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Articles sadguru ke shrimukh se

Science of Sant Mat

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Contact for Initiation

Contact for Initiation Initiation is given by Sat Guru Shrimat Paramahansa Sarananandji Maharaj, HE is the present Guru of Sant Mat Anuyayi Ashrams. Devotee has to visit personally to ...

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Objective

Mission 1. For spiritual aspirant to serve spritual path and peaceful atmosphere to elevate the spirituality .  liberating Self Knowledge to lead the ...

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sadguru ke shrimukh se PDF Print E-mail
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Wednesday, 24 August 2016 23:42
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२१-०९-२०१८

भक्ति एक प्रेममार्ग है और इसमें अपने अहंकार को साथ रखकर प्रवेश पाना संभव नहीं है। माया, मोह, लोभ, कामना आदि की भयावह लहरों से भरी इस जीवन सरिता में भक्ति-नैया को साधकर रखने के लिये श्रद्धा, विश्वास, वैराग्य, समर्पण एवं गुरुकृपा की नितांत आवश्यकता होती है। हर परिस्थिति में सद्‌गुरु परमात्मा के प्रति आकांक्षारहित, अपेक्षारहित एवं अडिग प्रेमभाव का बने रहना ही भक्तिमार्ग में निर्बाध यात्रा की युक्ति है। भक्ति मार्ग में श्रद्धा, विश्वास और प्रेम ही सर्वोपरि है।

१९-०९-२०१८

श्रीसद्‌गुरु महाराज को ही एकमात्र परम कल्याण-मित्र समझते हुए बिना किसी छिपाव अथवा दुराव के उनकी भक्ति करना चाहिये। मित्र-भाव से सद्‌गुरु स्वामीजी की रुचि समझते हुए तदनुरूप कर्म करना चाहिये। अर्जुन, सुदामा, विभीषण, सुग्रीव आदि भक्तों ने अपने इष्ट के श्रीचरणों में सख्य-भाव से समर्पण किया था। इष्ट के प्रति सख्य-भाव से भक्ति करने पर जीवन में बुद्धि की स्थिरता, स्थितप्रज्ञता और समत्वयोग सधता है। भक्ति क्षेत्र की चरम साधना सख्यभाव में समवसित होती है। जीव ईश्वर का शाश्वत सखा है। जीव अपने अहंकार एवं अज्ञानता के कारण ही ईश्वर के संग सखाभाव खो देता है। गुरुभक्ति की साधना करता हुआ भक्ति के द्वारा मनुष्य सद्‌गुरु परमात्मा की ओर उन्मुख होता है और पुन: सखाभाव को प्राप्त कर लेता है। सख्य भाव तो भगवान्‌ और भक्त के मध्य प्रगाढ़ संबंध है, इसीलिये सख्य भाव का सहारा लेकर भक्त को स्वयं को सद्‌गुरु परमात्मा के तुल्य समझने की भूल नहीं करनी चाहिये। भक्त के दास्य-प्रधान प्रेम से ही भगवान्‌ का प्रेम सख्य-प्रधान होता है। हम अपने सखा को हर हालत में प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं। यही सख्य-भाव है। जब सद्‌गुरु महाराज का स्मरण करते ही हृदय प्रेमभाव से भर जाये, उनकी सेवा में आनंद आने लगे, उनके श्रीचरणों में सर्वस्व समर्पण के भाव जाग जायें तो समझो यही सख्य-भाव का उदय है। यह सद्‌गुरु महाराज की करुणा ही है जो वे तुच्छ जीव को सखा के रूप में अपनाते हैं।

१२-०९-२०१८

जिनके अनुग्रह मात्र से साधक के शोक व मोह का विनाश हो जाता है, जिनकी कृपा की एक कणिका मात्र से बड़े से बड़ा अज्ञान जलकर नष्ट हो जाता है, ऐसे सन्तशिरोमणि श्रीसद्‌गुरु तीनों लोक में वंदनीय हैं। शिष्य की वृत्तियाँ श्रीसद्‌गुरु के अनुरूप हो जायें, इसीलिये शिष्य को सदैव गुरुदेव के अनुशासन में ही रहना चाहिये।

११-०९-२०१८

मनुष्य योनी में ही सद्‌गुरु महाराज की भक्ति-साधना द्वारा चंचल मन को स्थिर किया जा सकता है, किसी अन्य योनी में यह संभव नहीं है। मानव योनी के अतिरिक्त किसी अन्य योनी में संचित प्रारब्ध को चुकाने का उपाय ही नहीं है। श्रुति, सन्त, ग्रंथ आदि सभी यही कहते हैं कि इस अनमोल मानव जीवन को पाकर अब सचेत हो जाओ और गुरुभक्ति में खुद को डुबा लो, क्योंकि बिना गुरुकृपा के मोक्षरूपी महल नहीं मिलता है।

१०-०९-२०१८

तीनों लोक में श्रीसद्‌गुरु महाराज ही ऐसे परमदाता हैं जो जीवों के सब प्रकार के क्लेशों को मिटाने के लिये ही पराविद्या का उपदेश देते हैं, इसके अतिरिक्त उनका कोई स्वार्थ नहीं होता है। इसीलिये तीनों लोकों के सभी देवी-देवताओं में वे सबसे ऊपर विराजमान हैं। सद्‌गुरुदेव ही सभी के पालन-पोषण करने वाले हैं तथा वे ही सबके परम हितकारी हैं। सद्‌गुरुदेव के सिवाय जीव का कल्याण करने वाला दूसरा और कोई नहीं  है। पृथ्वी पर सदा विराजमान रहने वाले सद्‌गुरुदेव ही साक्षात्‌ परब्रह्म हैं, तभी तो राम-कृष्ण आदि अवतार भी सद्‌गुरुदेव को पाकर उनके बल पर ही ईश्वरत्व का निर्वाह कर सके। ऐसी अतुलित महिमावान्‌ श्रीसद्‌गुरु महाराज के दर्शन मात्र से हृदय उनके प्रति सम्मान के भावों से आप्लावित हो जाता है। सद्‌गुरुदेव ही सच्चिदानंद के मूर्तिमान्‌ स्वरूप हैं। त्रिगुणातीत परब्रह्म की सत्ता उन्हीं में समाई हुई है। उन सच्चिदानंद के मात्र एक अंश से यह संसार साँस लेता हुआ ज्ञान प्राप्त करता है और आनंद का अनुभव करता है। ईश्वर को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले श्रीसद्‌गुरु की प्रेम सहित पूजा-अर्चना भक्तों के जीवन में भव्यता एवं दिव्यता का संचार करती है।

०९-०९-२०१८

महिमावान्‌ श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति भक्त के हृदय में उठने वाले आदर व सत्कार के भावों की बाह्य अभिव्यक्ति अर्चन हैं। सद्‌गुरुदेव को प्रसन्न करने के लिये उनका यशोगान करना, उन्हें पूर्ण सम्मान देना  अर्चना है। अर्चना सद्‌गुरु परमात्मा की महान करुणा और अनुग्रहकारी कार्यों से उपजे भावों का ही परिणाम है। यह सद्‌गुरु महाराज की दिव्यता को अपने अंदर आमंत्रित करने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। अर्चना स्वयं में श्रीसद्‌गुरु महाराज के गुणों को उतारने का एक जरिया है।

०८-०९-२०१८

मन की ओर जाती हुई वृत्तियों को गुरु की ओर अभिमुख करो। गुरु ही समर्थ हैं, वही सक्षम हैं इन्हें ग्रहण करने में, वे परम पवित्र हैं, उन्हीं के आश्रय में ये पापवृत्तियाँ परिशुद्ध हो जाती हैं। वे प्रेम स्वरूप हैं अतः उन्हें सौंप देने पर ये विकार अलग-अलग न रहकर एक ही रूप ग्रहण कर लेते हैं और वह रूप है शुद्ध प्रेम। इस तरह भक्तिमार्ग में परमात्मा के सगुण रूप केवल सद्‌गुरु ही एकमात्र आश्रय हैं जो हमारी भावनाओं को हमारी मनोवृत्तियों को ग्रहण करके उन्हें परिशुद्ध करके अपने प्रति एकनिष्ठ प्रेम में परिवर्तित करके हमारा उद्धार कर देते हैं। अंतर्योग स्थापित करने के लिये जप, भजन, सेवा, पूजा, सत्संग आदि प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं और साथ ही साथ अंतर्योग को पुष्ट भी करते हैं। ये बाहरी साधन अंतर्योग की चरम अवस्था में शिष्य का गुरु से मिलन करा देता है, सभी भेद मिट जाते हैं और दोनों एक हो जाते हैं।

०६-०९-२०१८

साधारण जन सुख पाने के लिये नाना प्रकार के कर्मों में दिन-रात व्यस्त रहने पर भी दुःख ही उठाते हैं, परन्तु गुरुभक्त का कर्म अंतर्योग अर्थात्‌ सद्‌गुरु-परमात्मा से आंतरिक संबंध प्रगाढ़ करना ही होता है। इस अकेले कर्म का फल यह होता है कि पूरी कुदरत और सभी देवी-देवता उसके अनुकूल जाते हैं।

०५-०९-२०१८

प्रेम, श्रद्धा एवं आस्था के भावों को पैदा करने वाला भगवत्‌-रसायन जब हृदय में स्रवित होने लगता है, तो अहम्‌ गलकर परम में बदलने लगता है और भगवत्ता की प्राप्ति होती है। इस मधुर रसायन का स्वाद चखने पर समस्त इन्द्रियों सहित मन अनायास ही इस रसायन के स्रोत-स्थल हृदय की ओर आकर्षित होने लगता है। यही स्वाभाविक प्रत्याहार है। प्रत्याहार की ऐसी अवस्था में भक्त को हर पल अपने हृदय में विराजमान श्रीसद्‌गुरु परमात्मा के दर्शन होने लगते हैं। ज्ञानेन्द्रियों की बाह्य विषयों में होने वाली प्रवृत्तियों का हृदयस्थ सद्‌गुरु-परमात्मा के उन्मुख होकर उनसे जुड़ जाना ही अंतर्योग कहलाता है। यह अंतर्योग ही प्रेम व भक्ति की सफलता है।

०४-०९-२०१८

श्रीसद्‌गुरु महाराज की सरल, सुमधुर, अमृतमयी व ज्ञानयुक्त वाणी सत्संग में भक्ति की रसधार बहा देती है। इस भक्तिरस की धारा में भक्तों की आध्यात्मिक यात्रा स्वयं तय होती जाती है। जब तक हम सद्‌गुरु के समीप रहते हैं, हमारा खिंचाव परमात्मा की ओर ही होता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के समीप रहना, उनके अमृतवचनों को सुनना व उन पर अमल करना, श्रीसद्‌गुरु महाराज की आज्ञापालन एवं सेवा में सदा उपस्थित रहना आदि बाह्य-सत्संग है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के नामरस में सुरत को सदा भिगोये रखना और उनके दिव्य स्वरूप के ध्यान व दर्शन में लीन रहना आंतरिक सत्संग है। श्रीसद्‌गुरुदेव के साथ आंतरिक सत्संग स्थापित हो जाने पर शिष्य को उनका आशीर्वाद व सत्प्रेरणा निरंतर मिलने लगती है, चाहे वह शिष्य दूर प्रदेश में ही हो।
 

०३-०९-२०१८

जैसे फूलों के बगीचे के समीप जाने से नासिका सुवास से भर जाती है, वैसे ही संतों के संग से मन हमेशा शांत रहता है। सद्‌गुरुदेव के समुख जाते ही मन का अन्धकार मिटने लगता है। दसों-दिशाओं को प्रकाशित करती सद्‌गुरु की ज्ञानज्योति मलिन वासनायें अपने-आप मिटने लगती हैं। सद्‌गुरु महाराज की उपस्थिति मात्र सम्पूर्ण परिवेश को अद्भुत शुद्धता व शांति से भर देती हैं। सद्‌गुरु साक्षात्‌ परमार्थ का रूप होते हैं। सद्‌गुरु अपने मालिक के रंग में सदा रँगे होते हैं। वे निर्मल एवं पवित्र विचारों के भंडार होते हैं। उनके सत्संग व दर्शन से दिव्य गुण एवं पवित्र विचार अनायास ही भक्तों में प्रवेश करने लगते हैं।

०२-०९-२०१८

सत्संग अर्थात्‌ सत्य का संग। श्रीसद्‌गुरुदेव ही परम-सत्य के जानकार है, वे स्वयं सत्य की मूर्ति हैं, अतः श्रीसद्‌गुरु महाराज का सान्निध्य ही सत्संग है। सत्संग से तात्पर्य है- ईश्वर के अस्तित्त्व को अनुभव करने के लिए अनुकूल परिस्थिति। श्रीसद्‌गुरु महाराज के सत्संग में शिष्य का चिंतन परिष्कृत होता जाता है, आचरण व व्यवहार में शुद्धता आती है। सद्‌गुरु महाराज के सत्संग के प्रभाव से मन एक स्वच्छ दर्पण की तरह निर्मल हो जाता है और जीवन सद्‌गुणों से अलंकृत हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के सत्संग में आत्मा का पोषण होता है। ईश्वर का अनुभव प्रदान करने वाली भक्ति भी सत्संग में ही पनपती है।

३०-०८-२०१८

भक्त में समर्पण भाव तभी आता है, जब भक्त निरंकार का आधार लेता है। अहम्‌ का भाव अतिसूक्ष्म होते हुए भी समर्पण की राह में पहाड़ की भाँति अवरोध है, फिर चाहे यह अहम्‌ अपनी कला-कौशल, वैभव, विद्वता, सिद्धि अथवा वैराग्य का ही हो। बीज जब स्वयं को मिटा देता है, तभी उसे विशाल वृक्ष का रूप मिलता है। वैसे ही अपने अहम्‌ को गलाने पर परम अवस्था प्राप्त होती है। जैसे एक पतंगा दीपक की ज्योति में प्रवेश कर स्वयं को मिटा देता है, जैसे जल की बूँद समुद्र में मिलकर अपनी सत्ता खो देती है, वैसे ही एक भक्त अपने संपूर्ण अस्तित्व को सद्‌गुरुदेव के चरणों में विसर्जित कर देता है, यही सच्चा समर्पण है। पूर्ण में समाकर ही अंश को पूर्णता मिलती है। जैसे जल के पात्र में पड़ा एक बर्फ का टुकड़ा पिघलकर जल ही हो जाता है, वैसे ही सच्चा भक्त अपने अहम्‌ समेत पद, प्रतिष्ठा समेत सभी आकार की सीमाओं को गुरुभक्ति में मिटाकर श्रीसद्‌गुरुदेव को प्राप्त होता है।

२९-०८-२०१८
विशाल हृदय एवं निर्मल अंतःकरण युक्त व्यक्ति ही श्रद्धालु होता है। स्वार्थियों और अभिमानियों के हृदय में श्रद्धा नहीं टिक सकती। किसी की मौखिक रूप से वाह-वाही करना श्रद्धा नहीं है, बल्कि हृदय में किसी के प्रति सर्वभाँति अनुकूलन की स्वप्रेरणा का जागना श्रद्धा है। भ्रम-भय का भंजन करने वाले, मिथ्या धारणाओं व मान्यताओं को ढहाने वाले एवं पूर्वाग्रहों से ग्रसित बुद्धि को समाधान प्रदान करने वाले ज्ञान का जन्म श्रद्धा की कोख में ही होता है। श्रद्धा निरंतर प्रगाढ़  होती जाती है। जो आस्था, निष्ठा व विश्वास विपरीत समय और परिस्थिति में डगमगा जाये, वह श्रद्धा नहीं है। मनुष्य की श्रद्धा जिस आदर्श के प्रति होती है, जीवन के सभी क्रिया-कलाप, चिन्तन-धारा, आचार-व्यवहार आदि सभी उस आदर्श के अनुरूप ही ढलने लगते हैं। जीवन की सभी चेष्टायें और प्रवृत्तियाँ श्रद्धेय आदर्श की दिशा में संरेखित होने लगती हैं। श्रद्धा होने पर इष्ट के प्रति पूज्यभाव स्वतः ही प्रगट होने लगते हैं। जीवमात्र के प्रति श्रीसद्‌गुरु महाराज की असीम करुणा, अथाह प्रेम, अनंत दया, निःस्वार्थ कल्याणभाव एवं सदाचरण अनायास ही मनुष्यों के हृदय में उनके प्रति श्रद्धा पैदा कर देते हैं। श्रद्धेय की महिमा व श्रेष्ठता ही श्रद्धा का आधार है। श्रद्धेय का अनुसरण करना नहीं पड़ता अपितु जीवन-राह स्वतः ही उनकी ओर मुड़ जाती है। ऐसी श्रद्धा का योग जब प्रेम से होता है, तभी भक्ति फलित होती है। जैसे आँख से देखने का एवं कानों से सुनने का कार्य संपादित होता है, वैसे ही श्रद्धायुक्त हृदय में भक्ति का अनुभव होता है। श्रद्धेय सद्‌गुरु महाराज की विराटता, विशिष्टता, सौन्दर्यता, उदारता, शीलता आदि के आकर्षण से श्रद्धालु शिष्य सदा ही उनका सामीप्य चाहता है। श्रद्धेय श्रीसद्‌गुरुदेव की एक झलक से श्रद्धालु शिष्य का हृदय गद्‌गद्‌ हो जाता है, उनकी वाणी सुनकर पुलकित होता है और दयादृष्टि से रोमांचित हो जाता है।

१८-०८-२०१८

अपने नियत कर्मों को छोड़कर आलस्य के प्रभाव में ऐसा मानना कि जो कुछ करेंगे सद्‌गुरु ही करेंगे, श्रद्धा का तामसिक रूप है। संसार की क्षुद्र-कामनाओं की पूर्ति के लिये सद्‌गुरु महाराज के प्रति श्रद्धा रखना राजसिक श्रद्धा है। शास्त्रों में सात्विक श्रद्धा को ही श्रेष्ठ कहा गया है एवं उससे ही जीवन में परमार्थ घटित होता है। ऐसी श्रद्धा के बारे में ही कहा गया है कि- ’श्रद्धावानं लभते ज्ञानम्’। आत्मज्ञान के लिए गुरु के प्रति श्रद्धा का होना बड़ा आवश्यक है। जब शिष्य को यह पक्का यकीन हो जाता है कि, केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज ही जीवन में सत्य का प्रकाशन कर सकते हैं और सद्‌गुरु महाराज की कृपा से ही मुक्ति का द्वार खुल सकता है, तभी हृदय में श्रेष्ठ श्रद्धा  जागती है। सात्विक अर्थात्‌ श्रेष्ठ श्रद्धा की पहिचान ही यही है कि, इसके जागते ही संसार व प्रकृति की तरफ पकड़ ढीली पड़ने लगती है और पूरा जीवन केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज पर ही केन्द्रित हो जाता है।

१६-०८-२०१८

जो हमें श्रेयास्पद एवं प्रेमास्पद लगता है, उसके प्रति ही श्रद्धा का उदय होता है। इसका महत्व बहुत अधिक है कि हमारी श्रद्धा किसके प्रति है। श्रद्धा जिसके प्रति होगी, निश्चित ही हमारा जीवन उसकी ओर ही अग्रसर हो जायेगा। इसीलिये सद्‌गुणों के आगार श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति श्रद्धा होने पर जीवन स्वयं ही सद्‌गुणी होता जाता है। हमारे हृदय में श्रद्धेय के लिये सहज ही प्रेम व आनन्दमयी आकर्षण पैदा होता है जिससे उसके प्रति सर्वतोभावेन समर्पण की घटना घटती है, और समर्पण की धरा में ही सत्य का प्रकाशन होता है।

१५-०८-२०१८

श्रद्धा जीवन में समर्पण जैसी महती घटना को अंजाम देने वाली आत्मशक्ति है। श्रद्धा अपने इष्ट के प्रति हृदय में प्रेम की शिखर भावनाओं से निकला अनमोल पुष्प है। हृदय में श्रद्धा-कुसुम के खिलने से हृदय इतना विशाल हो जाता है कि उसमें अनंत एवं असीम विस्तार वाले सर्वव्यापी परमात्मा भी सिमटकर समा जाते हैं।
१४-०८-२०१८

श्रेय पथ की सिद्धि हेतु साधक का हृदय श्रद्धा भावों से भरा होना चाहिये। श्रद्धा से ही सद्‌गुरु महाराज द्वारा बतलाये भक्ति पथ पर चलने की प्रेरणा मिलती है। श्रद्धा वह भावना है जो संसारी हिचकोलों के बीच भी शिष्य को भक्तिपथ से विचलित होने नहीं देती और मंजिल मिलने तक शिष्य को सँभाले रहती है। श्रद्धा ही जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने का अस्त्र है। भटकती बुद्धि को स्थिर करने का बल श्रद्धा में ही होता है। श्रद्धा शिष्य को उसके लक्ष्य पर एकाग्र रखती है। श्रद्धा के सामर्थ्य से ही चित्त सद्‌गुरुदेव के चिन्तन में निरंतर लगा रहता है। श्रीसद्‌गुरु के प्रति श्रद्धायुक्त शिष्य, भक्तिमार्ग के सभी अवरोधों को लाँघ जाता है और हर परिस्थिति का डटकर सामना करता है। सद्‌गुरु महाराज के प्रति श्रद्धा से सभी संशयों का विनाश होता है। जो शिष्य अपने सद्‌गुरु के प्रति श्रद्धा से भरा होता है, उसके मन व हृदय में संशय पनपता ही नहीं।
०९-०८-२०१८

श्रीसद्‌गुरु परमात्मा से जुड़कर उन्हें आत्मसात्‌ करने में गुरुमंत्र एक डोर की भूमिका निभाता है। गुरु व गुरुमंत्र एक ही सत्ता अर्थात्‌ परमसत्ता के ही नाम हैं। इसीलिये श्रीसद्‌गुरुदेव महाराज से बीजमंत्र ग्रहण कर उसे अपने स्वाँसों व अपने हृदय में आरोपित करो और श्रद्धा व प्रेम के जल से निरंतर सिंचन करते रहो। देखते ही देखते यह बीजमंत्र हृदय में एक विशाल गुरुवृक्ष में परिवर्तित होकर गुरुकृपारूपी फलों से लद जायेगा। जीवन का हर कोना गुरुभक्ति की सुवास से महकने लगेगा। असीम गुरुतत्त्व को स्वयं में समाने का सूत्र यही है।

०८-०८-२०१८

गुरुभक्तों की हर बात निराली होती है। वे ईश्वर के दर्शन हेतु तीर्थ, पर्वत, गुफा आदि जगहों पर जाकर तपस्या करने की बजाय ईश्वर को अपने हृदय में ही बुला लेते हैं। असीम परमात्मा को अपने हृदय में उतार लेने की यह अद्‌भुत कला भक्त ही जानते हैं।

०५-०८-२०१८

श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा प्राप्त मंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन एवं ध्यान की साधना अत्यंत सूक्ष्मता से हमारे अन्तःकरण को प्रभावित करती है। सद्‌गुरुदेव द्वारा सिखायी जाने वाली ये साधनायें मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार का परिमार्जन एवं रूपांतरण करके अन्तःकरण की क्रिया-विधि को ही बदल देती हैं। शुद्ध अन्तःकरण में ही आत्म-दर्शन एवं परमात्म-दर्शन संभव होते हैं। शुद्ध अंतःकरण में ही यह प्रतीति सघन होती है कि हम ईश्वर के अंश हैं।

०१-०८-२०१८

अपने चित्त में किसी वीतरागी पुरुष को बिठाना अपने मन, बुद्धि व अहम् को विकार रहित करने का एकमात्र सरलतम उपाय है। अंतःकरण पवित्र करने का यही मार्ग है। सद्‌गुरु महाराज का भावपूर्ण चिंतन शिष्य के चेतना-तंतुओं को सद्‌गुरुदेव की विराटता से जोड़ता है। अनासक्त, वीतरागी पुरुष के चिंतन एवं ध्यान से चित्त एकाग्र होता है। एकाग्र चित्त वाले साधक ही जीवन में उत्कृष्ट आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करते हैं।

३१-०७-२०१८


सद्‌गुरुदेव ज्ञान निधान हैं, महत्‌ ज्ञान की प्राप्ति सद्‌गुरु की कृपा से ही संभव है। वे ही परमगति हैं और निर्वाण पद के दाता भी श्रीसद्‌गुरुदेव ही हैं। परमपिता परमेश्वर तो घट-घट में बसते हैं, सभी जीव उन्हीं के अंशरूप हैं, लेकिन यह अनुभूति सद्‌गुरु के अनुग्रह के बिना सर्वथा असंभव है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के चरणों से सदा ज्ञान, शान्ति, भक्ति व योग की शक्ति बहती रहती है। बस स्वयं को गुरुदेव के चरणों से जोड़ देने की आवश्यकता है, क्योंकि उसके बाद शेष सभी कुछ स्वतः उपलब्ध हो जाता है।

३०-०७-२०१८

आध्यात्मिक राह में प्रगति को अवरोधित करने वाला सबसे बड़ा कारक अहंकार है। सूक्ष्म से सूक्ष्म अहंकार भी साधक को अध्यात्म-पथ पर बढ़ने से रोक देता है। सद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों की भक्ति करने से अहंकार की कठोर से कठोर परत भी गल जाती है। श्रीसद्‌गुरुदेव के चरणोदक में उनकी तप-चेतना का अंश होता है। भक्त को श्रीसद्‌गुरु महाराज का चरणोदक प्राप्त होना उस पर सुकृपा होने का प्रतीक है। श्रीगुरुदेव की कृपा से ही अंतर्ज्योति प्रकाशती है, दिव्य ज्ञानचक्षु खुलते हैं। संसार के प्रपंच के बीच परमात्मा के दर्शन करवाने वाले, शिष्य की अन्तःशक्ति जगाकर उसे आत्मानंद में रमण करवाने वाले परमपूज्य श्रीसद्‌गुरु महाराज के चरणोदक का सेवन करने से सभी भवरोगों का निवारण होता है। सद्‌गुरु महाराज के चरणों का अवलंबन दृढ़ता से करें, तभी जीवदशा से उद्धार हो पायेगा। श्रीसद्‌गुरु महाराज के चरणकमलों की सेवा की मात्र तीव्र अभिलाषा ही जीवों के समस्त जन्मों के संचित कामादि वासनामय चित्त के मालिन्य को धो डालती है।

