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Science of Sant Mat

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गुरु तत्व पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
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बुधवार, 27 जनवरी 2010 22:51

गुरु तत्व
(लेखक - श्री श्री १०८श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस)

    ताते प्रथमहिं गुरु को खोजो ।
      शब्द बतावे सो गुरु सोधो ॥

अर्थात्‌ सर्वप्रथम यह काम करो कि ‍ऐसे गुरु की तलाश करो जो गुरु-शब्द व गुरु-मन्त्र के भजन, सुमिरन, सेवा, दर्शन, ध्यान यानी भक्ति योग का मार्ग बतला-बतला कर अध्यात्म की ओर अग्रसर करता रहे । कई स्थानो पर सन्तो ने स्पष्ट रूप से कहा है कि-
      गुर सोई जो शब्द सनेही,
                      शब्द बिना नहिं दूसर कोई ॥

सच्चा गुरु वही है जो शब्द सनेही है। दूसरे शब्दो में जिसने स्वयं शब्द का अभ्यास करके परम गति प्राप्त की हो और श्रीसद्‌गुरु के नाम मन्त्र-जप की साधना के सब भेदों को जानता हो तथा गुरु शब्दमार्गी हो। शिष्य को चाहिए ऐसे ही गुरु को धारण करे, क्योकि शिष्य के किए हुए पापों का भार गुरु ही उठाते है। जो गुरु शब्दगामी होते हैं और शब्द का अभ्यास औरों को कराते हैं वही शब्दमार्गी गुरु होते है। इसलिए सन्तो का कथन है-
        गुरु करे जान के, पानी पीवे छान के ॥
और-
        गुरु-गुरु में भेद है, गुरु-गुरु में भाव ।
        सोई गुरु नित बन्दिये, जो सबद बतावै दाव ॥

अपनी-अपनी जगह सभी साधु महात्मा बडे़ है, पर जो शब्द के विवेकी और पारखी हैं, वे सद्‌गुरु तो सिरमौर हैं। उनकी महिमा सबसे ऊँची है-  
           साधु साधु सब ही बडे़, अपनी अपनी ठौर ।
           सबद विवेकी पारखी, ते माथे के मौर ॥

