचनों के श्रवण करने से हृदय पवित्र एवं निर्मल हो जाता है। जहाँ प्रेम होता है वहाँ रस होता है, जहाँ चिंतन होता है वहाँ ज्ञान होता है। प्रेमभाव सहित सद्‌गुरु के उपदेशों का निरंतर चिन्तन एवं मनन करने से श्रावक शिष्य प्रेम व ज्ञान दोनों से आप्लावित हो जाता है। गुरुप्रेमी भक्तों द्वारा श्रीसद्‌गुरु भगवान् के नाम,रूप ,गुण, प्रभाव, लीला, तत्त्व और रहस्य की अमृतमयी कथाओं का श्रद्धा और प्रेमपूर्वक श्रवण करना एवं उनमें मुग्ध हो जाना ही श्रवण भक्ति का स्वरूप है। श्रीसद्‌गुरु महाराज को साष्टांग प्रणाम कर उन्हें अपनी निष्काम सेवा द्वारा प्रसान्न कर निष्कपट भाव से अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिये उनसे याचना करना एवं उनके बतलाये मार्ग में निरंतर चलते रहने की तत्परता ही श्रवण भक्ति प्राप्त करने की विधि है। श्रीकृष्णजी भी अर्जुन को आत्मज्ञान प्राप्त करने की यही विधि बतलाते हुए कहते हैं कि-
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ॥ श्रीमद्‌भागवद्गीता, ४/३४
अर्थात्‌, तत्त्व-ज्ञान को तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषों के पास जाकर समझ उनको साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और सरलता-पूर्वक प्रश्न करने से वे तत्त्वदर्शी अनुभवी ज्ञानी, शास्त्रज्ञ महापुरुष तुझे उस तत्त्व-ज्ञान का उपदेश देंगे।
श्रवण भक्ति अतिदुर्लभ है और केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज के सत्संग से ही प्राप्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है-
 बिनु सत्संग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग ।
मोह गएँ बिनु राम पद होई न दृढ़ अनुराग ॥ (रा०च०मा० ७|६१)
अर्थात्‌, सत्संग के बिना हरिकथा नहीं मिलती और बिना हरिकथा के मोह यानी अज्ञान का नाश नहीं होता तथा अज्ञान के नाश हुए बिना हरि में अनुराग अर्थात्‌ दृढ़ प्रेम नहीं होता।


१०-०२-२०१७

आध्यात्मिक संदर्भ में श्रवण का अर्थ है सद्‌गुरु के उपदेशों, गुरुमहिमा, गुरुभक्ति विषयक चर्चाओं को सुनकर अपने जीवन को गुरु के अनुकूल ढालना। गुरुभक्ति-योग साधना के पहले क्रम दीक्षा में गुरु अपने शिष्य का शुद्धिकरण करते हैं, और शिष्य को भक्ति मार्ग में प्रेरित करने के लिये गुरुभक्ति की साधना का उपदेश करते हैं। सद्‌गुरु द्वारा दी जाने वाली दीक्षा का उद्देश्य यही है कि शिष्य को गुरुभक्ति के गूढ़ रहस्यों को समझने के योग्य बनाना। शिष्य अपने गुरु के अमृतवचनों को सुन-सुनकर सांसारिक मोह व आकर्षणों से दूर हटता जाता है और उसका हृदय निर्मल होता जाता है। सद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों में शरण प्राप्ति को लक्ष्य बनाकर अन्य समस्त सांसारिक इच्छाओं, भावों, विचारों का पूर्ण रूप से त्याग  करके, सद्‌गुरुदेव के प्रति पूर्ण भक्ति व आस्था रखकर उनके सत्संग में अपनी भक्ति जिज्ञासाओं का समाधान करना ही श्रवण भक्ति हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों में प्रेम उत्पन्न हो जाये यही श्रवण का लक्ष्य है।  श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति हृदय में प्रेम उत्पन्न होने पर सभी सांसारिक राग स्वयं गल जाते हैं। श्रवण एक सूक्ष्म साधना है जिसमें शांत मन व एकाग्र चित्त से गुरु के वचनों को हृदय तक उतारना होता है। इस श्रवण साधना से ही अपने मूल स्वरूप आत्मा व परमात्मा सम्बन्धी तत्त्व रहस्य का पता लगता है। श्रीसद्‌गुरुदेव ही मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं और योग साधना में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं।


०९-०२-२०१७

भक्ति कोई कोरी उपासना नहीं अपितु  श्रद्धा, प्रेम व उन्मेष से परिपूर्ण अवस्था है। भक्ति एक ऐसी अवस्था है कि भक्त को न केवल सद्‌गुरु महाराज के वचनों से प्रेम होता है बल्कि सद्‌गुरु परमात्मा के नाम, गुण, चरित्र आदि के श्रवण में भी उसके हृदय में आनंदरस का प्रवाह होने लगता है। ऐसे में भक्त श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाम-गुण-कथा में इस कदर डूब जाता है कि वह सदा इसी आनंद को चखना चाहता है। भक्ति श्रीसद्‌गुरुदेव के माहात्म्य श्रवण और उससे उत्पन्न ज्ञान का परिणाम होती है। यही भक्ति जब और उत्कर्ष को प्राप्त होती है तब भगवद्विषयक ज्ञान और प्रखर होता है।

०८-०२०२०१७

जो सद्‌गुरु महाराज को छोड़कर और कुछ नहीं जानता वह श्वास-प्रश्वास के साथ श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाम को सुमिरता रहता है। जप करने का अर्थ है निर्जन में निःशब्द सद्‌गुरु का नाम लेना। सदैव ही मनन एवं स्मरण करते रहना उचित है। जप करने से सद्‌गुरु और उनकी भक्ति का लाभ होता है। सद्‌गुरुदेव के नाम-सुमिरन में सदा रुचि रखनी चाहिये। सद्‌गुरु और नाम दोनों एक ही हैं। नाम और नामी दोनों में अभेद जानकर सर्वदा प्रेमपूर्वक उनाका नाम ले-लेकर पुकारना चाहिये। जो सद्‌गुरु, वही नाम, दोनों भिन्न नहीं है। यदि सुमिरन और नामजप करते हुए दिन-दिन अनुराग बढ़े, आनंद मिलता चला जाय तो कोई भय नहीं सभी विकार कटकर रहेंगे, सब कुछ के बाद सद्‌गुरु की कृपादृष्टि होकर रहेगी।
०७-०२-२०१७

गुरुभक्ति रूपी वेदी में शिष्य को शरीर, हृदय, बुद्धि तीनों को समर्पित करना अनिवार्य है। यह समर्पण पूरे श्रद्धा से होना चाहिये अन्यथा  श्रद्धा के बिना समर्पण अधूरा ही रहता है। संपूर्ण समर्पण वही है जिसमें स्वयं काम प्रत्येक प्रिय वस्तु का, सभी गुण-दोषों का, अपनी सभी कमियों एवं विशिष्टताओं का सद्‌गुरु के प्रति सर्वत्मना सर्वांगीण हो। ऐसा समर्पण ही आत्मोत्सर्ग का विशुद्धतम रूप है।

०६-०२-२०१७

जब श्रीसद्‌गुरुदेव अपने प्रिय शिष्य की सेवा-भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं तब उस पर अपनी कृपा की शीतल वृष्टि कर परमात्मा के सत्यज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं। परम आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न समर्थ सद्‌गुरुदेव के स्मरण मात्र से ज्ञान स्वतः उत्पन्न हो जाता है अतः उन परमात्मा श्रीसद्‌गुरुदेव की पूजा, उपासना तथा सच्ची सेवा से असंभव भी संभव हो जाता है।

०५-०२-२०१७

सद्‌गुरु की कृपादृष्टि का पात्र बनने के लिये सेवक को अहम्‌ भाव से मुक्त होकर अत्यंत नम्र, दीन और गुरु-दरबार का हर प्रकार से हितैषी बनकर अनन्य और निष्छल भाव से तन-मन-धन से सेवारत रहना चाहिये। गुरु-निर्देशित विधि से भक्ति-साधना करते हुए, गुरु आज्ञा का सतत पालन करते हुए उनकी मौज के अनुसार चलने से ही जीवन सफल और सार्थक होता है। यही गुरुमुखता है।
 
०४-०१२-२०१७

शिष्य के यौगिक चक्रों को बेधकर उसके अज्ञानरूपी पाप को छिन्न-भिन्न  करके ज्ञान का बोध कराने वाले श्रीसद्‌गुरु महाराज ही हैं। श्रीसद्‌गुरुदेव ही सुषुप्त शक्तियों को अपनी कृपा शक्ति से  नामजप, भजन, सुमिरन कराकर शिष्य को शक्ति युक्त बनाते हैं। शिष्य के अंदर में होने वाले भजन, सुमिरन व ध्यान की प्रक्रिया को खोलना श्रीसद्‌गुरु कृपा का अभीष्ट है।

०३-०२-२०१७

देहधारी समय के सद्‌गुरु ही पूर्णब्रह्म हैं। वही शिष्य की आत्मा के पूर्ण जाग्रत स्वरूप हैं। वही प्रत्येक जीव के अंदर रमने वाले राम हैं। तत्त्वज्ञानी सन्त सद्‌गुरु ही परमात्मा के सगुण रूप हैं। यह सत्य सभी प्रकार से प्रमाणित है। इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है।

०२-०२-२०१७

सगुण परमात्मा श्रीसद्‌गुरुदेव की साधना अत्यंत सरल और सुगम है। विनम्र सेवा द्वारा सद्‌गुरु को संतुष्ट करके उनसे दीक्षा प्राप्त करना, उनके द्वारा प्रदत्त महामंत्र ’नाम’ का श्वास-प्रश्वास में जप करना, भ्रूमध्य में उनके रूप का ध्यान करना, उनकी आज्ञा का बिना संशय पालन करना, सौभाग्य से यदि सुलभ हो तो उन परमात्मा की देह की सेवा करना, नहीं तो अन्दर में तो अवश्य ही उनकी सेवा मान्स पूजा के रूप में करना, यही संक्षेप में सन्त साधना का स्वरूप है।

०१-०२-२०१७

श्रीसदगुरुदेव से श्रद्धापूर्वक उपदेश के ’श्रवण’ के बाद ही ’मनन’ आदि साधना या अभ्यास का श्रीगणेश सम्भव होता है तथा मनुष्य के सभी मनोरथ सिद्ध होने का द्वार खुल जाता है। श्रीसद्‌गुरु ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं अतः प्रत्यक्ष ब्रह्म की शरण प्राप्त हो जाने के बाद भला किस लौकिक-अलौकिक कामना का पूर्ण होना शेष रह जायेगा!

३१-०१-२०१७

संसार के अनेक बुद्धिमान्‌ लोग भी इस भ्रम का शिकार हैं कि पवित्र जीवन व्यतीत करना और सच्चे दिल से अपने सांसारिक कर्तव्यों को पूर्ण करना ही सबसे उत्तम धर्म या जीवन की मुक्ति है। वे भूल जाते हैं कि सदाचार या कर्तव्यपरायणता जीवन का मुख्य उद्देश्य नहीं है, मुख्य उद्देश्य तो सद्‌गुरु-प्राप्ति है, शेष सभी तो उसी उद्देश्य की पूर्ति में आंशिक रूप से सहायक मात्र हैं। जीवन का परम लक्ष्य तो सद्‌गुरु के नाम के सुमिरन की साधना द्वारा गुरु से मिलाप करना है जिससे जीव पूर्णता प्राप्त करके सदा के लिये आवागमन के बन्धनों से मुक्त हो सके। मनुष्य का जन्म प्रभु की भक्ति के लिये ही हुआ है इसलिये इस परम कर्तव्य को त्यागकर शेष हर प्रकार के कर्तव्य पूरे करते रहने से मनुष्य को सच्चिदानंद की प्राप्ति नहीं हो सकती है। सच्चिदानंद की अनुभूति तो श्रीसद्‌गुरुदेव की शरण में ही होती है।

३०-०१-२०१७

अज्ञान की गाँठ खुल जाना ही मोक्ष है। स्वरूप-शक्ति का अपनी वास्तविकता में अभिव्यक्त हो जाना मोक्ष है। गलतफहमी बन्धन है, असलियत का बोध हो जाना मोक्ष है। श्रीसद्‌गुरु अविद्या की गाँठ को खोलकर जीव में शिवभाव के अभिव्यक्ति कर देते हैं।

२९-०१-२०१७

यदि किसी अवरोधवश श्रीसद्‌गुरुदेव स्वामी के रूप का ध्यान न आये तो भी श्री गुरुमहाराज के नाम का सुमिरन निरन्तर करते रहना चाहिये। गुरु के नाम के सुमिरन से मन व प्राण पवित्र हो जाते हैं। इस प्रकार भी सतत अभ्यास करने से श्री गुरुमहाराज के के परमपावन चरण-कमलों में अनन्य-प्रेम उत्पन्न हो जाता है। नाम-जप या सुमिरन की सहज विधि यही है कि अपने श्वास-प्रश्वास के आने-जाने की ओर ध्यान रखकर श्वास-प्रश्वास के साथ ही साथ अपने आराध्य श्रीसद्‌गुरुदेव के नाम का स्मरण और जप करता रहे। यह साधना सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते सब समय की जा सकती है। अभ्यास दृढ़ हो जाने पर चित्त निरंतर श्री गुरुमहाराज के चिन्तन में अपने-आप ही लग जायेगा। यही सर्वमान्य श्रेष्ठ साधना है।

२८-०१-२०१७

परमतीर्थ श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा प्रदत्त उन्हीं का शब्दरूप ’नाम’ ही सच्चा तीर्थ है। इस तीर्थ में स्नान करने से सभी कलुष और विकार नष्ट होते हैं। यह ’शब्द’ निर्मल है। इसमें किसी प्रकार का भी विक्षेप असंभव है। यह परम शुद्ध तीर्थ है। इसी शब्दतीर्थ से सद्‌गुरुदेव रूपी परमतीर्थ तक की यात्रा पूरी होती है।

 

२७-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु चिन्तामणि हैं, साक्षात्‌ कल्पतरु हैं, जिसने उन्हें पा लिया उसके मन की सभी चिन्तायें शान्त हो गईं। जीवन में निरंतर जो संकल्प-विकल्प चलते रहते हैं वे सभी गुरु की छत्रछाया में उनकी कृपा से शांत हो जाते हैं। श्रीसद्‌गुरु वह चन्दन-तरु हैं, जिसमें भागवत सुगन्ध भरी हुई है अतः इसे पाकर  चारों वर्ण की वासनागंध मिट जाती है।

२६-०१-२०१७

जिस भाग्यशाली को सद्‌गुरु की कृपा से उनकी पूजा, अर्चना, ध्यान-सुमिरन और सेवा का अवसर सुलभ हो जाता है उसका परम कल्याण होना सुनिश्चित है, साथ ही साथ सभी देवता उसकी सेवा में बिना माँगे, बिना निवेदन किए सब कुछ देने के लिये हर समय तत्पर रहते हैं। "एकै साधे सब सधै  सब साधै सब जाय" अनेक की पूजा से कुछ नहीं मिलता, एक सद्‌गुरु की सेवा से ही सब कुछ सुलभ हो जाता है।

 

२५-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु की भक्ति से साधक को सब कुछ सहज सुलभ हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु के प्रेम की छाँव में रहने वाला शिष्य जीवन की सभी विघ्न-बाधाओं से सुरक्षित रहता है।

२२-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेवजी महाराज जिस नाम का उपदेश देते हैं उस नाम का अमल (अभ्यास) करने से वह कल्पलता के समान फलदायी हो जाता है और लौकिक-पारलौकिक सारी कामनाओं की पूर्ति करता है।

 

२१-०१-२०१७

सद्‌गुरुदेव  के भजन से लौकिक-पारलौकिक सभी प्रकार के दुःख दूर होते हैं। हमारे भीतर भी जो विषय-विकार रूपी राक्षस निरंतर उपद्रव मचाये रहते हैं उनको गुरुकृपा से ही वश में किया जा सकता है और कोई उपाय नहीं है।

२०-०१-२०१७

जिस आत्मज्ञान के द्वारा जीव ब्रह्मरूप हो जाता है, वह ज्ञान गुरुकृपा से ही प्राप्त होता है। गुरुकृपा-निक्षेप ही वह ज्ञान है। यह गुरुकृपा रूपी ज्ञान गुरु के सान्निध्य में उनकी शरण में रहकर पूर्ण निष्ठा और प्रेम के साथ उनकी सेवा करने से ही प्राप्त होता है।

१९-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज की सेवा से असाध्य कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं, इस बात की परीक्षा लौकिक मनोरथों को सफल करने में ही कर लेनी चाहिये। इसके बाद जब विश्वास जम जाये तो पक्के विश्वास के साथ नाम-भजन एवं गुरुसेवा द्वारा परमार्थ का साधन करना चाहिये।

१८-०१-२०१७

सद्‌गुरुदेव दीन-दुखियों के परम हितैषी होते हैं तथा बड़े से बड़ा अपराधी या पापी भी यदि शरणागत हो जाये तो वे उसे क्षमा कर देते हैं क्योंकि उनमें असीम करुणा होती है। बिना माँगे भी वे अपने सेवक के मनोरथ सफल करते रहते हैं, माँग लेने पर तो कहना ही क्या है!

 

 १७-०१-२०१७

सत्संग का मतलब है श्रीसद्‌गुरु महाराज का संग और उनकी सेवा करना। श्रीसद्‌गुरुदेव के वचनों को मन व चित्त से सुनना और समझना, उनकी बानी को तवज्जह के साथ मनन करना, उनके चरणों में प्रेम अथवा वास पाने की चाह से प्रेरित होकर श्रद्धा और सद्‌भाव से काम करना। यह सब तो बाहरी सत्संग है, पर उनके उपदेश के अनुसार मन और चित्त लगाकर सुरत को ऊँचे मुकामों पर चढ़ाने का अभ्यास करना, यह सब भीतरी सत्संग है।

१६-०१-२०१७

जब तक विरहाग्नि हृदय में न जगे और प्रियतम की दर्शनेच्छा की उत्कट लालसा न हो, तब तक साध्य की सिद्धि नहीं होगी। यदि शिष्य भक्ति व प्रेमपूर्वक श्रीगुरु के चरण कमलों को पकड़ लेता है तो वह कितना ही पंगु क्यों न हो, परमपद के दुर्गम पथ पर सुगमता के साथ चलकर दर्शन पा ही लेता है।

१५-०१-२०१७

गुरु के प्रति शिष्य के मन में अडिग आस्था व समर्पण पूर्ण ज्ञान प्राप्ति का आधार है। सामान्य मानव बुद्धि एवं अनुभवों के आधार पर गुरु को समझने अथवा उनके क्रिया-कलापों की समीक्षा का प्रयास करना शिष्य जीवन की सबसे बड़ी भूल होती है। तर्क अथवा बुद्धि द्वारा गुरु को नहीं समझा जा सकता है। गुरु-महिमा को समझने के लिये अपने हृदय के कपाटों को खोलकर गुरु को हृदय में बिठाने की जरूरत होती है। गुरु को तत्त्व से अर्थात्‌ गुरु-तत्त्व को समझने के लिये श्रद्धा, आस्था एवं समर्पण द्वारा निरहंकारिता की अवस्था प्राप्त करना आवश्यक है। श्रद्धा, आस्था एवं समर्पण द्वारा ही शिष्य अपनी तर्क-बुद्धि को गलाता है, अपने सभी पूर्वाग्रह समाप्त करता है।

१४-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति परमात्मभाव रखना ही ज्ञान व भक्ति प्राप्त करने की कुंजी है। गुरुमंत्र का जप, भजन, श्रीसद्‌गुरुदेव का सतत स्मरण, गुरुसेवा, गुरुपूजा, गुरुदर्शन व सद्‌गुरु स्वामीजी के स्वरूप के ध्यान से आत्मबोध होता है।

१३-०१-२०१७

साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जैसे-जैसे साधना प्रगाढ़ होती है, वैसे-वैसे साधक के मन में अबोधता के भाव भी प्रगाढ़ होने लगते हैं। ऐसे साधक अपने सद्गुरु से सदैव यही याचना करते हैं कि हे मालिक! साधना जगत् में मैं एकदम शून्य हूँ। मैं तो केवल मालिक की दया के बल पर ही जीता हूँ। मुझमें तो तपस्या करने का सामर्थ्य भी नहीं है। मुझमें तो आपके ज्ञान को समझने की शक्ति भी नहीं है। हे मालिक! आप मुझे किसी तरह अपनी सेवा में लगाये रहें, मुझे सदा अपने सत्संग में ही रखें। हे श्रीसद्गुरु महाराज! मेरी भक्ति की परीक्षा भी न लें क्योंकि उसमें मेरा अनुत्तीर्ण होना निश्चित है। आप तो मुझे केवल अपनी आज्ञा के आधीन ही रखें। मुझे आपकी चरणधूलि सदा प्राप्त होती रहे। आपकी सान्निध्यता से मैं सदा सुवासित रहूँ। यदि आपकी दया हो जायेगी तो मेरा मन मालिक में लग जायेगा और तभी मेरा कल्याण होगा।