२९-०७-२०१८


जीवन की पृष्ठभूमि में श्रीसद्‌गुरु महाराज से संबंधित प्रेमपूर्ण स्मृतियों एवं भावनाओं का सतत प्रवाह ही सुमिरन है। हम चाहे दैनिक जीवन के किसी भी कार्य को संपादित कर रहे हों, सुमिरन की धारा निरंतर बहती रहनी चाहिये। सद्‌गुरु महाराज के स्वरूप, नाम, महिमा आदि के निरंतर सुमिरन से हृदय सदा भक्तिभावों से आप्लावित रहता है। जैसे गर्भनाल से जुड़े शिशु का पालन-पोषण उसके बिना प्रयास किये चलता रहता है, वैसे ही सद्‌गुरु महाराज के स्मरण की डोर जब अटूट  हो जाती है तो शिष्य का आध्यात्मिक पोषण स्वतः होने लगता है। यह संभव है कि प्रारंभ में सुमिरन करते समय थोड़ी-थोड़ी देर में चंचल मन किसी अन्य जगह भटकने लगे, तो ऐसी स्थिति में उसे बार-बार मोड़कर सुमिरन में लगाना चाहिये। यही सुमिरन का अभ्यास है। कुछ ही समय में मन सद्‌गुरु-महाराज के स्मरण के आनंद में गोते लगाने लगेगा और उसका भटकना बंद हो जायेगा। वास्तव में सुमिरन के आनंद-रस में मन घुलकर विलीन हो जाता है। सांसारिक जीवन की किन्हीं जरूरतों को पूरा करने सद्‌गुरु महाराज का सुमिरन नहीं होना चाहिये, बल्कि अभ्यास ऐसा होना चाहिये कि सुमिरन का आनंद-रस ही जीवन की जरूरत बन जाये।

२६-
०७-२०१८

गुरुप्रेम को अपने दिल में सदा सँजोये रहने की एकमात्र युक्ति उनके नाम व रूप का सतत-सुमिरन ही है। नाम-स्मरण ही आध्यात्मिक पथ में निरंतर आगे बढ़ने का उद्यम है। नाम-स्मरण से नामी के रूप, लीला, गुण, धाम की स्मृति बनी रहती है और भक्त सदा गुरुस्मृति के अथाह आनंद में डूबा रहता है। सद्‌गुरु महाराज को निरंतर याद करना ही जीवन की मूल्यता है। इसके द्वारा जीवन परम शान्ति को प्राप्त कर धन्य-धन्य हो जाता है। आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक इन तीनों ही दुखों की समूल निवृत्ति हो जाती है।

२५-०७-२०१८


भक्त के हृदय में सद्‌गुरु महाराज का स्मरण सतत रूप से चलते रहना चाहिये, अन्यथा सुमिरन की डोर प्राणों के गहरायी तक नहीं पहुँच पाती है। चंद क्षणों के लिये किया गया स्मरण केवल सतह तक ही सीमित रहता है और अंतस्तल अछूता ही रह जाता है। इसीलिये सद्‌गुरुदेव के साथ अटूट रूप से जुड़ने के लिये हर स्वाँस में गुरुमंत्र का जप व सुमिरन करना चाहिये। जैसे लोभी मनुष्य धन का एवं कामी मनुष्य सदा भोग का स्मरण करता है, उसी लगाव के साथ भक्त भी अपने सद्‌गुरु महाराज का स्मरण अहर्निश करता है। 

२३-०७-२०१८

पाँवों की ठोकरें खाने वाला रास्ते का पत्थर जब योग्य मूर्तिकार के हाथ लग जाता है तो वह उसे तराशकर अपनी सृजनात्मक क्षमता का उपयोग करते हुये इस योग्य बना देता है कि वह मंदिर में प्रतिष्ठित होकर करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र बन जाता है। करोड़ों सिर उसके सामने झुकते हैं। रास्ते के पत्थर को इतना उच्च स्वरुप प्रदान करने वाले मूर्तिकार के समान ही, एक गुरु भी अपने शिष्य को सामान्य मानव से उठाकर महामानव के पद पर बैठा देता है। इसीलिये सद्‌गुरु का स्थान सर्वोपरि है।

२२-०७-२०१७

सद्‌गुरु महाराज का निरंतर अनन्य भाव से स्मरण करने पर ही अनन्य भक्ति का उदय होता है। सद्‌गुरु महाराज का सत्संग, गुरुभक्ति की कथा का पाठन, श्रवण, सद्‌गुरु महाराज के नाम का जप, भजन, कीर्तन, उनकी स्तुति आदि ये सभी स्मरण-भक्ति के उपाय हैं। फसल की पैदावार में सिंचाई की जो भूमिका है, भक्ति के विषय में वही उपयोगिता सतत-स्मरण की है। स्मरण ही वह युक्ति है, जिससे भक्ति तो मिलती ही है, साथ ही साथ स्वयं परमात्मा का साक्षात्कार सुलभ हो जाता है।

२१-०७-२०१८


चाहो प्रभु सोई करो, मैं आरत असहाय पुकारी। तुम मेरी बनावत आये मैं विषयिन कै दरबारी। दया होय प्रभु हमैं उबारो तौ का करिहैं बटपारी। ख्याल करत सब नसि जइहैं इनकी जुर्रत केतनी भारी। दासनदास खाकसार सरनागत तुम हमारे मैं तुम्हारी॥ दासनदास-भजनमाला, भाग-१, भजन संख्या ७२४
हे मालिक! मैं दुखी व असहाय हूँ एवं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि, मेरे कल्याण के लिये आपकी जो मर्जी हो, वह ही करें। मैं तो विषय-भोगों में फँसा हूँ, यह तो आपकी ही अनुकंपा है जो अब तक आप मेरी सुगति बनाये हुये हैं। हे प्रभु! यदि आप दया करके मुझे इस भवसागर से उबार लेंगे तो भला ये काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि शत्रु मेरा क्या बिगाड़ सकते हैं। चाहे ये शत्रु कितने भी साहसी व शक्तिशाली क्यों न हों, आपके स्मरणमात्र से इनका नाश हो जाता है। हे स्वामीजी! यह दासनदास आपकी शरण में पड़ा है, आप मेरे हैं और मैं आपका हूँ।


२०-०७-२०१८


सद्‌गुरु महाराज के नयनों में सदा अध्यात्म की सुरा भरी रहती है, जिसने भी इस अमृत का स्वाद लिया है वह गुरुभक्ति में मतवाला हो गया है। एक बार  इस मधु को चख लेने से फिर इसकी तलब बढ़ती ही जाती है। शिष्य जब सद्‌गुरु को अपना उर-आँगन दे देता है, अपनी मान्यताओं और अहम्‌ को ‍गुरु के चरणों में अर्पित कर देता है तो सद्‌गुरु उसके हृदय में अपने सत्य-स्वरूप का रस छलका देते हैं।

१९-०७-२०१८


श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ की लीला, कथा, महिमा आदि को परम श्रद्धा सहित निरंतर सुनना; श्रीसद्‌गुरु महाराज के गुणों, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ संकीर्तन करना; श्रीसद्‌गुरु महाराज का अनन्यभाव से  सतत-स्मरण करना; उनके श्रीचरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना; मन, वचन और कर्म द्वारा उनका पूजन-वंदन करना; दास्य भाव से श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी की निष्काम सेवा करना; श्रीसद्‌गुरु महाराज के चरणों में अपने सभी कर्म एवं कर्मफलों सहित सर्वस्व समर्पित कर उनसे शरण में स्वीकारने का निवेदन करना, ये सभी एक गुरुभक्त के लक्षण हैं।

१८-०७-२०१८

श्रीसद्‌गुरु देहधारी होते हुए भी देहातीत होते हैं। अपनी देह में निराकार ब्रह्म को समाये हुए श्रीसद्‌गुरु इस जगत्‌ के पालनहार हैं। श्रीसद्‌गुरु के नाम का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान में सभी लौकिक एवं अलौकिक शक्तियाँ समाहित हैं। श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्य को हर विषम परिस्थिति से उबारते हैं। जो आध्यात्मिक मंजिल अथक तपस्या एवं दीर्घकालीन साधनाओं से भी हासिल नहीं होती है, सद्‌गुरु-कृपा की एक दृष्टि ही साधक को वहाँ तक पहुँचा देती है। सद्‌गुरु सदा ही अपने शिष्यों की झोली खुशियों से भरी रखना चाहते हैं इसलिये ही वे शिष्यों को सदा जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान में लीन रहने की सीख देते हैं क्योंकि ये ही जीवन में वास्तविक खुशियों तक पहुँचाने वाली सीढ़ी है।

१६-०७-२०१८


सद्‌गुरुदेव के नाम, रूप, लीला, कथा आदि का श्रवण, कीर्तन व स्मरण गुरुभक्ति-प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ साधन हैं। सद्‌गुरु महाराज की भक्ति कथा का श्रवण, कीर्तन व निरंतर स्मरण से ध्यान शक्ति जाग्रत होती है। ध्यान से ज्ञान व वैराग्य प्रखर होते हैं। इन साधनों के निरंतर अभ्यास के साथ भक्ति अपने विविध उत्तरोत्तर स्वरूप को प्राप्त कर उत्कर्ष होती जाती है। शनैः-शनैः श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों में साधक की प्रीति गहराती जाती है। इस प्रेम से सद्‌गुरु महाराज प्रसन्न होते हैं और सभी अवरोधों को हटाकर भक्त को अपना स्वरूप दिखाते हैं। बिना प्रेम के सद्‌गुरु महाराज के श्रीचरण प्राप्त नहीं होते। सद्‌गुरुदेव के श्रीचरणों की प्राप्ति ही मुक्ति है। इस मुक्ति के बाद भक्त को आनंद स्वरूपा परम भक्ति की प्राप्ति होती है।

१५-०७-२०१८

प्रेमीभक्तों का हृदय गुरुभक्ति की सरिता में डूबने के लिये सभी साधनों से परिपूर्ण होता है। गुरुभक्ति के बीज उसके अन्तःकरण की उर्वर भूमि में अंकुरित होने को तैयार रहते हैं। मानो दीपक, तेल एवं बाती सभी तैयार हों और केवल सद्‌गुरु की प्रेमज्योति की ही आवश्यकता शेष रहती है। सद्‌गुरुदेव की पहली झलक मिलते ही इन भक्तों के जीवन में प्रेम की लौ वैसे ही प्रज्वलित हो जाती है, जैसे पेट्रोल आदि ईंधन दूर से ही किसी अग्निस्रोत की ज्वाला को आकर्षित कर धू-धू जलने लगते हैं। सद्‌गुरु महाराज को देखते ही पहली नजर में भक्तों के हृदय में अनायास ही भक्ति रसायन स्रवित होने लगता है और उसकी समूची आन्तरिक प्रकृति रसमय हो जाती है। ऐसे प्रेमीभक्त को पाकर सद्‌गुरुदेव के वात्सल्य-स्नेह के समुद्र में भी प्रेम का ज्वार आ जाता है।  श्रीसद्‌गुरु के प्रति मात्र प्रेम से परिपूर्ण होना ही भक्तिमार्ग में प्रगति के लिये पर्याप्त है। संतमत के इतिहास में श्रीश्री १००८ श्री स्वरूपानंदजी महाराज परमहंस, श्रीश्री १००८ श्री आत्मविवेकानंदजी महाराज परमहंस आदि महापुरुषों के जीवन में ऐसी राग-भक्ति का उदाहरण जग-जाहिर है, जहाँ सद्‌गुरु व शिष्य ने पहली नजर में एक-दूसरे को पहिचान लिया।

१३-०७-२०१८


शिष्य को चाहिये कि, वह निरंतर श्रीसद्‌गुरुदेव की अनंत महिमा का चिन्तन करे। उनके विराट स्वरूप की भावना से अपनी आत्मा को सरावोर रखे।  सद्‌गुरु महाराज का सतत-स्मरण उनसे एकाकार होने का अचूक उपाय है।
यथैव भावयत्यात्मा सततं भवति स्वयम्‌।
तथैवापूर्यते शक्त्या शीघ्रमेव महानपि॥
(योगवासिष्ठ, प्रकरण ४, सर्ग ११, श्लोक ५९)
अर्थात्‌, आत्मा जैसी-जैसी भावना करती है, वह शीघ्र वैसी ही हो जाती है और उसी प्रकार की शक्ति से पूर्ण हो जाती है।

१२-०७-२०१८

सद्‌गुरु की महिमा अनंत है। हजारों जीवन मिलने पर भी उनका संपूर्ण वर्णन नहीं हो सकता है। सर्वव्यापी अनंत चैतन्य सद्‌गुरु महाराज की भक्ति महिमा उजागर करते हुए श्रीस्वामीजी कहते हैं कि, श्रीसद्‌गुरु महाराज की भक्ति ऐसी अमूल्य निधि है, जिसके प्राप्त हो जाने पर शेष सभी उपलब्धियाँ स्वतः हो जाती है। गुरुभक्ति से ही सभी सद्‌गुणों की उत्पत्ति होती है। श्रीसद्‌गुरु ही धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के प्रदाता है, अतः विवेकी शिष्य को श्रीसद्‌गुरु महाराज की भक्ति का ही अवलंबन लेना चाहिये। गुरुभक्ति का प्रमुख फल तो श्रीसद्‌गुरु महाराज की शरण में आश्रय मिलना है और सु्ख, संपत्ति, मान, प्रतिष्ठा आदि तो गुरुभक्ति के पार्श्व परिणाम हैं। कुछ लोग तो सु्ख, संपत्ति, मान, प्रतिष्ठा आदि को ही अपना भाग्य समझते हैं, जबकि असली सौभाग्य तो संत-सद्‌गुरु महाराज का सत्संग है। जीवन में सद्‌गुरु महाराज के सर्वोच्च आध्यात्मिक दरबार के मिलने से बड़ा सौभाग्य भला अन्य क्या हो सकता है? श्रीसद्‌गुरु महाराज का सत्संग मिलना, उनसे नामरूपी अनमोल धन की प्राप्ति होना जीवन की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। इस उपलब्धि से ही हमारी आँखें खुलती हैं और जन्म-मरण का बंधन छूटता है।

११-०७-२०१८

सामान्यतः मन की प्रवृत्ति अवांछित विचारों की ओर झुकने की होती है और शुभ विचारों में, शुभ नियम पालने में मन को असुविधा होती होती है। इसका कारण है संचित संस्कार, मन में भरी हुई वासना तथा कुसंग। इन सब दोषों को मिटाने के लिए नाममंत्र के जप, भजन व सुमिरन के सिवाय अन्य कोई सरल उपाय नहीं है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाममंत्र का जप मन को अनेक विचारों में से एक विचार में लाने की और एक विचार में से फिर निर्विचार में ले जाने वाली सांख्य प्रक्रिया है।

१०-०७-२०१८

श्रीसद्‌गुरु के साथ श्रद्धा व प्रेम में इतना बल है कि वह मोह के साथ अहं व द्वैत को भी चूर-चूर कर डालता है। सांसारिक प्यार का मूल आधार द्वैत व अहंकार है, लेकिन श्रीसद्‌गुरु के साथ प्रेम इन दोनों को नष्ट कर देता है। प्रेमी शिष्य अपने श्रीसद्‌गुरु में समा जाता है और श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्य में। इस प्रकार अहं के नष्ट होते ही शिष्य को परमपद की प्राप्ति हो जाती है। हमारा मन मालिक की भक्ति की ओर जाता है क्योंकि वहाँ उसे रस मिलता है। मालिक के प्रेमी को अंदर से उस अलौकिक रस की प्राप्ति होती है जिसे पाकर अन्य प्रकार के रसों का स्वाभाविक उपराम हो जाता है।

०९-७-२०१८

सत्संग में शामिल होने के साथ-साथ आपको भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान की साधना नियमित रूप से करना चाहिये। कुछ समय बाद आपकी आध्यात्मिक क्षेत्र की जानकारी और निर्णायक शक्ति बढ़ने लगेगी, अपने सामर्थ्य एवं कमजोरियों के बारे में जानकारी होने लगेगी, आगे दिनों-दिन सुधार का रास्ता बनता जायेगा। आपका लक्ष्य स्पष्ट होने लगेगा परन्तु लक्ष्य की पूर्ति में कुछ समय लग सकता है। आप जितना अधिक समय भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान में लगायेंगे, उतनी जल्दी आपको लक्ष्य की प्राप्ति होगी। लेकिन इस संदर्भ में सफलता आपके अभ्यास,लगन और उत्साह पर निर्भर करती है। जैसे-जैसे आप साधना की गति बढ़ायेंगे और आध्यात्मिक शक्ति अर्जित करेंगे वैसे-वैसे आपकी अन्तर्दृष्टि धीरे-धीरे बढ़ती जायेगी और सशक्त होती जायेगी। अंत में समय आने पर आप अपने श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ की कृपा की शक्ति प्राप्त करने में समर्थ हो जायेंगे।

०८-०७-२०१७

अज्ञानवश मनुष्य ने अपने शरीर को साधनधाम न बनाकर सांसारिक भोगों का उपकरण मात्र बना लिया है, इसलिए यह तन उसके लिये मोक्ष का द्वार न होकर जन्म-मरण के चक्र में घुमाने का कारणरूप हो जाता है। अतः मनुष्य तन प्राप्त होने पर यह आवश्यक है कि वह कुछ ऐसा उपाय सोचे और करे, जिससे इस दुर्लभ मानव देह द्वारा उसका उद्धार हो सके तथा वह अपने परम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति कर ले। यह तभी संभव है जब उसे संसार सागर से मुक्त, माया से अतीत, नर देह में परमात्मा अर्थात्‌ श्रीसद्‌गुरुदेव की शरण प्राप्त हो जाये। इसीलिये गुरु की शरण प्राप्त करना ही मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिये। गुरु की कृपा से ही शिष्य की प्रतिभा जाग्रत होती है और वेद, उपनिषद्‌ आदि ग्रंथों के आशय स्पष्ट होते हैं।

०७-०७-२०१८


भक्तिरूपी धन अत्यंत दुर्लभ है। जो भक्ति के रहस्य को जानते हैं, वे सहज ही अपना तन-मन-धन सर्वस्व श्रीसद्‌गुरु महाराज को अर्पित कर देते हैं, उनके लिये यह अनमोल भक्तिधन की कमाई सहज ही होती है। करुणासिंधु मेरे सद्‌गुरु स्वामीजी अत्यंत दयालु हैं, वे स्वयं ही अपने हृदय को भक्त के हृदय से जोड़ देते हैं। इस संसार में श्रीसद्‌गुरु महाराज के सिवाय अन्य कौन उदार हो सकता है जो बिना किसी सेवा से ही जीवों पर अहैतुक ही द्रवित रहते हैं। अनाथों के नाथ, कृपासिंधु, हे सद्‌गुरु महाराज! आपकी कृपा से जीव अपने मूल-स्वभाव को सहज ही प्राप्त कर लेता है। हे मालिक! आपके शरण में पड़ा यह दासनदास आपकी इस कृपा की दुहाई देता है।

०६०७-२०१८


मोरे जीव संग रहो नाम लला। तोहरे रहे से सब सुख पइबै, बन जाओ मोरे गले कै हरवा। तोहरै मुख देखत रहौं निसिवासर येही करो उपकरवा। मेरे ऐब कै ख्याल करो न कबहूँ, छिन छिन भूलनहार हौं मोरे रजवा। कछु भक्ती भाव न मोरे, निन्दा करैं सब निन्दक समजवा। तू जानत हौं, छिपी न तुमसे, तोहरे भरोस पर मोर सबै कजवा। दासनदास खाकसार सरनागत हौं तोरे नाम मोरे महाराजवा॥ दासनदास भजनमाला भाग-३, भजन संख्या-८००
परानाम के स्वामी, हे सद्‌गुरुदेव! आप सदा मेरे जीव के साथ ही रहिये। आपके सत्संग में ही मुझे सर्वसुख प्राप्त होगा, इसीलिये आप मेरे गले का हार बनकर सदा मेरे हृदय में रहिये। हे मालिक! आप मुझ पर केवल यही उपकार कीजिये कि मैं दिन-रात आपके मनमोहक मुखड़े को ही देखता रहूँ। हे मेरे सद्‌गुरु महाराज! आप मेरे अवगुणों पर ध्यान न दीजिये क्योंकि मैं तो क्षुद्रबुद्धि हूँ और बार-बार एक क्षण में ही आपको विस्मृत कर देता हूँ। मेरे अंदर भक्ति की भाव भी नहीं हैं, पूरा समाज मेरी निन्दा करता है। हे सद्‌गुरुदेव! आपसे कुछ भी छुपा नहीं है, आप तो सर्वज्ञ हैं, मेरे जीवन के सभी कार्य आपके भरोसे ही हो रहे हैं। हे मेरे महाराज! यह दासनदास आपकी शरण में है, आपका नाम (मंत्र) ही मेरा स्वामी है।

०५-०७-२०१८


प्रेम कै रहिया सबसे आली बाय और धरम करम नीचा खाली बाय ना। हठ जोग राज जोग संचित दगध होय भक्ती जोग करै हिया निराली बाय ना। प्रेम भक्ती जल बिना नहाये अन्दर कै मल कबहूँ न जाये वेद पुरान सभी ने गाये ना। दासनदास खाकसार करु प्रेम बार-बार चरन धरु हिये में पार जइबै छिनक में ना॥ दासनदास भजनमाला भाग-३, भजन संख्या११६
प्रेममय जीवन ही सर्वोत्तम है, शेष धर्म-कर्म आदि सभी खोखले प्रपंच हैं। हठयोग, राजयोग आदि से केवल प्रारब्ध मिट सकता है, जबकि गुरुभक्ति तो हृदय को निर्मल कर निराला बना देती है। प्रेम-भक्ति के जल में स्नान किये बिना आंतरिक मलिनता नहीं मिटती है, वेद-पुराण आदि सभी ग्रंथ भी यही कहते हैं। यह दासनदास निरंतर बारंबार अपने सद्‌गुरु स्वामीजी के प्रेम में डूबा रहना चाहता है, उनके चरण-कमलों को सदा अपने हृदय में धारण रखना चाहता है, जिससे जीव एक छण में ही इस भवसागर को पार कर जाता है।

०४-०७-२०१८


जहाँ भक्ति और प्रेम की आग रौशन हो जाती है, वहाँ संसार के तमाम दुःख, क्लेष भस्म हो जाते हैं। जिस जगह भक्ति का प्रवेश हो जाता है वहाँ से दुःख को मजबूरन भागना पड़ता है। सच्चे भक्त गुरु-भक्ति के आगे माया को कुछ नही समझते हैं। गुरुभक्त की निगाहें दुनिया की निगाहों से बहुत ऊँची हैं, यही वजह है कि गुरुभक्त को जो सुख हासिल है वो संसार के किसी भी व्यक्ति को नहीं प्राप्त है। गुरु-शिष्य का रूहानी संबंध हकीकत में सद्‌गुरु के प्रति सच्चा प्रेम, श्रद्धा भाव तथा भक्ति की तड़प है।

०३-०७-२०१८

अपने इष्ट से हार्दिक योग के लिये सुमिरन अर्थात्‌ स्मरण ही एक सबल युक्ति है। जब साधक गुरु के नाममंत्र के अर्थ पर विचार करते हुए सद्‌गुरु के स्वरूप का स्मरण करता है, उनकी मोहक छवि को याद करता है, तो हृदय में भक्ति के भाव उठते हैं और इन भावों के सहारे उसके अपने गुरु के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति होती है। इन प्रेम भावनाओं से वह अपने प्रियतम श्रीसद्‌गुरुदेव से जुड़ जाता है।

०२-०७-२०१८

यद्यपि जीव ब्रह्म का ही अंश है, तथापि भौतिकता के वशीभूत होने के कारण वह आत्मस्थ चैतन्यस्वरूप परमप्रभु का साक्षात्कार करने में असमर्थ है। इस बाधक आवरण को विच्छिन्न करने के लिए एक शक्तिशाली माध्यम की आवश्यकता होती है और यह माध्यम 'गुरु' ही हैं। जीव-तत्त्व को परमात्म-तत्त्व तक पहुँचाने वाला 'गुरु-तत्त्व' ही है, जिसे वेद 'नेति-नेति' कहकर मौन हो जाते है। इस अमूल्य तत्त्व के रहस्य को केवल 'गुरु' ही ज्ञान और भक्ति के माध्यम से उजागर करने में समर्थ हैं।

२१-०२-२०१७

मात्र ज्ञानबुद्धि के सहारे भवसागर को पार करना तैरकर जाने के समान है, इसमें अनंत श्रम है, साधक के सीमित जीवनकाल और सीमित सामर्थ्य के कारण असफलता की संभावना बहुत अधिक है। जबकि प्रेमभक्ति तो ऐसी नैया है कि उसके खेवनहार श्रीसद्‌गुरु की कृपा से भक्त का भवपार होना निश्चित ही होता है। प्रेमी गुरुभक्त तो सद्‌गुरुदेव के दिव्य चरण-कमल के अवलम्बन से अनायास ही भवसागर को तर जाता है। प्रेमीभक्त की आध्यात्मिक यात्रा इतनी सुहानी होती है कि वह सद्‌गुरु के प्रेम में डूबकर भवपार करने की लालसा को भी तिलांजलि दे देता है। प्रेमी शिष्य केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज के चरणों की भक्ति की ही चाह रखता है अथवा ऐसा कहना अधिक उचित होगा कि सद्‌गुरु की प्रेमभक्ति से भवसागर सूख जाता है।

 

२०-०२-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन एवं ध्यान की समग्र साधना गुरुभक्ति है किन्तु इनमें भी सेवा को ही भक्ति का प्रधान का अवयव माना गया है। यह सेवा केवल शारीरिक रूप से ही नहीं अपितु मन, इन्द्रियों और प्रेमभावों से युक्त निष्काम सेवा है। यही सच्ची सेवा अथवा पराभक्ति कहलाती है। ऐसी भक्ति से न केवल ब्रह्मबोध होता है अपितु शिष्य का अपने सद्‌गुरु से एकाकार हो जाता है।

 

१९-०२-२०१७

जब शिष्य करुण और विनीत भाव से सद्‌गुरु महाराज को पुकारता है तो सद्‌गुरु स्वयं उससे मिलने की युक्ति बिठाकर उसे दर्शन देते हैं। मुक्ति प्रदाता, स्वयं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मसरूप श्रीसद्‌गुरुदेव अपने प्रेमी शिष्य की हर अभिलाषा पूरी करने को सदा तत्पर रहते हैं। सद्‌गुरु सम्मिलन की उत्कट कामना में व्याकुल शिष्य निश्चित ही सद्‌गुरु भगवान्‌ को प्राप्त करता है।  प्रेम के उत्कट हो जाने पर तत्क्षण सद्‌गुरु दर्शन देते हैं। भक्त और भगवान्‌ का रिश्ता ऐसा ही होता है। सद्‌गुरु अपने शिष्य के प्रेमी में इतने आभारी होते हैं कि उसकी झोली में स्वयं को ही डाल देने पर भी उनके देने की लालसा चुकती नहीं है। संपूर्ण सृष्टि के स्वामी श्रीसद्‌गुरुदेव तो अपने शिष्य के प्रेम में पराधीन होते हैं। सद्‌गुरु स्वामीजी के हृदय भाव अपने शिष्य प्रेम के लिये कुछ ऐसे होते है-
 प्रेमी के तो कर बिकूँ, यह तो मेरा असूल।
चार मुक्ति दूँ ब्याज में, देय सकहुं नहिं मूल।।
अर्थात्‌ मैं प्रेमी के हाथ में तो बिका ही रहता हूँ। चारों प्रकार की मुक्तियाँ (सायुज्य,सामीप्य, सालोक्य और सारूप्य) ब्याज के रूप में उसकी झोली में डाल देने पर भी उसके प्रेम रूपी मूलधन को नहीं चुका सकता।
भक्तवत्सल सद्‌गुरु अपने सम्पूर्ण ज्ञान, अनन्त सामर्थ्य और अतिशय प्रेम लिए प्रति पल अपने शिष्य के साथ होते हैं। शिष्य के हृदय के तार सद्‌गुरु परमात्मा से जुड़ते ही उनकी सम्पूर्ण शक्ति शिष्य के कवच के रूप प्रकट हो जाती है। सद्‌गुरु भगवान्‌ अपनी अनन्त शक्ति और अपरिसीम प्रेम से शिष्य का पोषण करते रहते हैं।