ऐसे गुरु का शिष्य होना चाहिए जो नाम के, शब्द के यानी परानाम के सुमिरन की युक्ति बतावे। उनका ही भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा करके उनकी कृपा प्राप्त करने का सन्त परामर्श देते हैं। ऐसे गुरु ही अपने शिष्यों का पूरी तरह से कल्याण करते हैं।
        श्री सद्‌गुरु महाराज ही देहधारियों के धारण करने वाले, पालन-पोषण करने वाले तथा वे ही परम हितकारी हैं। श्रीसद्‌गुरुदेव महाराज ही सबकी गति तथा मति के स्वामी हैं। इस संसार में श्रीसद्‌गुरु से बढ़्कर जीव का कल्याण करने वाला दूसरा और कोई नहीं है।
        लोक-कल्याणकारी व्यास ने पहले तो पारमार्थिक जिज्ञासा के लिए अपने पुत्र को आशीष दी, तदन्तर श्रीगुरु-परम्परा से प्राप्त अनादि ज्ञान को कहना शुरू किया। उन्होंने बताया कि उनके श्रीसद्‌गुरु थे नारदजी और उनके गुरु के श्रीगुरु के श्रीगुरु साक्षात्‌ शिव थे। पांचरात्र में रात्र शब्द का अर्थ है ज्ञान और ज्ञान पाञ्चरात्र कहा गया है। ब्रम्हा और नारद के बीच चल रहे संवाद में ब्रम्हाजी ने नारद से कहा कि जिज्ञास्य तत्व श्रीसद्‌गुरु से ही मिल सकता है।
      गुरुरेव परं ब्रम्ह कर्णधार स्वरूपकः॥
श्रीसद्‌गुरुदेवजी ही परब्रम्ह है। वही शिष्य की नौका पार लगाने वाले कर्णधार है। इसमें भक्ति का सत्पात्र वही होता है जो श्रीसद्‌गुरु का भक्त हो। नारद पाञ्चरात्र में कहा गया है कि बुद्धिमान्‌ भक्त को निष्कपट और श्रद्धा भाव एवं शुद्ध मन से श्रीसद्‌गुरु की आध्यात्मिक उपासना व साधना करनी चाहिए। शिष्य को चाहिए कि वह अपने गुरु की पूरी निष्ठा से व श्रद्धा के साथ सेवा, पूजा तथा उनकी आज्ञा का पालन करते हुए कुछ काल तक उनकी शरण में रहकर सेवा करते-करते गुरु को प्रसन्न कर उनकी दया का अधिकारी बन जाए। यानी उनकी दीक्षा प्राप्त कर भजन, भक्ति में रत रहकर ही तो गुरु की कृपा दृष्टि प्राप्त होती है। इसलिए जैसे हरि में वैसे ही श्रीसद्‌गुरु में भी भक्ति-भावना रखने से चारो फलों अर्थात्‌ अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति के लिए शिष्य अधिकृत होता है।
         हे भाई ! सभी मनुष्यों के मष्तक में श्रीसद्‌गुरु का सूक्ष्मरूप से निवास होता है। वही गुरुतत्व प्रतिबिम्ब रूप में नररूपी श्रीसद्‌गुरु के रूप में प्रतिष्ठित है। शिष्यों की कामना से स्वयं वह गुरूतत्व श्रीगुरुरूप में उतर आता है। श्रीसद्‌गुरु के सन्तुष्ट होने पर श्री हरि सन्तुष्ट रहते है और हरि के सन्तुष्ट होने पर तीनों लोक अनुकूल रहते है। वस्तुतः श्रीगुरु ही ब्रम्हा, विष्णु, महेश्वर है। वही परम ब्रम्ह है, वही परात्पर है, फलतः वही परमपूज्य गुरुदेव हैं।
         गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
         गुरुः साक्षात्‌ परब्रम्ह तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

गुरु सक्षात भगवान है जो साधको के पथ प्रदर्शन के लिए साकार रूप में प्रगट होते है। गुरु का दर्शन भगवान का दर्शन माना जाता है। गुरु का भगवान के साथ योग होता है। गुरु अपने शिष्यों में भक्ति अनुप्राणित करते है। गुरु का साकार रूप में दर्शन सबके लिए परम पावनकारी माना जाता है। गुरु वस्तुतः परमात्मा और जीवात्मा के बीच की अमूल्य कडी़ है। गुरु वह सत्ता है जिसने अपने को त्वम्‌ यानी जीवत्व से तत्‌ यानी ब्रम्ह में उन्नत कर लिया है और इस प्रकार उसकी उभय लोकों में मुक्त तथा अबाधित पहुँच है। वह मानो कि अमरत्व की देहली पर खडा़ रह कर नीचे झुककर एक हाथ से संघर्षरत आत्माओं को उन्नत करता है और दूसरे हाथ से उन्हें नित्य स्थायी आनन्द तथा असीम सच्चित्‌ की परम सत्ता में ऊपर उठाता है।
    सद्‌गुरु साक्षात्‌ ब्रम्ह होते है। वे आनन्द, ज्ञान तथा करूणा के सागर होते है। वे अपनें भक्तो का नेतृत्व करने वाले है। वे सभी सुखो के स्त्रोत होते है। श्रीसद्‌गुरु अपने शिष्यों के समस्त कष्टों, क्लेशों, विषादों तथा बाधाओं को दूर करने वाले है। वे अपने भक्तों को सम्यक्‌ दिव्य पथ दर्शाते हुए आपके अज्ञानाचरण को विदीर्ण करते हैं, आपको अमर और दिव्य बनाते है और आप की निम्न आसुरी प्रवृति को रूपान्तरित करते है। वे आपको ज्ञान-रज्जु देते हैं और इस संसार सागर में डूबते समय आपका हाथ पकड़ कर बाहर यानी अपनी ओर खींच लेते हैं। वे गुरुरूप में भगवन्त है। आपके कर्णधार है। आपको पूरी श्रद्धा व निष्ठा के साथ उनके बताए हुए नाम मंत्र का भजन, सुमिरन सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान नियमित नियमानुसार करते रहना चाहिए और श्रद्धा के साथ-साथ सादर दण्वत्‌ प्रणाम करते रहना चाहिए।
             स्वरूपे स्थिरता लभ्या सद्‌गुरोः भजनाद्‌ यतः।
             अतः साष्टांग नत्याहं स्तुवन्नित्यं गुरुं भजे॥