१२-०१-२०१७

जिनके अन्तःकरण में शिष्यत्व का भाव-बीज अंकुरित हो रहा है अथवा जिन भक्तों व शिष्यों के अन्तस् में श्रीसद्गुरु के भजन-भक्ति की शक्ति अवस्थित है, वे ही श्रीसद्गुरु के नाम-बीज के भजन-भक्ति की शक्ति की यथार्थता को जानते हैं। जैसे जमीन में दबा हुआ बीज मौसम आने पर अंकुरित हुये बिना नहीं रहता है, चाहे यह कितना ही कोमल या नाजुक हो फिर भी जमीन से निकलकर खुली हवा और सूर्य के प्रकाश में अपने अस्तित्व को साकार करता है। वैसे ही सद्‌गुरु से प्राप्त नाममंत्र रूपी बीज में गुरुभक्ति के पुष्प अवश्य ही खिलते हैं।

११-०१-२०१७

जिनके हृदय में श्रीसद्‌गुरु की भक्ति निवास करती है वे निर्धन होने पर भी धन्य हैं क्योंकि गुरुभक्ति की डोर में बँधकर साक्षात्‌ भगवान्‌ भी अपना धाम छोड़कर भक्तों के हृदय में बस जाते हैं।

१०-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेवजी महाराज का आश्रय पाना ही भगवान्‌ की प्राप्ति है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की शरणागति संसार के सभी धर्मों में प्रधान धर्म है।

०९-०१-२०१७

विवेक-बुद्धि का जागरण केवल और केवल संत-सद्‌गुरु के सत्संग में ही संभव है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के उपदेशामृत से विषय-वासनाओं की ईंट से निर्मित अज्ञानता की दीवार ढह जाती है, सांसारिक चाहतों का ऐनक उतर जाता है और सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त हुई निर्मल बुद्धि जगत्‌ को यथारूप देखती है। ऐसी ही स्थिति में सत्‌-असत्‌ तत्त्व का, सत्यपथ का और जीवन में पूर्णता के मायने का ज्ञान होता है।

०८-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज का ज्ञान प्रकाश अंदर-बाहर का भेद नष्ट कर देता है और घटाकाश व चिदाकाश को मिला देता है। घड़े में अनंत आकाश को भरना संभव ही नहीं है लेकिन अहंकार रूपी घटाकृति के टूटते ही सद्‌गुरु रूपी अनंत आकाश से एक हो जाना सहज है। श्रीसद्‌गुरु द्वारा बतलायी गयी नामजप, भजन, सुमिरन, पूजा, दर्शन, सेवा व ध्यान की साधना के निरंतर प्रहार से घटाकृति टूट जाती है और शिष्य रूपी बूँद सदा के लिये सद्‌गुरु रूपी सिंधु में समा जाती है। सद्‌गुरु भक्तिरस के सिंधु हैं, सद्‌गुरु के चिंतन में डूबना अर्थात् गुरुभक्ति के पावन सरोवर में स्नान करना है। इस पावन स्नान से ही मन की कलुषता धुलती है, मन ऐसे स्वच्छ दर्पण की तरह हो जाता है कि उसमें चेतना का प्रकाश झलकने लगता है।

०७-०१-२०१७

तीर्थ वह है, जो लोगों में  पवित्रता का संचार कर सके। गुरु अपने शिष्यों के जीवन से अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करते हैं, गुरुभक्ति की साधना में चलाकर उन्हें अहंकार-भाव, ममता, राग, द्वेष, ईर्ष्या, भय, काम-क्रोध आदि भीतरी दुर्गुणों से मुक्त कर पावन बनाते हैं, अत‌एव शिष्यों के लि‌ए गुरु ही परम तीर्थ हैं।

०५-०१-२०१७

 श्रीसद्‌गुरुदेव महाराज के श्रीचरणों में अपने सभी कर्मों की आहुति चढ़ाने वाले शिष्य की संपूर्ण अज्ञानता स्वाहा हो जाती है, यही मोक्ष यज्ञ का मर्म है।

वेदी सद्‌गुरु चरन, होम आहूति सब कर्म।
स्वाहा हो अज्ञानता, मोक्ष यज्ञ का मर्म॥

०४-०१-२०१७

ध्यान में केवल विचार शून्यता का घटित होना मानसिक शांति तो दे सकता है लेकिन आनंद नहीं। आनंद तो सद्‌गुरु महाराज के स्वरूप को ध्यान में बसाने पर ही प्राप्त होता है। शून्य ध्यान के लिये निर्विचार होना पर्याप्त है लेकिन आनंद-ध्यान श्रीसद्‌गुरु स्वरूप के दर्शन से ही संभव है।

०३-०१-२०१७

जीवन का अर्थ वही समझ सकता है जो दीक्षा और प्रेम इन दोनों के द्वारा सद्‌गुरु महाराज से जुड़ा हो। सद्‌गुरु-प्रेम जीवन में उत्सव का रंग है, जीवन का सार है, परम सिद्धि है, पूर्णता, श्रेष्ठता एवं भव्यता है। जब हृदय सरोवर में गुरुप्रेम रूपी कमल खिलता है तो जीवन में सर्वत्र बसंत आ जाता है, हवाओं में सद्‌गुरु के आशीष के स्पर्श का ही अनुभव होता है, नदियों में गुरुगीत का ही संगीत सुनाई देता है, पहाड़ों में सद्‌गुरु की ही शिखरता दिखाई देती है और फूलों से सद्‌गुरु महाराज की ही सुगंध आती है। प्रेम के बिना हृदय जाग्रत हो ही नहीं सकता। सिद्धि, जाग्रति व सफलता का दूसरा नाम प्रेम है और यह प्रेम गुरु से दीक्षा लेने के बाद ही परवान चढ़ता है।

२८-१२-२०१६

गुरु और शिष्य का मिलना एक दृष्टि से गुरुमंत्र की शक्ति का प्रसार है। गुरुमंत्र की शक्ति जो गुरुदीक्षा में गुरु के द्वारा शिष्य में प्रवेश करती है, वही शक्ति फैलकर उस शिष्य के संपूर्ण अस्तित्व को अपने आगोश में ले लेती है और अंत में मंत्रदेवता अर्थात् सद्‌गुरु से मिला देती है। प्रेम, आस्था व श्रद्धा इन तीन गुणों से युक्त शिष्य इस शक्ति को ग्रहण करने में इतना सुचालक हो जाता है कि वह शक्ति स्रोत अर्थात् सद्‌गुरु से अभिन्न हो जाता है। गुरु और शिष्य दोनों की स्वाँसों में एक ही गुरुमंत्र गूँजता है, दोनों ही गुरुभक्ति के रस में भीगे हु‌ए होते हैं, दोनों से एक ही स्वर गुरुनाम का निकलता है।

२७-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु चिन्तामणि हैं, साक्षात्‌ कल्पतरु हैं, जिसने उन्हें पा लिया उसके मन की सभी चिन्तायें शान्त हो गईं। जीवन में निरंतर जो संकल्प-विकल्प चलते रहते हैं वे सभी गुरु की छत्रछाया में उनकी कृपा से शांत हो जाते हैं। श्रीसद्‌गुरु वह चन्दन-तरु हैं, जिसमें भागवत सुगन्ध भरी हुई है अतः इसे पाकर  चारों वर्ण की वासनागंध मिट जाती है।

२६-०१-२०१७

जिस भाग्यशाली को सद्‌गुरु की कृपा से उनकी पूजा, अर्चना, ध्यान-सुमिरन और सेवा का अवसर सुलभ हो जाता है उसका परम कल्याण होना सुनिश्चित है, साथ ही साथ सभी देवता उसकी सेवा में बिना माँगे, बिना निवेदन किए सब कुछ देने के लिये हर समय तत्पर रहते हैं। "एकै साधे सब सधै  सब साधै सब जाय" अनेक की पूजा से कुछ नहीं मिलता, एक सद्‌गुरु की सेवा से ही सब कुछ सुलभ हो जाता है।

२५-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु की भक्ति से साधक को सब कुछ सहज सुलभ हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु के प्रेम की छाँव में रहने वाला शिष्य जीवन की सभी विघ्न-बाधाओं से सुरक्षित रहता है।

२२-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेवजी महाराज जिस नाम का उपदेश देते हैं उस नाम का अमल (अभ्यास) करने से वह कल्पलता के समान फलदायी हो जाता है और लौकिक-पारलौकिक सारी कामनाओं की पूर्ति करता है।

२१-०१-२०१७

सद्‌गुरुदेव  के भजन से लौकिक-पारलौकिक सभी प्रकार के दुःख दूर होते हैं। हमारे भीतर भी जो विषय-विकार रूपी राक्षस निरंतर उपद्रव मचाये रहते हैं उनको गुरुकृपा से ही वश में किया जा सकता है और कोई उपाय नहीं है।

 

२०-०१-२०१७

जिस आत्मज्ञान के द्वारा जीव ब्रह्मरूप हो जाता है, वह ज्ञान गुरुकृपा से ही प्राप्त होता है। गुरुकृपा-निक्षेप ही वह ज्ञान है। यह गुरुकृपा रूपी ज्ञान गुरु के सान्निध्य में उनकी शरण में रहकर पूर्ण निष्ठा और प्रेम के साथ उनकी सेवा करने से ही प्राप्त होता है।

१९-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज की सेवा से असाध्य कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं, इस बात की परीक्षा लौकिक मनोरथों को सफल करने में ही कर लेनी चाहिये। इसके बाद जब विश्वास जम जाये तो पक्के विश्वास के साथ नाम-भजन एवं गुरुसेवा द्वारा परमार्थ का साधन करना चाहिये।

 

१८-०१-२०१७

सद्‌गुरुदेव दीन-दुखियों के परम हितैषी होते हैं तथा बड़े से बड़ा अपराधी या पापी भी यदि शरणागत हो जाये तो वे उसे क्षमा कर देते हैं क्योंकि उनमें असीम करुणा होती है। बिना माँगे भी वे अपने सेवक के मनोरथ सफल करते रहते हैं, माँग लेने पर तो कहना ही क्या है!

 

१७-०१-२०१७

सत्संग का मतलब है श्रीसद्‌गुरु महाराज का संग और उनकी सेवा करना। श्रीसद्‌गुरुदेव के वचनों को मन व चित्त से सुनना और समझना, उनकी बानी को तवज्जह के साथ मनन करना, उनके चरणों में प्रेम अथवा वास पाने की चाह से प्रेरित होकर श्रद्धा और सद्‌भाव से काम करना। यह सब तो बाहरी सत्संग है, पर उनके उपदेश के अनुसार मन और चित्त लगाकर सुरत को ऊँचे मुकामों पर चढ़ाने का अभ्यास करना, यह सब भीतरी सत्संग है।

१६-०१-२०१७

जब तक विरहाग्नि हृदय में न जगे और प्रियतम की दर्शनेच्छा की उत्कट लालसा न हो, तब तक साध्य की सिद्धि नहीं होगी। यदि शिष्य भक्ति व प्रेमपूर्वक श्रीगुरु के चरण कमलों को पकड़ लेता है तो वह कितना ही पंगु क्यों न हो, परमपद के दुर्गम पथ पर सुगमता के साथ चलकर दर्शन पा ही लेता है।

१५-०१-२०१७

गुरु के प्रति शिष्य के मन में अडिग आस्था व समर्पण पूर्ण ज्ञान प्राप्ति का आधार है। सामान्य मानव बुद्धि एवं अनुभवों के आधार पर गुरु को समझने अथवा उनके क्रिया-कलापों की समीक्षा का प्रयास करना शिष्य जीवन की सबसे बड़ी भूल होती है। तर्क अथवा बुद्धि द्वारा गुरु को नहीं समझा जा सकता है। गुरु-महिमा को समझने के लिये अपने हृदय के कपाटों को खोलकर गुरु को हृदय में बिठाने की जरूरत होती है। गुरु को तत्त्व से अर्थात्‌ गुरु-तत्त्व को समझने के लिये श्रद्धा, आस्था एवं समर्पण द्वारा निरहंकारिता की अवस्था प्राप्त करना आवश्यक है। श्रद्धा, आस्था एवं समर्पण द्वारा ही शिष्य अपनी तर्क-बुद्धि को गलाता है, अपने सभी पूर्वाग्रह समाप्त करता है।

१४-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति परमात्मभाव रखना ही ज्ञान व भक्ति प्राप्त करने की कुंजी है। गुरुमंत्र का जप, भजन, श्रीसद्‌गुरुदेव का सतत स्मरण, गुरुसेवा, गुरुपूजा, गुरुदर्शन व सद्‌गुरु स्वामीजी के स्वरूप के ध्यान से आत्मबोध होता है।

१३-०१-२०१७

साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जैसे-जैसे साधना प्रगाढ़ होती है, वैसे-वैसे साधक के मन में अबोधता के भाव भी प्रगाढ़ होने लगते हैं। ऐसे साधक अपने सद्गुरु से सदैव यही याचना करते हैं कि हे मालिक! साधना जगत् में मैं एकदम शून्य हूँ। मैं तो केवल मालिक की दया के बल पर ही जीता हूँ। मुझमें तो तपस्या करने का सामर्थ्य भी नहीं है। मुझमें तो आपके ज्ञान को समझने की शक्ति भी नहीं है। हे मालिक! आप मुझे किसी तरह अपनी सेवा में लगाये रहें, मुझे सदा अपने सत्संग में ही रखें। हे श्रीसद्गुरु महाराज! मेरी भक्ति की परीक्षा भी न लें क्योंकि उसमें मेरा अनुत्तीर्ण होना निश्चित है। आप तो मुझे केवल अपनी आज्ञा के आधीन ही रखें। मुझे आपकी चरणधूलि सदा प्राप्त होती रहे। आपकी सान्निध्यता से मैं सदा सुवासित रहूँ। यदि आपकी दया हो जायेगी तो मेरा मन मालिक में लग जायेगा और तभी मेरा कल्याण होगा।

१२-०१-२०१७

जिनके अन्तःकरण में शिष्यत्व का भाव-बीज अंकुरित हो रहा है अथवा जिन भक्तों व शिष्यों के अन्तस् में श्रीसद्गुरु के भजन-भक्ति की शक्ति अवस्थित है, वे ही श्रीसद्गुरु के नाम-बीज के भजन-भक्ति की शक्ति की यथार्थता को जानते हैं। जैसे जमीन में दबा हुआ बीज मौसम आने पर अंकुरित हुये बिना नहीं रहता है, चाहे यह कितना ही कोमल या नाजुक हो फिर भी जमीन से निकलकर खुली हवा और सूर्य के प्रकाश में अपने अस्तित्व को साकार करता है। वैसे ही सद्‌गुरु से प्राप्त नाममंत्र रूपी बीज में गुरुभक्ति के पुष्प अवश्य ही खिलते हैं।

११-०१-२०१७

जिनके हृदय में श्रीसद्‌गुरु की भक्ति निवास करती है वे निर्धन होने पर भी धन्य हैं क्योंकि गुरुभक्ति की डोर में बँधकर साक्षात्‌ भगवान्‌ भी अपना धाम छोड़कर भक्तों के हृदय में बस जाते हैं।

१०-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेवजी महाराज का आश्रय पाना ही भगवान्‌ की प्राप्ति है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की शरणागति संसार के सभी धर्मों में प्रधान धर्म है।

०९-०१-२०१७

विवेक-बुद्धि का जागरण केवल और केवल संत-सद्‌गुरु के सत्संग में ही संभव है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के उपदेशामृत से विषय-वासनाओं की ईंट से निर्मित अज्ञानता की दीवार ढह जाती है, सांसारिक चाहतों का ऐनक उतर जाता है और सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त हुई निर्मल बुद्धि जगत्‌ को यथारूप देखती है। ऐसी ही स्थिति में सत्‌-असत्‌ तत्त्व का, सत्यपथ का और जीवन में पूर्णता के मायने का ज्ञान होता है।

०८-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज का ज्ञान प्रकाश अंदर-बाहर का भेद नष्ट कर देता है और घटाकाश व चिदाकाश को मिला देता है। घड़े में अनंत आकाश को भरना संभव ही नहीं है लेकिन अहंकार रूपी घटाकृति के टूटते ही सद्‌गुरु रूपी अनंत आकाश से एक हो जाना सहज है। श्रीसद्‌गुरु द्वारा बतलायी गयी नामजप, भजन, सुमिरन, पूजा, दर्शन, सेवा व ध्यान की साधना के निरंतर प्रहार से घटाकृति टूट जाती है और शिष्य रूपी बूँद सदा के लिये सद्‌गुरु रूपी सिंधु में समा जाती है। सद्‌गुरु भक्तिरस के सिंधु हैं, सद्‌गुरु के चिंतन में डूबना अर्थात् गुरुभक्ति के पावन सरोवर में स्नान करना है। इस पावन स्नान से ही मन की कलुषता धुलती है, मन ऐसे स्वच्छ दर्पण की तरह हो जाता है कि उसमें चेतना का प्रकाश झलकने लगता है।

०७-०१-२०१७

तीर्थ वह है, जो लोगों में  पवित्रता का संचार कर सके। गुरु अपने शिष्यों के जीवन से अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करते हैं, गुरुभक्ति की साधना में चलाकर उन्हें अहंकार-भाव, ममता, राग, द्वेष, ईर्ष्या, भय, काम-क्रोध आदि भीतरी दुर्गुणों से मुक्त कर पावन बनाते हैं, अत‌एव शिष्यों के लि‌ए गुरु ही परम तीर्थ हैं।

०५-०१-२०१७

 श्रीसद्‌गुरुदेव महाराज के श्रीचरणों में अपने सभी कर्मों की आहुति चढ़ाने वाले शिष्य की संपूर्ण अज्ञानता स्वाहा हो जाती है, यही मोक्ष यज्ञ का मर्म है।

वेदी सद्‌गुरु चरन, होम आहूति सब कर्म।
स्वाहा हो अज्ञानता, मोक्ष यज्ञ का मर्म॥

०४-०१-२०१७

ध्यान में केवल विचार शून्यता का घटित होना मानसिक शांति तो दे सकता है लेकिन आनंद नहीं। आनंद तो सद्‌गुरु महाराज के स्वरूप को ध्यान में बसाने पर ही प्राप्त होता है। शून्य ध्यान के लिये निर्विचार होना पर्याप्त है लेकिन आनंद-ध्यान श्रीसद्‌गुरु स्वरूप के दर्शन से ही संभव है।

०३-०१-२०१७

जीवन का अर्थ वही समझ सकता है जो दीक्षा और प्रेम इन दोनों के द्वारा सद्‌गुरु महाराज से जुड़ा हो। सद्‌गुरु-प्रेम जीवन में उत्सव का रंग है, जीवन का सार है, परम सिद्धि है, पूर्णता, श्रेष्ठता एवं भव्यता है। जब हृदय सरोवर में गुरुप्रेम रूपी कमल खिलता है तो जीवन में सर्वत्र बसंत आ जाता है, हवाओं में सद्‌गुरु के आशीष के स्पर्श का ही अनुभव होता है, नदियों में गुरुगीत का ही संगीत सुनाई देता है, पहाड़ों में सद्‌गुरु की ही शिखरता दिखाई देती है और फूलों से सद्‌गुरु महाराज की ही सुगंध आती है। प्रेम के बिना हृदय जाग्रत हो ही नहीं सकता। सिद्धि, जाग्रति व सफलता का दूसरा नाम प्रेम है और यह प्रेम गुरु से दीक्षा लेने के बाद ही परवान चढ़ता है।

२८-१२-२०१६

गुरु और शिष्य का मिलना एक दृष्टि से गुरुमंत्र की शक्ति का प्रसार है। गुरुमंत्र की शक्ति जो गुरुदीक्षा में गुरु के द्वारा शिष्य में प्रवेश करती है, वही शक्ति फैलकर उस शिष्य के संपूर्ण अस्तित्व को अपने आगोश में ले लेती है और अंत में मंत्रदेवता अर्थात् सद्‌गुरु से मिला देती है। प्रेम, आस्था व श्रद्धा इन तीन गुणों से युक्त शिष्य इस शक्ति को ग्रहण करने में इतना सुचालक हो जाता है कि वह शक्ति स्रोत अर्थात् सद्‌गुरु से अभिन्न हो जाता है। गुरु और शिष्य दोनों की स्वाँसों में एक ही गुरुमंत्र गूँजता है, दोनों ही गुरुभक्ति के रस में भीगे हु‌ए होते हैं, दोनों से एक ही स्वर गुरुनाम का निकलता है।