 

१८-०२-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज की निष्काम सेवा की कसौटी पर खरा उतरने के लिये उनकी  सेवा में अपने-आप को मिटा देना चाहिये। जो जीव इस कसौटी में सफल होते हैं वे फिर जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते। मात्र अपने गुणों और सामर्थ्य के बलबूते पर मालिक के रूप में लीनता संभव नहीं है अपितु जिन जीवों पर सन्त सद्गुरु की विशेष दया और कृपा होती है उन्हीं की कमाई फलवती सिद्ध होती है। वे ही जीव निजधाम में पहुँच सकते हैं। जीव को सन्त सद्गुरु की दया व कृपा प्राप्त करने की अर्हता सद्गुरु की निष्काम सेवा से ही प्राप्त होती है। जीवों को निष्काम सेवा रूपी मुक्तिमार्ग में चलाना ही उनकी सबसे बड़ी कृपा और अनुकम्पा है। जिस सेवक पर यह कृपा उतरती है उसका कल्याण होने में कोई सन्देह नहीं।

१७-०२-२०१७

समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली गुरुभक्ति की महिमा अगाध है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों की सेवा गुरुभक्ति प्राप्त करने का प्राथमिक साधन है। गुरुभक्ति या सद्गुरु सेवा का मार्ग आध्यात्मिक प्रगति का पथ है। श्रीसद्‌गुरु की निष्काम सेवा से ही शिष्य आध्यात्मिकता के उस उच्च शिखर तक पहुँच जाता है जो अन्य किसी पथों पर चलकर अनेक जन्मों की कठिन साधनाओं के संपन्न होने पर भी दुर्लभ है। गुरुभक्ति जीव का काया-कल्प का मार्ग है। अज्ञान अवस्था में अपने मूल स्वरूप को भूला जीव सद्‌गुरु महाराज की भक्ति द्वारा अपने मूल स्वरूप को प्राप्त करता है, यही आत्मिक उन्नति है, यही आत्मिक उत्कर्ष है। सन्त सद्गुरु की सेवा-भक्ति और उनके प्रति प्रेम ही आत्मिक उत्कर्ष के साधन हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज ही अपने आध्यात्मिक अनुभवों का सूत्रपात कर भक्ति मार्ग सुनिश्चित करते हैं जिस पर चलकर जीव को निज-स्वरूप और सच्चिदानन्द परमात्मा का बोध होता है। लौकिक मंत्र-तंत्र का उपदेश देने वाले तो अनेक होते हैं लेकिन जो शिष्य को जीवन के परम सत्य का बोध कराते हैं‍ वे ही सच्चे सद्‌गुरु होते हैं।

१६-०२-२०१७

अपने इष्ट श्रीसद्‌गुरुदेव के प्रति अनन्य एवं अखण्ड प्रेम ही भक्ति है। काया, वाणी व मन से गुरु की सेवा में रत रहना, गुरु की हर इच्छा की पूर्ति हेतु आतुर हो जाना, दिन-रात उनकी स्मृति में मग्न रहना, नाम सुमिरन की सतत धार को अक्षुण्ण बनाये रखना ही भगवत्‌ प्रेम का पुष्ट आहार है।

१५-०२-२०१७

गुरुशक्ति तत्त्वतः निराकार है लेकिन जीवों को भव से मुक्त करने के लिये यही गुरुशक्ति देह वरण कर श्रीसद्‌गुरुदेव के रूप में अवतरित होती है। श्रीसद्‌गुरुदेव भव के तापों से संतप्त जीवों को भक्ति रूपी शीतल मधुमयी छाया प्रदान करते हैं और अपने शिष्यों को भक्ति-गंगा में अवगाहन करवा कर उनके मूल-स्वरूप का साक्षात्कार करवाते हैं। इसीलिये भक्तिमार्ग की साधना में श्रीसद्‌गुरुदेव के प्रति भक्ति को जो उच्चतम प्रशंसा मिली है, उपनिषद्‌ भी उसका ही समर्थन करते हैं-
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥ श्वेताश्वतर उपनिषद्‌ , ६/२३
अर्थात्‌ जिस परम भक्ति के भाव से परमेश्वर की भक्ति की जाती है, वैसी ही भक्ति जिस साधक में सद्‌गुरु के प्रति होती है, ऐसे महात्मा-मनस्वी पुरुष के हृदय में ही सद्‌गुरु द्वारा कहे गये आध्यात्मिक रहस्यों के अर्थ प्रकाशित होते हैं।

१४-०२-२०१७

गुरुदर्शन ही शिष्य की परम जिज्ञासा होती है। शिष्य सदा इसी भावना से प्रार्थना करता है कि हे मालिक! मैं कब पवित्र और एकाग्र मन वाला होकर आपके सत्य, आनंदमय स्वरूप का साक्षात्‌ दर्शन करूँगा। मैं कब आपके अनन्त आनंदमयी रूप में अंतर्भूत- तदात्मभूत हो पाऊँगा? हे स्वामीजी! आपके पावन अनुग्रह से ही मेरी यह अभिलाषा पूर्ण हो सकती है, अतः मैं आपसे ही भक्तिमयी प्रार्थना करता हूँ।

१३-०२-२०१७

सच्चा गुरुभक्त अपने सद्‌गुरु की आज्ञा पालन करने में तत्पर एवं समर्पित  होता है, उसे अपने सद्‌गुरु से अधिक प्रिय और कोई नहीं होता, उसका जीवन एवं उसके समस्त क्रियाकलाप सद्‌गुरु को ही समर्पित होते हैं। जो साधक एक श्रीसद्‌गुरुदेव को छोड़कर तरह-तरह के देवी-देवताओं में चित्त रमाता है उसका मन भ्रम और भटकाव में फँस जाता है। इसके विपरीत जो शिष्य अपने श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति अपने प्राणों की आहुति लगाने के लिए भी तैयार है, श्रीसद्‌गुरु ही जिसके सर्वस्व होते हैं, उसे ही 'सद्‌गुरु प्रणिधान' कहते हैं। सद्‌गुरु प्रणिधान का अर्थ है स्वयं को सद्‌गुरु परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देना। श्रीसद्‌गुरु को ही अपना स्वामी, माता-पिता, सर्वस्व मानकर, अपनी समस्त इच्छाओं का त्याग कर, सदैव श्रीसद्‌गुरुदेव की आज्ञा का पालन करना एवं स्वयं को उनके अधीन मानना, सद्‌गुरु से प्रेम करना एवं भक्तिपूर्वक उनका गुणगान करना, यही शरणागति है। समस्त आध्यात्मिक साधनों में सद्‌गुरु-शरणागति ही एक ऐसा सशक्त साधन है कि इसके आचरण मात्र से ही परमात्मबोध हो जाता है। गुरु सदा ही ऐसे शरणागत भक्त के साथ होते हैं।

 

१२-०२-२०१७

‍गुरु बनाने मात्र से मनुष्य का विवेक नहीं जागता है। विवेक जागरण के लिये सद्‌गुरु का सत्संग आवश्यक है, सद्‌गुरु के बतलाये मार्ग का अनुसरण आवश्यक है, हर घड़ी उनकी शरणागति आवश्यक है। गुरु उपदेश, गुरुमहिमा आदि श्रवण का सतत अभ्यास करने से शिष्य के मन में विवेक उत्पन्न होने लगता है। तब वह सत्य-असत्य, नित्य-अनित्य का मनन करने लगता है, इससे ही विवेक-बुद्धि जाग्रत होती है। सद्‌गुरु की श्रीवाणी से निकले उपदेश पर आचरण से ही अंत:करण शुद्ध होता है और शुद्ध अंतःकरण से गुरुभक्ति करने पर ही जीव उद्धार होता है। सत्संग से मनुष्य का स्वभाव परिवर्तित हो जाता है। सत्संग से ही मनुष्य का भक्त के रूप में नया जन्म होता है। जीवन में सद्‌गुरु  की भक्ति और उनके प्रति प्रेम बढ़ाने के लिए सद्‌गुरु के कल्याणकारी वचनों को श्रद्धा एवं प्रेम से सुनना ही सत्संग है। आध्यात्मिक उन्नति सत्संग से ही होती है। निष्काम कर्म और उपासना से अंतःकरण शुद्ध होता है और गुरुकृपा मिलती है। सद्‌गुरु के उपदेश को जीवन में उतारने से उनकी कृपा आत्मसात्‌ होती है। श्रीसद्‌गुरुदेव की सेवा सच्चे प्रेम व बिना किसी स्वार्थ के साथ करनी चाहिए।

११-०२-२०१७

उपदेश श्रवण  के द्वारा श्रीसद्‌गुरुदेव शिष्य के हृदय में प्रवेश करते है इसलिए श्रवण भक्ति को श्रुति मार्ग भी कहते है। श्रुति द्वारा श्रीसद्‌गुरु महाराज का प्रेम स्वरूप एवं  ज्ञान स्वरूप दोनों ही ग्राह्य है। श्रीसद्‌गुरु के वचनों के श्रवण करने से हृदय पवित्र एवं निर्मल हो जाता है। जहाँ प्रेम होता है वहाँ रस होता है, जहाँ चिंतन होता है वहाँ ज्ञान होता है। प्रेमभाव सहित सद्‌गुरु के उपदेशों का निरंतर चिन्तन एवं मनन करने से श्रावक शिष्य प्रेम व ज्ञान दोनों से आप्लावित हो जाता है। गुरुप्रेमी भक्तों द्वारा श्रीसद्‌गुरु भगवान् के नाम,रूप ,गुण, प्रभाव, लीला, तत्त्व और रहस्य की अमृतमयी कथाओं का श्रद्धा और प्रेमपूर्वक श्रवण करना एवं उनमें मुग्ध हो जाना ही श्रवण भक्ति का स्वरूप है। श्रीसद्‌गुरु महाराज को साष्टांग प्रणाम कर उन्हें अपनी निष्काम सेवा द्वारा प्रसान्न कर निष्कपट भाव से अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिये उनसे याचना करना एवं उनके बतलाये मार्ग में निरंतर चलते रहने की तत्परता ही श्रवण भक्ति प्राप्त करने की विधि है। श्रीकृष्णजी भी अर्जुन को आत्मज्ञान प्राप्त करने की यही विधि बतलाते हुए कहते हैं कि-
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ॥ श्रीमद्‌भागवद्गीता, ४/३४
अर्थात्‌, तत्त्व-ज्ञान को तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषों के पास जाकर समझ उनको साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और सरलता-पूर्वक प्रश्न करने से वे तत्त्वदर्शी अनुभवी ज्ञानी, शास्त्रज्ञ महापुरुष तुझे उस तत्त्व-ज्ञान का उपदेश देंगे।
श्रवण भक्ति अतिदुर्लभ है और केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज के सत्संग से ही प्राप्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है-
 बिनु सत्संग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग ।
मोह गएँ बिनु राम पद होई न दृढ़ अनुराग ॥ (रा०च०मा० ७|६१)
अर्थात्‌, सत्संग के बिना हरिकथा नहीं मिलती और बिना हरिकथा के मोह यानी अज्ञान का नाश नहीं होता तथा अज्ञान के नाश हुए बिना हरि में अनुराग अर्थात्‌ दृढ़ प्रेम नहीं होता।

 

१०-०२-२०१७

आध्यात्मिक संदर्भ में श्रवण का अर्थ है सद्‌गुरु के उपदेशों, गुरुमहिमा, गुरुभक्ति विषयक चर्चाओं को सुनकर अपने जीवन को गुरु के अनुकूल ढालना। गुरुभक्ति-योग साधना के पहले क्रम दीक्षा में गुरु अपने शिष्य का शुद्धिकरण करते हैं, और शिष्य को भक्ति मार्ग में प्रेरित करने के लिये गुरुभक्ति की साधना का उपदेश करते हैं। सद्‌गुरु द्वारा दी जाने वाली दीक्षा का उद्देश्य यही है कि शिष्य को गुरुभक्ति के गूढ़ रहस्यों को समझने के योग्य बनाना। शिष्य अपने गुरु के अमृतवचनों को सुन-सुनकर सांसारिक मोह व आकर्षणों से दूर हटता जाता है और उसका हृदय निर्मल होता जाता है। सद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों में शरण प्राप्ति को लक्ष्य बनाकर अन्य समस्त सांसारिक इच्छाओं, भावों, विचारों का पूर्ण रूप से त्याग  करके, सद्‌गुरुदेव के प्रति पूर्ण भक्ति व आस्था रखकर उनके सत्संग में अपनी भक्ति जिज्ञासाओं का समाधान करना ही श्रवण भक्ति हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों में प्रेम उत्पन्न हो जाये यही श्रवण का लक्ष्य है।  श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति हृदय में प्रेम उत्पन्न होने पर सभी सांसारिक राग स्वयं गल जाते हैं। श्रवण एक सूक्ष्म साधना है जिसमें शांत मन व एकाग्र चित्त से गुरु के वचनों को हृदय तक उतारना होता है। इस श्रवण साधना से ही अपने मूल स्वरूप आत्मा व परमात्मा सम्बन्धी तत्त्व रहस्य का पता लगता है। श्रीसद्‌गुरुदेव ही मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं और योग साधना में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं।

०९-०२-२०१७

भक्ति कोई कोरी उपासना नहीं अपितु  श्रद्धा, प्रेम व उन्मेष से परिपूर्ण अवस्था है। भक्ति एक ऐसी अवस्था है कि भक्त को न केवल सद्‌गुरु महाराज के वचनों से प्रेम होता है बल्कि सद्‌गुरु परमात्मा के नाम, गुण, चरित्र आदि के श्रवण में भी उसके हृदय में आनंदरस का प्रवाह होने लगता है। ऐसे में भक्त श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाम-गुण-कथा में इस कदर डूब जाता है कि वह सदा इसी आनंद को चखना चाहता है। भक्ति श्रीसद्‌गुरुदेव के माहात्म्य श्रवण और उससे उत्पन्न ज्ञान का परिणाम होती है। यही भक्ति जब और उत्कर्ष को प्राप्त होती है तब भगवद्विषयक ज्ञान और प्रखर होता है।

०८-०२०२०१७

जो सद्‌गुरु महाराज को छोड़कर और कुछ नहीं जानता वह श्वास-प्रश्वास के साथ श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाम को सुमिरता रहता है। जप करने का अर्थ है निर्जन में निःशब्द सद्‌गुरु का नाम लेना। सदैव ही मनन एवं स्मरण करते रहना उचित है। जप करने से सद्‌गुरु और उनकी भक्ति का लाभ होता है। सद्‌गुरुदेव के नाम-सुमिरन में सदा रुचि रखनी चाहिये। सद्‌गुरु और नाम दोनों एक ही हैं। नाम और नामी दोनों में अभेद जानकर सर्वदा प्रेमपूर्वक उनाका नाम ले-लेकर पुकारना चाहिये। जो सद्‌गुरु, वही नाम, दोनों भिन्न नहीं है। यदि सुमिरन और नामजप करते हुए दिन-दिन अनुराग बढ़े, आनंद मिलता चला जाय तो कोई भय नहीं सभी विकार कटकर रहेंगे, सब कुछ के बाद सद्‌गुरु की कृपादृष्टि होकर रहेगी।

 

०७-०२-२०१७

गुरुभक्ति रूपी वेदी में शिष्य को शरीर, हृदय, बुद्धि तीनों को समर्पित करना अनिवार्य है। यह समर्पण पूरे श्रद्धा से होना चाहिये अन्यथा  श्रद्धा के बिना समर्पण अधूरा ही रहता है। संपूर्ण समर्पण वही है जिसमें स्वयं काम प्रत्येक प्रिय वस्तु का, सभी गुण-दोषों का, अपनी सभी कमियों एवं विशिष्टताओं का सद्‌गुरु के प्रति सर्वत्मना सर्वांगीण हो। ऐसा समर्पण ही आत्मोत्सर्ग का विशुद्धतम रूप है।

०६-०२-२०१७

जब श्रीसद्‌गुरुदेव अपने प्रिय शिष्य की सेवा-भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं तब उस पर अपनी कृपा की शीतल वृष्टि कर परमात्मा के सत्यज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं। परम आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न समर्थ सद्‌गुरुदेव के स्मरण मात्र से ज्ञान स्वतः उत्पन्न हो जाता है अतः उन परमात्मा श्रीसद्‌गुरुदेव की पूजा, उपासना तथा सच्ची सेवा से असंभव भी संभव हो जाता है।

०५-०२-२०१७

सद्‌गुरु की कृपादृष्टि का पात्र बनने के लिये सेवक को अहम्‌ भाव से मुक्त होकर अत्यंत नम्र, दीन और गुरु-दरबार का हर प्रकार से हितैषी बनकर अनन्य और निष्छल भाव से तन-मन-धन से सेवारत रहना चाहिये। गुरु-निर्देशित विधि से भक्ति-साधना करते हुए, गुरु आज्ञा का सतत पालन करते हुए उनकी मौज के अनुसार चलने से ही जीवन सफल और सार्थक होता है। यही गुरुमुखता है।

०४-०१२-२०१७

शिष्य के यौगिक चक्रों को बेधकर उसके अज्ञानरूपी पाप को छिन्न-भिन्न  करके ज्ञान का बोध कराने वाले श्रीसद्‌गुरु महाराज ही हैं। श्रीसद्‌गुरुदेव ही सुषुप्त शक्तियों को अपनी कृपा शक्ति से  नामजप, भजन, सुमिरन कराकर शिष्य को शक्ति युक्त बनाते हैं। शिष्य के अंदर में होने वाले भजन, सुमिरन व ध्यान की प्रक्रिया को खोलना श्रीसद्‌गुरु कृपा का अभीष्ट है।

०३-०२-२०१७

देहधारी समय के सद्‌गुरु ही पूर्णब्रह्म हैं। वही शिष्य की आत्मा के पूर्ण जाग्रत स्वरूप हैं। वही प्रत्येक जीव के अंदर रमने वाले राम हैं। तत्त्वज्ञानी सन्त सद्‌गुरु ही परमात्मा के सगुण रूप हैं। यह सत्य सभी प्रकार से प्रमाणित है। इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है।

०२-०२-२०१७

सगुण परमात्मा श्रीसद्‌गुरुदेव की साधना अत्यंत सरल और सुगम है। विनम्र सेवा द्वारा सद्‌गुरु को संतुष्ट करके उनसे दीक्षा प्राप्त करना, उनके द्वारा प्रदत्त महामंत्र ’नाम’ का श्वास-प्रश्वास में जप करना, भ्रूमध्य में उनके रूप का ध्यान करना, उनकी आज्ञा का बिना संशय पालन करना, सौभाग्य से यदि सुलभ हो तो उन परमात्मा की देह की सेवा करना, नहीं तो अन्दर में तो अवश्य ही उनकी सेवा मान्स पूजा के रूप में करना, यही संक्षेप में सन्त साधना का स्वरूप है।

०१-०२-२०१७

श्रीसदगुरुदेव से श्रद्धापूर्वक उपदेश के ’श्रवण’ के बाद ही ’मनन’ आदि साधना या अभ्यास का श्रीगणेश सम्भव होता है तथा मनुष्य के सभी मनोरथ सिद्ध होने का द्वार खुल जाता है। श्रीसद्‌गुरु ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं अतः प्रत्यक्ष ब्रह्म की शरण प्राप्त हो जाने के बाद भला किस लौकिक-अलौकिक कामना का पूर्ण होना शेष रह जायेगा!

३१-०१-२०१७

संसार के अनेक बुद्धिमान्‌ लोग भी इस भ्रम का शिकार हैं कि पवित्र जीवन व्यतीत करना और सच्चे दिल से अपने सांसारिक कर्तव्यों को पूर्ण करना ही सबसे उत्तम धर्म या जीवन की मुक्ति है। वे भूल जाते हैं कि सदाचार या कर्तव्यपरायणता जीवन का मुख्य उद्देश्य नहीं है, मुख्य उद्देश्य तो सद्‌गुरु-प्राप्ति है, शेष सभी तो उसी उद्देश्य की पूर्ति में आंशिक रूप से सहायक मात्र हैं। जीवन का परम लक्ष्य तो सद्‌गुरु के नाम के सुमिरन की साधना द्वारा गुरु से मिलाप करना है जिससे जीव पूर्णता प्राप्त करके सदा के लिये आवागमन के बन्धनों से मुक्त हो सके। मनुष्य का जन्म प्रभु की भक्ति के लिये ही हुआ है इसलिये इस परम कर्तव्य को त्यागकर शेष हर प्रकार के कर्तव्य पूरे करते रहने से मनुष्य को सच्चिदानंद की प्राप्ति नहीं हो सकती है। सच्चिदानंद की अनुभूति तो श्रीसद्‌गुरुदेव की शरण में ही होती है।

३०-०१-२०१७

अज्ञान की गाँठ खुल जाना ही मोक्ष है। स्वरूप-शक्ति का अपनी वास्तविकता में अभिव्यक्त हो जाना मोक्ष है। गलतफहमी बन्धन है, असलियत का बोध हो जाना मोक्ष है। श्रीसद्‌गुरु अविद्या की गाँठ को खोलकर जीव में शिवभाव के अभिव्यक्ति कर देते हैं।

२९-०१-२०१७

यदि किसी अवरोधवश श्रीसद्‌गुरुदेव स्वामी के रूप का ध्यान न आये तो भी श्री गुरुमहाराज के नाम का सुमिरन निरन्तर करते रहना चाहिये। गुरु के नाम के सुमिरन से मन व प्राण पवित्र हो जाते हैं। इस प्रकार भी सतत अभ्यास करने से श्री गुरुमहाराज के के परमपावन चरण-कमलों में अनन्य-प्रेम उत्पन्न हो जाता है। नाम-जप या सुमिरन की सहज विधि यही है कि अपने श्वास-प्रश्वास के आने-जाने की ओर ध्यान रखकर श्वास-प्रश्वास के साथ ही साथ अपने आराध्य श्रीसद्‌गुरुदेव के नाम का स्मरण और जप करता रहे। यह साधना सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते सब समय की जा सकती है। अभ्यास दृढ़ हो जाने पर चित्त निरंतर श्री गुरुमहाराज के चिन्तन में अपने-आप ही लग जायेगा। यही सर्वमान्य श्रेष्ठ साधना है।

२८-०१-२०१७

परमतीर्थ श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा प्रदत्त उन्हीं का शब्दरूप ’नाम’ ही सच्चा तीर्थ है। इस तीर्थ में स्नान करने से सभी कलुष और विकार नष्ट होते हैं। यह ’शब्द’ निर्मल है। इसमें किसी प्रकार का भी विक्षेप असंभव है। यह परम शुद्ध तीर्थ है। इसी शब्दतीर्थ से सद्‌गुरुदेव रूपी परमतीर्थ तक की यात्रा पूरी होती है।

२७-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु चिन्तामणि हैं, साक्षात्‌ कल्पतरु हैं, जिसने उन्हें पा लिया उसके मन की सभी चिन्तायें शान्त हो गईं। जीवन में निरंतर जो संकल्प-विकल्प चलते रहते हैं वे सभी गुरु की छत्रछाया में उनकी कृपा से शांत हो जाते हैं। श्रीसद्‌गुरु वह चन्दन-तरु हैं, जिसमें भागवत सुगन्ध भरी हुई है अतः इसे पाकर  चारों वर्ण की वासनागंध मिट जाती है।

२६-०१-२०१७

जिस भाग्यशाली को सद्‌गुरु की कृपा से उनकी पूजा, अर्चना, ध्यान-सुमिरन और सेवा का अवसर सुलभ हो जाता है उसका परम कल्याण होना सुनिश्चित है, साथ ही साथ सभी देवता उसकी सेवा में बिना माँगे, बिना निवेदन किए सब कुछ देने के लिये हर समय तत्पर रहते हैं। "एकै साधे सब सधै  सब साधै सब जाय" अनेक की पूजा से कुछ नहीं मिलता, एक सद्‌गुरु की सेवा से ही सब कुछ सुलभ हो जाता है।

 

२५-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु की भक्ति से साधक को सब कुछ सहज सुलभ हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु के प्रेम की छाँव में रहने वाला शिष्य जीवन की सभी विघ्न-बाधाओं से सुरक्षित रहता है।

२२-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेवजी महाराज जिस नाम का उपदेश देते हैं उस नाम का अमल (अभ्यास) करने से वह कल्पलता के समान फलदायी हो जाता है और लौकिक-पारलौकिक सारी कामनाओं की पूर्ति करता है।

 

२१-०१-२०१७

सद्‌गुरुदेव  के भजन से लौकिक-पारलौकिक सभी प्रकार के दुःख दूर होते हैं। हमारे भीतर भी जो विषय-विकार रूपी राक्षस निरंतर उपद्रव मचाये रहते हैं उनको गुरुकृपा से ही वश में किया जा सकता है और कोई उपाय नहीं है।

२०-०१-२०१७

जिस आत्मज्ञान के द्वारा जीव ब्रह्मरूप हो जाता है, वह ज्ञान गुरुकृपा से ही प्राप्त होता है। गुरुकृपा-निक्षेप ही वह ज्ञान है। यह गुरुकृपा रूपी ज्ञान गुरु के सान्निध्य में उनकी शरण में रहकर पूर्ण निष्ठा और प्रेम के साथ उनकी सेवा करने से ही प्राप्त होता है।

१९-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज की सेवा से असाध्य कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं, इस बात की परीक्षा लौकिक मनोरथों को सफल करने में ही कर लेनी चाहिये। इसके बाद जब विश्वास जम जाये तो पक्के विश्वास के साथ नाम-भजन एवं गुरुसेवा द्वारा परमार्थ का साधन करना चाहिये।

१८-०१-२०१७

सद्‌गुरुदेव दीन-दुखियों के परम हितैषी होते हैं तथा बड़े से बड़ा अपराधी या पापी भी यदि शरणागत हो जाये तो वे उसे क्षमा कर देते हैं क्योंकि उनमें असीम करुणा होती है। बिना माँगे भी वे अपने सेवक के मनोरथ सफल करते रहते हैं, माँग लेने पर तो कहना ही क्या है!