श्रीसद्‌गुरु के स्वरूप में साधक की भावना भजन, पूजन, दर्शन करने से ही स्थिर हो सकती है। यह बात मेरी समझ में आ गई तो अब मैं नित्य श्रीसद्‌गुरुदेव महाराज को साष्टांग प्रणाम करता रहूँगा और उनकी स्तुति सदा-सदा करता रहूँगा और सदा-सदा सेवा करता रहूँगा।
         गुरु भगवान्‌ हैं, उनकी वाणी भगवद्‌ वाणी है। उन्हें उपदेश देने की आवश्यकता नहीं है। उनका सान्निध्य तथा उनकी संगति भी उन्नयनकारी, प्रेरणादायी तथा भावोत्तेजक है। उनका संग ही आत्मप्रबोधक है। उनके सान्निध्य में रहने से आध्यात्मिक शिक्षा का विकास होना ही है। सभी शिष्यों को श्रीसद्‌गुरु की अमृतवाणी को सुनने से, अध्ययन करने से, संतवाणी का अध्ययन करने से, आश्रम के सत्‌-साहित्य का अध्ययन करने से गुरु की महत्ता अंतर्जगत्‌ में प्रगट हो जायेगी।
        गुरु मोक्ष का द्वार है। वह इन्द्रियातीत सत्‌-चित्‌ का द्वार है किन्तु इस द्वार में साधक को ही प्रवेश करना है। गुरु सहायक है, वही इस द्वार में प्रवेश करने का उपाय बतायेगा, किन्तु व्यावहारिक साधना का वास्तविक कार्य-भार तो साधक के सिर पर ही है।
        जीव जो भी ज्ञान सीख सकता है, वह केवल मनुष्य शरीर से ही सीख सकता है। अतः श्रीसद्‌गुरुभगवान ही केवल मानव शरीर के द्वारा ही शिक्षा दे सकते हैं। आप अपने श्रीसद्‌गुरु में स्वकल्पित पूर्णता के मानवीय आदर्श को साकार होता हुआ पाते हैं। श्रीसद्‌गुरु वह आदर्श हैं जिसके अनुरूप आप अपना निर्माण करना चाहते है। आपका मन सहज ही यह स्वीकार कर लेगा कि ऐसी महान्‌ आत्मा आदर करने तथा श्रद्धा करने योग्य है।
          श्रद्धावान भक्त लखि लीजै ।
          ताको यह गुरु महिमा दीजै ॥
          परम रहस्य गूढ़ येहि जानी ।
          कहे न सबहिं प्रसिद्ध बखानी ॥
          भक्ति के साधन दिये । सद्‌गुरु करूणागर ॥
           श्रद्धा से सेवन करे । निश्चय हो निस्तार ॥

संत महापुरुषों की पावन संगति से शुभ विचार मिलते हैं । शुभ विचारों से शुभ संस्कार बनते हैं । शुभ संस्कारों से मन शुद्ध हो कर आत्मानंद को प्राप्त करने में समर्थ होता है । अतः संत महापुरुषों की संगति शुभ संस्कारों को बनाने के लिये अति आवश्यक है।
( उपरोक्त लेख श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित "श्रीगुरुतत्व एवं गुरु शिष्य संवाद" नामक साहित्य का अंश है।)






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