२७-१२-२०१६

जिस तरह मिस्री की एक ढेली को जिव्हा पर रखते ही पूरा मुँह मीठा हो जाता है, वैसे ही ध्यान में आनंद स्वरूप श्रीसद्‌गुरु महाराज की एक झलक मात्र से शिष्य आनंद से भर जाता है।

२६-१२-२०१६

गुरुकृपा से चित्त के शुद्ध हो जाने पर मन सहज ही एकाग्र हो जाता है फलतः कर्म अपने-आप छूटने लगते हैं। जिस अनुपात में भक्ति उपलब्ध होती जाती है उसी अनुपात में कर्म-बंधन शिथिल होते जाते हैं। एकाग्रता को प्राप्त हुआ मन अपने ही हृदय में स्थित गुरु के दर्शन कर आत्मज्ञान संपन्न हो जाता है। इसीलिये सभी श्रुतियों में गुरु ज्ञान के लिये गुरु के भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान की साधना तथा गुरु की दया व शरणागति की अनिवार्यता पर जोर दिया गया है।

२५-१२-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज शिष्य में अपनी आध्यात्मिक शक्ति का संचार कर उसे दीक्षामंत्र प्रदान करते हैं। इस नाममंत्र के आनंद में डूबना ही भजन है। जब शिष्य की प्रत्येक श्वास नाम के रस में डूबने लगती है तो सिद्ध अवस्था प्राप्त होती है। यही साधना का सहज पथ है।

२४-१२-२०१६

मलिन चित्त की शुद्धि का एकमात्र उपाय है-गुरुभक्ति। गुरुदीक्षा में सद्‌गुरु द्वारा प्रदान की जाने वाली श्रीसद्‌गुरु-भक्तियोग की साधना के अभ्यास से ही मन व चित्त का परिमार्जन होता है। इसीलिये सद्‌गुरु की तलाश कर उनसे गुरुदीक्षा ग्रहण करना एवं उनके द्वारा बतलाये मार्ग पर चलना ही मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिये।

२३-१२-२०१६

परम पूज्य श्रीसद्‌गुरु के श्रीमुख से बहने वाली अविरल ज्ञानगंगा की धारा में जो शिष्य सदा गोता लगाता रहता है, वह सदा मुक्त अवस्था में ही रहता है।

२१-१२-२०१६

शिष्य के नेत्र हर समय मात्र श्रीसद्‌गुरु दर्शन के रस में भीगे रहते हैं, कान सदा ही श्रीसद्‌गुरु महाराज की अमृतवाणी सुनना चाहते हैं, जिव्हा में सद्‌गुरु के चरणामृत की प्यास जाग जाती है, नासिका श्रीसद्‌गुरु महाराज की दिव्य आध्यात्मिक सुवास में खो‌ई रहती है और सतत-सुमिरन के द्वारा शिष्य हर पल श्रीसद्‌गुरु का पावन स्पर्श प्राप्त करता है। यही है प्रत्याहार की स्थिति, जिसमें इन्द्रियाँ बाहरी विषयों से विरक्त हो जाती हैं और श्रीसद्‌गुरु महाराज के दर्शन, सुमिरन, सेवा व ध्यान में अपना संपूर्ण आहार प्राप्त कर तृप्त होती रहती हैं। ऐसी अवस्था आने पर ही चेतना की अंतर्मुखता सिद्ध होती है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अन्दर सद्‌गुरु से जुड़ जाती हैं और कर्मेन्द्रियाँ गुरु की सेवा में संलग्न हो जाती हैं, यही है वास्तविक प्रत्याहार।

२०-१२-२०१६

गुरुदीक्षा सद्‌गुरु के प्रेम की अभिव्यक्ति है। श्रीसद्‌गुरु महाराज ने गुरुदीक्षा रूपी एक प्रेम डगर बनायी है ताकि इस पर चलकर जीव सदा प्रेम से आप्लावित रहे। हर प्रेमी की यह अभिलाषा होती है कि वह अपने जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि से अपने प्रियजनों से जोड़ दे। श्रीसद्‌गुरु महाराज गुरुप्रेम की अतल गहरायी में निवास करते हैं और गुरुप्रेम के इस अनमोल खजाने को वे जीवों पर लुटाना चाहते हैं। सभी जीव तो श्रीसद्‌गुरु महाराज के ही अंश हैं अतः वे चाहते हैं कि जिस गुरुप्रेम रूपी अमृत से वे सरावोर हैं उनका अंश भी गुरुप्रेम के उस अमृतरस से जुड़ जाये। गुरुदीक्षा के माध्यम से ही वे अपने शिष्यों को प्रेम के अथाह सागर में डुबोते हैं जिससे हर एक शिष्य सहज, सरल, सद्भाव व संस्कार से परिपूर्ण हो; उसमें जीवमात्र के प्रति दया, ममता, करुणा, स्नेह आदि जैसे सद्गुण उजागर हो सके।

१९-१२-२०१६

समस्त कर्मों को अपने गुरु के चरणों में सप्रेम समर्पित कर देना ही गुरुदीक्षा की दक्षिणा है। हृदय में बसे प्रेम की समस्त धारा‌ओं को पूर्णरूपेण श्रीसद्‌गुरु की ओर मोड़ देना ही गुरु से दीक्षित होने का अभिप्राय है। 

 

१८-१२-२०१६

एक साधक गुरुदीक्षा से ही शिष्य बनता है। दीक्षा प्राप्त करने के बाद ही वह उच्च कोटी की साधना में प्रवृत्त होकर गुरुभक्ति की शक्ति प्राप्त करता है। गुरु का कार्य अपने शिष्य के साधनात्मक क्षेत्र को मजबूत बनाना है, जिससे शिष्य आत्म-साक्षात्कार कर सके। श्रीसद्‌गुरु कभी भी नहीं चाहते कि शिष्य सदा दास बनकर जीवन बिताये। गुरु तो अपने प्रत्येक शिष्य को अपने जैसा ही बनाना चाहते हैं। इसीलिये गुरु बारंबार अपने शिष्यों को भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना करने की प्रेरणा देते रहते हैं।

१७-१२-२०१६

ईर्ष्या, दोषदृष्टि, नकारात्मकता, संशयात्मकता, अस्थिर बुद्धि, काम, क्रोधादि ये चित्त के दोष हैं, इन दोषों से युक्त चित्त कभी भी आध्यात्मिक साधना में प्रवृत्त नहीं हो पाता है। को‌ई भी भौतिक साधन इन चित्त विकारों को दूर नहीं कर सकता है, लेकिन श्रीसद्‌गुरु महाराज का चरणोदक ग्रहण करने से ये सभी दोष चित्त से निकल जाते हैं और चित्त निर्मल अवस्था को प्राप्त होता है। तीर्थ वह है, जो लोगों में  पवित्रता का संचार कर सके। गुरु अपने शिष्य के अज्ञानमय अंधकार दूर करते हैं, गुरुभक्ति की साधना में चलाकर शिष्य को अहंकार-भाव, ममता, राग, द्वेष, ईर्ष्या, भय, काम-क्रोध आदि भीतरी दुर्गुणों से मुक्त कर पावन बनाते हैं, अत‌एव शिष्यों के लि‌ए गुरु ही परम तीर्थ हैं। ध्यान सरिता में शिष्य को डुबोकर उसके मानस में चढी जन्मों के मलिनता को हटाने वाले श्रीसद्‌गुरु ही हैं। पतित पावन श्रीसद्‌गुरु ही भवबंधनों से मुक्त करने वाली ध्यान-साधना के रहस्यों को जानने वाले हैं और वे ही इसे दूसरों को समझा सकते हैं। जीवों के मलिन मन को निर्मल कर मानस-तीर्थ बनाने वाले श्रीसद्‌गुरु भगवान् ही हैं। इसी मानस-तीर्थ में सद्‌गुरु महाराज के दर्शन से जीव मुक्त होता है।

१५-१२-२०१६

हमारा जीवन एक ऐसे वृक्ष में लटका है जिसके नीचे भयावह नाग हमें डसने को फन फैलाये हु‌ए राह देख रहा है, लेकिन हम वृक्ष में लगे मधुमख्खी के छत्ते से गिरने वाले एक-दो बूँद शहद के स्वाद में ही जिये जा रहे हैं, न जाने कब वृक्ष से हमारा हाथ छूट जाये और हम सदा के लिये काल के गाल में समा जायें। सद्‌गुरु अपना हाथ फैलाये हमें आवाज दे रहे हैं कि अपना एक हाथ मुझे थमा दो और इस संसार रूपी वृक्ष से दूसरे हाथ को छोड़कर मुझे पकड़ लो ताकि मैं तुम्हें सुरक्षित रूप से तुम्हारे घर तक पहुँचा दूँ। हम कदाचित् एक हाथ तो गुरु को पकड़ा देते हैं, लेकिन फिर भी दूसरे हाथ से संसार को जकड़ कर पकड़े ही रहते हैं। अपने जीवन को पूरी तरह से सद्‌गुरु के चरणों में सौपना होगा, तभी कल्याण होगा। श्रीसद्‌गुरु को अपना एक हाथ सौप देना तो आधी दीक्षा ही हु‌ई, क्योंकि जब तक हम अपने दूसरे हाथ को भी संसार से छुड़ाकर सद्‌गुरु के हाथों में नहीं सौपते हैं, तब तक आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है। संसार एवं अध्यात्म दोनों नावों में पैर रखने पर हम कहीं भी न पहुँचेंगे। दीक्षा तभी पूर्ण होती है जब हम श्रीसद्‌गुरु महाराज से नाममंत्र ग्रहण करें और उस पल से ही सद्‌गुरु की शरण में नामजप, भजन, सुमिरन, पूजा, सेवा, दर्शन व ध्यान के पथ पर चलने का व्रत लेकर निरंतर अभ्यास में जुट जायें।

१४-१२-२०१६

दीक्षा एक अन्तर्बेधी शक्ति है जिसकी सहायता से साधक अपने अंदर खुदाई करता हुआ अपनी चेतना के मूल स्रोत तक पहुँच जाता है। जैसे एक ही स्थान पर निरंतर खुदाई कर मिट्टी को बाहर फेकते रहने से निश्चित ही गहरा जलस्रोत मिल जाता है, वैसे ही श्रीसद्‌गुरु महाराज से दीक्षा ग्रहण कर साधक अपने अंदर से समस्त व्यर्थ तत्त्वों को निकालने की युक्ति पा जाता है और निरंतर अंदर की ओर गति करता हुआ अंत में आत्म-प्रकाश प्राप्त कर लेता है।

१३-१२-२०१६

जिस तरह पतिव्रता-स्त्री के मन में अपने पति के अलावा किसी अन्य का विचार नहीं होता है, वैसे ही सच्चा शिष्य अपने गुरु के सिवाय किसी अन्य का विचार नहीं करता है। शिष्य निरन्तर अपने गुरु के रूप रस में ही निमग्न रहता है जिसकी मधुरता अमृत से भी रसीली होती है।

११-१२-२०१६

श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ द्वारा बता‌ई ग‌ई योग-युक्ति से सुरत ब्रह्मा के देश में पहुँचकर अमृत कुण्ड में स्नान-पान करके ब्रह्म में लीन हो जाती है। सभी दुर्गम आध्यात्मिक मंजिलें गुरुकृपा से सुगम हो जाती हैं। श्रीसद्‌गुरु की कृपा से भक्तिमार्ग की यात्रा निर्बाध होती है। श्रीसद्‌गुरु की कृपा ही असंभव को संभव बनाती है। श्रीसद्‌गुरु की कृपा प्राप्त हो जाने पर दुष्कर और दुरूह प्रारब्ध को भी मोड़कर अपने अनुकूल किया जा सकता है।
१०-१२-२०१६

साधक के जीवन में गुरुकृपा की प्राप्ति ही सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु है, कल्पतरु है एवं चिन्तामणि है। गुरुकृपा तो गृहस्थ शिष्य को भी निष्काम कर्मयोगी व विदेह बना देती है। सद्गुरु की कृपा से ही ज्ञान का परम प्रकाश मिलता है, जिसके उजियारे में साधक-शिष्य जीवन्मुक्त होता है। सद्‌गुरु की प्राप्ति होने पर समस्त क्रियाओं की सिद्धि के साथ-साथ भक्ति व मुक्ति भी सिद्ध होती है। सदगुरु की कृपा प्राप्त करने वाला शिष्य कृत-कृत्य होता है, क्योंकि गुरुकृपा से ही शिष्य को आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञानी होने के बाद किसी अन्य सिद्धि की आवश्यकता ही नहीं रहती है। गुरुकृपा से तत्त्वनिष्ठा स्वतः हस्तगत होती है। जो शिष्य अपने गुरु के प्रति ईश्वर भाव रखकर भक्तिराह पर चलते हैं, सकल शास्त्र अपने निहित अर्थ को ऐसे गुरुभक्त की समझ में खुद ही प्रकाशित कर देते हैं।

०९-१२-२०१६

सद्‌गुरु भी शिष्यों की आध्यात्मिक जिज्ञासा को कई ढंगों से परखते हैं। जिस तरह शिष्य सद्‌गुरु को ढूँढ़ता है, ठीक वैसे ही सद्‌गुरु भी अपने सत्पात्र शिष्य को खोजते हैं। जब शिष्य अपने अधूरेपन को, अपने अनगढ़ जीवन को सद्‌गुरु की पूर्णता में समर्पित करता है और सद्‌गुरु भी अपनी पूर्णता शिष्य में उड़ेलते हैं, तभी दोनों की आपसी खोज समाप्त होती है।

०८-१२-२०१६

गुरु, गुरुमंत्र एवं गुरुतत्त्व में कोई भेद नहीं है, ये तीनों एक ही हैं, लेकिन एकमात्र श्रीसद्गुरु महाराज ही इस रहस्य को उजागर कर शिष्य के समझ-पटल में अंकित करने में समर्थ हैं। इसीलिये श्रीसद्गुरु महाराज के स्वरूप के ध्यान से जुड़ा मंत्र-जप ही पूर्ण होता है। मंत्र-जप के समय जब सहसदल कमल (संतजन जिसे हृदय कहते हैं) में गुरु-स्वरूप का स्पष्ट दर्शन होने लगे तभी गुरुमंत्र सिद्ध होता है।

०७-१२-२०१६

सद्‌गुरु जंगम अर्थात् चलते-फिरते तीर्थ हैं। श्रीसद्‌गुरु के उपदेशामृत सरिता में अवगाहन से मुक्तिरूप फल प्राप्त होता है। सन्त-सद्‌गुरु के बिना आत्मज्ञान नहीं हो सकता है, भीतरी आँख खोलने वाले एकमात्र वैद्य हैं श्रीसद्‌गुरु महाराज। जिन्होंने इन श्रीसद्‌गुरुदेव को पहिचान लिया, वही प्रज्ञावान् है, उसका जीवन ही सुकृत है और वही भवसागर से पार हो सकता है। अपनी दृष्टि को बाहर से हटाकर अंदर की ओर लगाओ, यही जीवन की कसौटी है, जीवन को खरा सोना बनाने वाले स्वामी सद्‌गुरु का दर्शन अंदर ही होगा। श्रीसद्‌गुरु की कृपा से क्रोध, अहंकार व मन की बाहरी दौड़ समाप्त हो जाती है और मन अंदर ही सद्‌गुरु के स्वरूप में रमण करने लगता है।

०६-१२-२०१६

शिष्य को गुरु से कुछ भी नहीं छुपाना चाहिये, सद्‌गुरु के समक्ष जीवन का हर अध्याय खुला होना चाहिये। जीवन में सभी ग्लानियों से मुक्ति का यही एकमात्र उपाय है।

०५-१२-२०१६

गुरु ही शिव हैं, शिव ही देह रूप में अवतरित होकर जीवों के कल्याण हेतु दुर्लभ गुरु-तत्त्व को सुलभ करते हैं। इस गुरु-तत्त्व का साकार स्वरूप ही ’गुरु’ नाम से अभिवंदित होता है। शिव स्वयं ही गुरु बनकर देहाकार में अवतरित होते हैं और अपने शिवत्व का रहस्य उद्घाटन करते हैं, अर्थात् शिवत्व का ज्ञान कराने वाले गुरु साक्षात् शिव रूप ही हैं। शंभु रूप कल्याणकारी सत्ता जो ब्रह्मज्ञान देकर शिवत्व को प्रकाशित करती है, वही गुरु है।

०४-१२-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा दिया गया ’नाम’ परमात्मा का निर्गुण स्वरूप है जो सगुण रूप में स्वयं देहधारी श्रीसद्‌गुरुदेव के रूप में व्यक्त है।

०२-१२-२०१६

प्रेम परमात्मिक गुण है और प्रेम के बिना परमात्मा की अनुभूति असंभव है। आध्यात्मिक यात्रा प्रेममार्ग से ही तय होती है और जिस भक्त की श्रीसद्‌गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा व अटूट निष्ठा है वही इस आध्यात्मिक यात्रा का पथिक हो सकता है। मालिक तक वही शिष्य पहुँच सकता है या उनके साथ एकाकार हो सकता है जिसका हृदय सदा गुरुप्रेम से भरा होता है। गुरुभक्ति में भीगे नयन और गुरुप्रेम से रोमांचित तन-मन ही शिष्य के परिचायक हैं। शिष्य के हृदय में श्रीसद्‌गुरु के प्रति उपजे प्रेम-विरह के भाव परम कल्याणकारी हैं। श्रीसद्‌गुरु के प्रति शिष्य का प्रेम-विरह आध्यात्मिक संपत्ति है। सद्‌गुरु का प्रेम शिष्य को सभी आध्यात्मिक मंजिलों का अधिकारी बना देता है। श्रीसद्‌गुरु से प्रेम होने पर ही उनसे प्राप्त ’नाम’ या ’शब्द’ से संबंध जुड़ता है और भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना फलीभूत होती है। श्रीसद्‌गुरु के प्रेम-विरह से तड़पती हु‌ई शिष्य की सुरत नाम-भजन, सुमिरन व ध्यान के सहारे रूहानी चढ़ा‌ई शुरू करती है और अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप में प्रगट होती है।

२८-११-२०१६

जिस तरह बीज अपने आस्तित्व को मिटाकर ही वृक्ष रूप में विकसित होता है, ठीक उसी तरह शिष्य को अपनी पूर्णता फलीभूत करने हेतु अपना अहम्‌ विसर्जित कर श्रीसद्‌गुरुदेव के श्रीचरणों में पूर्ण समर्पित होना पड़ता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज से अत्यंत गुप्त महामंत्रराज की दीक्षा लेने के पश्चात्‌ शिष्य को सदा ही नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन एवं ध्यान की साधना में लीन रहना चाहिये। गुरु की आज्ञा का अक्षरशः पालन एवं गुरुसेवा ही शिष्य का धर्म होना चाहिये। सदा ही श्रीगुरुदेवजी के चरणों में यह प्रार्थना करना चाहिये कि प्रभु! आप सदैव ही हमारा मार्गदर्शन कीजिये, जीवन में कभी एक पल को भी हमारे स्मृति-पटल से आप का स्वरूप ओझल न हो पाये।

२७-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज अपने शिष्यों को हर वक्त संभालते रहते हैं। सैकड़ों मील दूर रहने पर भी गुरुकृपा शिष्य की रक्षा करती है। शिष्य की हर पल रक्षा करते हुये उसके लोक-परलोक को सवाँरने वाले गुरु ही हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज साक्षात्‌ रूप से ईश्वर ही होते हैं। वे अपने शिष्यों को नाम भजन, सुमिरन, ध्यान की प्रेरणा देकर यात्रा के प्रथम सोपान से उच्चत्तम सोपान तक ले जाने के लिये सतत्‌ प्रयासरत रहते हैं। वे क्षण बहुत ही अनमोल होते हैं, जब शिष्य अपने मन को श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ के नामजप में लगाये रहता है। जैसे ही मन श्रीसद्‌गुरु के नामरस में डूबता है जीवन की उधेड़-बुन समाप्त हो जाती है, भूत व भविष्य खो जाते हैं. केवल वर्तमान का आनंद ही शेष रह जाता है। इसीलिये अपने मन को सब ओर से बटोरकर श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ में सदा-सदा के लिये जोड़ दो। हर पल उनके बतलाये हुये मंत्र का जप करते हुये उनकी सेवा, पूजा, दर्शन करते हुये अपने जीवन का सच्चा लाभ उठाओ।

परम हितैषी जीव के, सद्‌गुरु परम उदार।
ताते कबहूँ न छोड़िये, चरण कमल अधार॥
भक्ति मुक्ति गुरुचरण में, ऐसा निश्चय जान।
शरण गुरु की जो गहे, सो पाये पद निर्वाण॥