 

 १७-०१-२०१७

सत्संग का मतलब है श्रीसद्‌गुरु महाराज का संग और उनकी सेवा करना। श्रीसद्‌गुरुदेव के वचनों को मन व चित्त से सुनना और समझना, उनकी बानी को तवज्जह के साथ मनन करना, उनके चरणों में प्रेम अथवा वास पाने की चाह से प्रेरित होकर श्रद्धा और सद्‌भाव से काम करना। यह सब तो बाहरी सत्संग है, पर उनके उपदेश के अनुसार मन और चित्त लगाकर सुरत को ऊँचे मुकामों पर चढ़ाने का अभ्यास करना, यह सब भीतरी सत्संग है।

१६-०१-२०१७

जब तक विरहाग्नि हृदय में न जगे और प्रियतम की दर्शनेच्छा की उत्कट लालसा न हो, तब तक साध्य की सिद्धि नहीं होगी। यदि शिष्य भक्ति व प्रेमपूर्वक श्रीगुरु के चरण कमलों को पकड़ लेता है तो वह कितना ही पंगु क्यों न हो, परमपद के दुर्गम पथ पर सुगमता के साथ चलकर दर्शन पा ही लेता है।

१५-०१-२०१७

गुरु के प्रति शिष्य के मन में अडिग आस्था व समर्पण पूर्ण ज्ञान प्राप्ति का आधार है। सामान्य मानव बुद्धि एवं अनुभवों के आधार पर गुरु को समझने अथवा उनके क्रिया-कलापों की समीक्षा का प्रयास करना शिष्य जीवन की सबसे बड़ी भूल होती है। तर्क अथवा बुद्धि द्वारा गुरु को नहीं समझा जा सकता है। गुरु-महिमा को समझने के लिये अपने हृदय के कपाटों को खोलकर गुरु को हृदय में बिठाने की जरूरत होती है। गुरु को तत्त्व से अर्थात्‌ गुरु-तत्त्व को समझने के लिये श्रद्धा, आस्था एवं समर्पण द्वारा निरहंकारिता की अवस्था प्राप्त करना आवश्यक है। श्रद्धा, आस्था एवं समर्पण द्वारा ही शिष्य अपनी तर्क-बुद्धि को गलाता है, अपने सभी पूर्वाग्रह समाप्त करता है।

१४-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज के प्रति परमात्मभाव रखना ही ज्ञान व भक्ति प्राप्त करने की कुंजी है। गुरुमंत्र का जप, भजन, श्रीसद्‌गुरुदेव का सतत स्मरण, गुरुसेवा, गुरुपूजा, गुरुदर्शन व सद्‌गुरु स्वामीजी के स्वरूप के ध्यान से आत्मबोध होता है।

१३-०१-२०१७

साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जैसे-जैसे साधना प्रगाढ़ होती है, वैसे-वैसे साधक के मन में अबोधता के भाव भी प्रगाढ़ होने लगते हैं। ऐसे साधक अपने सद्गुरु से सदैव यही याचना करते हैं कि हे मालिक! साधना जगत् में मैं एकदम शून्य हूँ। मैं तो केवल मालिक की दया के बल पर ही जीता हूँ। मुझमें तो तपस्या करने का सामर्थ्य भी नहीं है। मुझमें तो आपके ज्ञान को समझने की शक्ति भी नहीं है। हे मालिक! आप मुझे किसी तरह अपनी सेवा में लगाये रहें, मुझे सदा अपने सत्संग में ही रखें। हे श्रीसद्गुरु महाराज! मेरी भक्ति की परीक्षा भी न लें क्योंकि उसमें मेरा अनुत्तीर्ण होना निश्चित है। आप तो मुझे केवल अपनी आज्ञा के आधीन ही रखें। मुझे आपकी चरणधूलि सदा प्राप्त होती रहे। आपकी सान्निध्यता से मैं सदा सुवासित रहूँ। यदि आपकी दया हो जायेगी तो मेरा मन मालिक में लग जायेगा और तभी मेरा कल्याण होगा।

१२-०१-२०१७

जिनके अन्तःकरण में शिष्यत्व का भाव-बीज अंकुरित हो रहा है अथवा जिन भक्तों व शिष्यों के अन्तस् में श्रीसद्गुरु के भजन-भक्ति की शक्ति अवस्थित है, वे ही श्रीसद्गुरु के नाम-बीज के भजन-भक्ति की शक्ति की यथार्थता को जानते हैं। जैसे जमीन में दबा हुआ बीज मौसम आने पर अंकुरित हुये बिना नहीं रहता है, चाहे यह कितना ही कोमल या नाजुक हो फिर भी जमीन से निकलकर खुली हवा और सूर्य के प्रकाश में अपने अस्तित्व को साकार करता है। वैसे ही सद्‌गुरु से प्राप्त नाममंत्र रूपी बीज में गुरुभक्ति के पुष्प अवश्य ही खिलते हैं।

११-०१-२०१७

जिनके हृदय में श्रीसद्‌गुरु की भक्ति निवास करती है वे निर्धन होने पर भी धन्य हैं क्योंकि गुरुभक्ति की डोर में बँधकर साक्षात्‌ भगवान्‌ भी अपना धाम छोड़कर भक्तों के हृदय में बस जाते हैं।

१०-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरुदेवजी महाराज का आश्रय पाना ही भगवान्‌ की प्राप्ति है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की शरणागति संसार के सभी धर्मों में प्रधान धर्म है।

०९-०१-२०१७

विवेक-बुद्धि का जागरण केवल और केवल संत-सद्‌गुरु के सत्संग में ही संभव है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के उपदेशामृत से विषय-वासनाओं की ईंट से निर्मित अज्ञानता की दीवार ढह जाती है, सांसारिक चाहतों का ऐनक उतर जाता है और सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त हुई निर्मल बुद्धि जगत्‌ को यथारूप देखती है। ऐसी ही स्थिति में सत्‌-असत्‌ तत्त्व का, सत्यपथ का और जीवन में पूर्णता के मायने का ज्ञान होता है।

०८-०१-२०१७

श्रीसद्‌गुरु महाराज का ज्ञान प्रकाश अंदर-बाहर का भेद नष्ट कर देता है और घटाकाश व चिदाकाश को मिला देता है। घड़े में अनंत आकाश को भरना संभव ही नहीं है लेकिन अहंकार रूपी घटाकृति के टूटते ही सद्‌गुरु रूपी अनंत आकाश से एक हो जाना सहज है। श्रीसद्‌गुरु द्वारा बतलायी गयी नामजप, भजन, सुमिरन, पूजा, दर्शन, सेवा व ध्यान की साधना के निरंतर प्रहार से घटाकृति टूट जाती है और शिष्य रूपी बूँद सदा के लिये सद्‌गुरु रूपी सिंधु में समा जाती है। सद्‌गुरु भक्तिरस के सिंधु हैं, सद्‌गुरु के चिंतन में डूबना अर्थात् गुरुभक्ति के पावन सरोवर में स्नान करना है। इस पावन स्नान से ही मन की कलुषता धुलती है, मन ऐसे स्वच्छ दर्पण की तरह हो जाता है कि उसमें चेतना का प्रकाश झलकने लगता है।

०७-०१-२०१७

तीर्थ वह है, जो लोगों में  पवित्रता का संचार कर सके। गुरु अपने शिष्यों के जीवन से अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करते हैं, गुरुभक्ति की साधना में चलाकर उन्हें अहंकार-भाव, ममता, राग, द्वेष, ईर्ष्या, भय, काम-क्रोध आदि भीतरी दुर्गुणों से मुक्त कर पावन बनाते हैं, अत‌एव शिष्यों के लि‌ए गुरु ही परम तीर्थ हैं।

०५-०१-२०१७

 श्रीसद्‌गुरुदेव महाराज के श्रीचरणों में अपने सभी कर्मों की आहुति चढ़ाने वाले शिष्य की संपूर्ण अज्ञानता स्वाहा हो जाती है, यही मोक्ष यज्ञ का मर्म है।

वेदी सद्‌गुरु चरन, होम आहूति सब कर्म।
स्वाहा हो अज्ञानता, मोक्ष यज्ञ का मर्म॥

०४-०१-२०१७

ध्यान में केवल विचार शून्यता का घटित होना मानसिक शांति तो दे सकता है लेकिन आनंद नहीं। आनंद तो सद्‌गुरु महाराज के स्वरूप को ध्यान में बसाने पर ही प्राप्त होता है। शून्य ध्यान के लिये निर्विचार होना पर्याप्त है लेकिन आनंद-ध्यान श्रीसद्‌गुरु स्वरूप के दर्शन से ही संभव है।

०३-०१-२०१७

जीवन का अर्थ वही समझ सकता है जो दीक्षा और प्रेम इन दोनों के द्वारा सद्‌गुरु महाराज से जुड़ा हो। सद्‌गुरु-प्रेम जीवन में उत्सव का रंग है, जीवन का सार है, परम सिद्धि है, पूर्णता, श्रेष्ठता एवं भव्यता है। जब हृदय सरोवर में गुरुप्रेम रूपी कमल खिलता है तो जीवन में सर्वत्र बसंत आ जाता है, हवाओं में सद्‌गुरु के आशीष के स्पर्श का ही अनुभव होता है, नदियों में गुरुगीत का ही संगीत सुनाई देता है, पहाड़ों में सद्‌गुरु की ही शिखरता दिखाई देती है और फूलों से सद्‌गुरु महाराज की ही सुगंध आती है। प्रेम के बिना हृदय जाग्रत हो ही नहीं सकता। सिद्धि, जाग्रति व सफलता का दूसरा नाम प्रेम है और यह प्रेम गुरु से दीक्षा लेने के बाद ही परवान चढ़ता है।

२८-१२-२०१६

गुरु और शिष्य का मिलना एक दृष्टि से गुरुमंत्र की शक्ति का प्रसार है। गुरुमंत्र की शक्ति जो गुरुदीक्षा में गुरु के द्वारा शिष्य में प्रवेश करती है, वही शक्ति फैलकर उस शिष्य के संपूर्ण अस्तित्व को अपने आगोश में ले लेती है और अंत में मंत्रदेवता अर्थात् सद्‌गुरु से मिला देती है। प्रेम, आस्था व श्रद्धा इन तीन गुणों से युक्त शिष्य इस शक्ति को ग्रहण करने में इतना सुचालक हो जाता है कि वह शक्ति स्रोत अर्थात् सद्‌गुरु से अभिन्न हो जाता है। गुरु और शिष्य दोनों की स्वाँसों में एक ही गुरुमंत्र गूँजता है, दोनों ही गुरुभक्ति के रस में भीगे हु‌ए होते हैं, दोनों से एक ही स्वर गुरुनाम का निकलता है।

२७-१२-२०१६

जिस तरह मिस्री की एक ढेली को जिव्हा पर रखते ही पूरा मुँह मीठा हो जाता है, वैसे ही ध्यान में आनंद स्वरूप श्रीसद्‌गुरु महाराज की एक झलक मात्र से शिष्य आनंद से भर जाता है।

२६-१२-२०१६

गुरुकृपा से चित्त के शुद्ध हो जाने पर मन सहज ही एकाग्र हो जाता है फलतः कर्म अपने-आप छूटने लगते हैं। जिस अनुपात में भक्ति उपलब्ध होती जाती है उसी अनुपात में कर्म-बंधन शिथिल होते जाते हैं। एकाग्रता को प्राप्त हुआ मन अपने ही हृदय में स्थित गुरु के दर्शन कर आत्मज्ञान संपन्न हो जाता है। इसीलिये सभी श्रुतियों में गुरु ज्ञान के लिये गुरु के भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान की साधना तथा गुरु की दया व शरणागति की अनिवार्यता पर जोर दिया गया है।

२५-१२-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज शिष्य में अपनी आध्यात्मिक शक्ति का संचार कर उसे दीक्षामंत्र प्रदान करते हैं। इस नाममंत्र के आनंद में डूबना ही भजन है। जब शिष्य की प्रत्येक श्वास नाम के रस में डूबने लगती है तो सिद्ध अवस्था प्राप्त होती है। यही साधना का सहज पथ है।

२४-१२-२०१६

मलिन चित्त की शुद्धि का एकमात्र उपाय है-गुरुभक्ति। गुरुदीक्षा में सद्‌गुरु द्वारा प्रदान की जाने वाली श्रीसद्‌गुरु-भक्तियोग की साधना के अभ्यास से ही मन व चित्त का परिमार्जन होता है। इसीलिये सद्‌गुरु की तलाश कर उनसे गुरुदीक्षा ग्रहण करना एवं उनके द्वारा बतलाये मार्ग पर चलना ही मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिये।

२३-१२-२०१६

परम पूज्य श्रीसद्‌गुरु के श्रीमुख से बहने वाली अविरल ज्ञानगंगा की धारा में जो शिष्य सदा गोता लगाता रहता है, वह सदा मुक्त अवस्था में ही रहता है।

२१-१२-२०१६

शिष्य के नेत्र हर समय मात्र श्रीसद्‌गुरु दर्शन के रस में भीगे रहते हैं, कान सदा ही श्रीसद्‌गुरु महाराज की अमृतवाणी सुनना चाहते हैं, जिव्हा में सद्‌गुरु के चरणामृत की प्यास जाग जाती है, नासिका श्रीसद्‌गुरु महाराज की दिव्य आध्यात्मिक सुवास में खो‌ई रहती है और सतत-सुमिरन के द्वारा शिष्य हर पल श्रीसद्‌गुरु का पावन स्पर्श प्राप्त करता है। यही है प्रत्याहार की स्थिति, जिसमें इन्द्रियाँ बाहरी विषयों से विरक्त हो जाती हैं और श्रीसद्‌गुरु महाराज के दर्शन, सुमिरन, सेवा व ध्यान में अपना संपूर्ण आहार प्राप्त कर तृप्त होती रहती हैं। ऐसी अवस्था आने पर ही चेतना की अंतर्मुखता सिद्ध होती है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अन्दर सद्‌गुरु से जुड़ जाती हैं और कर्मेन्द्रियाँ गुरु की सेवा में संलग्न हो जाती हैं, यही है वास्तविक प्रत्याहार।

२०-१२-२०१६

गुरुदीक्षा सद्‌गुरु के प्रेम की अभिव्यक्ति है। श्रीसद्‌गुरु महाराज ने गुरुदीक्षा रूपी एक प्रेम डगर बनायी है ताकि इस पर चलकर जीव सदा प्रेम से आप्लावित रहे। हर प्रेमी की यह अभिलाषा होती है कि वह अपने जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि से अपने प्रियजनों से जोड़ दे। श्रीसद्‌गुरु महाराज गुरुप्रेम की अतल गहरायी में निवास करते हैं और गुरुप्रेम के इस अनमोल खजाने को वे जीवों पर लुटाना चाहते हैं। सभी जीव तो श्रीसद्‌गुरु महाराज के ही अंश हैं अतः वे चाहते हैं कि जिस गुरुप्रेम रूपी अमृत से वे सरावोर हैं उनका अंश भी गुरुप्रेम के उस अमृतरस से जुड़ जाये। गुरुदीक्षा के माध्यम से ही वे अपने शिष्यों को प्रेम के अथाह सागर में डुबोते हैं जिससे हर एक शिष्य सहज, सरल, सद्भाव व संस्कार से परिपूर्ण हो; उसमें जीवमात्र के प्रति दया, ममता, करुणा, स्नेह आदि जैसे सद्गुण उजागर हो सके।

१९-१२-२०१६

समस्त कर्मों को अपने गुरु के चरणों में सप्रेम समर्पित कर देना ही गुरुदीक्षा की दक्षिणा है। हृदय में बसे प्रेम की समस्त धारा‌ओं को पूर्णरूपेण श्रीसद्‌गुरु की ओर मोड़ देना ही गुरु से दीक्षित होने का अभिप्राय है। 

१८-१२-२०१६

एक साधक गुरुदीक्षा से ही शिष्य बनता है। दीक्षा प्राप्त करने के बाद ही वह उच्च कोटी की साधना में प्रवृत्त होकर गुरुभक्ति की शक्ति प्राप्त करता है। गुरु का कार्य अपने शिष्य के साधनात्मक क्षेत्र को मजबूत बनाना है, जिससे शिष्य आत्म-साक्षात्कार कर सके। श्रीसद्‌गुरु कभी भी नहीं चाहते कि शिष्य सदा दास बनकर जीवन बिताये। गुरु तो अपने प्रत्येक शिष्य को अपने जैसा ही बनाना चाहते हैं। इसीलिये गुरु बारंबार अपने शिष्यों को भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना करने की प्रेरणा देते रहते हैं।

१७-१२-२०१६

ईर्ष्या, दोषदृष्टि, नकारात्मकता, संशयात्मकता, अस्थिर बुद्धि, काम, क्रोधादि ये चित्त के दोष हैं, इन दोषों से युक्त चित्त कभी भी आध्यात्मिक साधना में प्रवृत्त नहीं हो पाता है। को‌ई भी भौतिक साधन इन चित्त विकारों को दूर नहीं कर सकता है, लेकिन श्रीसद्‌गुरु महाराज का चरणोदक ग्रहण करने से ये सभी दोष चित्त से निकल जाते हैं और चित्त निर्मल अवस्था को प्राप्त होता है। तीर्थ वह है, जो लोगों में  पवित्रता का संचार कर सके। गुरु अपने शिष्य के अज्ञानमय अंधकार दूर करते हैं, गुरुभक्ति की साधना में चलाकर शिष्य को अहंकार-भाव, ममता, राग, द्वेष, ईर्ष्या, भय, काम-क्रोध आदि भीतरी दुर्गुणों से मुक्त कर पावन बनाते हैं, अत‌एव शिष्यों के लि‌ए गुरु ही परम तीर्थ हैं। ध्यान सरिता में शिष्य को डुबोकर उसके मानस में चढी जन्मों के मलिनता को हटाने वाले श्रीसद्‌गुरु ही हैं। पतित पावन श्रीसद्‌गुरु ही भवबंधनों से मुक्त करने वाली ध्यान-साधना के रहस्यों को जानने वाले हैं और वे ही इसे दूसरों को समझा सकते हैं। जीवों के मलिन मन को निर्मल कर मानस-तीर्थ बनाने वाले श्रीसद्‌गुरु भगवान् ही हैं। इसी मानस-तीर्थ में सद्‌गुरु महाराज के दर्शन से जीव मुक्त होता है।

१५-१२-२०१६

हमारा जीवन एक ऐसे वृक्ष में लटका है जिसके नीचे भयावह नाग हमें डसने को फन फैलाये हु‌ए राह देख रहा है, लेकिन हम वृक्ष में लगे मधुमख्खी के छत्ते से गिरने वाले एक-दो बूँद शहद के स्वाद में ही जिये जा रहे हैं, न जाने कब वृक्ष से हमारा हाथ छूट जाये और हम सदा के लिये काल के गाल में समा जायें। सद्‌गुरु अपना हाथ फैलाये हमें आवाज दे रहे हैं कि अपना एक हाथ मुझे थमा दो और इस संसार रूपी वृक्ष से दूसरे हाथ को छोड़कर मुझे पकड़ लो ताकि मैं तुम्हें सुरक्षित रूप से तुम्हारे घर तक पहुँचा दूँ। हम कदाचित् एक हाथ तो गुरु को पकड़ा देते हैं, लेकिन फिर भी दूसरे हाथ से संसार को जकड़ कर पकड़े ही रहते हैं। अपने जीवन को पूरी तरह से सद्‌गुरु के चरणों में सौपना होगा, तभी कल्याण होगा। श्रीसद्‌गुरु को अपना एक हाथ सौप देना तो आधी दीक्षा ही हु‌ई, क्योंकि जब तक हम अपने दूसरे हाथ को भी संसार से छुड़ाकर सद्‌गुरु के हाथों में नहीं सौपते हैं, तब तक आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है। संसार एवं अध्यात्म दोनों नावों में पैर रखने पर हम कहीं भी न पहुँचेंगे। दीक्षा तभी पूर्ण होती है जब हम श्रीसद्‌गुरु महाराज से नाममंत्र ग्रहण करें और उस पल से ही सद्‌गुरु की शरण में नामजप, भजन, सुमिरन, पूजा, सेवा, दर्शन व ध्यान के पथ पर चलने का व्रत लेकर निरंतर अभ्यास में जुट जायें।

१४-१२-२०१६

दीक्षा एक अन्तर्बेधी शक्ति है जिसकी सहायता से साधक अपने अंदर खुदाई करता हुआ अपनी चेतना के मूल स्रोत तक पहुँच जाता है। जैसे एक ही स्थान पर निरंतर खुदाई कर मिट्टी को बाहर फेकते रहने से निश्चित ही गहरा जलस्रोत मिल जाता है, वैसे ही श्रीसद्‌गुरु महाराज से दीक्षा ग्रहण कर साधक अपने अंदर से समस्त व्यर्थ तत्त्वों को निकालने की युक्ति पा जाता है और निरंतर अंदर की ओर गति करता हुआ अंत में आत्म-प्रकाश प्राप्त कर लेता है।

१३-१२-२०१६

जिस तरह पतिव्रता-स्त्री के मन में अपने पति के अलावा किसी अन्य का विचार नहीं होता है, वैसे ही सच्चा शिष्य अपने गुरु के सिवाय किसी अन्य का विचार नहीं करता है। शिष्य निरन्तर अपने गुरु के रूप रस में ही निमग्न रहता है जिसकी मधुरता अमृत से भी रसीली होती है।

११-१२-२०१६

श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ द्वारा बता‌ई ग‌ई योग-युक्ति से सुरत ब्रह्मा के देश में पहुँचकर अमृत कुण्ड में स्नान-पान करके ब्रह्म में लीन हो जाती है। सभी दुर्गम आध्यात्मिक मंजिलें गुरुकृपा से सुगम हो जाती हैं। श्रीसद्‌गुरु की कृपा से भक्तिमार्ग की यात्रा निर्बाध होती है। श्रीसद्‌गुरु की कृपा ही असंभव को संभव बनाती है। श्रीसद्‌गुरु की कृपा प्राप्त हो जाने पर दुष्कर और दुरूह प्रारब्ध को भी मोड़कर अपने अनुकूल किया जा सकता है।
१०-१२-२०१६

साधक के जीवन में गुरुकृपा की प्राप्ति ही सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु है, कल्पतरु है एवं चिन्तामणि है। गुरुकृपा तो गृहस्थ शिष्य को भी निष्काम कर्मयोगी व विदेह बना देती है। सद्गुरु की कृपा से ही ज्ञान का परम प्रकाश मिलता है, जिसके उजियारे में साधक-शिष्य जीवन्मुक्त होता है। सद्‌गुरु की प्राप्ति होने पर समस्त क्रियाओं की सिद्धि के साथ-साथ भक्ति व मुक्ति भी सिद्ध होती है। सदगुरु की कृपा प्राप्त करने वाला शिष्य कृत-कृत्य होता है, क्योंकि गुरुकृपा से ही शिष्य को आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञानी होने के बाद किसी अन्य सिद्धि की आवश्यकता ही नहीं रहती है। गुरुकृपा से तत्त्वनिष्ठा स्वतः हस्तगत होती है। जो शिष्य अपने गुरु के प्रति ईश्वर भाव रखकर भक्तिराह पर चलते हैं, सकल शास्त्र अपने निहित अर्थ को ऐसे गुरुभक्त की समझ में खुद ही प्रकाशित कर देते हैं।

०९-१२-२०१६

सद्‌गुरु भी शिष्यों की आध्यात्मिक जिज्ञासा को कई ढंगों से परखते हैं। जिस तरह शिष्य सद्‌गुरु को ढूँढ़ता है, ठीक वैसे ही सद्‌गुरु भी अपने सत्पात्र शिष्य को खोजते हैं। जब शिष्य अपने अधूरेपन को, अपने अनगढ़ जीवन को सद्‌गुरु की पूर्णता में समर्पित करता है और सद्‌गुरु भी अपनी पूर्णता शिष्य में उड़ेलते हैं, तभी दोनों की आपसी खोज समाप्त होती है।

०८-१२-२०१६

गुरु, गुरुमंत्र एवं गुरुतत्त्व में कोई भेद नहीं है, ये तीनों एक ही हैं, लेकिन एकमात्र श्रीसद्गुरु महाराज ही इस रहस्य को उजागर कर शिष्य के समझ-पटल में अंकित करने में समर्थ हैं। इसीलिये श्रीसद्गुरु महाराज के स्वरूप के ध्यान से जुड़ा मंत्र-जप ही पूर्ण होता है। मंत्र-जप के समय जब सहसदल कमल (संतजन जिसे हृदय कहते हैं) में गुरु-स्वरूप का स्पष्ट दर्शन होने लगे तभी गुरुमंत्र सिद्ध होता है।

०७-१२-२०१६

सद्‌गुरु जंगम अर्थात् चलते-फिरते तीर्थ हैं। श्रीसद्‌गुरु के उपदेशामृत सरिता में अवगाहन से मुक्तिरूप फल प्राप्त होता है। सन्त-सद्‌गुरु के बिना आत्मज्ञान नहीं हो सकता है, भीतरी आँख खोलने वाले एकमात्र वैद्य हैं श्रीसद्‌गुरु महाराज। जिन्होंने इन श्रीसद्‌गुरुदेव को पहिचान लिया, वही प्रज्ञावान् है, उसका जीवन ही सुकृत है और वही भवसागर से पार हो सकता है। अपनी दृष्टि को बाहर से हटाकर अंदर की ओर लगाओ, यही जीवन की कसौटी है, जीवन को खरा सोना बनाने वाले स्वामी सद्‌गुरु का दर्शन अंदर ही होगा। श्रीसद्‌गुरु की कृपा से क्रोध, अहंकार व मन की बाहरी दौड़ समाप्त हो जाती है और मन अंदर ही सद्‌गुरु के स्वरूप में रमण करने लगता है।

०६-१२-२०१६

शिष्य को गुरु से कुछ भी नहीं छुपाना चाहिये, सद्‌गुरु के समक्ष जीवन का हर अध्याय खुला होना चाहिये। जीवन में सभी ग्लानियों से मुक्ति का यही एकमात्र उपाय है।

०५-१२-२०१६

गुरु ही शिव हैं, शिव ही देह रूप में अवतरित होकर जीवों के कल्याण हेतु दुर्लभ गुरु-तत्त्व को सुलभ करते हैं। इस गुरु-तत्त्व का साकार स्वरूप ही ’गुरु’ नाम से अभिवंदित होता है। शिव स्वयं ही गुरु बनकर देहाकार में अवतरित होते हैं और अपने शिवत्व का रहस्य उद्घाटन करते हैं, अर्थात् शिवत्व का ज्ञान कराने वाले गुरु साक्षात् शिव रूप ही हैं। शंभु रूप कल्याणकारी सत्ता जो ब्रह्मज्ञान देकर शिवत्व को प्रकाशित करती है, वही गुरु है।

०४-१२-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा दिया गया ’नाम’ परमात्मा का निर्गुण स्वरूप है जो सगुण रूप में स्वयं देहधारी श्रीसद्‌गुरुदेव के रूप में व्यक्त है।

