Hindi (India)English (United Kingdom)
मुखपृष्ठ लेख आध्यात्मिक सम्पदा का अक्षय स्त्रोत- गुरु-कृपा

Science of Sant Mat

  Science of Sant Mat ( As explained by my Sat Guru Shrimat Paramahansa Sarananandji ) The spirituality is the continuous process in which GOD refines HIMSELF. For this purpose HE incarnates in the ...

Read more

Contact for Initiation

Contact for Initiation Initiation is given by Sat Guru Shrimat Paramahansa Sarananandji Maharaj, HE is the present Guru of Sant Mat Anuyayi Ashrams. Devotee has to visit personally to ...

Read more

Objective

Mission 1. For spiritual aspirant to serve spritual path and peaceful atmosphere to elevate the spirituality .  liberating Self Knowledge to lead the ...

Read more
More in: Latest, Newsflash
आध्यात्मिक सम्पदा का अक्षय स्त्रोत- गुरु-कृपा पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
गुरुवार, 07 जनवरी 2010 19:40

आध्यात्मिक सम्पदा का अक्षय स्त्रोत- गुरु-कृपा-
(लेखक - श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस)
         आत्मा का आनंद तो गुरु कृपा से मिलता है। बुद्धिमत्ता से रस नहीं प्रगट हो सकता। गुरु कृपा प्राप्त करने पर साधक को जो आनंद प्राप्त होता है उसका अनुभव किसी वैज्ञानिक को कभी भी नहीं हो सकता। अपनी नई खोज या अविष्कार में सफल होने पर एक वैज्ञानिक को भी प्रसन्नता होती है, हर्ष होता है परन्तु तुष्टि नहीं होती। उसकी अपूर्णता बनी रहती है, कुछ नया खोजने और पाने की इच्छा बनी रहती है, भुख शांत नहीं होती क्योंकि उसका हर्ष अहं जनित होता है। इसके विपरीत साधक को जो आनंद प्राप्त होता है वह अहं-शून्य होता है, वह पूर्ण रूप से संतुष्ट होता है उसकी कुछ पाने की भूख मर चुकी होती है, वह पूर्ण होता है और तब उसे कुछ पाने के लिए शेष नहीं रहता। गुरु का सच्चा शिष्य जो आनंद लूटता है, महान्‌ वैज्ञानिक भी उससे परिचित नहीं हो पाता। जहाँ तक सुख की बात है, आज के युग में प्रचुर वैज्ञानिक सुख-साधन युक्त सामग्रियों से मनुष्य क्या सुखी है? किसी भी क्षेत्र में क्या उसे तृप्ति का अनुभव हो रहा है? वह और अधिक चिन्ताग्रस्त, दुखी तथा अशान्त है। इसलिए आध्यात्मिक क्षेत्र में गुरूकृपा से साधना से प्राप्त सुख नगण्य है, तुच्छ है। इष्ट कृपा से प्राप्त सुख के सामने त्रैलोक्य का साम्राज्य भी मूल्यहीन है। इसलिए सन्तवाणी है-
             " तीन टुक कोपीन की औ भाजी बिन लूण ।
           तुलसी हिए रघुवर बसें तो इन्द्र वापुरो कूण ॥"
भारत के स्वनामधन्य सन्त महापुरूषो में सन्त ज्ञानेश्वर जी का नाम बडा़ प्रसिध्द है। कई सौ साल पहले वे ब्रम्हलीन हो चुके हैं, पर आज भी उनका स्मरण करने से मन पवित्र हो जाता है\ ऐसे महापुरूष धन्य हैं। उनकी दया, उनकी उदारता और उनके आत्मप्रेरक प्रसंगो को पढ़कर, सुनकर लाखों लोग सन्मार्ग प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित होते रहते हैं। उनसा ही कोई जीवन्त सन्त महापुरूष मिल जाए तो लक्ष-लक्ष जीवो का उध्दार हो जाए। ऐसे ही सन्त महापुरूषों के कारण तो भारत को जगत्‌-गुरु कहा जाता है। संसार के सभी देशो ने अपनी-अपनी विशेष सम्पदा के कारण प्रसिध्दि प्राप्त किया है। इंग्लैण्ड वैज्ञानिक यंत्रो के लिए, अमेरिका अकूत धन के लिए, इतली शिल्प और कला के लिए, अरब देश उर्जा-स्त्रोत पेट्रोल के लिए प्रसिध्द है। भारत अपनी जिस विशेष सम्पदा के लिए विश्व में सर्वोच्च स्थान पर है वह सम्पदा उनके सन्त महापुरूषों की शाश्वत परम्परा है। हर देश की सम्पदा विशेष आज नहीं तो कल समाप्त होने वाली है परन्तु अपने देश की यह आध्यात्मिक सम्पदा अक्षुण्य है, अमर है। काल विशेष में इसकी ज्योति धूमिल हो सकती है परन्तु बुझ नहीं सकती; समय पाकर फिर पूर्ण प्रज्ज्वलित होकर संसार को ज्ञान का प्रकाश देती ही रहेगी। सबकी सम्पति बेचने और खरीदने की है परन्तु यह शाश्वत भारतीय आध्यात्मिक सम्पदा बेचने और खरीदने की वस्तु नहीं है, देने की है, बाँटने की है। यहाँ समर्पण चलता है, दान चलता है, सौदा नहीं। भारत का अजस्त्र ऊर्जा स्त्रोत यही सन्त परम्परा है, यही सनातन है, इसके अमरत्व का मूल कारण गुरु द्वारा अपने अनन्य भक्त शिष्य को दिया जाने वाला ज्ञान प्रकाश है। सन्त सद्‌गुरु अपार दयाशील होते हैं। वे सदा अपनी आध्यात्म शक्ति का दान करके अपने शिष्य को योगेश्वर बनाते रहते हैं। यही उनका प्रमुख कार्य है, उनकी दयाभरी वाणी कभी भी निष्फल नहीं जाती है।
( उपरोक्त लेख श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित "श्रीसद्‌गुरु-कृपा का महत्व" नामक साहित्य के अंश हैं।)

           

LAST_UPDATED2