२१-११-२०१६

दीक्षा के उपरांत मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता है। दीक्षा के बाद शिष्य ऊपरी तल पर तो पहले जैसे ही दिखता है, लेकिन उसके अंदर सब कुछ बदल जाता है। उसकी प्रवृत्तियाँ अंतर्मुखी हो जाती हैं, हृदय में प्रतिष्ठित सद्‌गुरु ही उसका पूरा संसार होते हैं। उसकी बाहरी दौड़ समाप्त हो जाती हैं, उसकी सांसारिक आकांक्षायें पतझड़ के पत्तों की तरह झड़ जाती हैं। अंतस्‌ में गुरुभक्ति की नयी कोपलें खिलने लगती हैं, रोम-रोम में सद्‌गुरु रूपी बसंत की महक होती है और उसके उसके जीवन का पूरा रस हृदयस्थ गुरु के प्रति ही होता है। उसकी पूरी देह इष्ट सद्‌गुरु का मंदिर बन जाती है जहाँ चौबीसों घंटे सद्‌गुरु की पूजा, प्रार्थना, आरती, भजन, सेवा व दर्शन चलते रहते हैं।

 २०-११-२०१६

सद्‌गुरु अधिकारी व योग्य शिष्य को ही तत्त्वज्ञान प्रदान करते हैं। सद्‌गुरु के प्रति श्रद्धा व शरणागति के भाव से ही शिष्य में योग्यता आती है। सद्‌गुरु के निर्देशानुसार जीवनचर्या व उनकी निःस्वार्थ सेवा से इन्द्रिय संयम सिद्ध होता है और मन लक्ष्य के प्रति उन्मुख होता है। यही ज्ञान प्राप्ति का सुगम उपाय है।

१९-११-२०१६

आत्मशक्ति से ही जीव का अस्तित्त्व है, लेकिन जैसे मृग अपने नाभि-कमल में ही कस्तूरी होने के बावजूद उसकी दिव्य सुगंध के स्रोत को खोजने के लिए अज्ञानतावश भटकता फिरता है, उसी प्रकार से मनुष्य भी सद्ज्ञान के अभाव में आत्म-प्रकाश की खोज में संसार में भटकता रहता है। लेकिन जैसे ही मनुष्य को गुरुदीक्षा मिल जाती है और गुरुकृपा से उसका अज्ञान रूपी अन्धकार मिट जाता है और जीवन आत्म-प्रकाश से आलोकित हो जाता है। समर्थ सद्गुरु जो सदा अंतर के मंडलों में भ्रमण करते हैं और हमें भी शरीर के नौ दरवाजों को बंद करने की युक्ति सिखाकर अंतर मंडलों में विचरण करा सकते हों, उनकी कृपा से ही आत्मशक्ति को जाना जा सकता है। जैसे गहरी खुदाई पर ही धातु की खदाने मिलतीं हैं और मोती प्राप्त करने के लिए लिए समुद्र में गहरे गोते लगाने पड़ते हैं, वैसे ही आत्मबोध के लिये गुरुभक्ति की साधना में गहरे उतरने की आवश्यकता होती है।

१८-११-२०१६

दीक्षा में सद्‌गुरु के श्रीमुख से प्राप्त गुरुमंत्र में अपार शक्ति होती है। गुरुमंत्र ही सृष्टि की शक्ति का केन्द्र है, चिन्मय शक्ति है, यह कथन अक्षरशः सत्य है। सद्‌गुरु से प्राप्त नाममंत्र ही जीवन का अनमोल धन है। नाम के बिना कोई भी जीव भवपार नहीं कर सकता है। सद्‌गुरु से नामदीक्षा तो सहज अथवा अत्यल्प प्रयास से ही प्राप्त हो जाती है लेकिन केवल वही शिष्य इस नामधन के मूल्य को प्राप्त करता है जो श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों में अपने शीश अर्थात्‌ अहंकार को अर्पित करता है। मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार इन चारों को गुरु के चरणों में अर्पित करने पर ही नाम का खजाना खुलता है। नाम-साधना एक सहज साधना है जिसमें शरीर नहीं अपितु मन के नियंत्रण पर महत्व दिया जाता है। मन ही जीव को संसार में इधर-उधर भटकाता है, जब तक मन नियंत्रित नहीं होगा तब तक आत्मपथ पर गति संभव नहीं है। यह मार्ग जिस्मानी नहीं, रूहानी है। यह आंतरिक मार्ग अत्यंत गुप्त है। इस मार्ग पर यात्रा करने के साधन भी गुप्त हैं और इसकी मंजिल भी गुप्त है। इस मार्ग के अवरोध भी अत्यंत सूक्ष्म है। कामिल मुर्शिद ही इस राह पर जीव की रहनुमाई कर सकते हैं क्योंकि वे इस राह की बारीकियों से परिचित हैं और स्वयं इस राह को तय करके मंजिल तक पहुँचे हुए हैं। यह साधना सद्‌गुरु की शरण में संपन्न होने के कारण ही सहज है। श्रीसद्‌गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करने से ही अमृत की वर्षा होती है और जीवन में निष्कामता, शील, क्षमा, संतोष, विवेक आदि प्रौढ़ होते हैं। ऐसा होने पर ही सुरत ऊर्ध्व गति करती है और सद्‌गुरु परमेश्वर से मिलकर मुक्त होती है। यह सब गुरु की कृपा पर ही आधारित है। इसलिए सद्‌गुरु की खोज जीवन की असली खोज व कमाई है।


१७-११-२०१६

सद्‌गुरु की सान्निध्यता में शिष्य में सांसारिक संबंधों व विषयों के प्रति वैराग्यता व अनासक्ति आती है। संसार के प्रपंचों के प्रति वैराग्यता व अनासक्ति ही समस्त आध्यात्मिक उपलब्धियों की नींव है। इस पर ही आत्मज्ञान का वृक्ष विकसित होता है और मोक्षफल की प्राप्ति होती है। गुरुसेवा ही मोक्ष का मार्ग है। गुरुसेवा मात्र भौतिक कृत्य नहीं है, अपितु जब शिष्य गुरु के विचारों से एकरूप हो जाता है और गुरु के बिना कहे ही गुरु के अनुसार बर्तने लगता है तो ऐसे अनुकूलन में ही शिष्य गुरुसेवक का पद पाता है। गुरु के सत्संग में एक ऐसा दिन भी आता है जब शिष्य गुरु के मौन व्याख्यान को समझने लगता है। गुरु के हृदय के भावों को अपने हृदय में पैदा करना ही शिष्य की गुरु से अनुकूलता है। गुरु के हृदय की धड़कन बन जाना ही शिष्य की गुरु के प्रति अनुकूलता है। गुरुसेवा में शिष्य अपनी सुध भूल जाता है, उसकी चेतना में केवल गुरु का ही स्थान होता है। यही पराचेतना की अवस्था है, जिसमें केवल पारब्रह्म सद्‌गुरु की ही झलक होती है। जैसे कोयला का एक टुकड़ा अग्नि में तपकर अग्नि की गर्मी, प्रकाश व ज्वलन शक्ति को प्राप्त कर लेता है, वैसे ही अपनी चेतना को सद्‌गुरु की चेतना में झोंककर शिष्य की अन्तरंग सत्ता ब्राह्मीभूत हो जाती है। ऐसे शिष्य को भीतर-बाहर चारों ओर सत् ही सत् दृष्टिगोचर होता है। विश्व में सर्वत्र उसे सद्‌गुरु ब्रह्म ही परिलक्षित होते हैं।

१६-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महराज नररूप में हरि ही हैं। शिष्य को सर्वप्रथम उनका नररूप ही दिखाई देता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज से परानाम का उपदेश लेकर पूर्ण श्रद्धा भाव से श्वास के सहारे इस परानाम के मानसिक जप और मस्तक में सहसदल कमल पर उनके दिव्य विग्रह का ध्यान करते-करते जब शिष्य को श्रीसद्‌गुरु के परम प्रकाशमय स्वरूप का दर्शन होता है, तभी उनके हरि रूप का ज्ञान होता है। उन्हीं की कृपा से साधक रूपी ब्रह्मबिन्दु श्रीसद्‌गुरु रूपी ब्रह्मसिंधु में लय होता है और ’अहम्‌-ब्रह्मास्मि’ का अनुभव करता है। इसी भाव दशा में वह अपना तन, मन व जीवन रूपी अनमोल धन श्रीसद्‌गुरु पर न्यौछावर करता है, जिन्होंने जन्म-जन्मांतर, युग-युगांतर, कल्प-कल्पांतर से भूले जीव को निजधाम में प्रतिष्ठित किया।

१४-११-२०१६

परम पूज्य श्रीसद्‌गुरु के श्रीमुख से बहने वाली अविरल गंगा की धारा में जो शिष्य सदा गोता लगाता रहता है, वह सदा मुक्त अवस्था में ही रहता है। गुरुभक्ति से मन पवित्र एवं निर्मल होता है, मनुष्य की प्रसुप्त आत्मा जाग्रत होती है। भक्ति ही मन के समाधान का सर्वश्रेष्ठ एवं सुगम साधन है। प्रेम व भक्ति से उपजे आनंद रस से अंतःकरण कोमल बनता है। गुरुभक्ति के अलावा किसी अन्य मार्ग में ऐसी उपलब्धि दुर्लभ है।

१३-११-२०१६

जब तक शिष्य गुरुदीक्षा नहीं ग्रहण करता, तब तक वह श्रीसद्‌गुरुदेव से नहीं जुड़ पाता है। श्रीसद्‌गुरुदेव स्वामीजी परम विभूति हैं, उनकी देह में रची परम चैतन्यता ही गुरु-तत्त्व है, वे ही जगदीश और जगन्नियंता हैं। शिष्य के लिये सद्‌गुरु की देह ही एकमात्र मंदिर है, इस मंदिर की सेवा, अर्चना, पूजन ही शिष्य के जीवन का परमार्थ है। जो शिष्य सद्‌गुरु के नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन व ध्यान की साधना के लिये स्वयं की देह को तपोभूमि बनाता है, उस तपोभूमि के हृदय में सद्‌गुरु के दिव्य विग्रह का मंदिर बनाता है, और उस मंदिर में अभीष्ट के रूप में गुरु-तत्त्व की प्राण-प्रतिष्ठा करता है, वह शिष्य सृष्टि की सबसे पावनतम कृति है एवं वही सही अर्थों में जंगम तीर्थ है। गुरु के नाम का उच्चारण करने पर गुरुभक्त का रोम-रोम प्रफुल्लित होने लगता है। तन व मन की चिन्तायें समाप्त हो जाती है। जप, तप व योग से भी जो नहीं मिल पाता है, वह गुरुभाव की एक तरंग से गुरभक्त को मिल जाता है।

१२-११-२०१६

आध्यात्मिक मार्ग में वही शिष्य सतत उन्नति पर निरंतर अग्रसर रहता है, जिसके ऊपर ब्रह्मनिष्ठ, तत्त्ववेत्ता श्रीसद्गुरु की अनुकंपा लगातार बनी रहती है। स्वयं को पूर्ण रूप से सद्गुरु को सौंपकर उनकी प्रत्येक आज्ञा के पालन से ही सद्गुरु की इस अनुकंपा को ग्रहण करने की पात्रता आती है। ब्रह्मज्ञान में दीक्षित शिष्य साधना के द्वारा सद्‌गुरुदेव के ईश्वरीय स्वरूप का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है। दीक्षा की सफलता शिष्य की गुरु के प्रति श्रद्धा पर ही निर्भर करती है।  शिष्य यदि गुरु की ऊर्जा और ज्ञान को आत्मसात कर अपने जीवन  में ना उतार पाये, तो श्रेष्ठ प्रक्रिया भी व्यर्थ हो जाती है।

११-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज दीक्षोपरांत पूर्ण समर्पित शिष्य की साधना का समस्त उत्तरदायित्व स्वयं अपने ऊपर लेते हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज शिष्य को ज्ञान का उपदेश करते हैं, ज्ञान को उसके जीवन में चरितार्थ करते हैं और शिष्य को जीवन के सार-तत्त्व की प्रतीति सद्‌गुरु ही करवाते हैं। शारीरिक रोग, आलस्य, संदेह, ढुलमुल रवैया, प्रमाद, चंचल मन, भ्रान्ति, हतोत्साह, अस्थिर चित्त, उदासी, दुख आदि विघ्न आध्यात्मिक-साधना में बाधक होते हैं। इसीलिये श्रीसद्‌गुरु महाराज शिष्य के जीवन को संयमित दिनचर्या व सम्यक दर्शन प्रदान कर उसे इन सभी विघ्नों से पार करते हैं। गुरुभक्ति की साधना कोई नीरस तप नहीं है अपितु इसमें श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्य को आनंदपूर्ण मार्ग से साधना करवाते हैं। सद्‌गुरु की मधुर वाणी से उपदेश प्राप्त करता हुआ शिष्य सदैव तृप्त रहता है। श्रीसद्‌गुरु के सान्निध्य में साधना अत्यंत सरस होती है।

हे सद्‌गुरु! आप ही आनंद-मय अनुभूति के आधार हैं।
आप ही आध्यात्मिक संसार में सद्‌ज्ञान के आगार हैं॥
भँवर द्वन्द्वों से उबारें आप करुणा प्रेम की पतवार हैं।
आप ही हैं इष्ट स्वामी आप ही शिष्यों के सर्वाधार हैं॥

१०-११-२०१६

साधक, सिद्ध, साध्य और साधन, इन चारों के एक साथ मिलने पर ही आध्यात्मिक साधना संपूर्ण होती है। गुरुदीक्षा ही एक मात्र ऐसी प्रक्रिया है जो साधना के चारों अंगों अर्थात्‌ साधक, सिद्ध, साध्य और साधन को आपस में नजदीक आने का अवसर प्रदान करती है। इन चारों अंगों का पूर्ण मिलाप ही साधना की अंतिम अवस्था है। इन चारों का ऐक्य ही सफल साधना है जिसमें ये चारों एक-दूसरे से अभिन्न हो जाते हैं। अभिन्न होने में आपसी एकरूपता अनिवार्य है। संतमत की साधना में सिद्ध, साध्य और साधन एक ही होते हैं, अर्थात्‌ गुरुमंत्र (श्रीसद्‌गुरु की चेतना के एक अंश के रूप में साधन है), सिद्ध ( ऐसे मार्गदर्शक जो साधना के हर पहलू से पूर्णतः परिचित हैं अर्थात्‌ श्रीसद्‌गुरु) और साध्य ( इष्टदेव स्वयं श्रीसद्‌गुरु) एक ही सत्ता के तीन नाम हैं। शास्त्र भी इसी तथ्य को सिद्ध करते हैं-
यथा घटश्च कलशः, कुम्भश्चैकार्थवाचकाः।
तथा मंत्रो देवताश्च, गुरुश्चैकार्थवाचकाः॥कुलार्णव तंत्र, १३/६४
अर्थात् जिस प्रकार घट, कलश और कुम्भ एक ही वस्तु के अनेक नाम है, उसी प्रकार मंत्र, देवता व गुरु एक ही तत्त्व के भिन्न नाम हैं।
साधन के रूप में गुरुमंत्र, मार्गदर्शक के रूप में श्रीसद्‌गुरु एवं साध्य इष्ट के रूप में भी श्रीसद्‌गुरु महाराज को एक ही परमसत्ता जानते हुए साधक का इनसे एकरूप होना ही आध्यात्मिक साधना की पूर्णता है।

०९-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु की भक्ति ही जीवन का सार है। श्रीसद्‌गुरु की भक्ति से ज्ञान, विज्ञान सभी कुछ मिल जाता है। श्रुतियों में उन्हीं प्रभु की पराचेतना के रूप में श्रीसद्‌गुरुदेव का ही निरूपण हुआ है। इसलिये मन और वाणी से श्रीसद्‌गुरु महाराज की आराधना सदा करते रहना चाहिये। जिस क्षण शिष्य का अहं मिट जाता है तो उसके हृदय में श्रीसद्‌गुरुदेव स्वयं प्रगट हो जाते हैं, फिर सारी साधनायें स्वतः होने लगती हैं। सभी तप अपने-आप होने लगते हैं। इसलिये श्रीसद्‌गुरु के शरणापन्न बने रहना साधना-जीवन की सर्वोच्च कसौटी है।

०८-११-२०१६

दीक्षा एक अन्तर्बेधी शक्ति है अर्थात्‌ दीक्षाशक्ति से साधक अपने अंदर खुदाई करता हुआ अपनी चेतना के मूल स्रोत तक पहुँच जाता है। जैसे कोई इंसान निरंतर एक ही स्थान पर खुदाई कर मिट्टी को बाहर फेकता हुआ गहराई पर जाकर जलस्रोत को पा लेता है, वैसे ही साधक सद्‌गुरु महाराज से दीक्षा ग्रहण कर अपने अंदर से समस्त व्यर्थ तत्त्वों को निकालने की युक्ति पा जाता है और निरंतर अंदर की ओर गति करता हुआ अंत में आत्मा के प्रकाश को प्राप्त कर लेता है। आत्म-प्रकाश को प्राप्त करने की यह क्रिया ही आध्यात्मिक साधना है। सद्‌गुरु से दीक्षा ग्रहण कर उनके मार्गदर्शन में चलकर ही उनकी कृपा से यह क्रिया सिद्ध होती है। साधक को निरंतर अंदर गति करने की शक्ति मिलती रहे, इस हेतु ही श्रीसद्‌गुरु महाराज दीक्षा के दौरान गुरुमंत्र के रूप में अपनी चेतना का एक अंश प्रदान करते हैं। सद्‌गुरु महाराज से प्राप्त गुरुमंत्र एक प्रकाश के स्रोत की तरह है जिसकी रोशनी में साधक सदा आगे बढ़ता रहता है। गुरुदीक्षा इस साधना में प्रवेश का द्वार है, जिसमें प्रवेश कर साधक आध्यात्मिक महल में चढ़ता है।

०७-११-२०१६

श्रीसद्गुरु महाराज की आज्ञानुसार चलना, सदा उन्हें प्रसन्न रखना, उनके रुख को समझते हुए उनकी हर आवश्यकता को उनके द्वारा जाहिर करने से पहले ही पूर्ण करना, सद्गुरु के दरबार व भक्तों की सेवा  करना और सद्गुरु महाराज द्वारा जन-कल्याणार्थ चलायी जाने वाली योजनाओं में प्रेम व उत्साह के साथ तन-मन-धन से सहयोग करना बाह्य-सेवा कहलाती है। श्रीसद्गुरु महाराज के द्वारा बतलाये गये नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान की साधना को पूर्ण मन व चित्त के साथ संपादित करना ही सद्गुरु महाराज की आंतरिक सेवा है।

०६-११-२०१६

संकल्प शक्ति को क्षति पहुँचाने वाला तत्त्व है -संदेह। गुरुभक्ति के संदर्भ में सद्‌गुरु में पूर्ण आस्था ही संकल्प-शक्ति का आधार होता है। गुरुभक्त के मन में संदेह-बुद्धि प्रवेश ही नहीं कर पाती। शिष्य अपनी साधना में सफलता के लिये पूर्ण रूप से सद्‌गुरु-कृपा पर आश्रित होता है। सद्‌गुरु की कृपा से शिष्य के मन में सफलता के प्रति सन्देह पनपता ही नहीं है। यह श्रीसद्‌गुरुदेव की ही महिमा है कि शिष्य सभी संदेहों व भयों से मुक्त होकर गुरुभक्ति के मार्ग पर चलता है और उसकी साधना निर्विघ्न संपन्न होती है।

०४-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरुदेव के बिना आत्मानुसंधान संभव ही नहीं है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के बतलाये हुए नाममंत्र के जप, पूजा, भजन, दर्शन, सेवा, सुमिरन व ध्यान की साधना से बुद्धि को तराशा कर सूक्ष्म बनाया जाता है और तभी आत्मा जो कि नित्य तत्त्व है उसमें प्रवेश संभव होता है, यही युक्ति है आत्म-साक्षात्कार की। जिस क्षण शिष्य अपने गुरु-स्वरूप को अपने अंदर प्रगट कर लेता है, उसी क्षण उसे आत्म-तत्त्व का प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है।