०२-१२-२०१६

प्रेम परमात्मिक गुण है और प्रेम के बिना परमात्मा की अनुभूति असंभव है। आध्यात्मिक यात्रा प्रेममार्ग से ही तय होती है और जिस भक्त की श्रीसद्‌गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा व अटूट निष्ठा है वही इस आध्यात्मिक यात्रा का पथिक हो सकता है। मालिक तक वही शिष्य पहुँच सकता है या उनके साथ एकाकार हो सकता है जिसका हृदय सदा गुरुप्रेम से भरा होता है। गुरुभक्ति में भीगे नयन और गुरुप्रेम से रोमांचित तन-मन ही शिष्य के परिचायक हैं। शिष्य के हृदय में श्रीसद्‌गुरु के प्रति उपजे प्रेम-विरह के भाव परम कल्याणकारी हैं। श्रीसद्‌गुरु के प्रति शिष्य का प्रेम-विरह आध्यात्मिक संपत्ति है। सद्‌गुरु का प्रेम शिष्य को सभी आध्यात्मिक मंजिलों का अधिकारी बना देता है। श्रीसद्‌गुरु से प्रेम होने पर ही उनसे प्राप्त ’नाम’ या ’शब्द’ से संबंध जुड़ता है और भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना फलीभूत होती है। श्रीसद्‌गुरु के प्रेम-विरह से तड़पती हु‌ई शिष्य की सुरत नाम-भजन, सुमिरन व ध्यान के सहारे रूहानी चढ़ा‌ई शुरू करती है और अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप में प्रगट होती है।

२८-११-२०१६

जिस तरह बीज अपने आस्तित्व को मिटाकर ही वृक्ष रूप में विकसित होता है, ठीक उसी तरह शिष्य को अपनी पूर्णता फलीभूत करने हेतु अपना अहम्‌ विसर्जित कर श्रीसद्‌गुरुदेव के श्रीचरणों में पूर्ण समर्पित होना पड़ता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज से अत्यंत गुप्त महामंत्रराज की दीक्षा लेने के पश्चात्‌ शिष्य को सदा ही नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन एवं ध्यान की साधना में लीन रहना चाहिये। गुरु की आज्ञा का अक्षरशः पालन एवं गुरुसेवा ही शिष्य का धर्म होना चाहिये। सदा ही श्रीगुरुदेवजी के चरणों में यह प्रार्थना करना चाहिये कि प्रभु! आप सदैव ही हमारा मार्गदर्शन कीजिये, जीवन में कभी एक पल को भी हमारे स्मृति-पटल से आप का स्वरूप ओझल न हो पाये।

२७-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज अपने शिष्यों को हर वक्त संभालते रहते हैं। सैकड़ों मील दूर रहने पर भी गुरुकृपा शिष्य की रक्षा करती है। शिष्य की हर पल रक्षा करते हुये उसके लोक-परलोक को सवाँरने वाले गुरु ही हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज साक्षात्‌ रूप से ईश्वर ही होते हैं। वे अपने शिष्यों को नाम भजन, सुमिरन, ध्यान की प्रेरणा देकर यात्रा के प्रथम सोपान से उच्चत्तम सोपान तक ले जाने के लिये सतत्‌ प्रयासरत रहते हैं। वे क्षण बहुत ही अनमोल होते हैं, जब शिष्य अपने मन को श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ के नामजप में लगाये रहता है। जैसे ही मन श्रीसद्‌गुरु के नामरस में डूबता है जीवन की उधेड़-बुन समाप्त हो जाती है, भूत व भविष्य खो जाते हैं. केवल वर्तमान का आनंद ही शेष रह जाता है। इसीलिये अपने मन को सब ओर से बटोरकर श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ में सदा-सदा के लिये जोड़ दो। हर पल उनके बतलाये हुये मंत्र का जप करते हुये उनकी सेवा, पूजा, दर्शन करते हुये अपने जीवन का सच्चा लाभ उठाओ।

परम हितैषी जीव के, सद्‌गुरु परम उदार।
ताते कबहूँ न छोड़िये, चरण कमल अधार॥
भक्ति मुक्ति गुरुचरण में, ऐसा निश्चय जान।
शरण गुरु की जो गहे, सो पाये पद निर्वाण॥

२१-११-२०१६

दीक्षा के उपरांत मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता है। दीक्षा के बाद शिष्य ऊपरी तल पर तो पहले जैसे ही दिखता है, लेकिन उसके अंदर सब कुछ बदल जाता है। उसकी प्रवृत्तियाँ अंतर्मुखी हो जाती हैं, हृदय में प्रतिष्ठित सद्‌गुरु ही उसका पूरा संसार होते हैं। उसकी बाहरी दौड़ समाप्त हो जाती हैं, उसकी सांसारिक आकांक्षायें पतझड़ के पत्तों की तरह झड़ जाती हैं। अंतस्‌ में गुरुभक्ति की नयी कोपलें खिलने लगती हैं, रोम-रोम में सद्‌गुरु रूपी बसंत की महक होती है और उसके उसके जीवन का पूरा रस हृदयस्थ गुरु के प्रति ही होता है। उसकी पूरी देह इष्ट सद्‌गुरु का मंदिर बन जाती है जहाँ चौबीसों घंटे सद्‌गुरु की पूजा, प्रार्थना, आरती, भजन, सेवा व दर्शन चलते रहते हैं।

 २०-११-२०१६

सद्‌गुरु अधिकारी व योग्य शिष्य को ही तत्त्वज्ञान प्रदान करते हैं। सद्‌गुरु के प्रति श्रद्धा व शरणागति के भाव से ही शिष्य में योग्यता आती है। सद्‌गुरु के निर्देशानुसार जीवनचर्या व उनकी निःस्वार्थ सेवा से इन्द्रिय संयम सिद्ध होता है और मन लक्ष्य के प्रति उन्मुख होता है। यही ज्ञान प्राप्ति का सुगम उपाय है।

१९-११-२०१६

आत्मशक्ति से ही जीव का अस्तित्त्व है, लेकिन जैसे मृग अपने नाभि-कमल में ही कस्तूरी होने के बावजूद उसकी दिव्य सुगंध के स्रोत को खोजने के लिए अज्ञानतावश भटकता फिरता है, उसी प्रकार से मनुष्य भी सद्ज्ञान के अभाव में आत्म-प्रकाश की खोज में संसार में भटकता रहता है। लेकिन जैसे ही मनुष्य को गुरुदीक्षा मिल जाती है और गुरुकृपा से उसका अज्ञान रूपी अन्धकार मिट जाता है और जीवन आत्म-प्रकाश से आलोकित हो जाता है। समर्थ सद्गुरु जो सदा अंतर के मंडलों में भ्रमण करते हैं और हमें भी शरीर के नौ दरवाजों को बंद करने की युक्ति सिखाकर अंतर मंडलों में विचरण करा सकते हों, उनकी कृपा से ही आत्मशक्ति को जाना जा सकता है। जैसे गहरी खुदाई पर ही धातु की खदाने मिलतीं हैं और मोती प्राप्त करने के लिए लिए समुद्र में गहरे गोते लगाने पड़ते हैं, वैसे ही आत्मबोध के लिये गुरुभक्ति की साधना में गहरे उतरने की आवश्यकता होती है।

१८-११-२०१६

दीक्षा में सद्‌गुरु के श्रीमुख से प्राप्त गुरुमंत्र में अपार शक्ति होती है। गुरुमंत्र ही सृष्टि की शक्ति का केन्द्र है, चिन्मय शक्ति है, यह कथन अक्षरशः सत्य है। सद्‌गुरु से प्राप्त नाममंत्र ही जीवन का अनमोल धन है। नाम के बिना कोई भी जीव भवपार नहीं कर सकता है। सद्‌गुरु से नामदीक्षा तो सहज अथवा अत्यल्प प्रयास से ही प्राप्त हो जाती है लेकिन केवल वही शिष्य इस नामधन के मूल्य को प्राप्त करता है जो श्रीसद्‌गुरु महाराज के श्रीचरणों में अपने शीश अर्थात्‌ अहंकार को अर्पित करता है। मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार इन चारों को गुरु के चरणों में अर्पित करने पर ही नाम का खजाना खुलता है। नाम-साधना एक सहज साधना है जिसमें शरीर नहीं अपितु मन के नियंत्रण पर महत्व दिया जाता है। मन ही जीव को संसार में इधर-उधर भटकाता है, जब तक मन नियंत्रित नहीं होगा तब तक आत्मपथ पर गति संभव नहीं है। यह मार्ग जिस्मानी नहीं, रूहानी है। यह आंतरिक मार्ग अत्यंत गुप्त है। इस मार्ग पर यात्रा करने के साधन भी गुप्त हैं और इसकी मंजिल भी गुप्त है। इस मार्ग के अवरोध भी अत्यंत सूक्ष्म है। कामिल मुर्शिद ही इस राह पर जीव की रहनुमाई कर सकते हैं क्योंकि वे इस राह की बारीकियों से परिचित हैं और स्वयं इस राह को तय करके मंजिल तक पहुँचे हुए हैं। यह साधना सद्‌गुरु की शरण में संपन्न होने के कारण ही सहज है। श्रीसद्‌गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करने से ही अमृत की वर्षा होती है और जीवन में निष्कामता, शील, क्षमा, संतोष, विवेक आदि प्रौढ़ होते हैं। ऐसा होने पर ही सुरत ऊर्ध्व गति करती है और सद्‌गुरु परमेश्वर से मिलकर मुक्त होती है। यह सब गुरु की कृपा पर ही आधारित है। इसलिए सद्‌गुरु की खोज जीवन की असली खोज व कमाई है।


१७-११-२०१६

सद्‌गुरु की सान्निध्यता में शिष्य में सांसारिक संबंधों व विषयों के प्रति वैराग्यता व अनासक्ति आती है। संसार के प्रपंचों के प्रति वैराग्यता व अनासक्ति ही समस्त आध्यात्मिक उपलब्धियों की नींव है। इस पर ही आत्मज्ञान का वृक्ष विकसित होता है और मोक्षफल की प्राप्ति होती है। गुरुसेवा ही मोक्ष का मार्ग है। गुरुसेवा मात्र भौतिक कृत्य नहीं है, अपितु जब शिष्य गुरु के विचारों से एकरूप हो जाता है और गुरु के बिना कहे ही गुरु के अनुसार बर्तने लगता है तो ऐसे अनुकूलन में ही शिष्य गुरुसेवक का पद पाता है। गुरु के सत्संग में एक ऐसा दिन भी आता है जब शिष्य गुरु के मौन व्याख्यान को समझने लगता है। गुरु के हृदय के भावों को अपने हृदय में पैदा करना ही शिष्य की गुरु से अनुकूलता है। गुरु के हृदय की धड़कन बन जाना ही शिष्य की गुरु के प्रति अनुकूलता है। गुरुसेवा में शिष्य अपनी सुध भूल जाता है, उसकी चेतना में केवल गुरु का ही स्थान होता है। यही पराचेतना की अवस्था है, जिसमें केवल पारब्रह्म सद्‌गुरु की ही झलक होती है। जैसे कोयला का एक टुकड़ा अग्नि में तपकर अग्नि की गर्मी, प्रकाश व ज्वलन शक्ति को प्राप्त कर लेता है, वैसे ही अपनी चेतना को सद्‌गुरु की चेतना में झोंककर शिष्य की अन्तरंग सत्ता ब्राह्मीभूत हो जाती है। ऐसे शिष्य को भीतर-बाहर चारों ओर सत् ही सत् दृष्टिगोचर होता है। विश्व में सर्वत्र उसे सद्‌गुरु ब्रह्म ही परिलक्षित होते हैं।

१६-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महराज नररूप में हरि ही हैं। शिष्य को सर्वप्रथम उनका नररूप ही दिखाई देता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज से परानाम का उपदेश लेकर पूर्ण श्रद्धा भाव से श्वास के सहारे इस परानाम के मानसिक जप और मस्तक में सहसदल कमल पर उनके दिव्य विग्रह का ध्यान करते-करते जब शिष्य को श्रीसद्‌गुरु के परम प्रकाशमय स्वरूप का दर्शन होता है, तभी उनके हरि रूप का ज्ञान होता है। उन्हीं की कृपा से साधक रूपी ब्रह्मबिन्दु श्रीसद्‌गुरु रूपी ब्रह्मसिंधु में लय होता है और ’अहम्‌-ब्रह्मास्मि’ का अनुभव करता है। इसी भाव दशा में वह अपना तन, मन व जीवन रूपी अनमोल धन श्रीसद्‌गुरु पर न्यौछावर करता है, जिन्होंने जन्म-जन्मांतर, युग-युगांतर, कल्प-कल्पांतर से भूले जीव को निजधाम में प्रतिष्ठित किया।

१४-११-२०१६

परम पूज्य श्रीसद्‌गुरु के श्रीमुख से बहने वाली अविरल गंगा की धारा में जो शिष्य सदा गोता लगाता रहता है, वह सदा मुक्त अवस्था में ही रहता है। गुरुभक्ति से मन पवित्र एवं निर्मल होता है, मनुष्य की प्रसुप्त आत्मा जाग्रत होती है। भक्ति ही मन के समाधान का सर्वश्रेष्ठ एवं सुगम साधन है। प्रेम व भक्ति से उपजे आनंद रस से अंतःकरण कोमल बनता है। गुरुभक्ति के अलावा किसी अन्य मार्ग में ऐसी उपलब्धि दुर्लभ है।

१३-११-२०१६

जब तक शिष्य गुरुदीक्षा नहीं ग्रहण करता, तब तक वह श्रीसद्‌गुरुदेव से नहीं जुड़ पाता है। श्रीसद्‌गुरुदेव स्वामीजी परम विभूति हैं, उनकी देह में रची परम चैतन्यता ही गुरु-तत्त्व है, वे ही जगदीश और जगन्नियंता हैं। शिष्य के लिये सद्‌गुरु की देह ही एकमात्र मंदिर है, इस मंदिर की सेवा, अर्चना, पूजन ही शिष्य के जीवन का परमार्थ है। जो शिष्य सद्‌गुरु के नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन व ध्यान की साधना के लिये स्वयं की देह को तपोभूमि बनाता है, उस तपोभूमि के हृदय में सद्‌गुरु के दिव्य विग्रह का मंदिर बनाता है, और उस मंदिर में अभीष्ट के रूप में गुरु-तत्त्व की प्राण-प्रतिष्ठा करता है, वह शिष्य सृष्टि की सबसे पावनतम कृति है एवं वही सही अर्थों में जंगम तीर्थ है। गुरु के नाम का उच्चारण करने पर गुरुभक्त का रोम-रोम प्रफुल्लित होने लगता है। तन व मन की चिन्तायें समाप्त हो जाती है। जप, तप व योग से भी जो नहीं मिल पाता है, वह गुरुभाव की एक तरंग से गुरभक्त को मिल जाता है।

१२-११-२०१६

आध्यात्मिक मार्ग में वही शिष्य सतत उन्नति पर निरंतर अग्रसर रहता है, जिसके ऊपर ब्रह्मनिष्ठ, तत्त्ववेत्ता श्रीसद्गुरु की अनुकंपा लगातार बनी रहती है। स्वयं को पूर्ण रूप से सद्गुरु को सौंपकर उनकी प्रत्येक आज्ञा के पालन से ही सद्गुरु की इस अनुकंपा को ग्रहण करने की पात्रता आती है। ब्रह्मज्ञान में दीक्षित शिष्य साधना के द्वारा सद्‌गुरुदेव के ईश्वरीय स्वरूप का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है। दीक्षा की सफलता शिष्य की गुरु के प्रति श्रद्धा पर ही निर्भर करती है।  शिष्य यदि गुरु की ऊर्जा और ज्ञान को आत्मसात कर अपने जीवन  में ना उतार पाये, तो श्रेष्ठ प्रक्रिया भी व्यर्थ हो जाती है।

११-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज दीक्षोपरांत पूर्ण समर्पित शिष्य की साधना का समस्त उत्तरदायित्व स्वयं अपने ऊपर लेते हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज शिष्य को ज्ञान का उपदेश करते हैं, ज्ञान को उसके जीवन में चरितार्थ करते हैं और शिष्य को जीवन के सार-तत्त्व की प्रतीति सद्‌गुरु ही करवाते हैं। शारीरिक रोग, आलस्य, संदेह, ढुलमुल रवैया, प्रमाद, चंचल मन, भ्रान्ति, हतोत्साह, अस्थिर चित्त, उदासी, दुख आदि विघ्न आध्यात्मिक-साधना में बाधक होते हैं। इसीलिये श्रीसद्‌गुरु महाराज शिष्य के जीवन को संयमित दिनचर्या व सम्यक दर्शन प्रदान कर उसे इन सभी विघ्नों से पार करते हैं। गुरुभक्ति की साधना कोई नीरस तप नहीं है अपितु इसमें श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्य को आनंदपूर्ण मार्ग से साधना करवाते हैं। सद्‌गुरु की मधुर वाणी से उपदेश प्राप्त करता हुआ शिष्य सदैव तृप्त रहता है। श्रीसद्‌गुरु के सान्निध्य में साधना अत्यंत सरस होती है।

हे सद्‌गुरु! आप ही आनंद-मय अनुभूति के आधार हैं।
आप ही आध्यात्मिक संसार में सद्‌ज्ञान के आगार हैं॥
भँवर द्वन्द्वों से उबारें आप करुणा प्रेम की पतवार हैं।
आप ही हैं इष्ट स्वामी आप ही शिष्यों के सर्वाधार हैं॥

१०-११-२०१६

साधक, सिद्ध, साध्य और साधन, इन चारों के एक साथ मिलने पर ही आध्यात्मिक साधना संपूर्ण होती है। गुरुदीक्षा ही एक मात्र ऐसी प्रक्रिया है जो साधना के चारों अंगों अर्थात्‌ साधक, सिद्ध, साध्य और साधन को आपस में नजदीक आने का अवसर प्रदान करती है। इन चारों अंगों का पूर्ण मिलाप ही साधना की अंतिम अवस्था है। इन चारों का ऐक्य ही सफल साधना है जिसमें ये चारों एक-दूसरे से अभिन्न हो जाते हैं। अभिन्न होने में आपसी एकरूपता अनिवार्य है। संतमत की साधना में सिद्ध, साध्य और साधन एक ही होते हैं, अर्थात्‌ गुरुमंत्र (श्रीसद्‌गुरु की चेतना के एक अंश के रूप में साधन है), सिद्ध ( ऐसे मार्गदर्शक जो साधना के हर पहलू से पूर्णतः परिचित हैं अर्थात्‌ श्रीसद्‌गुरु) और साध्य ( इष्टदेव स्वयं श्रीसद्‌गुरु) एक ही सत्ता के तीन नाम हैं। शास्त्र भी इसी तथ्य को सिद्ध करते हैं-
यथा घटश्च कलशः, कुम्भश्चैकार्थवाचकाः।
तथा मंत्रो देवताश्च, गुरुश्चैकार्थवाचकाः॥कुलार्णव तंत्र, १३/६४
अर्थात् जिस प्रकार घट, कलश और कुम्भ एक ही वस्तु के अनेक नाम है, उसी प्रकार मंत्र, देवता व गुरु एक ही तत्त्व के भिन्न नाम हैं।
साधन के रूप में गुरुमंत्र, मार्गदर्शक के रूप में श्रीसद्‌गुरु एवं साध्य इष्ट के रूप में भी श्रीसद्‌गुरु महाराज को एक ही परमसत्ता जानते हुए साधक का इनसे एकरूप होना ही आध्यात्मिक साधना की पूर्णता है।

०९-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु की भक्ति ही जीवन का सार है। श्रीसद्‌गुरु की भक्ति से ज्ञान, विज्ञान सभी कुछ मिल जाता है। श्रुतियों में उन्हीं प्रभु की पराचेतना के रूप में श्रीसद्‌गुरुदेव का ही निरूपण हुआ है। इसलिये मन और वाणी से श्रीसद्‌गुरु महाराज की आराधना सदा करते रहना चाहिये। जिस क्षण शिष्य का अहं मिट जाता है तो उसके हृदय में श्रीसद्‌गुरुदेव स्वयं प्रगट हो जाते हैं, फिर सारी साधनायें स्वतः होने लगती हैं। सभी तप अपने-आप होने लगते हैं। इसलिये श्रीसद्‌गुरु के शरणापन्न बने रहना साधना-जीवन की सर्वोच्च कसौटी है।

०८-११-२०१६

दीक्षा एक अन्तर्बेधी शक्ति है अर्थात्‌ दीक्षाशक्ति से साधक अपने अंदर खुदाई करता हुआ अपनी चेतना के मूल स्रोत तक पहुँच जाता है। जैसे कोई इंसान निरंतर एक ही स्थान पर खुदाई कर मिट्टी को बाहर फेकता हुआ गहराई पर जाकर जलस्रोत को पा लेता है, वैसे ही साधक सद्‌गुरु महाराज से दीक्षा ग्रहण कर अपने अंदर से समस्त व्यर्थ तत्त्वों को निकालने की युक्ति पा जाता है और निरंतर अंदर की ओर गति करता हुआ अंत में आत्मा के प्रकाश को प्राप्त कर लेता है। आत्म-प्रकाश को प्राप्त करने की यह क्रिया ही आध्यात्मिक साधना है। सद्‌गुरु से दीक्षा ग्रहण कर उनके मार्गदर्शन में चलकर ही उनकी कृपा से यह क्रिया सिद्ध होती है। साधक को निरंतर अंदर गति करने की शक्ति मिलती रहे, इस हेतु ही श्रीसद्‌गुरु महाराज दीक्षा के दौरान गुरुमंत्र के रूप में अपनी चेतना का एक अंश प्रदान करते हैं। सद्‌गुरु महाराज से प्राप्त गुरुमंत्र एक प्रकाश के स्रोत की तरह है जिसकी रोशनी में साधक सदा आगे बढ़ता रहता है। गुरुदीक्षा इस साधना में प्रवेश का द्वार है, जिसमें प्रवेश कर साधक आध्यात्मिक महल में चढ़ता है।

०७-११-२०१६

श्रीसद्गुरु महाराज की आज्ञानुसार चलना, सदा उन्हें प्रसन्न रखना, उनके रुख को समझते हुए उनकी हर आवश्यकता को उनके द्वारा जाहिर करने से पहले ही पूर्ण करना, सद्गुरु के दरबार व भक्तों की सेवा  करना और सद्गुरु महाराज द्वारा जन-कल्याणार्थ चलायी जाने वाली योजनाओं में प्रेम व उत्साह के साथ तन-मन-धन से सहयोग करना बाह्य-सेवा कहलाती है। श्रीसद्गुरु महाराज के द्वारा बतलाये गये नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान की साधना को पूर्ण मन व चित्त के साथ संपादित करना ही सद्गुरु महाराज की आंतरिक सेवा है।

०६-११-२०१६

संकल्प शक्ति को क्षति पहुँचाने वाला तत्त्व है -संदेह। गुरुभक्ति के संदर्भ में सद्‌गुरु में पूर्ण आस्था ही संकल्प-शक्ति का आधार होता है। गुरुभक्त के मन में संदेह-बुद्धि प्रवेश ही नहीं कर पाती। शिष्य अपनी साधना में सफलता के लिये पूर्ण रूप से सद्‌गुरु-कृपा पर आश्रित होता है। सद्‌गुरु की कृपा से शिष्य के मन में सफलता के प्रति सन्देह पनपता ही नहीं है। यह श्रीसद्‌गुरुदेव की ही महिमा है कि शिष्य सभी संदेहों व भयों से मुक्त होकर गुरुभक्ति के मार्ग पर चलता है और उसकी साधना निर्विघ्न संपन्न होती है।

०४-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरुदेव के बिना आत्मानुसंधान संभव ही नहीं है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के बतलाये हुए नाममंत्र के जप, पूजा, भजन, दर्शन, सेवा, सुमिरन व ध्यान की साधना से बुद्धि को तराशा कर सूक्ष्म बनाया जाता है और तभी आत्मा जो कि नित्य तत्त्व है उसमें प्रवेश संभव होता है, यही युक्ति है आत्म-साक्षात्कार की। जिस क्षण शिष्य अपने गुरु-स्वरूप को अपने अंदर प्रगट कर लेता है, उसी क्षण उसे आत्म-तत्त्व का प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है।

०३-११-२०१६

सद्‌गुरु प्रदत्त नाममंत्र एक परम चेतन, निराकार सत्ता है, यह अकथ है अर्थात् इसे जुबान प्रकट नहीं कर सकती, कान सुन नहीं सकते, कलम लिख नहीं सकती और भाषा इसका वर्णन नहीं कर सकती। यह मन-बुद्धि से परे की हकीकत है। यह हर प्रकार के द्वैत, हर तरह के परिवर्तनों से परे का वह सच है जो सृष्टि की हर वस्तु और हर प्राणी में बसा है। शब्द या नाम सर्वव्यापक है और हरेक जीव के अन्दर बसता है। जब भक्त के हृदय में सद्‌गुरु के चरण-कमल प्रगट होते हैं और उनके दैदीप्य नखों के प्रकाश से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है, तब नाम रूपी हीरा घट के अन्दर दिखा‌ई देता है, जो परम प्रकाश रूप है। जब परमात्मा स्वरूप सद्‌गुरु की कृपा से आन्तरिक शब्द-धुन या नाम का भेद मिल जाता है, तब जीव के अन्दर ज्ञान का सूरज प्रकाशित हो उठता है। आध्यात्मिक मार्ग में सद्‌गुरु नाम की मधुर धुन और दिव्य ज्योति सर्वोच्च रूहानी मजिल तक पहुँचने में शिष्य की सहायता करती है। जैसे अँधेरे में रास्ता भूला हु‌आ इन्सान कहीं दूर से आती हु‌ई आवाज़ की मदद से अपनी दिशा कायम कर लेता है, उसी तरह नाम की धुन शिष्य की आत्मा को अपने स्रोत की तरफ खींच लेती है। जिस प्रकार बाहर का प्रकाश राह के अवरोधों से बचाते हु‌ए सफ़र तय करने में सहायता करता है, उसी तरह दीक्षा में प्राप्त गुरुनाम की दिव्य ज्योति शिष्य को अनेक आन्तरिक रुकावटों से बचाकर गंतव्य तक पहुँचाती है। जैसे लोहा अग्नि में डालने पर अग्निमय हो जाता है, ऐसे ही सद्‌गुरु परमात्मा का नाम-सुमिरन करने वाला स्वयं परमात्मामय हो जाता है।

०२-११-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज सौभागी शिष्य में अपनी आध्यात्मिक शक्ति का संचार कर उसे दीक्षामंत्र प्रदान करते हैं। इस नाममंत्र के आनंद में डूबना ही भजन है। जब शिष्य की प्रत्येक श्वास-प्रश्वास नाम के रस में भीगी रहती है तो सिद्ध अवस्था प्राप्त होती है। यही साधना का सहज पथ है। सद्‌गुरु महाराज द्वारा शक्ति समन्वित दीक्षामंत्र की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है। इस मंत्र की गुह्यता में प्रवेश करने के लिये शिष्य में शरणागत भाव होना चाहिये। सद्‌गुरु से दीक्षामंत्र तो प्राप्त हो सकता है, लेकिन गुरुमंत्र की शक्ति को धारण करने के लिये पात्रता आवश्यक है। जैसे बाँस की तीली में सुचालकता न होने से विद्युत का प्रवाह असंभव है, वैसे ही सद्‌गुरु के द्वारा दिये गये मंत्र की शक्ति से जुड़ने के लिये सुचालकता आवश्यक है। शिष्य का सद्‌गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण ही वह पात्रता है जो गुरुकृपा के रूप में मंत्रशक्ति का वरण करती है। शरणागति से ही शिष्य अपने सद्‌गुरु से अनुकूलता प्राप्त करता है। ऐसा होने पर ही शक्ति-दीक्षा पूर्ण होती है। इसीलिये पूर्ण निष्ठा से मन, वाणी व कर्म को गुरु अनुरूप नियोजित करके भजन, सुमिरन व ध्यान करना चाहिये। शिष्य का चिन्तन, मनन, भावना, भजन, भक्ति आदि सभी सम्मिलित रूप से श्रीसद्‌गुरु के चरणों में प्रवाहित होना चाहिये। जैसे भुने या उबाले हु‌ए बीज में जैसे अंकुरण असम्भव है, वैसे ही सद्‌गुरु के चरणों में पूर्ण समर्पित शिष्य के मन-बुद्धि में सांसारिक विकार उत्पन्न नहीं हो सकते।