०३-११-२०१६

सद्‌गुरु प्रदत्त नाममंत्र एक परम चेतन, निराकार सत्ता है, यह अकथ है अर्थात् इसे जुबान प्रकट नहीं कर सकती, कान सुन नहीं सकते, कलम लिख नहीं सकती और भाषा इसका वर्णन नहीं कर सकती। यह मन-बुद्धि से परे की हकीकत है। यह हर प्रकार के द्वैत, हर तरह के परिवर्तनों से परे का वह सच है जो सृष्टि की हर वस्तु और हर प्राणी में बसा है। शब्द या नाम सर्वव्यापक है और हरेक जीव के अन्दर बसता है। जब भक्त के हृदय में सद्‌गुरु के चरण-कमल प्रगट होते हैं और उनके दैदीप्य नखों के प्रकाश से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है, तब नाम रूपी हीरा घट के अन्दर दिखा‌ई देता है, जो परम प्रकाश रूप है। जब परमात्मा स्वरूप सद्‌गुरु की कृपा से आन्तरिक शब्द-धुन या नाम का भेद मिल जाता है, तब जीव के अन्दर ज्ञान का सूरज प्रकाशित हो उठता है। आध्यात्मिक मार्ग में सद्‌गुरु नाम की मधुर धुन और दिव्य ज्योति सर्वोच्च रूहानी मजिल तक पहुँचने में शिष्य की सहायता करती है। जैसे अँधेरे में रास्ता भूला हु‌आ इन्सान कहीं दूर से आती हु‌ई आवाज़ की मदद से अपनी दिशा कायम कर लेता है, उसी तरह नाम की धुन शिष्य की आत्मा को अपने स्रोत की तरफ खींच लेती है। जिस प्रकार बाहर का प्रकाश राह के अवरोधों से बचाते हु‌ए सफ़र तय करने में सहायता करता है, उसी तरह दीक्षा में प्राप्त गुरुनाम की दिव्य ज्योति शिष्य को अनेक आन्तरिक रुकावटों से बचाकर गंतव्य तक पहुँचाती है। जैसे लोहा अग्नि में डालने पर अग्निमय हो जाता है, ऐसे ही सद्‌गुरु परमात्मा का नाम-सुमिरन करने वाला स्वयं परमात्मामय हो जाता है।

०२-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज सौभागी शिष्य में अपनी आध्यात्मिक शक्ति का संचार कर उसे दीक्षामंत्र प्रदान करते हैं। इस नाममंत्र के आनंद में डूबना ही भजन है। जब शिष्य की प्रत्येक श्वास-प्रश्वास नाम के रस में भीगी रहती है तो सिद्ध अवस्था प्राप्त होती है। यही साधना का सहज पथ है। सद्‌गुरु महाराज द्वारा शक्ति समन्वित दीक्षामंत्र की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है। इस मंत्र की गुह्यता में प्रवेश करने के लिये शिष्य में शरणागत भाव होना चाहिये। सद्‌गुरु से दीक्षामंत्र तो प्राप्त हो सकता है, लेकिन गुरुमंत्र की शक्ति को धारण करने के लिये पात्रता आवश्यक है। जैसे बाँस की तीली में सुचालकता न होने से विद्युत का प्रवाह असंभव है, वैसे ही सद्‌गुरु के द्वारा दिये गये मंत्र की शक्ति से जुड़ने के लिये सुचालकता आवश्यक है। शिष्य का सद्‌गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण ही वह पात्रता है जो गुरुकृपा के रूप में मंत्रशक्ति का वरण करती है। शरणागति से ही शिष्य अपने सद्‌गुरु से अनुकूलता प्राप्त करता है। ऐसा होने पर ही शक्ति-दीक्षा पूर्ण होती है। इसीलिये पूर्ण निष्ठा से मन, वाणी व कर्म को गुरु अनुरूप नियोजित करके भजन, सुमिरन व ध्यान करना चाहिये। शिष्य का चिन्तन, मनन, भावना, भजन, भक्ति आदि सभी सम्मिलित रूप से श्रीसद्‌गुरु के चरणों में प्रवाहित होना चाहिये। जैसे भुने या उबाले हु‌ए बीज में जैसे अंकुरण असम्भव है, वैसे ही सद्‌गुरु के चरणों में पूर्ण समर्पित शिष्य के मन-बुद्धि में सांसारिक विकार उत्पन्न नहीं हो सकते।

०१-११-२०१६

ब्रह्मदीक्षा प्रदान करते समय सद्‌गुरु अपनी दिव्य दृष्टि से शिष्य को शक्ति-ग्राह्यता प्रदान करते हैं और उसमें अपनी ब्राह्मी ऊर्जा प्रवाहित करते हैं। सद्‌गुरु अपने शिष्य में मंत्रशक्ति को स्थापित कर उसके ब्रह्मबीज को सप्राण बनाते हैं। सद्‌गुरु की मंत्रदीक्षा से शिष्य में ब्रह्मत्व का पहला अंकुर फूटता है। श्रीसद्‌गुरुदेव प्रदत्त मन्त्र की साधना-विधि समझाते हैं, जिससे मंत्र शिष्य में अभीष्ट ऊर्जाशक्ति के रूप में फलीभूत होता है। इस तरह सद्‌गुरु की ब्रह्मदीक्षा में दीक्षित हु‌आ शिष्य परम शान्ति को अन्त:करण में धारण करता हु‌आ दिव्य तत्त्वों से परिपूर्ण हो जाता है। लेकिन ये दिव्य तत्त्व बीज रूप में ही होते हैं। इन दिव्य बीजों के अंकुरण एवं विकास के लिये स्वयं को नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना में डुबोना पड़ता है। जिस प्रकार समय से पूर्व डिम्ब गर्भ से बाहर आये बीज का अंकुरण संभव नहीं होता है, वैसे ही गुरुमन्त्र की साधना परिपक्व हु‌ए बिना सार्वजनिक होने पर निष्फल हो जाती है। इसीलिये शिष्य को चाहिये कि वह गुरु द्वारा बतलाये गये साधना क्षेत्र (यथा- हृदय चक्र, आज्ञा-चक्र अथवा सहस्रार) में, गुरु प्रदत्त निर्देशों का दृढ़ता से पालन करते हु‌ए, गुरुमंत्र की साधना गुप्त रूप से करता रहे और अपनी साधना को कभी भी सार्वजनिक न करे। ऐसी साधना के परिणामस्वरूप सफलता स्वयं उस शिष्य का आलिंगन करती है।

३१-१०-२०१६

मंजिलें आ जाती हैं खुद ही उसके कदमों के तले।
दर में मालिक के जिस दास का सारा संसार गले॥

उस शिष्य के जीवन में को‌ई भी रिक्तता नहीं बचती जो दास भाव से अपने सद्‌गुरु के समीप रहता है और गुरुसेवा ही जिसका कर्तव्य होता है। दास भाव समर्पण का भाव है, मालिक के मौज में जीने का भाव है। अनेक जन्मों की साधना के बावजूद जो अहंकार, मन और कुतर्क-बुद्धि जैसे दुर्गुण मिटने का नाम तक नहीं लेते, सद्‌गुरु के चरणों में दासत्व स्वीकारने के पल से ही वो तिरोहित हो जाते हैं। इसीलिये परमसंतों ने स्वयं को अपने सद्‌गुरु के चरणों का दासनदास कहा है। सांसारिक अर्थों में दास कहते ही मन में अनेक यातना‌ओं को सहने वाले व्यक्ति की छवि आ जाती है, लेकिन आध्यात्मिक अर्थों में सद्‌गुरु के चरणों का दास तो भक्त-शिरोमणि होता है। बड़े सौभाग्य से ही सद्‌गुरु के दास की पदवी मिलती है। जिसके अन्तस् में दीक्षा ग्रहण करते ही दास भाव जाग्रत हो जाता है, उसी क्षण से उसके जीवन में अध्यात्म धारा का प्रवाह फूट पड़ता है और हृदय में प्रेम, भक्ति, आस्था, श्रद्धा व समर्पण की फसल लहलहाने लगती है। दासनदास को गुरु स्वयं अपने हृदय में समा लेते हैं। सद्‌गुरु का दासनदास एक पल में ही साधक, शिष्य व भक्त की अवस्था को लांघ जाता है और सदा गुरु की कृपावृष्टि में भीगा रहता है।

३०-१०-२०१६

ध्यान का अर्थ है ध्येय में एकतार रूप से होश को लगाना। शिष्य के लिये श्रीसद्‌गुरु महाराज ही एकमात्र ध्येय हैं और जब शिष्य निरंतर श्रीसद्‌गुरु महाराज की महिमा के चिंतन व उनके गुणों के मनन में लीन होने लगता है, तो मन में सद्‌गुरु के अलाव अन्य को‌ई भी विचार उत्पन्न नहीं होता, श्रीसद्‌गुरु महाराज पर ही पूर्ण एकाग्र हु‌ए मन की यही अवस्था ध्यान है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के दिव्य स्वरूप के निरंतर ध्यान से मन के समस्त द्वंद्व शांत हो जाते हैं, विषय भोगों के प्रति अनासक्ति पैदा होती है, कामना और अपने-पराये का भाव मिट जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की कृपा से प्राप्त होने वाली यह अवस्था ही वैराग्यता है, वैराग्य भाव से ही शिष्य में विवेक-बुद्धि तीक्ष्ण होती है और उसे सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्म-तत्त्व को ग्रहण करने की योग्यता अनायास ही प्राप्त हो जाती है। उसके मन के सभी अवगुण नष्ट हो जाते हैं और उसमें सद्गुणों का प्रादुर्भाव होता हैं। उसके मन में यह दृढ निश्चय हो जाता है कि संसार के सभी पदार्थ माया रूप होने से अनित्य हैं, अर्थात उनका को‌ई अस्तित्व नहीं है और एकमात्र श्रीसद्‌गुरु ही सर्वत्र समभाव से परिपूर्ण हैं। सद्‌गुरु की संचालक व नियामक शक्ति का एहसास होने पर शिष्य यह जान जाता है कि सद्‌गुरु ही इस जगत् के कर्णधार है और यही ज्ञान उसे अकर्त्तापन के भाव से भर देता है। सृष्टि के एकमात्र कर्त्ता श्रीसद्‌गुरु परमात्मा के स्वरूप में जब इस प्रकार की प्रगाढ़ स्थिति बनती है, तो अपने साथ-साथ उसे जगत् का भी विस्मरण हो जाता है और एक अपूर्व आनंद अनुभव होता है, यही ध्यान है।

 २९-१०-२०१६

सद्‌गुरु-भजन व सद्‌गुरु-सेवा दोनों में अगाध प्रेम का होना आवश्यक है। सेवा आन्तरिक प्रेमभाव का सगुण साकार स्वरूप होता है और सेवा से आन्तरिक साधना को दृढ़ता व प्रेम को प्रगाढ़ता प्राप्त होती है। प्रेमपूर्वक अपना सब कुछ श्रीसद्‌गुरु को समर्पित करके, निष्काम भाव से गुरु की सेवा करना ही प्रेमाभक्ति का प्रमुख अंग है। श्रीसद्‌गुरु के प्रति निष्काम प्रेम सर्वोत्कृष्ट भाव है। गुरुप्रेम तो जीवन है, हृदय रूपी मानसरोवर में खिला कमल है। प्रेम निरहंकारिता है व संपूर्ण जीवन का गौरव है। गुरुप्रेम की विशालता इतनी है कि यह पूरे ब्रह्माण्ड को अपने-आप में समा लेता है। प्रेम प्रणव है क्योंकि इसी के सहारे आकाश की सुदूर ऊँचा‌ईयों को पाया जा सकता है, अनंत आकाश में उड़ा जा सकता है और संपूर्णता के साथ श्रीसद्‌गुरु से एकाकार होकर जीवन की सार्थकता को प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिये शिष्य को चाहिये कि वह श्रीसद्‌गुरु भगवान् के नाम के भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना को अपने जीवन के प्रति क्षण का हिस्सा बनाये, श्रीसद्‌गुरु का संग पाने की हर संभव कोशिश करता रहे और सेवा, भजन व सत्संग करते हुये मन में समर्पण के भावों को बढ़ाता रहे।

२८-१०-२०१६

ज्ञान का अर्थ जानकारी मात्र न होकर चेतना के ऐसे प्रकाश से है जिसके तले जीवन के सत्य उजागर होते हैं। सद्‌गुरु ही शिष्य के जीवन में दीक्षा के माध्यम से इस चेतना प्रकाश को भरते हैं। इस प्रकाश में शिष्य को अपने सभी बंधनों का अनुभव होने लगता है और उसके अंदर अपने सभी पाश्विक भावों से मुक्त होने का भाव जागने लगता है। जब तक जीवन में सत्य ज्ञान का उदय नहीं होता है, मनुष्य इन बंधनों को ही अपना जीवन समझता है, उदरपूर्ति व सांसारिक वासना‌ओं को पूर्ण करने में ही जीवन की सफलता समझता है। सांसारिक वासनायें छिद्र युक्त घड़े में भरे जल के समान हैं, जिसे चाहे जितने बार भी भरने की कोशिश की जाये, वह कभी भी नहीं भरता। सांसारिक वृत्तियों की तृप्ति असंभव है। इसीलिये जीवन भर वासनापूर्ति में लगे रहने के बाद भी जीवन में रिक्तता बनी ही रहती है और जीवन सदा अपूर्ण बना रहता है। दीक्षा के उपरांत विषय-वासनायें क्षींण होती है और जीवन सद्भावों से भरता है। सद्‌गुरु द्वारा दीक्षा के दौरान बतलायी गयी साधना से जीव की बाहरी पकड़ ढीली होती है और शिष्य में अंतर्मुखता बढ़ती है। जीवन के सारे अनमोल खजाने तो मनुष्य के अंदर ही होते हैं और सद्‌गुरु की कृपा रूपी प्रकाश में ही दिखा‌ई पड़ते हैं। एक बार शिष्य को इन आंतरिक खजानों का आभास हो जाये, तो वह बाहरी दुनिया के समस्त आकर्षणों को कंकड़-पत्थर की तरह छोड़ देता है। गुरुदीक्षा रूपी सरिता के अंदर अनमोल रत्नों के अंबार भरे पड़े हैं, जो भक्त इसमें डुबकी लगता है, वह इन अंबारों का स्वामी बन जाता है। दीक्षा रूपी वृक्ष अर्थ, धर्म, काम व मोक्ष इन चारों फलों को देने वाला है।

२७-१०-२०१६

ऊपरी तौर से देखने पर शिष्य जीवन की उपलब्धियाँ शिष्य के तप और पुरुषार्थों का परिणाम प्रतीत होती है, जबकि सत्यता यह है कि शिष्य का आध्यात्मिक विकास गुरु की कृपा एवं उनके ही प्रयासों का नतीजा होता है। जिस तरह सिनेमा के चलचित्र तो परदे पर दिखा‌ई देते हैं, लेकिन वास्तव में चलचित्र को परदे में झलकाने का कार्य दूर किसी मशीन द्वारा चुपचाप संपादित होता है। वैसे ही शिष्य एक परदे की तरह ही है, जिसमें झलकने वाले सभी रंग श्रीसद्‌गुरु की कृपा के ही होते हैं। सद्‌गुरु दीक्षा के माध्यम से शिष्य के मानस-पटल को इतनी निर्मलता प्रदान करते हैं कि उसमें आध्यात्मिकता के रंग व लक्षण उभर सकें। सद्‌गुरु की यह क्रिया-प्रणाली इतनी गुप्त होती है कि शिष्य को भी इसका आभास नहीं हो पाता है। जब संपूर्ण जगत्‌ शिष्य की आध्यात्मिक उपलब्धियों की सराहना करता है, तो गुरु का हृदय ही सर्वाधिक गद्‌गद्‌ होता है, आखिर मूर्ति की प्रशंसा में मूर्तिकार से अधिक भला अन्य कौन खुश हो सकता है।

२६-१०-२०१६

गुरुदीक्षा सद्‌गुरु महाराज द्वारा अपने चैतन्य, तप, पुण्य एवं ज्ञान के एक अंश को शिष्य में स्थापित करने का महान आध्यात्मिक प्रयोग है। जैसे एक बागवान्‌ द्वारा सामान्य पौधे में उन्नत पौधे की कलम लगाने जैसा है। गुरुदीक्षा के उपरांत सद्‌गुरु की दिव्य चेतना का अंश शिष्य के जीवन में स्थापित होता है जो गुरुभक्ति, प्रेम, श्रद्धा व समर्पण से सिंचित होकर निरंतर संवर्धित होता है और शिष्य के पूरे जीवन को दिव्यता से भर देता है। शिष्य द्वारा श्रीसद्‌गुरु महाराज का सतत-स्मरण जब उसकी भावनात्मक अनुभूति से जुड़ने लगता है तो शिष्य के हृदय में सद्‌गुरु के प्रति प्रेम का अंकुरण होता है। सद्‌गुरु के प्रति यह प्रेम ही शिष्य को हर क्षण जीवन्त बनाये रहती है। इसी जीवन्तता में शिष्य की आध्यात्मिक यात्रा संपन्न होती है।

२५-१०-२०१६

गुरुदीक्षा में सद्‌गुरु अपनी शक्ति के एक अंश से मंत्र को चैतन्य करते हैं और चेतना के इस बीजमंत्र को शिष्य को प्रदान करते हैं। सद्‌गुरु का यह चेतनामंत्र शिष्य को संस्कारित करता है, जिससे कि शिष्य के जीवन में किसी प्रकार की प्रतिकूलता उसे दुर्भाग्य के रूप में प्रभावित न करे। यह संस्कार सभी परिस्थितियों में शिष्य को अनुकूलता प्रदान करता है। इस शक्तियुक्त गुरुमंत्र के प्रभाव से  प्रारब्धवश आने वाले दुर्योग भी टल जाते हैं। गुरु प्रदत्त इस गुरुमंत्र की शक्ति एवं चेतना के कारण शिष्य ज्ञान से आपूरित होने लगता है। इस गुरुमंत्र की महिमा यह भी होती है कि यह शिष्य के पूर्व जन्मों में अर्जित विद्याओं एवं योग्यताओं को एकत्र कर वर्तमान जीवन में जोड़ देता है। इसीलिये अनेक बार गुरुदीक्षा के समय ऐसे चमत्कार देखे गए हैं कि दीक्षा लेते ही शिष्य में अविश्वनीय रूप से सदाचार, प्रेम, ज्ञान व भक्ति के गुण प्रगट हो जाते हैं। सद्‌गुरु के दीक्षामंत्र की चेतना शिष्य को अपने पूर्व जन्म की विद्याओं का स्मरण करा देती हैं।

२४-१०-२०१६

गुरुदीक्षा एक पावनकारी संस्कार है जिसके माध्यम से श्रीसद्‌गुरु शिष्य में सद्‌गुणों की वृद्धि एवं दोषों का उन्मूलन करते हैं। गुरुदीक्षा द्वारा सद्‌गुरु महाराज शिष्य के मन, बुद्धि, भावनाओं व आत्मा का परिमार्जन करते हैं, इसीलिये गुरुदीक्षा को शुद्धि-संस्कार भी कहते हैं। गुरुदीक्षा मनुष्य के सभी दोषों का शोधन कर उसे प्रत्येक स्तर पर सुसंस्कृत शिष्य बनाने का एक प्रावधान है। श्रीसद्‌गुरु महाराज शिष्य को दीक्षा प्रदान कर उसमें अभीष्ट गुणों को जन्म देते हैं। आध्यात्मिक उन्नति मानव के चरम विकास का पर्याय है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए शिष्य के जीवन में अनुशासन व दैवी गुणों का आविर्भाव होना अत्यंत आवश्यक है और गुरुदीक्षा से इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। श्रीसद्‌गुरु महाराज अपने शिष्य को संयमित दिनचर्या पर चलाकर एक ओर उसके बाह्यरूप को संस्कारित करते हैं, वहीं दूसरी ओर नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान द्वारा उसके आंतरिक स्वरूप को तब तक निखारते रहते हैं जब तक कि शिष्य को अपने निखरे हुए स्वरूप की झलक दिखने लगे। जब शिष्य की संपूर्ण कलुषता मिट जाती है और उसका आंतरिक स्वरूप स्वच्छ दर्पण की भाँति हो जाता है तो सद्‌गुरु-परमात्मा की झलक उसे अपनी आत्मा में ही दिखाई देने लगती है। गुरुदीक्षा शिष्य में सद्‌गुणों का आधान करती है, इसीलिये सर्वोत्तम संस्कार के रूप में प्रतिष्ठित है। सांसारिक जगत्‌ में भी कम मूल्य वालों वस्तुओं को उपचारित कर अधिक मूल्यवान्‌ बनाया जाता है। जैसे मृदा अयस्कों से अवांछनीय पदार्थों को निकालकर परिशोधन द्वारा धातु बनाया जाता है। वैसे ही दीक्षा द्वारा सद्‌गुरुदेव शिष्य के अल्प मूल्य अथवा मूल्यहीन जीवन को बहुमूल्यता प्रदान करते हैं। शिष्य में दुर्गुणों का निकास व दिव्य गुणों का प्रवेश ही गुरुदीक्षा संस्कार का प्रयोजन है।

२३-१०-२०१६

साधक को आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने के लिये निरंतर उत्साहपूर्वक भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना करना नितान्त आवश्यक है। श्रीसद्‌गुरु में पूर्ण भक्ति व अटल विश्वास होने पर श्रीसद्‌गुरु की कृपा से शिष्य को निःसंदेह पूर्ण रूपेण श्रीसद्‌गुरु की सहायता मिलती है। श्रीसद्‌गुरु की अनुकम्पा से साधक को परमात्म सुख का परम अनुभव उपलब्ध होता है।
सद्‌गुरु संबल जीव का, रखो हृदय विश्वास।
ध्यान भक्ति सेवा करो, जपो नाम हर स्वाँस॥
ईश्वर, ब्रह्म, सत्य आदि सभी सद्‌गुरु सत्ता के ही भिन्न-भिन्न नाम हैं। सेवा, भक्ति व समर्पण से श्रीसद्‌गुरु को सदा प्रसन्न रखना चाहिये। अपने चित्त को श्रीसद्‌गुरु की सेवा में लगा दो, गुरु की आज्ञा का पालन भक्तिभाव से करो, सद्‌गुरु के श्रीमुख से निकले शब्दों में पूर्ण श्रद्धा रखो तभी जीवन में सुधार हो सकेगा। ज्ञान व मुक्ति प्राप्त करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा उपाय नहीं है। अपने आराध्य परम पूज्य श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी की पूजा ईश्वरीय भाव से करनी चाहिये। यह भली-भाँति समझ लेना चाहिये कि ईश्वर और ब्रह्म की सभी शक्तियाँ श्रीसद्‌गुरु में विद्यमान है। श्रीसद्‌गुरु के दर्शन में सदा देवत्व के दर्शन करना चाहिये। ऐसा होने पर ही शाश्वत्‌ ब्रह्मानंद की प्राप्ति होती है।

२२-१०-२०१६

ध्यान में केवल विचार शून्यता का घटित होना मानसिक शांति तो दे सकता है, लेकिन आनंद नहीं। आनंद तो सद्‌गुरु महाराज के स्वरूप को ध्यान में बसाने पर ही प्राप्त होता है। शून्य ध्यान के लिये निर्विचार होना पर्याप्त है, लेकिन आनंद-ध्यान श्रीसद्‌गुरु स्वरूप के दर्शन से ही संभव है। अपने सद्‌गुरु के स्वरूप में लीन होना ही ध्यान का लक्ष्य है। श्रीसद्‌गुरु महाराज आनंद स्वरूप हैं। जैसे-जैसे शिष्य ध्यान में परम आनंद स्वरूप श्रीसद्‌गुरु महाराज के दर्शन पाता है, वैसे-वैसे दुःख और भय से मुक्त होकर आत्मभाव में प्रतिष्ठित होता जाता है। जिस तरह मिस्री की एक ढेली को जिव्हा पर रखते ही पूरा मुँह मीठा हो जाता है, वैसे ही ध्यान में आनंद स्वरूप श्रीसद्‌गुरु महाराज की एक झलक मात्र से शिष्य आनंद से भर जाता है। कुछ दिनों की साधना के पश्चात्‌ ध्यान में गुरु की मोहनी मूरत स्थायी रूप से स्थिर हो जाती है, शिष्य अपनी आँखें मूँदकर दिन-रात उस दिव्य स्वरूप के आनंद में खोया रहता है। यह गुरुदर्शन का आनंद उसके रग-रग में इस तरह रच-बस जाता है कि शिष्य स्वयं आनंद का झरना बन जाता है। ऐसे शिष्य के जीवन से आनंद की सुवास चारों ओर फैलने लगती है, जो भी उसके सान्निध्य में आता है वह समझ जाता है कि इसके जीवन में गुरुभक्ति के बेल फैल चुकी है और इसका जीवन आनंद-फल से परिपूर्ण है। ऐसा शिष्य पूरी मानव-जाति में सद्‌गुरु के आनंद की लहर फैला देता है।

२१-१०-२०१६

सूरज की तरह ही सद्‌गुरु भी आध्यात्मिक ऊर्जा के अक्षय-स्रोत हैं। सद्‌गुरु के वचन व कर्म से सदा ज्ञान की रश्मियाँ ही निकला करती हैं, यह ज्ञानपुंज जिस शिष्य के अन्तस् में प्रवेश करता है, उसके सभी अज्ञान आवरण दूर हो जाते हैं। सद्‌गुरु के इस ज्ञान प्रकाश को ग्रहण करने के लिये शिष्य बनकर अपने हृदय को खोलना होगा, सद्‌गुरु महाराज को अपने हृदय में जगह देनी पड़ेगी, फिर जन्मों के अज्ञान रूपी अंधकार के हटने में पल भर की देर नहीं लगेगी। सूर्य से हमें केवल प्रकाश ही नहीं प्राप्त होता, अपितु सूर्य से ही हमारा भौतिक जीवन पोषित है। सूर्य के प्रकाश से वनस्पतियाँ पोषक तत्त्वों का संश्लेषण करती हैं और उन वनस्पतियों के सेवन से ही हमारा जीवन है। वैसे ही सद्‌गुरु के ज्ञान से न केवल आध्यात्मिक जीवन प्रशस्त होता है, अपितु जीवन के सर्वांगींण विकास हेतु सभी आवश्यक तत्त्व भी प्राप्त होते हैं। गुरु ही हमारे जीवन में उज्ज्वल भविष्य की नींव रखते है।

२०-१०-२०१६

जो नदियाँ समुद्र की तरफ की न बहकर बेतरतीब रूप से क‌ई धारा‌ओं में बँट जाती हैं और अनेक दिशा‌ओं में बहती रहती हैं, वे अपने गंतव्य समुद्र तक न पहुँचकर तप्त धरती में ही विलीन जाती हैं। वैसे ही शिष्य की चेतना यदि पूर्ण रूप से सद्‌गुरु की ओर प्रवाहित न होकर सांसारिक भटकावों में भटकती रहती है, तो भवतापों का शिकार बन जाती है और आवागमन के दुष्चक्र में फँस जाती है। इसीलिये शिष्य को अपनी चेतना को संसार के अनेक प्रकार के भटकावों से समेटकर मात्र श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में ही लगा देना चाहिये। शिष्य की सभी प्रवृत्तियाँ व भावनायें गुरुन्मुख ही होना चाहिये, उसके सर्वकार्य श्रीसद्‌गुरु की प्रसन्नता के लिये ही होने चाहिये, तभी गुरु और शिष्य का महामिलन होता है। नदी जितने वेग के साथ समुद्र की ओर बहती है उतनी शीघ्र वह अनंत समुद्र में मिलकर अनंत बन जाती है। वैसे ही भक्ति की जितनी प्रगाढ़ता से शिष्य अपने सद्‌गुरु को पाने हेतु नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान में गति करता है, उतनी त्वरा के साथ वह गुरु के परम मिलन को प्राप्त होता है। जैसे दलदल अथवा धूल मिट्टी में सना जल अधिक दूरी तक गति नहीं कर सकता, वैसे ही सांसारिक कीचड़ में फँसा जीव भी आध्यात्मिक गति नहीं कर सकता है। शिष्य को अपनी भावना‌ओं को निर्मल रखने का सतत प्रयास करना चाहिये।

१९-१०-२०१६

जो साधक गुरुदीक्षा लेकर भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना पूरी निष्ठा व श्रद्धा के साथ करते हैं तथा श्रीसद्‌गुरु के चरणों में अपना सब कुछ समर्पित कर देते हैं, ऐसे साधक निश्चित ही जीवन में उच्च शिखर पर पहुँचते हैं। जिसके मन में गुरुभक्ति के पथ पर चलने का उत्साह हो, हृदय में मालिक से मिलने की तड़प हो, जिसमें श्रीसद्‌गुरु से एकाकार होने की चाह हो, वह गुरुभक्त ही जीवन में आध्यात्मिक उपलब्धियों को पा सकता है। जिसने गुरु को जान लिया उसने ब्रह्म को जान लिया। जो गुरु से एकाकार हो गया तो समझो वह ब्रह्म में लीन हो गया।

 १७-१०-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज के द्वारा बतलायी गयी साधना से ही शिष्य अपने आत्म-स्वरूप का साक्षात्कार करता है। आत्मा का यही शुद्ध स्वरूप ज्ञानावस्था  है। अनेक जन्मों के संचित संस्कारों से निर्मित वृत्तियाँ आत्मा के  शुद्ध स्वरूप को आवृत किये रहती हैं, यही अज्ञान की अवस्था है। श्रीसद्‌गुरु-भक्तियोग  की साधना से ही शिष्य के चित्त की स्थूल वृत्तियों और सूक्ष्म-संस्कारों का निरोध होता है, तदुपरांत आत्मा पूर्ण प्रकाश के साथ उजागर होती है। यही वह ज्ञान-प्रकाश जिसमें जीवन के सभी रहस्य स्वयं उजागर हो जाते हैं और जानने को कुछ भी शेष नहीं बचता है। यही है परा-भक्तियोग। इस भक्तियोग के सधते ही समस्त आसन क्रियाएँ, मुद्राएँ, प्राणायाम, यम, नियम आदि स्वचालित हो जाते हैं, शिष्य को इन्हें साधने हेतु अलग से कोई प्रयास नहीं करना पड़ता है।


१६-१०-२०१६

सभी चिन्ताओं से मुक्ति पाने का एक ही उपाय है- समर्पण। जैसे एक नन्हा बच्चा अपना हाथ पिता को पकड़ाकर मार्ग की चिन्ता नहीं करता, उसे पूर्ण विश्वास होता है कि वह अपने पिता के सहारे हर हालत में घर तक पहुँच ही जायेगा। एक शिशु अपनी माँ पर पूर्ण आश्रित रहता है, उसे अपने आहार की भी चिन्ता नहीं होती। वैसे ही जब एक शिष्य सद्‌गुरु पर पूर्ण रूप से समर्पित होता है, अपने सद्‌गुरु पर जब उसकी अटूट श्रद्धा व आस्था होती है तो श्रीसद्‌गुरु महाराज स्वयं उसकी हर आवश्यकता को पूर्ण कर गंतव्य तक पहुँचा देते हैं। इसमें एकमात्र यही अनिवार्यता है कि शिष्य अपने जीवन को पूरी तरह से सद्‌गुरु के श्रीचरणों में सौप दे। सद्‌गुरु के श्रीचरणों में पूर्ण समर्पण से ही असीम शांति का अनुभव होता है। चूँकि समर्पित शिष्य में कोई स्वार्थ भाव नहीं होता अतः उसके जीवन में कोई विघ्न भी नहीं होते हैं। ऐसी परम शरणागति में सद्‌गुरु के संग प्रेमासक्ति के अलावा अन्य सभी आसक्तियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं। सद्‌गुरु के प्रति प्रेम की यह आसक्ति जीवात्मा को बाँधती नहीं है, बल्कि उसके समस्त बन्धनों को सफलतापूर्वक छिन्न कर देती है। मनुष्य में अपनी श्रेष्ठता की समस्त भ्रांतियाँ अहंकार रूप में प्रगट होती हैं अतः सर्वप्रथम अपने अहंकार को सद्‌गुरु के श्रीचरणों में विलय कर एक नन्हें बालक की तरह निश्चिंत हो जाओ।

०८-१०-२०१६

संपूर्ण आकाश एवं उसमें निहित जड़-चेतन सृष्टि गुरुशक्ति के ही अवयव तत्त्व हैं। गुरुशक्ति में संपूर्ण सृष्टि अपने समस्त अवयवों सहित समायी है। सृजन, पालन, संहार आदि सभी क्रियाएँ एवं समस्त भाव सभी इसी गुरुशक्ति में समाहित हैं। गुरुशक्ति ने प्रेम, दया, करुणा, कृपा आदि भावों को अपने देहधारी अवतार अर्थात्‌ श्रीसद्‌गुरुदेव के रूप प्रगट किया है। श्रीसद्‌गुरु महाराज ही जीवों को भवसागर से पार लगाने वाले उद्धारक हैं। श्रीसद्‌गुरु के समस्त क्रिया-कलाप व योजनाएँ जन-कल्याण हेतु ही हैं। उनके द्वारा दी जाने वाले परम पावनकारी दीक्षा का प्रयोजन भी जीव की मुक्ति है। उनके श्रीमुख से निःसृत उपदेश निर्मल ज्ञान की धारा है, इसमें जिसने भी डुबकी लगायी उसने निश्चित ही आत्म-प्रकाश की झलक पायी है। देहधारी सद्‌गुरु सृष्टि चेतना का परिमार्जित एवं पवित्रतम स्वरूप हैं। उनकी चेतना पारस प्रभाव से युक्त है, जो भी सद्‌गुरु महाराज की शरण ग्रहण करता है वह निर्मल चेतना से युक्त हो जाता है।

०७-१०-२०१६

गुरुदीक्षा सद्गुरु का दुर्लभ कृपा प्रसाद है, जिसमें गुरुमंत्र के माध्यम से सद्गुरु साधक की मानस भूमि में प्रविष्ट करते हैं और उसकी मनोभूमि में आध्यात्मिकता का बीजारोपण करते हैं। इस इष्ट मंत्र के नियमित जप-भजन से शिष्य सद्गुरु की दिव्यता की अनुभूति पाता है। श्रीसद्‌गुरु के दिव्य स्वरूप के प्रभाव से एक दिन शिष्य स्वयं भी दिव्य और भव्य स्वरूप को उपलब्ध होता है। इस तरह एक प्रदीप्त दीपक से दूसरे दीपक का जीवंत हो उठना ही गुरु-शिष्य परंपरा है। जो शिष्य मन की कुटिलताओं को त्यागकर प्रेम व श्रद्धायुक्त हृदय से सद्‌गुरु महाराज का सत्संग करते हैं और निष्कपट भाव से सद्गुरु के चरणों का सहारा लेकर भजन-भक्ति करते हैं, वे अवश्य ही गुरुकृपा से धन्य होते हैं, इसमें तनिक भी संदेह  नही है।

०६-१०-२०१६

श्रीसद्‌गुरु की दीक्षा से जीवन के सभी भटकाव समाप्त होते हैं। दीक्षा लेने के पश्चात्‌ शिष्य की सभी वृत्तियों व कार्य-कलापों का सूत्रपात ज्ञान अर्जन की दिशा में होने लगता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की दीक्षा दीक्षा ग्रहण करते ही शिष्य को प्रेम, भक्ति, आत्मबल, चेतना आदि अनायास ही उपलब्ध हो जाते हैं। इन अनमोल तत्त्वों को प्राप्त करने के लिए फिर उसे इधर उधर नहीं भटकना पड़ता। गुरुदीक्षा से शिष्य को सद्‌गुरु के सत्संग का अधिकार मिल जाता है। श्रीसद्‌गुरु के सत्संग से शिष्य भक्ति व ज्ञान के मार्ग का पथिक बन जाता है और फिर ज्ञान अर्जन की दृष्टि से उसके जीवन में वेद-पुराण आदि का कोई औचित्य नहीं बचता। ऐसा साधक जीवन के समस्त अनिवार्य कर्मों को संपन्न करता हुआ भी संसार से निर्लिप्त रहता है। दूसरे शब्दों में श्रीसद्‌गुरु से दीक्षित हुआ शिष्य सदा मुक्त अवस्था में ही रहता है। दीक्षा एक ऐसा संस्कार है जो शिष्य को आजीवन सुसंस्कृत बनाए रखता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जो शिष्य सद्‌गुरु से दीक्षा लेकर गुरुभक्ति से जुड़ जाता है उसका इस जीवन में अधोपतन तो होता ही नहीं और मृत्यु के बाद भी वह फिर कभी निम्न योनियों में नहीं भटकता है। यदि शिष्य सद्‌गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित है तो मात्र दीक्षा की महिमा से ही वह अध्यात्म के उच्चतम सोपान में प्रवेश कर जाता है। दीक्षा सद्‌गुरु द्वारा शिष्य को दिया गया वह दान है जिससे जीवन में सम्पन्नता, धन, यश, वैभव, पराक्रम, आरोग्यता, सुख और दिव्यता प्राप्त होती है। अध्यात्म की ऊँचाइयों को छूकर परमहंस की स्थिति प्राप्त करने के लिये दीक्षा ही एकमात्र विकल्प है।  मानव के सीमित जीवन में मोक्ष की महासाधनाओं को संपन्न कर पाना असंभव है, लेकिन गुरुदीक्षा ही ऐसी युक्ति है जिससे जीवन्मुक्ति की समस्त साधनाएँ स्वतः ही शिष्य के भीतर स्थापित हो जाती हैं। सार रूप में दीक्षा ही गुरुधाम का दिव्य द्वार है।

 ०५-१०-२०१६

आत्मीय मूल्यों का प्रकाशन है- गुरुदीक्षा
वेद, उपनिषद्‌ आदि के पठन-पाठन से तो केवल जानकारी संग्रह बढ़ता है, लेकिन उनमें जिस ज्ञान-तत्त्व की चर्चा है उसे आचरण, व्यवहार व अनुभव में लाना बिल्कुल अलग बात है। विद्या अर्जन और ज्ञान प्राप्ति में बहुत अन्तर है। उदाहरण के तौर पर किसी प्रकाश स्रोत की जानकारी एकत्र कर लेना यदि विद्या अर्जन है तो हाथ में प्रकाश पुञ्ज का होना ज्ञान है। विद्या एक सामान्य व्यक्ति अथवा शास्त्र से भी ग्रहण की जा सकती है लेकिन ज्ञान केवल सद्‌गुरु से ही प्राप्त होता है।जब तक मनुष्य की चेतना में जन्मों के संचित मलों की कालिख चढ़ी होती है तब तक ज्ञान का अत्मसात्‌ होना असंभव है। वास्तव में जीवन में सत्य-तत्त्व का प्रकाश बाह्य साधनों द्वारा संभव ही नहीं है। जिस तत्त्व को विद्या के अर्जन द्वारा समझने की कोशिश होती है वह तत्त्व तो मनुष्य के अंदर स्वयं विद्यमान है, आवश्यकता है उन मलिन आवरणों को उतारना जिनसे हमारी ज्ञान-चेतना ढँकी हुई है फिर वह तत्त्व स्वयं ही अपना प्रकाश चारों ओर बिखेर देता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा दीक्षा के दौरान बतलायी गयी नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन व दर्शन की साधना से ही ये अज्ञानता के मलिन आवरण विदीर्ण होते हैं और शिष्य का पूरा अस्तित्व ज्ञान-चेतना के प्रकाश से रोशन होता है।

 ०४-१०-२०१६

सद्‌गुरु पराचेतना का साकार रूप हैं, उनके रोम-रोम से चेतना का प्रवाह होता है। सद्‌गुरु-चेतना पारस की महिमा से युक्त है, अर्थात्‌, सद्‌गुरु के समीप आते ही शिष्य भी चेतनावान्‌ हो जाता है। सद्‌गुरु का सामीप्य दीक्षा ग्रहण करने पर ही मिलता है, अतः यह कहना अधिक उचित होगा कि सद्‌गुरु द्वारा शिष्य को अपने पास लाकर सचेतन बनाने की युक्ति है-दीक्षा। दीक्षा में प्राप्त गुरुमंत्र परमचेतना का बीज है जो जप, भजन व सुमिरन के माध्यम से शिष्य की आत्मचेतना को  समेटकर अपने चारों ओर केन्द्रित करता है और इस तरह आत्मा की समग्र चेतना के प्रकाश को झलकाता है। दीक्षा-संस्कार के साथ ही शिष्य में यह प्रक्रिया स्वत: शुरू हो जाती है। दीक्षा वह दुर्लभ प्रक्रिया है जिसके द्वारा सद्‌गुरु शिष्य की समस्त मलिनताओं को हटाकर उसके जीवन में कान्ति व पूर्णत्व प्रदान कर उसे नर से नारायण बनाते हैं। दीक्षा आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ है जिसमें शिष्य सद्‌गुरु की कृपा से आत्मा का साक्षात्कार करता है एवं परमात्म तत्त्व अर्थात्‌ श्रीसद्‌गुरुदेव से एकत्व स्थापित करता है।
सद्‌गुरु का स्थूल विग्रह परमात्म तत्त्व को झलकाने वाला दर्पण है। परमात्मा या ब्रह्म का सत्-चित्-आनन्द स्वरूप ही श्रीसद्‌गुरु अवतार है। दीक्षा के बिना सद्‌गुरु ब्रह्म की ओर गति और सिद्धि संभव नहीं है। जिस तरह वर्षा में खड़े होने पर संपूर्ण देह भीग जाती है वैसे ही सद्‌गुरुदेव के सान्निध्य में शिष्य ज्ञान से सरावोर रहता है। सद्‌गुरु के श्रीमुख से निकले उपदेशामृत श्रद्धावान्‌ शिष्य के हृदय में ज्ञान का प्रकाश भरते हैं। श्रद्धा और समर्पण के द्वारा ही सद्‌गुरु के ज्ञानामृत दोहन से आप्लावित होकर शिष्य अनंत सिद्धियों का स्वामी बनता है।
दीक्षा उपरांत शिष्य की साधना में गुणात्मक वृद्धि होती है। जैसे एक किसान बीज बोने के लिये भूमि को तैयार करता है और अंकुरण के पश्चात्‌ खरपतवार को निकाल फेकता है ताकि भूमि की संपूर्ण उर्वरा शक्ति फसल की पैदावार बढ़ाने में ही लगे। उसी प्रकार सद्‌गुरु अपने शिष्य को ज्ञानार्जन हेतु योग्यता प्रदान कर उसके मन से सांसारिक प्रलोभनों को हटाते हैं ताकि उसकी संपूर्ण चेतनाशक्ति आध्यात्मिक प्रगति में ही लगे।