०१-११-२०१६

ब्रह्मदीक्षा प्रदान करते समय सद्‌गुरु अपनी दिव्य दृष्टि से शिष्य को शक्ति-ग्राह्यता प्रदान करते हैं और उसमें अपनी ब्राह्मी ऊर्जा प्रवाहित करते हैं। सद्‌गुरु अपने शिष्य में मंत्रशक्ति को स्थापित कर उसके ब्रह्मबीज को सप्राण बनाते हैं। सद्‌गुरु की मंत्रदीक्षा से शिष्य में ब्रह्मत्व का पहला अंकुर फूटता है। श्रीसद्‌गुरुदेव प्रदत्त मन्त्र की साधना-विधि समझाते हैं, जिससे मंत्र शिष्य में अभीष्ट ऊर्जाशक्ति के रूप में फलीभूत होता है। इस तरह सद्‌गुरु की ब्रह्मदीक्षा में दीक्षित हु‌आ शिष्य परम शान्ति को अन्त:करण में धारण करता हु‌आ दिव्य तत्त्वों से परिपूर्ण हो जाता है। लेकिन ये दिव्य तत्त्व बीज रूप में ही होते हैं। इन दिव्य बीजों के अंकुरण एवं विकास के लिये स्वयं को नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना में डुबोना पड़ता है। जिस प्रकार समय से पूर्व डिम्ब गर्भ से बाहर आये बीज का अंकुरण संभव नहीं होता है, वैसे ही गुरुमन्त्र की साधना परिपक्व हु‌ए बिना सार्वजनिक होने पर निष्फल हो जाती है। इसीलिये शिष्य को चाहिये कि वह गुरु द्वारा बतलाये गये साधना क्षेत्र (यथा- हृदय चक्र, आज्ञा-चक्र अथवा सहस्रार) में, गुरु प्रदत्त निर्देशों का दृढ़ता से पालन करते हु‌ए, गुरुमंत्र की साधना गुप्त रूप से करता रहे और अपनी साधना को कभी भी सार्वजनिक न करे। ऐसी साधना के परिणामस्वरूप सफलता स्वयं उस शिष्य का आलिंगन करती है।

३१-१०-२०१६

मंजिलें आ जाती हैं खुद ही उसके कदमों के तले।
दर में मालिक के जिस दास का सारा संसार गले॥

उस शिष्य के जीवन में को‌ई भी रिक्तता नहीं बचती जो दास भाव से अपने सद्‌गुरु के समीप रहता है और गुरुसेवा ही जिसका कर्तव्य होता है। दास भाव समर्पण का भाव है, मालिक के मौज में जीने का भाव है। अनेक जन्मों की साधना के बावजूद जो अहंकार, मन और कुतर्क-बुद्धि जैसे दुर्गुण मिटने का नाम तक नहीं लेते, सद्‌गुरु के चरणों में दासत्व स्वीकारने के पल से ही वो तिरोहित हो जाते हैं। इसीलिये परमसंतों ने स्वयं को अपने सद्‌गुरु के चरणों का दासनदास कहा है। सांसारिक अर्थों में दास कहते ही मन में अनेक यातना‌ओं को सहने वाले व्यक्ति की छवि आ जाती है, लेकिन आध्यात्मिक अर्थों में सद्‌गुरु के चरणों का दास तो भक्त-शिरोमणि होता है। बड़े सौभाग्य से ही सद्‌गुरु के दास की पदवी मिलती है। जिसके अन्तस् में दीक्षा ग्रहण करते ही दास भाव जाग्रत हो जाता है, उसी क्षण से उसके जीवन में अध्यात्म धारा का प्रवाह फूट पड़ता है और हृदय में प्रेम, भक्ति, आस्था, श्रद्धा व समर्पण की फसल लहलहाने लगती है। दासनदास को गुरु स्वयं अपने हृदय में समा लेते हैं। सद्‌गुरु का दासनदास एक पल में ही साधक, शिष्य व भक्त की अवस्था को लांघ जाता है और सदा गुरु की कृपावृष्टि में भीगा रहता है।

३०-१०-२०१६

ध्यान का अर्थ है ध्येय में एकतार रूप से होश को लगाना। शिष्य के लिये श्रीसद्‌गुरु महाराज ही एकमात्र ध्येय हैं और जब शिष्य निरंतर श्रीसद्‌गुरु महाराज की महिमा के चिंतन व उनके गुणों के मनन में लीन होने लगता है, तो मन में सद्‌गुरु के अलाव अन्य को‌ई भी विचार उत्पन्न नहीं होता, श्रीसद्‌गुरु महाराज पर ही पूर्ण एकाग्र हु‌ए मन की यही अवस्था ध्यान है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के दिव्य स्वरूप के निरंतर ध्यान से मन के समस्त द्वंद्व शांत हो जाते हैं, विषय भोगों के प्रति अनासक्ति पैदा होती है, कामना और अपने-पराये का भाव मिट जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की कृपा से प्राप्त होने वाली यह अवस्था ही वैराग्यता है, वैराग्य भाव से ही शिष्य में विवेक-बुद्धि तीक्ष्ण होती है और उसे सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्म-तत्त्व को ग्रहण करने की योग्यता अनायास ही प्राप्त हो जाती है। उसके मन के सभी अवगुण नष्ट हो जाते हैं और उसमें सद्गुणों का प्रादुर्भाव होता हैं। उसके मन में यह दृढ निश्चय हो जाता है कि संसार के सभी पदार्थ माया रूप होने से अनित्य हैं, अर्थात उनका को‌ई अस्तित्व नहीं है और एकमात्र श्रीसद्‌गुरु ही सर्वत्र समभाव से परिपूर्ण हैं। सद्‌गुरु की संचालक व नियामक शक्ति का एहसास होने पर शिष्य यह जान जाता है कि सद्‌गुरु ही इस जगत् के कर्णधार है और यही ज्ञान उसे अकर्त्तापन के भाव से भर देता है। सृष्टि के एकमात्र कर्त्ता श्रीसद्‌गुरु परमात्मा के स्वरूप में जब इस प्रकार की प्रगाढ़ स्थिति बनती है, तो अपने साथ-साथ उसे जगत् का भी विस्मरण हो जाता है और एक अपूर्व आनंद अनुभव होता है, यही ध्यान है।

 २९-१०-२०१६

सद्‌गुरु-भजन व सद्‌गुरु-सेवा दोनों में अगाध प्रेम का होना आवश्यक है। सेवा आन्तरिक प्रेमभाव का सगुण साकार स्वरूप होता है और सेवा से आन्तरिक साधना को दृढ़ता व प्रेम को प्रगाढ़ता प्राप्त होती है। प्रेमपूर्वक अपना सब कुछ श्रीसद्‌गुरु को समर्पित करके, निष्काम भाव से गुरु की सेवा करना ही प्रेमाभक्ति का प्रमुख अंग है। श्रीसद्‌गुरु के प्रति निष्काम प्रेम सर्वोत्कृष्ट भाव है। गुरुप्रेम तो जीवन है, हृदय रूपी मानसरोवर में खिला कमल है। प्रेम निरहंकारिता है व संपूर्ण जीवन का गौरव है। गुरुप्रेम की विशालता इतनी है कि यह पूरे ब्रह्माण्ड को अपने-आप में समा लेता है। प्रेम प्रणव है क्योंकि इसी के सहारे आकाश की सुदूर ऊँचा‌ईयों को पाया जा सकता है, अनंत आकाश में उड़ा जा सकता है और संपूर्णता के साथ श्रीसद्‌गुरु से एकाकार होकर जीवन की सार्थकता को प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिये शिष्य को चाहिये कि वह श्रीसद्‌गुरु भगवान् के नाम के भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना को अपने जीवन के प्रति क्षण का हिस्सा बनाये, श्रीसद्‌गुरु का संग पाने की हर संभव कोशिश करता रहे और सेवा, भजन व सत्संग करते हुये मन में समर्पण के भावों को बढ़ाता रहे।

२८-१०-२०१६

ज्ञान का अर्थ जानकारी मात्र न होकर चेतना के ऐसे प्रकाश से है जिसके तले जीवन के सत्य उजागर होते हैं। सद्‌गुरु ही शिष्य के जीवन में दीक्षा के माध्यम से इस चेतना प्रकाश को भरते हैं। इस प्रकाश में शिष्य को अपने सभी बंधनों का अनुभव होने लगता है और उसके अंदर अपने सभी पाश्विक भावों से मुक्त होने का भाव जागने लगता है। जब तक जीवन में सत्य ज्ञान का उदय नहीं होता है, मनुष्य इन बंधनों को ही अपना जीवन समझता है, उदरपूर्ति व सांसारिक वासना‌ओं को पूर्ण करने में ही जीवन की सफलता समझता है। सांसारिक वासनायें छिद्र युक्त घड़े में भरे जल के समान हैं, जिसे चाहे जितने बार भी भरने की कोशिश की जाये, वह कभी भी नहीं भरता। सांसारिक वृत्तियों की तृप्ति असंभव है। इसीलिये जीवन भर वासनापूर्ति में लगे रहने के बाद भी जीवन में रिक्तता बनी ही रहती है और जीवन सदा अपूर्ण बना रहता है। दीक्षा के उपरांत विषय-वासनायें क्षींण होती है और जीवन सद्भावों से भरता है। सद्‌गुरु द्वारा दीक्षा के दौरान बतलायी गयी साधना से जीव की बाहरी पकड़ ढीली होती है और शिष्य में अंतर्मुखता बढ़ती है। जीवन के सारे अनमोल खजाने तो मनुष्य के अंदर ही होते हैं और सद्‌गुरु की कृपा रूपी प्रकाश में ही दिखा‌ई पड़ते हैं। एक बार शिष्य को इन आंतरिक खजानों का आभास हो जाये, तो वह बाहरी दुनिया के समस्त आकर्षणों को कंकड़-पत्थर की तरह छोड़ देता है। गुरुदीक्षा रूपी सरिता के अंदर अनमोल रत्नों के अंबार भरे पड़े हैं, जो भक्त इसमें डुबकी लगता है, वह इन अंबारों का स्वामी बन जाता है। दीक्षा रूपी वृक्ष अर्थ, धर्म, काम व मोक्ष इन चारों फलों को देने वाला है।

२७-१०-२०१६

ऊपरी तौर से देखने पर शिष्य जीवन की उपलब्धियाँ शिष्य के तप और पुरुषार्थों का परिणाम प्रतीत होती है, जबकि सत्यता यह है कि शिष्य का आध्यात्मिक विकास गुरु की कृपा एवं उनके ही प्रयासों का नतीजा होता है। जिस तरह सिनेमा के चलचित्र तो परदे पर दिखा‌ई देते हैं, लेकिन वास्तव में चलचित्र को परदे में झलकाने का कार्य दूर किसी मशीन द्वारा चुपचाप संपादित होता है। वैसे ही शिष्य एक परदे की तरह ही है, जिसमें झलकने वाले सभी रंग श्रीसद्‌गुरु की कृपा के ही होते हैं। सद्‌गुरु दीक्षा के माध्यम से शिष्य के मानस-पटल को इतनी निर्मलता प्रदान करते हैं कि उसमें आध्यात्मिकता के रंग व लक्षण उभर सकें। सद्‌गुरु की यह क्रिया-प्रणाली इतनी गुप्त होती है कि शिष्य को भी इसका आभास नहीं हो पाता है। जब संपूर्ण जगत्‌ शिष्य की आध्यात्मिक उपलब्धियों की सराहना करता है, तो गुरु का हृदय ही सर्वाधिक गद्‌गद्‌ होता है, आखिर मूर्ति की प्रशंसा में मूर्तिकार से अधिक भला अन्य कौन खुश हो सकता है।

२६-१०-२०१६

गुरुदीक्षा सद्‌गुरु महाराज द्वारा अपने चैतन्य, तप, पुण्य एवं ज्ञान के एक अंश को शिष्य में स्थापित करने का महान आध्यात्मिक प्रयोग है। जैसे एक बागवान्‌ द्वारा सामान्य पौधे में उन्नत पौधे की कलम लगाने जैसा है। गुरुदीक्षा के उपरांत सद्‌गुरु की दिव्य चेतना का अंश शिष्य के जीवन में स्थापित होता है जो गुरुभक्ति, प्रेम, श्रद्धा व समर्पण से सिंचित होकर निरंतर संवर्धित होता है और शिष्य के पूरे जीवन को दिव्यता से भर देता है। शिष्य द्वारा श्रीसद्‌गुरु महाराज का सतत-स्मरण जब उसकी भावनात्मक अनुभूति से जुड़ने लगता है तो शिष्य के हृदय में सद्‌गुरु के प्रति प्रेम का अंकुरण होता है। सद्‌गुरु के प्रति यह प्रेम ही शिष्य को हर क्षण जीवन्त बनाये रहती है। इसी जीवन्तता में शिष्य की आध्यात्मिक यात्रा संपन्न होती है।

२५-१०-२०१६

गुरुदीक्षा में सद्‌गुरु अपनी शक्ति के एक अंश से मंत्र को चैतन्य करते हैं और चेतना के इस बीजमंत्र को शिष्य को प्रदान करते हैं। सद्‌गुरु का यह चेतनामंत्र शिष्य को संस्कारित करता है, जिससे कि शिष्य के जीवन में किसी प्रकार की प्रतिकूलता उसे दुर्भाग्य के रूप में प्रभावित न करे। यह संस्कार सभी परिस्थितियों में शिष्य को अनुकूलता प्रदान करता है। इस शक्तियुक्त गुरुमंत्र के प्रभाव से  प्रारब्धवश आने वाले दुर्योग भी टल जाते हैं। गुरु प्रदत्त इस गुरुमंत्र की शक्ति एवं चेतना के कारण शिष्य ज्ञान से आपूरित होने लगता है। इस गुरुमंत्र की महिमा यह भी होती है कि यह शिष्य के पूर्व जन्मों में अर्जित विद्याओं एवं योग्यताओं को एकत्र कर वर्तमान जीवन में जोड़ देता है। इसीलिये अनेक बार गुरुदीक्षा के समय ऐसे चमत्कार देखे गए हैं कि दीक्षा लेते ही शिष्य में अविश्वनीय रूप से सदाचार, प्रेम, ज्ञान व भक्ति के गुण प्रगट हो जाते हैं। सद्‌गुरु के दीक्षामंत्र की चेतना शिष्य को अपने पूर्व जन्म की विद्याओं का स्मरण करा देती हैं।

२४-१०-२०१६

गुरुदीक्षा एक पावनकारी संस्कार है जिसके माध्यम से श्रीसद्‌गुरु शिष्य में सद्‌गुणों की वृद्धि एवं दोषों का उन्मूलन करते हैं। गुरुदीक्षा द्वारा सद्‌गुरु महाराज शिष्य के मन, बुद्धि, भावनाओं व आत्मा का परिमार्जन करते हैं, इसीलिये गुरुदीक्षा को शुद्धि-संस्कार भी कहते हैं। गुरुदीक्षा मनुष्य के सभी दोषों का शोधन कर उसे प्रत्येक स्तर पर सुसंस्कृत शिष्य बनाने का एक प्रावधान है। श्रीसद्‌गुरु महाराज शिष्य को दीक्षा प्रदान कर उसमें अभीष्ट गुणों को जन्म देते हैं। आध्यात्मिक उन्नति मानव के चरम विकास का पर्याय है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए शिष्य के जीवन में अनुशासन व दैवी गुणों का आविर्भाव होना अत्यंत आवश्यक है और गुरुदीक्षा से इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। श्रीसद्‌गुरु महाराज अपने शिष्य को संयमित दिनचर्या पर चलाकर एक ओर उसके बाह्यरूप को संस्कारित करते हैं, वहीं दूसरी ओर नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान द्वारा उसके आंतरिक स्वरूप को तब तक निखारते रहते हैं जब तक कि शिष्य को अपने निखरे हुए स्वरूप की झलक दिखने लगे। जब शिष्य की संपूर्ण कलुषता मिट जाती है और उसका आंतरिक स्वरूप स्वच्छ दर्पण की भाँति हो जाता है तो सद्‌गुरु-परमात्मा की झलक उसे अपनी आत्मा में ही दिखाई देने लगती है। गुरुदीक्षा शिष्य में सद्‌गुणों का आधान करती है, इसीलिये सर्वोत्तम संस्कार के रूप में प्रतिष्ठित है। सांसारिक जगत्‌ में भी कम मूल्य वालों वस्तुओं को उपचारित कर अधिक मूल्यवान्‌ बनाया जाता है। जैसे मृदा अयस्कों से अवांछनीय पदार्थों को निकालकर परिशोधन द्वारा धातु बनाया जाता है। वैसे ही दीक्षा द्वारा सद्‌गुरुदेव शिष्य के अल्प मूल्य अथवा मूल्यहीन जीवन को बहुमूल्यता प्रदान करते हैं। शिष्य में दुर्गुणों का निकास व दिव्य गुणों का प्रवेश ही गुरुदीक्षा संस्कार का प्रयोजन है।

२३-१०-२०१६

साधक को आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने के लिये निरंतर उत्साहपूर्वक भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना करना नितान्त आवश्यक है। श्रीसद्‌गुरु में पूर्ण भक्ति व अटल विश्वास होने पर श्रीसद्‌गुरु की कृपा से शिष्य को निःसंदेह पूर्ण रूपेण श्रीसद्‌गुरु की सहायता मिलती है। श्रीसद्‌गुरु की अनुकम्पा से साधक को परमात्म सुख का परम अनुभव उपलब्ध होता है।
सद्‌गुरु संबल जीव का, रखो हृदय विश्वास।
ध्यान भक्ति सेवा करो, जपो नाम हर स्वाँस॥
ईश्वर, ब्रह्म, सत्य आदि सभी सद्‌गुरु सत्ता के ही भिन्न-भिन्न नाम हैं। सेवा, भक्ति व समर्पण से श्रीसद्‌गुरु को सदा प्रसन्न रखना चाहिये। अपने चित्त को श्रीसद्‌गुरु की सेवा में लगा दो, गुरु की आज्ञा का पालन भक्तिभाव से करो, सद्‌गुरु के श्रीमुख से निकले शब्दों में पूर्ण श्रद्धा रखो तभी जीवन में सुधार हो सकेगा। ज्ञान व मुक्ति प्राप्त करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा उपाय नहीं है। अपने आराध्य परम पूज्य श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी की पूजा ईश्वरीय भाव से करनी चाहिये। यह भली-भाँति समझ लेना चाहिये कि ईश्वर और ब्रह्म की सभी शक्तियाँ श्रीसद्‌गुरु में विद्यमान है। श्रीसद्‌गुरु के दर्शन में सदा देवत्व के दर्शन करना चाहिये। ऐसा होने पर ही शाश्वत्‌ ब्रह्मानंद की प्राप्ति होती है।

२२-१०-२०१६

ध्यान में केवल विचार शून्यता का घटित होना मानसिक शांति तो दे सकता है, लेकिन आनंद नहीं। आनंद तो सद्‌गुरु महाराज के स्वरूप को ध्यान में बसाने पर ही प्राप्त होता है। शून्य ध्यान के लिये निर्विचार होना पर्याप्त है, लेकिन आनंद-ध्यान श्रीसद्‌गुरु स्वरूप के दर्शन से ही संभव है। अपने सद्‌गुरु के स्वरूप में लीन होना ही ध्यान का लक्ष्य है। श्रीसद्‌गुरु महाराज आनंद स्वरूप हैं। जैसे-जैसे शिष्य ध्यान में परम आनंद स्वरूप श्रीसद्‌गुरु महाराज के दर्शन पाता है, वैसे-वैसे दुःख और भय से मुक्त होकर आत्मभाव में प्रतिष्ठित होता जाता है। जिस तरह मिस्री की एक ढेली को जिव्हा पर रखते ही पूरा मुँह मीठा हो जाता है, वैसे ही ध्यान में आनंद स्वरूप श्रीसद्‌गुरु महाराज की एक झलक मात्र से शिष्य आनंद से भर जाता है। कुछ दिनों की साधना के पश्चात्‌ ध्यान में गुरु की मोहनी मूरत स्थायी रूप से स्थिर हो जाती है, शिष्य अपनी आँखें मूँदकर दिन-रात उस दिव्य स्वरूप के आनंद में खोया रहता है। यह गुरुदर्शन का आनंद उसके रग-रग में इस तरह रच-बस जाता है कि शिष्य स्वयं आनंद का झरना बन जाता है। ऐसे शिष्य के जीवन से आनंद की सुवास चारों ओर फैलने लगती है, जो भी उसके सान्निध्य में आता है वह समझ जाता है कि इसके जीवन में गुरुभक्ति के बेल फैल चुकी है और इसका जीवन आनंद-फल से परिपूर्ण है। ऐसा शिष्य पूरी मानव-जाति में सद्‌गुरु के आनंद की लहर फैला देता है।

२१-१०-२०१६

सूरज की तरह ही सद्‌गुरु भी आध्यात्मिक ऊर्जा के अक्षय-स्रोत हैं। सद्‌गुरु के वचन व कर्म से सदा ज्ञान की रश्मियाँ ही निकला करती हैं, यह ज्ञानपुंज जिस शिष्य के अन्तस् में प्रवेश करता है, उसके सभी अज्ञान आवरण दूर हो जाते हैं। सद्‌गुरु के इस ज्ञान प्रकाश को ग्रहण करने के लिये शिष्य बनकर अपने हृदय को खोलना होगा, सद्‌गुरु महाराज को अपने हृदय में जगह देनी पड़ेगी, फिर जन्मों के अज्ञान रूपी अंधकार के हटने में पल भर की देर नहीं लगेगी। सूर्य से हमें केवल प्रकाश ही नहीं प्राप्त होता, अपितु सूर्य से ही हमारा भौतिक जीवन पोषित है। सूर्य के प्रकाश से वनस्पतियाँ पोषक तत्त्वों का संश्लेषण करती हैं और उन वनस्पतियों के सेवन से ही हमारा जीवन है। वैसे ही सद्‌गुरु के ज्ञान से न केवल आध्यात्मिक जीवन प्रशस्त होता है, अपितु जीवन के सर्वांगींण विकास हेतु सभी आवश्यक तत्त्व भी प्राप्त होते हैं। गुरु ही हमारे जीवन में उज्ज्वल भविष्य की नींव रखते है।

२०-१०-२०१६

जो नदियाँ समुद्र की तरफ की न बहकर बेतरतीब रूप से क‌ई धारा‌ओं में बँट जाती हैं और अनेक दिशा‌ओं में बहती रहती हैं, वे अपने गंतव्य समुद्र तक न पहुँचकर तप्त धरती में ही विलीन जाती हैं। वैसे ही शिष्य की चेतना यदि पूर्ण रूप से सद्‌गुरु की ओर प्रवाहित न होकर सांसारिक भटकावों में भटकती रहती है, तो भवतापों का शिकार बन जाती है और आवागमन के दुष्चक्र में फँस जाती है। इसीलिये शिष्य को अपनी चेतना को संसार के अनेक प्रकार के भटकावों से समेटकर मात्र श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में ही लगा देना चाहिये। शिष्य की सभी प्रवृत्तियाँ व भावनायें गुरुन्मुख ही होना चाहिये, उसके सर्वकार्य श्रीसद्‌गुरु की प्रसन्नता के लिये ही होने चाहिये, तभी गुरु और शिष्य का महामिलन होता है। नदी जितने वेग के साथ समुद्र की ओर बहती है उतनी शीघ्र वह अनंत समुद्र में मिलकर अनंत बन जाती है। वैसे ही भक्ति की जितनी प्रगाढ़ता से शिष्य अपने सद्‌गुरु को पाने हेतु नामजप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान में गति करता है, उतनी त्वरा के साथ वह गुरु के परम मिलन को प्राप्त होता है। जैसे दलदल अथवा धूल मिट्टी में सना जल अधिक दूरी तक गति नहीं कर सकता, वैसे ही सांसारिक कीचड़ में फँसा जीव भी आध्यात्मिक गति नहीं कर सकता है। शिष्य को अपनी भावना‌ओं को निर्मल रखने का सतत प्रयास करना चाहिये।

१९-१०-२०१६

जो साधक गुरुदीक्षा लेकर भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना पूरी निष्ठा व श्रद्धा के साथ करते हैं तथा श्रीसद्‌गुरु के चरणों में अपना सब कुछ समर्पित कर देते हैं, ऐसे साधक निश्चित ही जीवन में उच्च शिखर पर पहुँचते हैं। जिसके मन में गुरुभक्ति के पथ पर चलने का उत्साह हो, हृदय में मालिक से मिलने की तड़प हो, जिसमें श्रीसद्‌गुरु से एकाकार होने की चाह हो, वह गुरुभक्त ही जीवन में आध्यात्मिक उपलब्धियों को पा सकता है। जिसने गुरु को जान लिया उसने ब्रह्म को जान लिया। जो गुरु से एकाकार हो गया तो समझो वह ब्रह्म में लीन हो गया।

 १७-१०-२०१६

श्रीसद्‌गुरु महाराज के द्वारा बतलायी गयी साधना से ही शिष्य अपने आत्म-स्वरूप का साक्षात्कार करता है। आत्मा का यही शुद्ध स्वरूप ज्ञानावस्था  है। अनेक जन्मों के संचित संस्कारों से निर्मित वृत्तियाँ आत्मा के  शुद्ध स्वरूप को आवृत किये रहती हैं, यही अज्ञान की अवस्था है। श्रीसद्‌गुरु-भक्तियोग  की साधना से ही शिष्य के चित्त की स्थूल वृत्तियों और सूक्ष्म-संस्कारों का निरोध होता है, तदुपरांत आत्मा पूर्ण प्रकाश के साथ उजागर होती है। यही वह ज्ञान-प्रकाश जिसमें जीवन के सभी रहस्य स्वयं उजागर हो जाते हैं और जानने को कुछ भी शेष नहीं बचता है। यही है परा-भक्तियोग। इस भक्तियोग के सधते ही समस्त आसन क्रियाएँ, मुद्राएँ, प्राणायाम, यम, नियम आदि स्वचालित हो जाते हैं, शिष्य को इन्हें साधने हेतु अलग से कोई प्रयास नहीं करना पड़ता है।