०२-१०-२०१६

मानव जीवन की सार्थकता यही है कि जीव को मालिक के नाममंत्र के भजन-भक्ति का सुख मिल सके, श्रीसद्‌गुरुदेव की असीम कृपा से मुस्तकिल सुख मिले, शाश्वत सुख मिले। श्रीसद्‌गुरु के नाममंत्र का जप तथा भजन-भक्ति की साधना शाश्वत सुख को देने वाली है, हमेशा आनंद देने वाली है। श्रीसद्‌गुरु के नाममंत्र का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना सदा करने वाला सदा सुखी रहता है। त्रिलोक में भी इसके समान कल्याणकारी कुछ अन्य नहीं है, इसीलिये विचारशील साधकजन अपने दिल में मात्र श्रीसद्‌गुरुदेव की भजन-भक्ति की चाह ही रखते हैं।

 ०१-१०-२०१६

नामजप, भजन, सुमिरन, पूजा, दर्शन और ध्यान साधना की सफलता हेतु सद्‌गुरु महाराज के प्रति गहरी आस्था और दृढ़ भक्ति। शिष्य को हर पल इसका ध्यान रखना चाहिये कि सच्चे शिष्य के लिये गुरुभक्ति ही साधना है और यही सिद्धि है। जब कोई शिष्य इस गुरुभक्ति के सत्य को भूल जाता है, तो उसकी साधना में भटकाव के दौर आते हैं। कभी यह भटकाव किसी सिद्धि को पाने की लालसा में होता है तो कभी अन्य किसी सांसारिक आकांक्षा के कारण। लेकिन कृपालु श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्य को इस भटकाव से चेताते हैं, बचाते हैं, उबारते हैं, उद्धार करते हैं। सचमुच ही सद्‌गुरु के अलावा ऐसी कृपा और कौन कर सकता है, भला कौन सहारा दे सकता है। जो शिष्य अपने अन्तस्‌ को अपने श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में समर्पित करता है उसे अपने भक्ति-मुक्ति तथा आध्यात्मिक तत्त्वों की उपलब्धि सहज ही हो जाती है। ऐसा शिष्य सर्वदा मुक्त एवं ब्रह्ममय हो जाता है। इसी भक्ति की युक्ति से मुक्ति मिलती है। यही गुरु-शिष्य-रहस्य है।

३०-०९-२०१६

आत्म-बोध, स्वरूप की पहचान, आत्म-साक्षात्कार, परमात्म-मिलन, परम तत्त्व की प्राप्ति आदि चाहे जो भी संज्ञा इसे दें, मानव जीवन का यही परम लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति का एक ही उपाय है और वह है- सद्‌गुरुदेव की चरण-शरण। परमतीर्थ सद्‌गुरुदेव ज्ञानतीर्थ हैं, भक्तितीर्थ हैं, आत्मतीर्थ हैं। सन्त-सद्‌गुरु रूपी परमतीर्थ ऐसा कल्पसागर है जिसके प्रेमामृत रूपी शीतल जल में स्नान करने से तन, मन, आत्मा एक साथ पवित्र हो जाते हैं। उसमें भक्ति की निर्बाध धारा बहती रहती है और ज्ञान की निर्मल तरंगें उठा करती हैं। तीर्थ, व्रत, जप-तप, अनेक प्रकार की योग-साधनायें मनुष्य को आंशिक लाभ ही प्रदान कर सकती हैं। जीव का परम उद्धार तो तभी हो सकता है जब वह परमतीर्थ सद्‌गुरुदेव की शरण ग्रहण करे। सद्‌गुरु का चरणामृत ही वह पवित्र गंगा है जिसमें स्नान करने से पाप-ताप मिटते हैं, तन-मन-आत्मा निर्मल होते हैं और मनुष्य सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
२९-०९-२०१६

शिष्य के सभी क्रिया-कलापों के पीछे एक ही उद्देश्य होता है- सद्‌गुरु की प्रसन्नता। शिष्य के लिए गुरु ही सर्वस्व होते हैं, इसलिए श्रेष्ठ शिष्य वही है, जो अपने हृदय के तारों को केवल गुरु से ही जोड़ता है। हृदय में सद्‌गुरु को स्थायी रूप से स्थापित करना ही शिष्य का लक्ष्य होना चाहिये। ऐसा सौभाग्यशाली शिष्य ही स्वयं को भी गुरु के हृदय में स्थापित कर पाता है। सद्‌गुरु का संसार शिष्य होता है और शिष्य का संसार सद्‌गुरु ही होते हैं। गुरु-शिष्य का संबंध आस्था और प्रेम का पवित्र संबंध है। भले ही यह संबंध बंधन हो, पर यह बंधन अनंत बंधनों का अंत करने वाला है। इस गुरु-शिष्य संबंध के बीच किसी अन्य का कोई अस्तित्व नहीं होता है। जब समस्त कर्मों, चिंतन व भावों के कारणरूप एकमात्र गुरु ही हो जायें, तो समझो कि शिष्यता का पुष्प खिलने लगा। जब ऐसा लगने लगे कि गुरु ही मेरे जीवन के कर्ता-धर्त्ता हैं, मेरे सभी क्रिया-कलाप उन्हीं के कारण हैं, मैं तो उनका दास मात्र हूँ, एक निमित्त मात्र हूँ, तो समझो कि शिष्यता के उच्चतम सोपानों की ओर गति होने लगी है। जब ओठों से ’ गुरु’ शब्द उच्चारण होते ही गला अवरुद्ध होने लगे और आँखे प्रेमाश्रुओं से छलछला उठें, तो समझे कि शिष्यता के संवर्धन हेतु गुरुकृपा का सिंचन मिलने लगा।

 २८-०९-२०१६

श्रीसद्‌गुरु के पास बैठने मात्र से साधक के हृदय में ज्ञान का प्रकाश होने लगता है, शास्त्रों में जिसे ब्रह्म प्रकाश कहा गया है। जिससे मन के समस्त भ्रम और चिन्तायें स्वतः दूर हो जाती हैं। अतः शिष्य को चाहिये की वह श्रीसद्‌गुरु की निकटता के लिये निरंतर प्रयत्न करे। जिस तरह से प्रज्वलित दीपक के संपर्क मात्र से ही अन्य दीपक भी जल उठता है उसी प्रकार श्रीसद्‌गुरु के सानिध्य मात्र से शिष्य का अन्तर्मन प्रकाशित हो जाता है और उसका कल्याण हो जाता है।

२६-०९-२०१६

ध्यान की तीन अवस्थायें होती हैं- सर्वप्रथम साधक श्रीसद्‌गुरु महाराज के दिव्य विग्रह का ध्यान करता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के विभिन्न क्रिया-कलापों जैसे चलने, बैठने, उपदेश देने आदि स्थूल क्रियाओं को ध्यान में लाता है। धीरे-धीरे जब ध्यान-साधना गहरी होने लगती है तो दूसरी अवस्था में साधक ध्यान में सहसदल कमल पर विराजमान वर एवं अभय मुद्रा धारण किये हुये श्रीसद्‌गुरु महाराज के तेजोमय ब्रह्म-स्वरूप के दर्शन करता है। ध्यान की अत्यंत प्रगाढ़ एवं गहरी अवस्था में साधक को श्रीसद्‌गुरु महाराज के परम चैतन्य-स्वरूप अर्थात्‌ गुरु-तत्त्व का अनुभव होता है।

 
२५-०९-२०१६

जिन शिष्यों के लिये गुरुसेवा ही सर्वोपरि है, वे ही सत्‌-शिष्य कहलाते हैं। उन्हें अपने सुख-दुख, हानि-लाभ की चिन्ता नहीं होती है और वे अपने श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं। जो शिष्य हर परिस्थिति में अपने सद्‌गुरु की सान्निध्यता की ही चाह रखते हैं, उन्हें निज-धाम पहुँचाने हेतु श्रीसद्‌गुरु अपनी समस्त विद्यायें व आध्यात्मिक कमाई लुटाया करते हैं। ऐसे शिष्य ही मोक्ष के अधिकारी होते हैं और यदि उनकी साधना में कोई कमीं रह जाती है तो सद्‌गुरु स्वयं उन्हें अपनी आध्यात्मिक शक्ति प्रदान कर सफल बनाते हैं।

२४-०९-२०१६

गुरु में पूर्ण विलीनता ही शिष्य का एकमात्र लक्ष्य होता है, अपने संपूर्ण अस्तित्व को मिटाकर पूर्ण गुरुरूपेण हो जाना ही शिष्य जीवन की उपादेयता है। जिन्होंने गुरुभक्ति की सरिता में जीवन को डुबोकर निर्मल किया है, इस मर्म को वे ही समझ सकते हैं। शिष्य को चाहिए कि वह नियमित-निरंतर-निर्बाध रूप से गुरुमंत्र का जप करे। गुरुमंत्र से ही अंतःकरण निर्मल होता है, कर्मबंधन शिथिल होते है, चक्रों मे उर्जा आती है और कुण्डलिनी जागरण होता है। गुरुमंत्र एक तारकमंत्र है। मंत्रजप के साथ-साथ सद्‌गुरुदेव महाराज का सतत स्मरण, दर्शन एवं ध्यान करते रहना चाहिये। जब जप, सतत स्मरण, दर्शन एवं ध्यान करते-करते साधक को इस बात का होश नहीं रहता कि वह जप कर रहा है, तो वह अजपा-जप की अवस्था कहलाती है। इसी तरह जब साधक दर्शन, स्मरण एवं ध्यान में इतनी गहराई से तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने होने का भान नहीं बचता, वह पूरी तरह गुरुमय हो जाता है, तो यह अवस्था ही सहज समाधि की अवस्था कहलाती है।

 २२-०९-२०१६

मंत्रजप
प्रत्येक आती व जाती हुई स्वाँस में गुरुमंत्र के अक्षरों को अर्थसहित, मौन व सचेतनपूर्वक आरोपित करना ही यथार्थ मंत्रजप है। यहाँ मंत्रजप के जिस ढंग पर जोर दिया गया है वह है- अर्थसहित, मौन व सचेतनपूर्वक। श्रीसद्‌गुरु महाराज इसके गूढ़ रहस्य को समझाते हुए कहते हैं कि जब तक मंत्र के अर्थ में ध्यान न लगाया जाय तो मंत्र रूपी बीज का पल्लवन नहीं होता। जिस प्रकार इत्र की शीशी के ढक्कन को न खोलने पर इत्र की सुवास का अनुभव नहीं होता है, उसी प्रकार मंत्र में निहित प्रभाव का प्रादुर्भाव उसमें छुपे अर्थ को खोलने पर ही होता है। मंत्र में गुरुशक्ति छुपी होती है, जिसका प्रभाव यह है कि वह अज्ञानता के अंधकार को हटाकर जीवन के ज्ञान रूपी प्रकाश से सरावोर करती है। शिष्य को गुरुमंत्र के प्रत्येक जाप में प्रत्येक आती व जाती स्वाँस के साथ इसी अर्थ के भाव को मन में लाना है। मंत्र जाप के समय ऐसे भाव जगाने चाहिये कि गुरुमंत्र के स्वाँसों के माध्यम से अंदर प्रवेश होने के साथ उसका अज्ञान तिमिर हट रहा है और अन्तस्‌ सद्‌गुरु के ज्ञान-प्रकाश से भर रहा है। यह जाप पूर्णतः मानसिक होना चाहिय अर्थात्‌ यह किसी को पता भी न चले कि आप गुरुमंत्र का जाप कर रहे हैं। जो साधना गुप्त रूप से की जाती, वही फलवती होती है। जैसे कि जमीन के अंदर बोया गया बीज ही अंकुरित होता है उसी प्रकार बीजमंत्र का पल्लवन भी तभी होता है जब उसका प्रदर्शन न हो। मंत्रजप मूर्छित चेतना के साथ नहीं अपितु जाग्रत चेतना के साथ होना चाहिये। पूरे होश के साथ अर्थ व भाव सहित गुरुमंत्र का जाप निश्चित ही फलदायी होता है।

२१-०९-२०१६

श्रद्धा-
जिस तरह पौधे को पनपने के लिये जल आवश्यक है, वैसे ही हृदय में गुरुभक्ति पनपने हेतु सद्‌गुरु के प्रति श्रद्धा भाव की आवश्यकता होती है। श्रीसद्‌गुरु महाराज को यथास्वरूप, पूर्णतोभावेन स्वीकारना ही श्रद्धा है। श्रद्धा एक ऐसा विश्वास है जो बिना तर्क व बिना शर्त होता है। सद्‌गुरु के प्रति श्रद्धा एक ऐसा बल है जो प्रतिकूल परिस्थितियों को भी शिष्य के अनुकूल बना देती है। श्रद्धा से साधना को बल मिलता है अथवा ऐसा कहना ज्यादा उचित होगा कि श्रद्धा की शक्ति से ही साधना में प्रगति होती है।

२०-०९-२०१६

सुमिरन
मंत्र-साधना में सुमिरन का बहुत महत्व है। गुरुमंत्र की साधना करते समय मन व मस्तिष्क पूर्ण रूप से गुरु में ही लीन होने चाहिये। सुमिरन का अर्थ है कि मन सद्‌गुरु के स्मरण से परिपूर्ण हो। इसलिये यह आवश्यक है कि भटकते मन को बार-बार रोककर सद्‌गुरु की यादों में स्थिर किया जाय। कहा जाता है कि मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। श्रीसद्‌गुरु की महिमा में विचारमग्न रहने से शिष्य के अंदर सद्‌गुण पनपते हैं क्योंकि श्रीसद्‌गुरु महाराज तो सद्‌गुणों के भंडार हैं। श्रीसद्‌गुरु की मोहनी छवि, उनका दिव्य स्वरूप और उनकी महिमा ही सुमिरन के अंग हैं। मंत्र के जप से मन स्थिर होता है लेकिन चित्त की स्थिरता तो सुमिरन से ही प्राप्त होती है।

 १९-०९-२०१६

मनुष्य को उसके स्वरूप का पहचान करवाने वाली संजीवनी शक्ति है- पराविद्या। यह पराविद्या पुस्तकों या अन्य सांसारिक ज्ञान के साधनों द्वारा नहीं मिल सकती। यह देह या इन्द्रियों का विषय नहीं है, यह विषय देहातीत है, इन्द्रियातीत है, आत्मिक है। इसे एक आत्मा दूसरी आत्मा से ही सीख सकती है। सीखने वाला जीवात्मा है तथा सिखाने वाला नरदेह में सगुण रूप से विद्यमान परमात्मा हैं जिन्हें सद्‌गुरु कहा जाता है। इस विद्या की प्राप्ति सद्‌गुरु के अतिरिक्त किसी अन्य स्रोत से संभव ही नहीं है। कठोपनिषद्‌ कहता है-
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्याम॥
अर्थात्‌, यह आत्मा प्रवचन, बुद्धि अथवा श्रवणादि द्वारा प्राप्त नहीं होता, अपितु यह जिसे अनुग्रहपूर्वक स्वीकार कर लेता है उसको ही प्राप्त हो सकता है; उसे यह आत्मा अपना यथार्थ स्वरूप प्रकट कर देता है ।
जिस तत्त्वदर्शी सद्‌गुरु में परमात्मा स्वयं विराजमान हैं ऐसे सद्‌गुरु की कृपा जिस शिष्य को प्राप्त होती है, उसी शिष्य के अन्तस्‌ में श्रीसद्‌गुरु महाराज अपना ब्रह्मस्वरूप प्रगट करते हैं और इस तरह से उस शिष्य को ब्रह्मविद्या प्राप्त होती है।

१८-०९-२०१७

चाहे कोई कितने भी यम, नियम, तीर्थ, दान आदि यत्न कर ले, किन्तु ’नाम’ रूपी अनमोल धन उसे बिना सद्‌गुरु की कृपा के नहीं मिल सकता है। यह ’नाम’  परम प्रकाश रूप और ध्वनि स्पंदनों से युक्त है। यह ’नाम’  विदेह है, भाषा रहित है, मन व इन्द्रियों से परे है। मानव शरीर के अन्दर इस नाम-तत्त्व से मिलने का सत्य मार्ग है, लेकिन यह नाम-तत्त्व मुर्शिद कामिल अर्थात्‌ पूर्ण सद्‌गुरु के अलावा किसी अन्य सहारे से प्राप्त नहीं हो सकता है। इसीलिये सच्चे खोजी को अन्य सभी सांसारिक सहारे छोड़ कर सद्‌गुरु वक़्त को ही खोजना चाहिये और उनकी शरण ले‍नी चाहिये। मंत्र गुरु से ही प्राप्त करना चाहिये, इसीलिये आध्यात्मिक साधना के प्रारंभ में मंत्रदीक्षा का विधान है। दीक्षा में गुरुमंत्र के सहारे ही गुरु-शिष्य का संबंध स्थापित होता है। गुरु मंत्र-दीक्षा देते समय अपनी चैतन्य शक्ति का एक अंश भी शिष्य को देते हैं जिससे कालान्तर में शिष्य का जीवन पूर्ण प्रकाशित होता है। जैसे गहराई में बोये गये बीज की भूमि को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ बीज बोया गया है, लेकिन जल, वायु और समय के प्रभाव से ही बीज में अंकुर फूटते हैं और धीरे-धीरे वह बीज विशाल वृक्ष में बदल जाता है। ऐसे ही मंत्रदीक्षा के समय मंत्रशक्ति का पता नहीं चलता लेकिन जब साधक जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान आदि साधनों द्वारा उसे सींचता है, तब मंत्रदीक्षा का जो प्रसाद है, बीजरूप में जो आशीर्वाद मिला है, वह पनपता है और अनुभव में आता है।

१७-०९-२०१७

श्रीसद्‌गुरु के प्रति प्रेम की शुरुआत तो उनके दैहिक स्वरूप से ही होती है पर उस प्रेम में किसी प्रकार का स्वार्थ, वासना या कामना नहीं होती है। गुरु स्व-शरीर में अवस्थित होते हुये भी शिष्य के लिए एक गहरे आत्मिक अनुभव होते हैं। गुरुप्रेम एक अनुपम एहसास है जिसका अनुभव सच्चा शिष्य अपने अन्तस्‌ में सदैव ही करता है‍ परंतु इस प्रेम का वर्णन उसकी वाणी की क्षमता से परे होता है।

१६-०९-२०१६

बहिर्मुखी व्यक्ति सांसारिक कार्यो में लिपायमान रहता है, मानव देह के नौ दरवाजों से उसकी शक्तियाँ बाहर ही बिखरती रहती है, लेकिन जैसे ही वह भृकुटी के मध्य आज्ञा-चक्र में  अपनी चेतना को श्रीसद्‌गुरु महाराज के स्वरूप में एकाग्र  करता है और सद्‌गुरु के महाराज के द्वारा प्राप्त नाममंत्र का स्वाँसों  में जप करता है तो चेतना का प्रवाह अंदर की ओर होने लगता है और उसकी चित्त-वृत्ति अंतर्मुखी होती है जिससे सभी शक्तियाँ सिमट कर उसका आध्यात्मिक उत्थान करने लगती हैं। यही है श्रीसद्‌गुरु महाराज का अभ्यास योग। इस अद्भुत-अलौकिक क्रियायोग को समय के तत्त्वदर्शी सद्‌गुरु के सान्निध्य में ही जाना जा सकता है।

१५-०९-२०१६
गुणों एवं रूप के स्मरण बिना ध्यान आसान नहीं है। इसलिए शिष्यों को अपने गुरुदेव के नाम का स्मरण उनके गुणों के चिन्तन के साथ करना चाहिए। इसी तरह सद्‌गुरुदेव का ध्यान भी उनके स्वरूप को याद करते हुए भक्तिपूर्वक करना चाहिए। शिष्य के जीवन में यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहनी चाहिए। ऐसा होते रहने पर शिष्य का अस्तित्व स्वयं ही गुरुदेव की चेतना में घुलता रहता है। सद्‌गुरु महाराज का सुमिरन करते समय उनके रूप का ध्यान करना चाहिये, मन को उन्हीं पर लगाये रहना चाहिये। जब सद्‌गुरु के स्वरूप का चिंतन होगा, तो उनके रूप से प्यार होगा। जब सद्‌गुरु स्वरूप से खूब प्यार होगा तभी ध्यान अवस्था प्राप्त होगी और हर स्थान पर सद्‌गुरु स्वरूप का ही दर्शन होगा।

 १४-०९-२०१६

आध्यात्मिक मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है -अहंकार। अहंकार एक आभास मात्र होते हुए भी सही प्रतीत होता है। चूँकि अहंकार का अस्तित्व है ही नहीं, इसीलिये उसे छोड़ने की कोई निश्चित विधि भी नहीं है। अहंकार के संबंध में तर्क-वितर्क करना पानी में लाठी पीटने जैसा ही है। अतः अहंकार को यथास्वरूप अपने श्रीसद्गुरु के श्रीचरणों में सौंपकर सद्गुरु महाराज के बतलाये मार्ग पर चलते चले जाओ। गुरुभक्ति एक ऐसा मार्ग है जिसमें केवल प्रेम से लगे रहने की आवश्यकता है। सद्गुरु की शरण मिलने के बाद कहीं अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं होती है। सद्गुरु की शरण में सभी कामनायें पूरी होती हैं। ऊँचे वृक्ष के सहारे एक दुबली बेल भी उतनी ही ऊँचाई तक चढ़ जाती है, जितना ऊँचा वह वृक्ष होता है।

१३-०९-२०१६

जिस साधक का मन सदा श्रीसद्‌गुरु की आरती, पूजा, दर्शन, भजन तथा ध्यान में लगा रहता है, उसकी सुरत में श्रीसद्‌गुरु महाराज का आसन होता है और उसका चित्त सदा मालिक में निमग्न रहता है। जो गुरुमुख अपने श्रीसद्‌गुरु की आज्ञा पर चलता है और अपना ख्याल, अपना ध्यान मालिक के श्रीचरणों में लगाये रखता है, वह भक्त चाहे जहाँ भी रहे मालिक की दया से उसका कल्याण होता रहता है। जिस शिष्य को प्रतिदिन श्रीसद्‌गुरु महाराज की अमृतवाणी श्रवण का सौभाग्य मिलता है, उसे कम समय में ही आशातीत सफलता मिलती है। गुरुवाणी से शांत हुआ शिष्य शीघ्रता से गुरु-ध्यान में प्रवेश कर गहराई तक पहुँचता है। ध्यान में मालिक के दर्शन होने से विषय-विकार नष्ट होते हैं और चित्त में निर्मलता आती है। विकार रहित निर्मल चित्त में सद्‌गुरु की छवि और भी अधिक स्पष्ट होती जाती है व साधना में एकाग्रता आती है।
ज्ञान भक्ति सरि गुरुवचन, पग पग भरे प्रकाश ।
छूटी  निद्रा  जनम की,  सुरत  चली  आकाश ॥

१२-०९-२०१६

सद्‌गुरु-सेवा के सामने सभी साधनाऐं तुच्छ हैं। जैसे चकोर सदा ही चंद्रमा की ओर टकटकी लगाये रहता है, वैसे ही शिष्य को भी गुरुसेवा की प्राप्ति हेतु याचक दृष्टि से सदा श्रीगुरुदेव की ओर निहारते रहना चाहिये। श्रीसद्‌गुरु की सेवा करने का अवसर तो शिष्य के जीवन का उत्सव होता है।
गुरुसेवा अरु बंदगी,  सुमिरन अरु बैराग ।
ये चारों जब भी मिलें,  पूरन होवे भाग ॥
गुरु-सेवा से बड़ी संसार में कोई साधना नहीं। इसकी तुलना में सभी साधनाऐं, भक्ति, कर्म आदि क्षुद्र हैं। गुरु-सेवा से शिष्य को क्षण मात्र में वह सब हासिल हो जाता है जो कई जन्मों की तपस्या के बाद भी संभव नहीं है।

११-०९-२०१६

मोक्ष प्राप्ति के केवल आठ ही साधन-द्रव्य हैं, जो मनुष्य श्रीसद्‌गुरु कृपा से इन आठ साधन-द्रव्यों को प्राप्त कर लेता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है। ये आठ साधन-द्रव्य हैं- सद्‌गुरु से नाममंत्र की दीक्षा, नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान । इस भव-सागर से मुक्ति हेतु, इन आठ साधन-द्रव्यों के अलावा अन्य कोई साधन है ही नहीं, यह सत्य है और यही एक मात्र सत्य है। मुक्ति की एक यही युक्ति है, जो तपोभूमि मठ गड़वाघाट में श्रीसद्‌गुरुदेवजी महाराज द्वारा अपने प्रिय शिष्यों को बतायी जाती है।
प्रगटैं   गड़वाघाट  में,   गूढ़  ज्ञान  के  भेद ।
गुरु-मुरीद की रीति को, सद्‍गुरु पोषन देत ॥
आध्यात्मिक साधना केवल पवित्र वातावरण में ही संपन्न होती है, अतः साधक यह श्रेष्ठ वातावरण या तो स्वयं बनाता है या चुन लेता है। कलियुग में मानव की उम्र इतनी नहीं होती कि वह स्वयं ही अपने संस्कारों को परिशोधित करे, मुक्ति हेतु उचित साधना का आविष्कार करे और उस साधना हेतु एक ऐसे स्थान का विकास करे जो मुक्ति हेतु सभी साधनों से परिपूर्ण हो। इसके लिये तो मनुष्य को कई जन्म लेने होंगे और प्रत्येक जन्म में मुक्ति के दृढ़-संकल्प की निरंतरता होनी चाहिये लेकिन इस भटकाव भरे कलियुग में यह असंभव है।
श्रीसद्‌गुरु महाराज अपनी आध्यात्मिक शक्ति से साधकों की साधना को शीघ्र फलित करने हेतु ही इस तपोभूमि गड़वाघाट का निर्माण किया है। श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी की घोर तपस्या के कारण ही इस तपोभूमि में काम, क्रोध, लोभ और मोह आदि तत्त्वों को  विनाश करने की शक्ति उत्पन्न हुई है। श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा निष्काम-भाव से चलायी गई गुरु-भक्ति की साधना से ही इस तपोभूमि में असीम शांति का प्रादुर्भाव हुआ है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाममंत्र की शक्ति के प्रभाव से इस तपोभूमि को मोक्ष-प्रदायिनी होने का गौरव प्राप्त है। इस तपोभूमि में आते ही मन में एक प्रसन्नता और चैतन्यता प्राप्त होती है और मन का सारा विषाद्‌, सारा दुःख, सारा दैन्य और सारा कष्ट समाप्त हो जाता है। इसके कण-कण में अद्भुत दिव्यता का वास है,  वातावरण में एक ओजस्वी प्रवाह है, यहाँ की वायु में आध्यात्मिक सुवास है और यहाँ के जल में अमृत जैसी शीतलता है। इस तपोभूमि में साधक को सैकड़ों वर्षों से साधना में लीन ऋषि-मुनियों, देवताओं, चिन्तकों और साधु-संन्यासियों का सत्संग प्राप्त होता है।

१०-०९-२०१६

भक्त-जीवन में सद्गुरु के द्वारा प्राप्त नाममंत्र का जप ही ब्रह्मविद्या प्राप्ति का सरल व सर्वोत्तम साधन है। जप का अर्थ है- श्रीसद्गुरु महाराज के नाममंत्र को श्वाँसों में आरोपित करना। इस मंत्र को जपने हेतु ठीक उसी विधि का प्रयोग करना चाहिये, जो दीक्षा के दौरान बतलायी गयी हो। इस मंत्र के जप में होठों व वाणी का प्रयोग नहीं होता है। नाम-जप के साथ-साथ मन में नाममंत्र के अर्थ का भी भाव लाना चाहिये। पातंजल योगसूत्र का कथन है-"तज्जपस्तदर्थभावनम्‌", अर्थात्‌ मंत्र का जप करते हुए उस मंत्र के अर्थ की भावना भी करनी चाहिये। जप के लिए कोई भी जगह अपवित्र नहीं है, इसीलिये गुरुमंत्र का जप हर समय एवं हर जगह किया जा सकता है। चूँकि स्वाँसों का संबंध अंतःकरण से होता है, इसीलिये स्वाँसों के माध्यम से इस नाममंत्र को अंतःकरण तक भेजने पर अंतःकरण इस नाममंत्र की गुरु-ऊर्जा द्वारा उजला होता जाता है। गुरुमंत्र की महिमा अवर्णनीय है। जगत् के समस्त विकारों का नाश करने के लिए सदगुरु-नाम ही जीवन-संजीवनी-सुधा है।
नाम बिना नाहीं होई कमवाँ हो गुरु बिना नाम न लखाय
नाम बिना न परमधमवाँ हो चाहे कोटिन करो उपाय
-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)

 ०९-०९-२०१६

सदगुरु के वचन ही साधना-वृक्ष के बीज हैं। यदि इन बीजों को साधक अंतःकरण रूप धरा में बोये, चिन्तन-मनन रूपी जल से सींचे तथा कुविचार रूपी पशुओं से बचाने हेतु यत्न द्वारा सुरक्षित रखे, तो उसे  परमपद की प्राप्तिरूप फल अवश्य प्राप्त होगा। जो गुरुवचनों को प्रेमपूर्वक हृदय में धारण करता है, वह अपने जीवनकाल में सदा सम्यक् प्रकार का सुख ही पाता है। सदगुरु द्वारा नाम-शब्द प्रदान करना अनंत दान है। वह नाममंत्र जीव के अनंत युगों के कर्मों को नष्ट कर डालता है। सदगुरु के शब्दजन्य ज्ञान से होने वाले पुण्य से अधिक फलदायी अन्य कुछ भी नहीं है। इस संसार में गुरु के शब्दों द्वारा ही जीवों का उद्धार होता है। जो उनकी सीख को श्रद्धापूर्वक हृदय में धारण करके उनकी सभी आज्ञाओं का तत्परता से पालन करते हैं, उनके शोक, मोह, चिंता, भय ऐसे भाग जाते है जैसे सूर्य उदय होने पर निशाचर। सद्‌गुरु महाराज का प्रत्येक वचन अनमोल है, अतः शिष्य को उनके प्रत्येक वचन को हृदय में सहेज कर रखना चाहिये।

०७-०९-२०१६

परमात्मा ने स्वयं को श्रीसद्‌गुरु महाराज के स्वरूप में साकार किया है और इसकी अनुभूति सिर्फ गुरुकृपा से होती है। इसीलिये कहा गया है कि " शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान।" श्रीसद्‌गुरु की शरण में जाकर उनकी बतायी युक्ति से साधना करके ही जीवन में प्रकाश भरा जा सकता है, अन्यथा अज्ञानता के अंधकार में ही जीवन बीत जाता है। गुरु ही जिज्ञासु की जिज्ञासा को शांत कर, उसे उसके जीवन का लक्ष्य समझाकर मुक्ति मार्ग पर चलाते हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज के वास्तविक स्वरूप को हमारी छोटी सी बुद्धि नहीं समझ सकती, वे अनहद हैं और उनका पार नहीं पाया जा सकता। उनके ज्ञान की थाह पाना असंभव है। श्रीसद्‌गुरु महाराज शाहों के शाह हैं। वे युगों-युगों से जीवों को इस भव से पार लगाते आये हैं। वे सर्वव्यापी ईश्वर हैं एवं सभी के दिल की बातों को जानने वाले अन्तर्यामी हैं। वे स्वयं नाम हैं और स्वयं नामी भी हैं, उनकी महिमा अवर्णनीय है। वे ही हमारे पालक हैं और सही मायनों में हमारे प्राणों के आधार भी वे ही हैं, उनके बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है।

०६-०९-२०१६

सेवा  सुमिरन  जप भजन, पूजा  दर्शन ध्यान ।
तरकीबें    गुरुदेव   की,  पाने   आतम  ज्ञान ॥
श्रीमठ गड़वाघाट के स्वामी श्रीसद्गुरु महाराज ने उपरोक्त दोहे में ब्रह्मविद्या को प्राप्त करने के उपायों को मंथ कर साररूप में कह दिया है। वे साधक जिन्होंने ब्रह्मरस की एक बूँद का भी रसास्वादन किया है, वे सद्गुरु महाराज द्वारा कहे गये उपरोक्त दोहे में छुपे संकेतों को समझ ही जायेंगे। श्रीसद्गुरु का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान भवरोग निवारण की अमोघ औषधि है, साधकों व शिष्यों के लिये परम अमृत है।

०५-०९-२०१६

गुरुदीक्षा एक ऐसी सीढ़ी है जिसके शिखर पर श्रीसद्‌गुरु विराजमान हैं और सबसे निचले तल पर शिष्य होता है। नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान इस सीढ़ी के पायदान हैं, जिसमें निरंतर चढ़ते हुए शिष्य सद्‌गुरु तक पहुँचता है, सद्‌गुरु को प्राप्त करता है। निःसंदेह महापुरुषों के पास भौतिक रूप से उपस्थित रहने से भी लाभ होता है, लेकिन सद्‌गुरु को प्राप्त करने का तात्पर्य इस भौतिक सान्निध्यता से नहीं है। नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान के द्वारा सद्‌गुरु से जुड़ना ही सद्‌गुरु की प्राप्ति है। अपना समय, शरीर, मन, ज्ञान, पुरूषार्थ एवं धन को लगाकर श्रीसद्‌गुरु को प्रसन्न करना एवं उनकी लोकमंगलकारी योजनाओं को सफल बनाना ही गुरु की बाह्यसेवा है। नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान से स्वयं को सदा गुरु से जोड़े रहना आंतरिक सेवा है। गुरुदीक्षा के द्वारा ही शिष्य को गुरुसेवा का सुनहरा अवसर मिल पाता है, वह अपने गुरु से अंतरंगता से जुड़ पाता है। परम तपस्वी श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी चौंसठ कलाओं से सम्पूर्ण हैं, जिस शिष्य को उनकी दयादृष्टि प्राप्त हो जाती है, संपूर्ण प्रकृति उस सौभागी के लिये कल्पवृक्ष बनकर हर भाँति उसकी आकांक्षाओं को पूर्ण करने में लग जाती है।

०४-०९-२०१६

सच्चा शिष्य श्रीसद्‌गुरु से कभी दूर नहीं रह सकता है। जिस प्रकार परछाईं कभी वस्तु से दूर नहीं हो सकती, उसी प्रकार शिष्य भी श्रीसद्‌गुरु की शरण में ही रहता है। शिष्यों के लिए सद्‌गुरु से बढ़कर कोई वेद, शास्त्र अथवा ग्रंथ नहीं है। गुरु से बढ़कर कोई देवी-देवता नहीं है, श्रीसद्‌गुरु ही शिष्य के सर्वेश्वर होते हैं। शिष्य के लिए श्रीसद्‌गुरु के चरणों के अतिरिक्त कोई मंदिर या तीर्थ नहीं है। वह श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में सभी तीर्थों के दर्शन करता है। शिष्य को चाहिए कि वह हमेशा पुरुषार्थ करे यानी पूरी निष्ठा एवं भक्ति-भाव के साथ सदा भजन-सुमिरन करता रहे और पूरी श्रद्धा के साथ गुरु की सेवा करे। जब तक शिष्य के शरीर में प्राण हैं, वह गुरु की आज्ञापालन को परम धर्म समझे।

०३-०९-२०१६

समर्पण- श्रीसद्‌गुरु से पूर्ण अनुकूलन
हर प्रकार से श्रीसद्‌गुरु के अनुकूल रहना। जिन बातों से व कार्यों से श्रीसद्‌गुरु प्रसन्न हों वही कहना, सुनना चाहिये। जो बात गुरु को प्रिय लगे वही बोलो, वही करो और वही चीज सेवा में समर्पित करो। उन्हीं के चाहे अनुसार आचरण करना अनुकूलता है। अपना तन, मन, धन सर्वतोभावेन गुरु के चरणों में समर्पित कर देना चाहिये। यहाँ तक की उनकी मौज और अपनी इच्छा दोनों में भेद न रह जाय। जिस स्थिति में गुरु रखें, उसी में आनन्द लेना चाहिये।

०२-०९-२०१६

श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ की विनय प्रार्थना से साधना में सफलता और आत्मोन्नति प्राप्त होती है। सद्‌गुरु की प्रियता हेतु गुरुकृपा का अवलंबन आवश्यक है। श्रीसद्‌गुरु की संतुष्टि ही गुरुकृपा की जननी है और सद्‌गुरु के द्वारा प्राप्त नाममंत्र के भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान की साधना द्वारा गुरु को संतुष्ट करना ही सच्ची गुरुसेवा है। यह गुरु-साधना ऐसे सौभाग्यशाली शिष्यों को सिद्ध होती है, जो स्वयं को सद्‌गुरु के गुरुत्व से आपूरित कर लेते हैं। गुरु-साधना केवल मंत्र जपने की क्रिया नहीं है, अपितु यह अपने संपूर्ण अस्तित्त्व को पूर्ण रूप से श्रीसद्‌गुरु में समर्पित कर देने की क्रिया है। अपने दुष्चिन्तनों व कुसंस्कारों को समूल नष्ट कर, स्वयं में गुरुतत्त्व को प्रतिष्ठित करना ही यथार्थतः गुरु-साधना है। श्रीसद्‌गुरु द्वारा दीक्षा में दिया गया महामंत्र इस उपलब्धि में सहायक है। गुरुमंत्र की साधना आन्तरिक भावनाओं की शुद्धि करने के साथ-साथ उन उपायों को भी सुलभ करती है, जिनसे साधक अल्प समय में ही अपने लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं। गुरुमंत्र साधना की यही सार्थकता है।
गुरुमंत्र की साधना अर्थात्‌ भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान से भक्ति के अक्षय भंडार भरते चले जाते हैं और संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं बचता है। श्रीगुरुगीता में इसी तथ्य को शंकरजी ने माता पार्वतीजी से कहा है कि हे देवी! ’गुरु’ यह दो अक्षरवाला मंत्र सब मंत्रों में राजा है, श्रेष्ठ है। स्मृतियाँ, वेद और पुराणों का सार यह ही है, इसमें संशय नहीं है।
मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम् ।
स्मृतिवेदपुराणानां सारमेव न संशयः॥

१-०९-२०१६

शिष्य को चाहिये कि वह हर साँस में श्रीसद्‌गुरुदेव द्वारा बताया हुये नाम-मंत्र का यानी श्रीसद्‌गुरुदेव द्वारा दी गई दीक्षा में उपदेशित नाम-मंत्र का निरंतर भजन, सुमिरन तथा माथे पर श्रीसद्‌गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करे। यही वह युक्ति है जिससे भक्ति व मुक्ति की प्राप्ति होती है, जिसे समय के सद्‌गुरु ही बताते हैं। यही सन्तमत की साधना है, जिसे सुरत-शब्द-योग भी कहा जाता है।
 
३१-०८-२०१६
गुरु और उनके पूर्ण समर्पित शिष्य के बीच एक मधुर निकटता होती है। इस निकटता में ही शिष्य की जिज्ञासाओं के निवारण हेतु सद्‌गुरु महाराज की अमृतवाणी से निकले समाधान वचन के रूप में उपनिषद्‌  निर्मित होते हैं। बिना तर्क-वितर्क के खुले हृदय से गुरु के वचनों को ग्रहण करने से ही शिष्य की आध्यात्मिक प्रगति होती है, क्योंकि गुरु का हर वचन शिष्य के कल्याण के लिये ही होता है।
निग्रहेऽनुग्रहे वापि गुरुः सर्वस्य कारणम्‌।
निर्गतं यद्‌ गुरोः वक्त्रात्‌ सर्व शास्त्रं तदुच्यते।। - श्रीगुरुगीता,३०३
सबके निग्रह व अनुग्रह में केवल सद्‌गुरुदेव ही कारण हैं। सद्‌गुरुदेव के मुख से जो भी निकलता है, उस सबको शास्त्र ही समझना चाहिये।

२९-०८-२०१६

सुमिरन क्या है?
सुमिरन अर्थात्‌ मालिक को याद करना, सुध-बुध में केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज ही अवस्थित होना, निरंतर उनके दर्शन की प्यास, अपने सद्‌गुरु की छवि को अपने हृदय में बसाये रखना, अपने दिल में सद्‍गुरु की याद बनाये रखना, हर श्वास में केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज की अभीप्सा, श्रीसद्‌गुरु महाराजजी को ही अपने जीवन का केन्द्र बना लेना, श्रीसद्‌गुरु महाराज की याद में सोना-जागना, उठना-बैठना, यही सुमिरन है।

२४-०८-२०१६

उपनिषद्‌ क्या हैं?
सद्गुरु के चरणों में बैठना सबसे बड़ी आध्यात्मिक साधना है।  गुरु के चरणों में बैठकर शिष्यत्व प्राप्त करने की कला प्राप्त होती है। जब शिष्य के हृदय में गुरु के चरणों में बैठने की ललक पैदा हो जाये, गुरु के ज्ञान वचनों को सुनकर हृदय में उतारने की कला आ जाये, तो शिष्य के अंतस् में शांति व आनंद के झरने स्वतः फूटने लगते हैं। ऋषियों ने इसी साधना को उपनिषद् का नाम दिया है।

 

 

 

 

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