१६-१०-२०१६

सभी चिन्ताओं से मुक्ति पाने का एक ही उपाय है- समर्पण। जैसे एक नन्हा बच्चा अपना हाथ पिता को पकड़ाकर मार्ग की चिन्ता नहीं करता, उसे पूर्ण विश्वास होता है कि वह अपने पिता के सहारे हर हालत में घर तक पहुँच ही जायेगा। एक शिशु अपनी माँ पर पूर्ण आश्रित रहता है, उसे अपने आहार की भी चिन्ता नहीं होती। वैसे ही जब एक शिष्य सद्‌गुरु पर पूर्ण रूप से समर्पित होता है, अपने सद्‌गुरु पर जब उसकी अटूट श्रद्धा व आस्था होती है तो श्रीसद्‌गुरु महाराज स्वयं उसकी हर आवश्यकता को पूर्ण कर गंतव्य तक पहुँचा देते हैं। इसमें एकमात्र यही अनिवार्यता है कि शिष्य अपने जीवन को पूरी तरह से सद्‌गुरु के श्रीचरणों में सौप दे। सद्‌गुरु के श्रीचरणों में पूर्ण समर्पण से ही असीम शांति का अनुभव होता है। चूँकि समर्पित शिष्य में कोई स्वार्थ भाव नहीं होता अतः उसके जीवन में कोई विघ्न भी नहीं होते हैं। ऐसी परम शरणागति में सद्‌गुरु के संग प्रेमासक्ति के अलावा अन्य सभी आसक्तियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं। सद्‌गुरु के प्रति प्रेम की यह आसक्ति जीवात्मा को बाँधती नहीं है, बल्कि उसके समस्त बन्धनों को सफलतापूर्वक छिन्न कर देती है। मनुष्य में अपनी श्रेष्ठता की समस्त भ्रांतियाँ अहंकार रूप में प्रगट होती हैं अतः सर्वप्रथम अपने अहंकार को सद्‌गुरु के श्रीचरणों में विलय कर एक नन्हें बालक की तरह निश्चिंत हो जाओ।

०८-१०-२०१६

संपूर्ण आकाश एवं उसमें निहित जड़-चेतन सृष्टि गुरुशक्ति के ही अवयव तत्त्व हैं। गुरुशक्ति में संपूर्ण सृष्टि अपने समस्त अवयवों सहित समायी है। सृजन, पालन, संहार आदि सभी क्रियाएँ एवं समस्त भाव सभी इसी गुरुशक्ति में समाहित हैं। गुरुशक्ति ने प्रेम, दया, करुणा, कृपा आदि भावों को अपने देहधारी अवतार अर्थात्‌ श्रीसद्‌गुरुदेव के रूप प्रगट किया है। श्रीसद्‌गुरु महाराज ही जीवों को भवसागर से पार लगाने वाले उद्धारक हैं। श्रीसद्‌गुरु के समस्त क्रिया-कलाप व योजनाएँ जन-कल्याण हेतु ही हैं। उनके द्वारा दी जाने वाले परम पावनकारी दीक्षा का प्रयोजन भी जीव की मुक्ति है। उनके श्रीमुख से निःसृत उपदेश निर्मल ज्ञान की धारा है, इसमें जिसने भी डुबकी लगायी उसने निश्चित ही आत्म-प्रकाश की झलक पायी है। देहधारी सद्‌गुरु सृष्टि चेतना का परिमार्जित एवं पवित्रतम स्वरूप हैं। उनकी चेतना पारस प्रभाव से युक्त है, जो भी सद्‌गुरु महाराज की शरण ग्रहण करता है वह निर्मल चेतना से युक्त हो जाता है।

०७-१०-२०१६

गुरुदीक्षा सद्गुरु का दुर्लभ कृपा प्रसाद है, जिसमें गुरुमंत्र के माध्यम से सद्गुरु साधक की मानस भूमि में प्रविष्ट करते हैं और उसकी मनोभूमि में आध्यात्मिकता का बीजारोपण करते हैं। इस इष्ट मंत्र के नियमित जप-भजन से शिष्य सद्गुरु की दिव्यता की अनुभूति पाता है। श्रीसद्‌गुरु के दिव्य स्वरूप के प्रभाव से एक दिन शिष्य स्वयं भी दिव्य और भव्य स्वरूप को उपलब्ध होता है। इस तरह एक प्रदीप्त दीपक से दूसरे दीपक का जीवंत हो उठना ही गुरु-शिष्य परंपरा है। जो शिष्य मन की कुटिलताओं को त्यागकर प्रेम व श्रद्धायुक्त हृदय से सद्‌गुरु महाराज का सत्संग करते हैं और निष्कपट भाव से सद्गुरु के चरणों का सहारा लेकर भजन-भक्ति करते हैं, वे अवश्य ही गुरुकृपा से धन्य होते हैं, इसमें तनिक भी संदेह  नही है।

०६-१०-२०१६

श्रीसद्‌गुरु की दीक्षा से जीवन के सभी भटकाव समाप्त होते हैं। दीक्षा लेने के पश्चात्‌ शिष्य की सभी वृत्तियों व कार्य-कलापों का सूत्रपात ज्ञान अर्जन की दिशा में होने लगता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज की दीक्षा दीक्षा ग्रहण करते ही शिष्य को प्रेम, भक्ति, आत्मबल, चेतना आदि अनायास ही उपलब्ध हो जाते हैं। इन अनमोल तत्त्वों को प्राप्त करने के लिए फिर उसे इधर उधर नहीं भटकना पड़ता। गुरुदीक्षा से शिष्य को सद्‌गुरु के सत्संग का अधिकार मिल जाता है। श्रीसद्‌गुरु के सत्संग से शिष्य भक्ति व ज्ञान के मार्ग का पथिक बन जाता है और फिर ज्ञान अर्जन की दृष्टि से उसके जीवन में वेद-पुराण आदि का कोई औचित्य नहीं बचता। ऐसा साधक जीवन के समस्त अनिवार्य कर्मों को संपन्न करता हुआ भी संसार से निर्लिप्त रहता है। दूसरे शब्दों में श्रीसद्‌गुरु से दीक्षित हुआ शिष्य सदा मुक्त अवस्था में ही रहता है। दीक्षा एक ऐसा संस्कार है जो शिष्य को आजीवन सुसंस्कृत बनाए रखता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जो शिष्य सद्‌गुरु से दीक्षा लेकर गुरुभक्ति से जुड़ जाता है उसका इस जीवन में अधोपतन तो होता ही नहीं और मृत्यु के बाद भी वह फिर कभी निम्न योनियों में नहीं भटकता है। यदि शिष्य सद्‌गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित है तो मात्र दीक्षा की महिमा से ही वह अध्यात्म के उच्चतम सोपान में प्रवेश कर जाता है। दीक्षा सद्‌गुरु द्वारा शिष्य को दिया गया वह दान है जिससे जीवन में सम्पन्नता, धन, यश, वैभव, पराक्रम, आरोग्यता, सुख और दिव्यता प्राप्त होती है। अध्यात्म की ऊँचाइयों को छूकर परमहंस की स्थिति प्राप्त करने के लिये दीक्षा ही एकमात्र विकल्प है।  मानव के सीमित जीवन में मोक्ष की महासाधनाओं को संपन्न कर पाना असंभव है, लेकिन गुरुदीक्षा ही ऐसी युक्ति है जिससे जीवन्मुक्ति की समस्त साधनाएँ स्वतः ही शिष्य के भीतर स्थापित हो जाती हैं। सार रूप में दीक्षा ही गुरुधाम का दिव्य द्वार है।

 ०५-१०-२०१६

आत्मीय मूल्यों का प्रकाशन है- गुरुदीक्षा
वेद, उपनिषद्‌ आदि के पठन-पाठन से तो केवल जानकारी संग्रह बढ़ता है, लेकिन उनमें जिस ज्ञान-तत्त्व की चर्चा है उसे आचरण, व्यवहार व अनुभव में लाना बिल्कुल अलग बात है। विद्या अर्जन और ज्ञान प्राप्ति में बहुत अन्तर है। उदाहरण के तौर पर किसी प्रकाश स्रोत की जानकारी एकत्र कर लेना यदि विद्या अर्जन है तो हाथ में प्रकाश पुञ्ज का होना ज्ञान है। विद्या एक सामान्य व्यक्ति अथवा शास्त्र से भी ग्रहण की जा सकती है लेकिन ज्ञान केवल सद्‌गुरु से ही प्राप्त होता है।जब तक मनुष्य की चेतना में जन्मों के संचित मलों की कालिख चढ़ी होती है तब तक ज्ञान का अत्मसात्‌ होना असंभव है। वास्तव में जीवन में सत्य-तत्त्व का प्रकाश बाह्य साधनों द्वारा संभव ही नहीं है। जिस तत्त्व को विद्या के अर्जन द्वारा समझने की कोशिश होती है वह तत्त्व तो मनुष्य के अंदर स्वयं विद्यमान है, आवश्यकता है उन मलिन आवरणों को उतारना जिनसे हमारी ज्ञान-चेतना ढँकी हुई है फिर वह तत्त्व स्वयं ही अपना प्रकाश चारों ओर बिखेर देता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा दीक्षा के दौरान बतलायी गयी नाममंत्र के जप, भजन, सुमिरन व दर्शन की साधना से ही ये अज्ञानता के मलिन आवरण विदीर्ण होते हैं और शिष्य का पूरा अस्तित्व ज्ञान-चेतना के प्रकाश से रोशन होता है।

 ०४-१०-२०१६

सद्‌गुरु पराचेतना का साकार रूप हैं, उनके रोम-रोम से चेतना का प्रवाह होता है। सद्‌गुरु-चेतना पारस की महिमा से युक्त है, अर्थात्‌, सद्‌गुरु के समीप आते ही शिष्य भी चेतनावान्‌ हो जाता है। सद्‌गुरु का सामीप्य दीक्षा ग्रहण करने पर ही मिलता है, अतः यह कहना अधिक उचित होगा कि सद्‌गुरु द्वारा शिष्य को अपने पास लाकर सचेतन बनाने की युक्ति है-दीक्षा। दीक्षा में प्राप्त गुरुमंत्र परमचेतना का बीज है जो जप, भजन व सुमिरन के माध्यम से शिष्य की आत्मचेतना को  समेटकर अपने चारों ओर केन्द्रित करता है और इस तरह आत्मा की समग्र चेतना के प्रकाश को झलकाता है। दीक्षा-संस्कार के साथ ही शिष्य में यह प्रक्रिया स्वत: शुरू हो जाती है। दीक्षा वह दुर्लभ प्रक्रिया है जिसके द्वारा सद्‌गुरु शिष्य की समस्त मलिनताओं को हटाकर उसके जीवन में कान्ति व पूर्णत्व प्रदान कर उसे नर से नारायण बनाते हैं। दीक्षा आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ है जिसमें शिष्य सद्‌गुरु की कृपा से आत्मा का साक्षात्कार करता है एवं परमात्म तत्त्व अर्थात्‌ श्रीसद्‌गुरुदेव से एकत्व स्थापित करता है।
सद्‌गुरु का स्थूल विग्रह परमात्म तत्त्व को झलकाने वाला दर्पण है। परमात्मा या ब्रह्म का सत्-चित्-आनन्द स्वरूप ही श्रीसद्‌गुरु अवतार है। दीक्षा के बिना सद्‌गुरु ब्रह्म की ओर गति और सिद्धि संभव नहीं है। जिस तरह वर्षा में खड़े होने पर संपूर्ण देह भीग जाती है वैसे ही सद्‌गुरुदेव के सान्निध्य में शिष्य ज्ञान से सरावोर रहता है। सद्‌गुरु के श्रीमुख से निकले उपदेशामृत श्रद्धावान्‌ शिष्य के हृदय में ज्ञान का प्रकाश भरते हैं। श्रद्धा और समर्पण के द्वारा ही सद्‌गुरु के ज्ञानामृत दोहन से आप्लावित होकर शिष्य अनंत सिद्धियों का स्वामी बनता है।
दीक्षा उपरांत शिष्य की साधना में गुणात्मक वृद्धि होती है। जैसे एक किसान बीज बोने के लिये भूमि को तैयार करता है और अंकुरण के पश्चात्‌ खरपतवार को निकाल फेकता है ताकि भूमि की संपूर्ण उर्वरा शक्ति फसल की पैदावार बढ़ाने में ही लगे। उसी प्रकार सद्‌गुरु अपने शिष्य को ज्ञानार्जन हेतु योग्यता प्रदान कर उसके मन से सांसारिक प्रलोभनों को हटाते हैं ताकि उसकी संपूर्ण चेतनाशक्ति आध्यात्मिक प्रगति में ही लगे।

०२-१०-२०१६

मानव जीवन की सार्थकता यही है कि जीव को मालिक के नाममंत्र के भजन-भक्ति का सुख मिल सके, श्रीसद्‌गुरुदेव की असीम कृपा से मुस्तकिल सुख मिले, शाश्वत सुख मिले। श्रीसद्‌गुरु के नाममंत्र का जप तथा भजन-भक्ति की साधना शाश्वत सुख को देने वाली है, हमेशा आनंद देने वाली है। श्रीसद्‌गुरु के नाममंत्र का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान की साधना सदा करने वाला सदा सुखी रहता है। त्रिलोक में भी इसके समान कल्याणकारी कुछ अन्य नहीं है, इसीलिये विचारशील साधकजन अपने दिल में मात्र श्रीसद्‌गुरुदेव की भजन-भक्ति की चाह ही रखते हैं।

 ०१-१०-२०१६

नामजप, भजन, सुमिरन, पूजा, दर्शन और ध्यान साधना की सफलता हेतु सद्‌गुरु महाराज के प्रति गहरी आस्था और दृढ़ भक्ति। शिष्य को हर पल इसका ध्यान रखना चाहिये कि सच्चे शिष्य के लिये गुरुभक्ति ही साधना है और यही सिद्धि है। जब कोई शिष्य इस गुरुभक्ति के सत्य को भूल जाता है, तो उसकी साधना में भटकाव के दौर आते हैं। कभी यह भटकाव किसी सिद्धि को पाने की लालसा में होता है तो कभी अन्य किसी सांसारिक आकांक्षा के कारण। लेकिन कृपालु श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्य को इस भटकाव से चेताते हैं, बचाते हैं, उबारते हैं, उद्धार करते हैं। सचमुच ही सद्‌गुरु के अलावा ऐसी कृपा और कौन कर सकता है, भला कौन सहारा दे सकता है। जो शिष्य अपने अन्तस्‌ को अपने श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में समर्पित करता है उसे अपने भक्ति-मुक्ति तथा आध्यात्मिक तत्त्वों की उपलब्धि सहज ही हो जाती है। ऐसा शिष्य सर्वदा मुक्त एवं ब्रह्ममय हो जाता है। इसी भक्ति की युक्ति से मुक्ति मिलती है। यही गुरु-शिष्य-रहस्य है।

३०-०९-२०१६

आत्म-बोध, स्वरूप की पहचान, आत्म-साक्षात्कार, परमात्म-मिलन, परम तत्त्व की प्राप्ति आदि चाहे जो भी संज्ञा इसे दें, मानव जीवन का यही परम लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति का एक ही उपाय है और वह है- सद्‌गुरुदेव की चरण-शरण। परमतीर्थ सद्‌गुरुदेव ज्ञानतीर्थ हैं, भक्तितीर्थ हैं, आत्मतीर्थ हैं। सन्त-सद्‌गुरु रूपी परमतीर्थ ऐसा कल्पसागर है जिसके प्रेमामृत रूपी शीतल जल में स्नान करने से तन, मन, आत्मा एक साथ पवित्र हो जाते हैं। उसमें भक्ति की निर्बाध धारा बहती रहती है और ज्ञान की निर्मल तरंगें उठा करती हैं। तीर्थ, व्रत, जप-तप, अनेक प्रकार की योग-साधनायें मनुष्य को आंशिक लाभ ही प्रदान कर सकती हैं। जीव का परम उद्धार तो तभी हो सकता है जब वह परमतीर्थ सद्‌गुरुदेव की शरण ग्रहण करे। सद्‌गुरु का चरणामृत ही वह पवित्र गंगा है जिसमें स्नान करने से पाप-ताप मिटते हैं, तन-मन-आत्मा निर्मल होते हैं और मनुष्य सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
२९-०९-२०१६

शिष्य के सभी क्रिया-कलापों के पीछे एक ही उद्देश्य होता है- सद्‌गुरु की प्रसन्नता। शिष्य के लिए गुरु ही सर्वस्व होते हैं, इसलिए श्रेष्ठ शिष्य वही है, जो अपने हृदय के तारों को केवल गुरु से ही जोड़ता है। हृदय में सद्‌गुरु को स्थायी रूप से स्थापित करना ही शिष्य का लक्ष्य होना चाहिये। ऐसा सौभाग्यशाली शिष्य ही स्वयं को भी गुरु के हृदय में स्थापित कर पाता है। सद्‌गुरु का संसार शिष्य होता है और शिष्य का संसार सद्‌गुरु ही होते हैं। गुरु-शिष्य का संबंध आस्था और प्रेम का पवित्र संबंध है। भले ही यह संबंध बंधन हो, पर यह बंधन अनंत बंधनों का अंत करने वाला है। इस गुरु-शिष्य संबंध के बीच किसी अन्य का कोई अस्तित्व नहीं होता है। जब समस्त कर्मों, चिंतन व भावों के कारणरूप एकमात्र गुरु ही हो जायें, तो समझो कि शिष्यता का पुष्प खिलने लगा। जब ऐसा लगने लगे कि गुरु ही मेरे जीवन के कर्ता-धर्त्ता हैं, मेरे सभी क्रिया-कलाप उन्हीं के कारण हैं, मैं तो उनका दास मात्र हूँ, एक निमित्त मात्र हूँ, तो समझो कि शिष्यता के उच्चतम सोपानों की ओर गति होने लगी है। जब ओठों से ’ गुरु’ शब्द उच्चारण होते ही गला अवरुद्ध होने लगे और आँखे प्रेमाश्रुओं से छलछला उठें, तो समझे कि शिष्यता के संवर्धन हेतु गुरुकृपा का सिंचन मिलने लगा।

 २८-०९-२०१६

श्रीसद्‌गुरु के पास बैठने मात्र से साधक के हृदय में ज्ञान का प्रकाश होने लगता है, शास्त्रों में जिसे ब्रह्म प्रकाश कहा गया है। जिससे मन के समस्त भ्रम और चिन्तायें स्वतः दूर हो जाती हैं। अतः शिष्य को चाहिये की वह श्रीसद्‌गुरु की निकटता के लिये निरंतर प्रयत्न करे। जिस तरह से प्रज्वलित दीपक के संपर्क मात्र से ही अन्य दीपक भी जल उठता है उसी प्रकार श्रीसद्‌गुरु के सानिध्य मात्र से शिष्य का अन्तर्मन प्रकाशित हो जाता है और उसका कल्याण हो जाता है।

२६-०९-२०१६

ध्यान की तीन अवस्थायें होती हैं- सर्वप्रथम साधक श्रीसद्‌गुरु महाराज के दिव्य विग्रह का ध्यान करता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के विभिन्न क्रिया-कलापों जैसे चलने, बैठने, उपदेश देने आदि स्थूल क्रियाओं को ध्यान में लाता है। धीरे-धीरे जब ध्यान-साधना गहरी होने लगती है तो दूसरी अवस्था में साधक ध्यान में सहसदल कमल पर विराजमान वर एवं अभय मुद्रा धारण किये हुये श्रीसद्‌गुरु महाराज के तेजोमय ब्रह्म-स्वरूप के दर्शन करता है। ध्यान की अत्यंत प्रगाढ़ एवं गहरी अवस्था में साधक को श्रीसद्‌गुरु महाराज के परम चैतन्य-स्वरूप अर्थात्‌ गुरु-तत्त्व का अनुभव होता है।

 
२५-०९-२०१६

जिन शिष्यों के लिये गुरुसेवा ही सर्वोपरि है, वे ही सत्‌-शिष्य कहलाते हैं। उन्हें अपने सुख-दुख, हानि-लाभ की चिन्ता नहीं होती है और वे अपने श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं। जो शिष्य हर परिस्थिति में अपने सद्‌गुरु की सान्निध्यता की ही चाह रखते हैं, उन्हें निज-धाम पहुँचाने हेतु श्रीसद्‌गुरु अपनी समस्त विद्यायें व आध्यात्मिक कमाई लुटाया करते हैं। ऐसे शिष्य ही मोक्ष के अधिकारी होते हैं और यदि उनकी साधना में कोई कमीं रह जाती है तो सद्‌गुरु स्वयं उन्हें अपनी आध्यात्मिक शक्ति प्रदान कर सफल बनाते हैं।

२४-०९-२०१६

गुरु में पूर्ण विलीनता ही शिष्य का एकमात्र लक्ष्य होता है, अपने संपूर्ण अस्तित्व को मिटाकर पूर्ण गुरुरूपेण हो जाना ही शिष्य जीवन की उपादेयता है। जिन्होंने गुरुभक्ति की सरिता में जीवन को डुबोकर निर्मल किया है, इस मर्म को वे ही समझ सकते हैं। शिष्य को चाहिए कि वह नियमित-निरंतर-निर्बाध रूप से गुरुमंत्र का जप करे। गुरुमंत्र से ही अंतःकरण निर्मल होता है, कर्मबंधन शिथिल होते है, चक्रों मे उर्जा आती है और कुण्डलिनी जागरण होता है। गुरुमंत्र एक तारकमंत्र है। मंत्रजप के साथ-साथ सद्‌गुरुदेव महाराज का सतत स्मरण, दर्शन एवं ध्यान करते रहना चाहिये। जब जप, सतत स्मरण, दर्शन एवं ध्यान करते-करते साधक को इस बात का होश नहीं रहता कि वह जप कर रहा है, तो वह अजपा-जप की अवस्था कहलाती है। इसी तरह जब साधक दर्शन, स्मरण एवं ध्यान में इतनी गहराई से तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने होने का भान नहीं बचता, वह पूरी तरह गुरुमय हो जाता है, तो यह अवस्था ही सहज समाधि की अवस्था कहलाती है।

 २२-०९-२०१६

मंत्रजप
प्रत्येक आती व जाती हुई स्वाँस में गुरुमंत्र के अक्षरों को अर्थसहित, मौन व सचेतनपूर्वक आरोपित करना ही यथार्थ मंत्रजप है। यहाँ मंत्रजप के जिस ढंग पर जोर दिया गया है वह है- अर्थसहित, मौन व सचेतनपूर्वक। श्रीसद्‌गुरु महाराज इसके गूढ़ रहस्य को समझाते हुए कहते हैं कि जब तक मंत्र के अर्थ में ध्यान न लगाया जाय तो मंत्र रूपी बीज का पल्लवन नहीं होता। जिस प्रकार इत्र की शीशी के ढक्कन को न खोलने पर इत्र की सुवास का अनुभव नहीं होता है, उसी प्रकार मंत्र में निहित प्रभाव का प्रादुर्भाव उसमें छुपे अर्थ को खोलने पर ही होता है। मंत्र में गुरुशक्ति छुपी होती है, जिसका प्रभाव यह है कि वह अज्ञानता के अंधकार को हटाकर जीवन के ज्ञान रूपी प्रकाश से सरावोर करती है। शिष्य को गुरुमंत्र के प्रत्येक जाप में प्रत्येक आती व जाती स्वाँस के साथ इसी अर्थ के भाव को मन में लाना है। मंत्र जाप के समय ऐसे भाव जगाने चाहिये कि गुरुमंत्र के स्वाँसों के माध्यम से अंदर प्रवेश होने के साथ उसका अज्ञान तिमिर हट रहा है और अन्तस्‌ सद्‌गुरु के ज्ञान-प्रकाश से भर रहा है। यह जाप पूर्णतः मानसिक होना चाहिय अर्थात्‌ यह किसी को पता भी न चले कि आप गुरुमंत्र का जाप कर रहे हैं। जो साधना गुप्त रूप से की जाती, वही फलवती होती है। जैसे कि जमीन के अंदर बोया गया बीज ही अंकुरित होता है उसी प्रकार बीजमंत्र का पल्लवन भी तभी होता है जब उसका प्रदर्शन न हो। मंत्रजप मूर्छित चेतना के साथ नहीं अपितु जाग्रत चेतना के साथ होना चाहिये। पूरे होश के साथ अर्थ व भाव सहित गुरुमंत्र का जाप निश्चित ही फलदायी होता है।

२१-०९-२०१६

श्रद्धा-
जिस तरह पौधे को पनपने के लिये जल आवश्यक है, वैसे ही हृदय में गुरुभक्ति पनपने हेतु सद्‌गुरु के प्रति श्रद्धा भाव की आवश्यकता होती है। श्रीसद्‌गुरु महाराज को यथास्वरूप, पूर्णतोभावेन स्वीकारना ही श्रद्धा है। श्रद्धा एक ऐसा विश्वास है जो बिना तर्क व बिना शर्त होता है। सद्‌गुरु के प्रति श्रद्धा एक ऐसा बल है जो प्रतिकूल परिस्थितियों को भी शिष्य के अनुकूल बना देती है। श्रद्धा से साधना को बल मिलता है अथवा ऐसा कहना ज्यादा उचित होगा कि श्रद्धा की शक्ति से ही साधना में प्रगति होती है।

२०-०९-२०१६

सुमिरन
मंत्र-साधना में सुमिरन का बहुत महत्व है। गुरुमंत्र की साधना करते समय मन व मस्तिष्क पूर्ण रूप से गुरु में ही लीन होने चाहिये। सुमिरन का अर्थ है कि मन सद्‌गुरु के स्मरण से परिपूर्ण हो। इसलिये यह आवश्यक है कि भटकते मन को बार-बार रोककर सद्‌गुरु की यादों में स्थिर किया जाय। कहा जाता है कि मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। श्रीसद्‌गुरु की महिमा में विचारमग्न रहने से शिष्य के अंदर सद्‌गुण पनपते हैं क्योंकि श्रीसद्‌गुरु महाराज तो सद्‌गुणों के भंडार हैं। श्रीसद्‌गुरु की मोहनी छवि, उनका दिव्य स्वरूप और उनकी महिमा ही सुमिरन के अंग हैं। मंत्र के जप से मन स्थिर होता है लेकिन चित्त की स्थिरता तो सुमिरन से ही प्राप्त होती है।

 १९-०९-२०१६

मनुष्य को उसके स्वरूप का पहचान करवाने वाली संजीवनी शक्ति है- पराविद्या। यह पराविद्या पुस्तकों या अन्य सांसारिक ज्ञान के साधनों द्वारा नहीं मिल सकती। यह देह या इन्द्रियों का विषय नहीं है, यह विषय देहातीत है, इन्द्रियातीत है, आत्मिक है। इसे एक आत्मा दूसरी आत्मा से ही सीख सकती है। सीखने वाला जीवात्मा है तथा सिखाने वाला नरदेह में सगुण रूप से विद्यमान परमात्मा हैं जिन्हें सद्‌गुरु कहा जाता है। इस विद्या की प्राप्ति सद्‌गुरु के अतिरिक्त किसी अन्य स्रोत से संभव ही नहीं है। कठोपनिषद्‌ कहता है-
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्याम॥
अर्थात्‌, यह आत्मा प्रवचन, बुद्धि अथवा श्रवणादि द्वारा प्राप्त नहीं होता, अपितु यह जिसे अनुग्रहपूर्वक स्वीकार कर लेता है उसको ही प्राप्त हो सकता है; उसे यह आत्मा अपना यथार्थ स्वरूप प्रकट कर देता है ।
जिस तत्त्वदर्शी सद्‌गुरु में परमात्मा स्वयं विराजमान हैं ऐसे सद्‌गुरु की कृपा जिस शिष्य को प्राप्त होती है, उसी शिष्य के अन्तस्‌ में श्रीसद्‌गुरु महाराज अपना ब्रह्मस्वरूप प्रगट करते हैं और इस तरह से उस शिष्य को ब्रह्मविद्या प्राप्त होती है।

१८-०९-२०१७

चाहे कोई कितने भी यम, नियम, तीर्थ, दान आदि यत्न कर ले, किन्तु ’नाम’ रूपी अनमोल धन उसे बिना सद्‌गुरु की कृपा के नहीं मिल सकता है। यह ’नाम’  परम प्रकाश रूप और ध्वनि स्पंदनों से युक्त है। यह ’नाम’  विदेह है, भाषा रहित है, मन व इन्द्रियों से परे है। मानव शरीर के अन्दर इस नाम-तत्त्व से मिलने का सत्य मार्ग है, लेकिन यह नाम-तत्त्व मुर्शिद कामिल अर्थात्‌ पूर्ण सद्‌गुरु के अलावा किसी अन्य सहारे से प्राप्त नहीं हो सकता है। इसीलिये सच्चे खोजी को अन्य सभी सांसारिक सहारे छोड़ कर सद्‌गुरु वक़्त को ही खोजना चाहिये और उनकी शरण ले‍नी चाहिये। मंत्र गुरु से ही प्राप्त करना चाहिये, इसीलिये आध्यात्मिक साधना के प्रारंभ में मंत्रदीक्षा का विधान है। दीक्षा में गुरुमंत्र के सहारे ही गुरु-शिष्य का संबंध स्थापित होता है। गुरु मंत्र-दीक्षा देते समय अपनी चैतन्य शक्ति का एक अंश भी शिष्य को देते हैं जिससे कालान्तर में शिष्य का जीवन पूर्ण प्रकाशित होता है। जैसे गहराई में बोये गये बीज की भूमि को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ बीज बोया गया है, लेकिन जल, वायु और समय के प्रभाव से ही बीज में अंकुर फूटते हैं और धीरे-धीरे वह बीज विशाल वृक्ष में बदल जाता है। ऐसे ही मंत्रदीक्षा के समय मंत्रशक्ति का पता नहीं चलता लेकिन जब साधक जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान आदि साधनों द्वारा उसे सींचता है, तब मंत्रदीक्षा का जो प्रसाद है, बीजरूप में जो आशीर्वाद मिला है, वह पनपता है और अनुभव में आता है।

१७-०९-२०१७

श्रीसद्‌गुरु के प्रति प्रेम की शुरुआत तो उनके दैहिक स्वरूप से ही होती है पर उस प्रेम में किसी प्रकार का स्वार्थ, वासना या कामना नहीं होती है। गुरु स्व-शरीर में अवस्थित होते हुये भी शिष्य के लिए एक गहरे आत्मिक अनुभव होते हैं। गुरुप्रेम एक अनुपम एहसास है जिसका अनुभव सच्चा शिष्य अपने अन्तस्‌ में सदैव ही करता है‍ परंतु इस प्रेम का वर्णन उसकी वाणी की क्षमता से परे होता है।

१६-०९-२०१६

बहिर्मुखी व्यक्ति सांसारिक कार्यो में लिपायमान रहता है, मानव देह के नौ दरवाजों से उसकी शक्तियाँ बाहर ही बिखरती रहती है, लेकिन जैसे ही वह भृकुटी के मध्य आज्ञा-चक्र में  अपनी चेतना को श्रीसद्‌गुरु महाराज के स्वरूप में एकाग्र  करता है और सद्‌गुरु के महाराज के द्वारा प्राप्त नाममंत्र का स्वाँसों  में जप करता है तो चेतना का प्रवाह अंदर की ओर होने लगता है और उसकी चित्त-वृत्ति अंतर्मुखी होती है जिससे सभी शक्तियाँ सिमट कर उसका आध्यात्मिक उत्थान करने लगती हैं। यही है श्रीसद्‌गुरु महाराज का अभ्यास योग। इस अद्भुत-अलौकिक क्रियायोग को समय के तत्त्वदर्शी सद्‌गुरु के सान्निध्य में ही जाना जा सकता है।

१५-०९-२०१६
गुणों एवं रूप के स्मरण बिना ध्यान आसान नहीं है। इसलिए शिष्यों को अपने गुरुदेव के नाम का स्मरण उनके गुणों के चिन्तन के साथ करना चाहिए। इसी तरह सद्‌गुरुदेव का ध्यान भी उनके स्वरूप को याद करते हुए भक्तिपूर्वक करना चाहिए। शिष्य के जीवन में यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहनी चाहिए। ऐसा होते रहने पर शिष्य का अस्तित्व स्वयं ही गुरुदेव की चेतना में घुलता रहता है। सद्‌गुरु महाराज का सुमिरन करते समय उनके रूप का ध्यान करना चाहिये, मन को उन्हीं पर लगाये रहना चाहिये। जब सद्‌गुरु के स्वरूप का चिंतन होगा, तो उनके रूप से प्यार होगा। जब सद्‌गुरु स्वरूप से खूब प्यार होगा तभी ध्यान अवस्था प्राप्त होगी और हर स्थान पर सद्‌गुरु स्वरूप का ही दर्शन होगा।

 १४-०९-२०१६

आध्यात्मिक मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है -अहंकार। अहंकार एक आभास मात्र होते हुए भी सही प्रतीत होता है। चूँकि अहंकार का अस्तित्व है ही नहीं, इसीलिये उसे छोड़ने की कोई निश्चित विधि भी नहीं है। अहंकार के संबंध में तर्क-वितर्क करना पानी में लाठी पीटने जैसा ही है। अतः अहंकार को यथास्वरूप अपने श्रीसद्गुरु के श्रीचरणों में सौंपकर सद्गुरु महाराज के बतलाये मार्ग पर चलते चले जाओ। गुरुभक्ति एक ऐसा मार्ग है जिसमें केवल प्रेम से लगे रहने की आवश्यकता है। सद्गुरु की शरण मिलने के बाद कहीं अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं होती है। सद्गुरु की शरण में सभी कामनायें पूरी होती हैं। ऊँचे वृक्ष के सहारे एक दुबली बेल भी उतनी ही ऊँचाई तक चढ़ जाती है, जितना ऊँचा वह वृक्ष होता है।

१३-०९-२०१६

जिस साधक का मन सदा श्रीसद्‌गुरु की आरती, पूजा, दर्शन, भजन तथा ध्यान में लगा रहता है, उसकी सुरत में श्रीसद्‌गुरु महाराज का आसन होता है और उसका चित्त सदा मालिक में निमग्न रहता है। जो गुरुमुख अपने श्रीसद्‌गुरु की आज्ञा पर चलता है और अपना ख्याल, अपना ध्यान मालिक के श्रीचरणों में लगाये रखता है, वह भक्त चाहे जहाँ भी रहे मालिक की दया से उसका कल्याण होता रहता है। जिस शिष्य को प्रतिदिन श्रीसद्‌गुरु महाराज की अमृतवाणी श्रवण का सौभाग्य मिलता है, उसे कम समय में ही आशातीत सफलता मिलती है। गुरुवाणी से शांत हुआ शिष्य शीघ्रता से गुरु-ध्यान में प्रवेश कर गहराई तक पहुँचता है। ध्यान में मालिक के दर्शन होने से विषय-विकार नष्ट होते हैं और चित्त में निर्मलता आती है। विकार रहित निर्मल चित्त में सद्‌गुरु की छवि और भी अधिक स्पष्ट होती जाती है व साधना में एकाग्रता आती है।
ज्ञान भक्ति सरि गुरुवचन, पग पग भरे प्रकाश ।
छूटी  निद्रा  जनम की,  सुरत  चली  आकाश ॥

१२-०९-२०१६

सद्‌गुरु-सेवा के सामने सभी साधनाऐं तुच्छ हैं। जैसे चकोर सदा ही चंद्रमा की ओर टकटकी लगाये रहता है, वैसे ही शिष्य को भी गुरुसेवा की प्राप्ति हेतु याचक दृष्टि से सदा श्रीगुरुदेव की ओर निहारते रहना चाहिये। श्रीसद्‌गुरु की सेवा करने का अवसर तो शिष्य के जीवन का उत्सव होता है।
गुरुसेवा अरु बंदगी,  सुमिरन अरु बैराग ।
ये चारों जब भी मिलें,  पूरन होवे भाग ॥
गुरु-सेवा से बड़ी संसार में कोई साधना नहीं। इसकी तुलना में सभी साधनाऐं, भक्ति, कर्म आदि क्षुद्र हैं। गुरु-सेवा से शिष्य को क्षण मात्र में वह सब हासिल हो जाता है जो कई जन्मों की तपस्या के बाद भी संभव नहीं है।

११-०९-२०१६

मोक्ष प्राप्ति के केवल आठ ही साधन-द्रव्य हैं, जो मनुष्य श्रीसद्‌गुरु कृपा से इन आठ साधन-द्रव्यों को प्राप्त कर लेता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है। ये आठ साधन-द्रव्य हैं- सद्‌गुरु से नाममंत्र की दीक्षा, नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान । इस भव-सागर से मुक्ति हेतु, इन आठ साधन-द्रव्यों के अलावा अन्य कोई साधन है ही नहीं, यह सत्य है और यही एक मात्र सत्य है। मुक्ति की एक यही युक्ति है, जो तपोभूमि मठ गड़वाघाट में श्रीसद्‌गुरुदेवजी महाराज द्वारा अपने प्रिय शिष्यों को बतायी जाती है।
प्रगटैं   गड़वाघाट  में,   गूढ़  ज्ञान  के  भेद ।
गुरु-मुरीद की रीति को, सद्‍गुरु पोषन देत ॥
आध्यात्मिक साधना केवल पवित्र वातावरण में ही संपन्न होती है, अतः साधक यह श्रेष्ठ वातावरण या तो स्वयं बनाता है या चुन लेता है। कलियुग में मानव की उम्र इतनी नहीं होती कि वह स्वयं ही अपने संस्कारों को परिशोधित करे, मुक्ति हेतु उचित साधना का आविष्कार करे और उस साधना हेतु एक ऐसे स्थान का विकास करे जो मुक्ति हेतु सभी साधनों से परिपूर्ण हो। इसके लिये तो मनुष्य को कई जन्म लेने होंगे और प्रत्येक जन्म में मुक्ति के दृढ़-संकल्प की निरंतरता होनी चाहिये लेकिन इस भटकाव भरे कलियुग में यह असंभव है।
श्रीसद्‌गुरु महाराज अपनी आध्यात्मिक शक्ति से साधकों की साधना को शीघ्र फलित करने हेतु ही इस तपोभूमि गड़वाघाट का निर्माण किया है। श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी की घोर तपस्या के कारण ही इस तपोभूमि में काम, क्रोध, लोभ और मोह आदि तत्त्वों को  विनाश करने की शक्ति उत्पन्न हुई है। श्रीसद्‌गुरु महाराज द्वारा निष्काम-भाव से चलायी गई गुरु-भक्ति की साधना से ही इस तपोभूमि में असीम शांति का प्रादुर्भाव हुआ है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के नाममंत्र की शक्ति के प्रभाव से इस तपोभूमि को मोक्ष-प्रदायिनी होने का गौरव प्राप्त है। इस तपोभूमि में आते ही मन में एक प्रसन्नता और चैतन्यता प्राप्त होती है और मन का सारा विषाद्‌, सारा दुःख, सारा दैन्य और सारा कष्ट समाप्त हो जाता है। इसके कण-कण में अद्भुत दिव्यता का वास है,  वातावरण में एक ओजस्वी प्रवाह है, यहाँ की वायु में आध्यात्मिक सुवास है और यहाँ के जल में अमृत जैसी शीतलता है। इस तपोभूमि में साधक को सैकड़ों वर्षों से साधना में लीन ऋषि-मुनियों, देवताओं, चिन्तकों और साधु-संन्यासियों का सत्संग प्राप्त होता है।

१०-०९-२०१६

भक्त-जीवन में सद्गुरु के द्वारा प्राप्त नाममंत्र का जप ही ब्रह्मविद्या प्राप्ति का सरल व सर्वोत्तम साधन है। जप का अर्थ है- श्रीसद्गुरु महाराज के नाममंत्र को श्वाँसों में आरोपित करना। इस मंत्र को जपने हेतु ठीक उसी विधि का प्रयोग करना चाहिये, जो दीक्षा के दौरान बतलायी गयी हो। इस मंत्र के जप में होठों व वाणी का प्रयोग नहीं होता है। नाम-जप के साथ-साथ मन में नाममंत्र के अर्थ का भी भाव लाना चाहिये। पातंजल योगसूत्र का कथन है-"तज्जपस्तदर्थभावनम्‌", अर्थात्‌ मंत्र का जप करते हुए उस मंत्र के अर्थ की भावना भी करनी चाहिये। जप के लिए कोई भी जगह अपवित्र नहीं है, इसीलिये गुरुमंत्र का जप हर समय एवं हर जगह किया जा सकता है। चूँकि स्वाँसों का संबंध अंतःकरण से होता है, इसीलिये स्वाँसों के माध्यम से इस नाममंत्र को अंतःकरण तक भेजने पर अंतःकरण इस नाममंत्र की गुरु-ऊर्जा द्वारा उजला होता जाता है। गुरुमंत्र की महिमा अवर्णनीय है। जगत् के समस्त विकारों का नाश करने के लिए सदगुरु-नाम ही जीवन-संजीवनी-सुधा है।
नाम बिना नाहीं होई कमवाँ हो गुरु बिना नाम न लखाय
नाम बिना न परमधमवाँ हो चाहे कोटिन करो उपाय
-दासनदास भजनमाला (श्रीमठ गड़वाघाट)

 ०९-०९-२०१६

सदगुरु के वचन ही साधना-वृक्ष के बीज हैं। यदि इन बीजों को साधक अंतःकरण रूप धरा में बोये, चिन्तन-मनन रूपी जल से सींचे तथा कुविचार रूपी पशुओं से बचाने हेतु यत्न द्वारा सुरक्षित रखे, तो उसे  परमपद की प्राप्तिरूप फल अवश्य प्राप्त होगा। जो गुरुवचनों को प्रेमपूर्वक हृदय में धारण करता है, वह अपने जीवनकाल में सदा सम्यक् प्रकार का सुख ही पाता है। सदगुरु द्वारा नाम-शब्द प्रदान करना अनंत दान है। वह नाममंत्र जीव के अनंत युगों के कर्मों को नष्ट कर डालता है। सदगुरु के शब्दजन्य ज्ञान से होने वाले पुण्य से अधिक फलदायी अन्य कुछ भी नहीं है। इस संसार में गुरु के शब्दों द्वारा ही जीवों का उद्धार होता है। जो उनकी सीख को श्रद्धापूर्वक हृदय में धारण करके उनकी सभी आज्ञाओं का तत्परता से पालन करते हैं, उनके शोक, मोह, चिंता, भय ऐसे भाग जाते है जैसे सूर्य उदय होने पर निशाचर। सद्‌गुरु महाराज का प्रत्येक वचन अनमोल है, अतः शिष्य को उनके प्रत्येक वचन को हृदय में सहेज कर रखना चाहिये।

०७-०९-२०१६

परमात्मा ने स्वयं को श्रीसद्‌गुरु महाराज के स्वरूप में साकार किया है और इसकी अनुभूति सिर्फ गुरुकृपा से होती है। इसीलिये कहा गया है कि " शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान।" श्रीसद्‌गुरु की शरण में जाकर उनकी बतायी युक्ति से साधना करके ही जीवन में प्रकाश भरा जा सकता है, अन्यथा अज्ञानता के अंधकार में ही जीवन बीत जाता है। गुरु ही जिज्ञासु की जिज्ञासा को शांत कर, उसे उसके जीवन का लक्ष्य समझाकर मुक्ति मार्ग पर चलाते हैं। श्रीसद्‌गुरु महाराज के वास्तविक स्वरूप को हमारी छोटी सी बुद्धि नहीं समझ सकती, वे अनहद हैं और उनका पार नहीं पाया जा सकता। उनके ज्ञान की थाह पाना असंभव है। श्रीसद्‌गुरु महाराज शाहों के शाह हैं। वे युगों-युगों से जीवों को इस भव से पार लगाते आये हैं। वे सर्वव्यापी ईश्वर हैं एवं सभी के दिल की बातों को जानने वाले अन्तर्यामी हैं। वे स्वयं नाम हैं और स्वयं नामी भी हैं, उनकी महिमा अवर्णनीय है। वे ही हमारे पालक हैं और सही मायनों में हमारे प्राणों के आधार भी वे ही हैं, उनके बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है।

०६-०९-२०१६

सेवा  सुमिरन  जप भजन, पूजा  दर्शन ध्यान ।
तरकीबें    गुरुदेव   की,  पाने   आतम  ज्ञान ॥
श्रीमठ गड़वाघाट के स्वामी श्रीसद्गुरु महाराज ने उपरोक्त दोहे में ब्रह्मविद्या को प्राप्त करने के उपायों को मंथ कर साररूप में कह दिया है। वे साधक जिन्होंने ब्रह्मरस की एक बूँद का भी रसास्वादन किया है, वे सद्गुरु महाराज द्वारा कहे गये उपरोक्त दोहे में छुपे संकेतों को समझ ही जायेंगे। श्रीसद्गुरु का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान भवरोग निवारण की अमोघ औषधि है, साधकों व शिष्यों के लिये परम अमृत है।

०५-०९-२०१६

गुरुदीक्षा एक ऐसी सीढ़ी है जिसके शिखर पर श्रीसद्‌गुरु विराजमान हैं और सबसे निचले तल पर शिष्य होता है। नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान इस सीढ़ी के पायदान हैं, जिसमें निरंतर चढ़ते हुए शिष्य सद्‌गुरु तक पहुँचता है, सद्‌गुरु को प्राप्त करता है। निःसंदेह महापुरुषों के पास भौतिक रूप से उपस्थित रहने से भी लाभ होता है, लेकिन सद्‌गुरु को प्राप्त करने का तात्पर्य इस भौतिक सान्निध्यता से नहीं है। नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान के द्वारा सद्‌गुरु से जुड़ना ही सद्‌गुरु की प्राप्ति है। अपना समय, शरीर, मन, ज्ञान, पुरूषार्थ एवं धन को लगाकर श्रीसद्‌गुरु को प्रसन्न करना एवं उनकी लोकमंगलकारी योजनाओं को सफल बनाना ही गुरु की बाह्यसेवा है। नाममंत्र का जप, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान से स्वयं को सदा गुरु से जोड़े रहना आंतरिक सेवा है। गुरुदीक्षा के द्वारा ही शिष्य को गुरुसेवा का सुनहरा अवसर मिल पाता है, वह अपने गुरु से अंतरंगता से जुड़ पाता है। परम तपस्वी श्रीसद्‌गुरु स्वामीजी चौंसठ कलाओं से सम्पूर्ण हैं, जिस शिष्य को उनकी दयादृष्टि प्राप्त हो जाती है, संपूर्ण प्रकृति उस सौभागी के लिये कल्पवृक्ष बनकर हर भाँति उसकी आकांक्षाओं को पूर्ण करने में लग जाती है।

०४-०९-२०१६

सच्चा शिष्य श्रीसद्‌गुरु से कभी दूर नहीं रह सकता है। जिस प्रकार परछाईं कभी वस्तु से दूर नहीं हो सकती, उसी प्रकार शिष्य भी श्रीसद्‌गुरु की शरण में ही रहता है। शिष्यों के लिए सद्‌गुरु से बढ़कर कोई वेद, शास्त्र अथवा ग्रंथ नहीं है। गुरु से बढ़कर कोई देवी-देवता नहीं है, श्रीसद्‌गुरु ही शिष्य के सर्वेश्वर होते हैं। शिष्य के लिए श्रीसद्‌गुरु के चरणों के अतिरिक्त कोई मंदिर या तीर्थ नहीं है। वह श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में सभी तीर्थों के दर्शन करता है। शिष्य को चाहिए कि वह हमेशा पुरुषार्थ करे यानी पूरी निष्ठा एवं भक्ति-भाव के साथ सदा भजन-सुमिरन करता रहे और पूरी श्रद्धा के साथ गुरु की सेवा करे। जब तक शिष्य के शरीर में प्राण हैं, वह गुरु की आज्ञापालन को परम धर्म समझे।

०३-०९-२०१६

समर्पण- श्रीसद्‌गुरु से पूर्ण अनुकूलन
हर प्रकार से श्रीसद्‌गुरु के अनुकूल रहना। जिन बातों से व कार्यों से श्रीसद्‌गुरु प्रसन्न हों वही कहना, सुनना चाहिये। जो बात गुरु को प्रिय लगे वही बोलो, वही करो और वही चीज सेवा में समर्पित करो। उन्हीं के चाहे अनुसार आचरण करना अनुकूलता है। अपना तन, मन, धन सर्वतोभावेन गुरु के चरणों में समर्पित कर देना चाहिये। यहाँ तक की उनकी मौज और अपनी इच्छा दोनों में भेद न रह जाय। जिस स्थिति में गुरु रखें, उसी में आनन्द लेना चाहिये।

०२-०९-२०१६

श्रीसद्‌गुरु भगवान्‌ की विनय प्रार्थना से साधना में सफलता और आत्मोन्नति प्राप्त होती है। सद्‌गुरु की प्रियता हेतु गुरुकृपा का अवलंबन आवश्यक है। श्रीसद्‌गुरु की संतुष्टि ही गुरुकृपा की जननी है और सद्‌गुरु के द्वारा प्राप्त नाममंत्र के भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन और ध्यान की साधना द्वारा गुरु को संतुष्ट करना ही सच्ची गुरुसेवा है। यह गुरु-साधना ऐसे सौभाग्यशाली शिष्यों को सिद्ध होती है, जो स्वयं को सद्‌गुरु के गुरुत्व से आपूरित कर लेते हैं। गुरु-साधना केवल मंत्र जपने की क्रिया नहीं है, अपितु यह अपने संपूर्ण अस्तित्त्व को पूर्ण रूप से श्रीसद्‌गुरु में समर्पित कर देने की क्रिया है। अपने दुष्चिन्तनों व कुसंस्कारों को समूल नष्ट कर, स्वयं में गुरुतत्त्व को प्रतिष्ठित करना ही यथार्थतः गुरु-साधना है। श्रीसद्‌गुरु द्वारा दीक्षा में दिया गया महामंत्र इस उपलब्धि में सहायक है। गुरुमंत्र की साधना आन्तरिक भावनाओं की शुद्धि करने के साथ-साथ उन उपायों को भी सुलभ करती है, जिनसे साधक अल्प समय में ही अपने लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं। गुरुमंत्र साधना की यही सार्थकता है।
गुरुमंत्र की साधना अर्थात्‌ भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन व ध्यान से भक्ति के अक्षय भंडार भरते चले जाते हैं और संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं बचता है। श्रीगुरुगीता में इसी तथ्य को शंकरजी ने माता पार्वतीजी से कहा है कि हे देवी! ’गुरु’ यह दो अक्षरवाला मंत्र सब मंत्रों में राजा है, श्रेष्ठ है। स्मृतियाँ, वेद और पुराणों का सार यह ही है, इसमें संशय नहीं है।
मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम् ।
स्मृतिवेदपुराणानां सारमेव न संशयः॥

१-०९-२०१६

शिष्य को चाहिये कि वह हर साँस में श्रीसद्‌गुरुदेव द्वारा बताया हुये नाम-मंत्र का यानी श्रीसद्‌गुरुदेव द्वारा दी गई दीक्षा में उपदेशित नाम-मंत्र का निरंतर भजन, सुमिरन तथा माथे पर श्रीसद्‌गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करे। यही वह युक्ति है जिससे भक्ति व मुक्ति की प्राप्ति होती है, जिसे समय के सद्‌गुरु ही बताते हैं। यही सन्तमत की साधना है, जिसे सुरत-शब्द-योग भी कहा जाता है।
 
३१-०८-२०१६
गुरु और उनके पूर्ण समर्पित शिष्य के बीच एक मधुर निकटता होती है। इस निकटता में ही शिष्य की जिज्ञासाओं के निवारण हेतु सद्‌गुरु महाराज की अमृतवाणी से निकले समाधान वचन के रूप में उपनिषद्‌  निर्मित होते हैं। बिना तर्क-वितर्क के खुले हृदय से गुरु के वचनों को ग्रहण करने से ही शिष्य की आध्यात्मिक प्रगति होती है, क्योंकि गुरु का हर वचन शिष्य के कल्याण के लिये ही होता है।
निग्रहेऽनुग्रहे वापि गुरुः सर्वस्य कारणम्‌।
निर्गतं यद्‌ गुरोः वक्त्रात्‌ सर्व शास्त्रं तदुच्यते।। - श्रीगुरुगीता,३०३
सबके निग्रह व अनुग्रह में केवल सद्‌गुरुदेव ही कारण हैं। सद्‌गुरुदेव के मुख से जो भी निकलता है, उस सबको शास्त्र ही समझना चाहिये।

२९-०८-२०१६

सुमिरन क्या है?
सुमिरन अर्थात्‌ मालिक को याद करना, सुध-बुध में केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज ही अवस्थित होना, निरंतर उनके दर्शन की प्यास, अपने सद्‌गुरु की छवि को अपने हृदय में बसाये रखना, अपने दिल में सद्‍गुरु की याद बनाये रखना, हर श्वास में केवल श्रीसद्‌गुरु महाराज की अभीप्सा, श्रीसद्‌गुरु महाराजजी को ही अपने जीवन का केन्द्र बना लेना, श्रीसद्‌गुरु महाराज की याद में सोना-जागना, उठना-बैठना, यही सुमिरन है।

२४-०८-२०१६

उपनिषद्‌ क्या हैं?
सद्गुरु के चरणों में बैठना सबसे बड़ी आध्यात्मिक साधना है।  गुरु के चरणों में बैठकर शिष्यत्व प्राप्त करने की कला प्राप्त होती है। जब शिष्य के हृदय में गुरु के चरणों में बैठने की ललक पैदा हो जाये, गुरु के ज्ञान वचनों को सुनकर हृदय में उतारने की कला आ जाये, तो शिष्य के अंतस् में शांति व आनंद के झरने स्वतः फूटने लगते हैं। ऋषियों ने इसी साधना को उपनिषद् का नाम दिया है।

Last Updated on Sunday, 23 September 2018 23:17