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Science of Sant Mat

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परा विद्या के दाता सद्‌गुरु पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
शुक्रवार, 05 फरवरी 2010 22:33

परा विद्या के दाता सद्‌गुरु (लेखक - श्री श्री १०८श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस)

यहाँ इस तथ्य को निःसंकोच स्वीकार करना चाहिये कि धर्म का मूल आध्यात्म है। आध्यात्मिक विभूतियों, सन्त-महापुरूषों की शिक्षायें, उपदेश और उनके आचरण ही धर्म के स्त्रोत हैं। चाहे हम उसे सन्त रहनी कहें, दैवी-संपदा कहें, चाहे बौद्ध धर्म का पंचशील या सम्यक्‌ जीवन कहें,या सभी पंथों में वर्णित सदाचार सम्बन्धी नियम कहें कोई अंतर नहीं पड़ता। सब मिलाकर जो सच्चा मानव धर्म है, वह हमें ॠषि, मुनियों, सन्त-महापुरूषों से ही प्राप्त हुआ है, हो रहा है और होता रहेगा। यह धर्म हमें संसार में अर्थ और काम में नियंत्रण रखकर जहाँ संसार को सुखद बनाता है वही हमारे चौथे पुरूषार्थ मोक्ष का प्रेरक होता है। धर्म के अनुसार संसार में मनुष्य अपनी कामनाओं से तुष्ट होकर अपने स्व की खोज की ओर प्रवृत होता है। वह तत्व रूप में जो है ,उसे प्राप्त करना चाहता है। तात्पर्य यह है कि बिना सन्त-महापुरूषों के  प्रत्यक्ष या परोक्ष दिशा-निर्देश के सांसारिक शिक्षा भी मानव समाज के लिए कल्याणकारी नहीं होती अपितु वह विध्वंसक हो सकती है। यह तो अपरा विद्या की बात है, आत्मसाक्षात्कार हेतु जो परा विद्या है, जिसे ब्रम्हज्ञान, तत्वज्ञान या तत्वदर्शन कहा जाता है, उसकी प्राप्ति तो केवल सन्त सद्‌गुरु द्वारा ही हो सकती है। उसके लिए एक गुरु जिसे सद्‌गुरु कहा जाता है, उनकी शरण में जाना अनिवार्य है, प्रायः सभी मत-पंथ इस बात से सहमत हैं।
        जब अपरा या सांसारिक विद्याओं को प्राप्त करने के लिए सीख देने वालों या शिक्षा देने वालों की आवश्यकता होती है तथा यह मान्य है कि बिना गुरु के किसी भी विषय का ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता तो भला जो सर्वोच्च विद्या है उसके लिये गुरु की अनिवार्यता सहज ही स्वीकार करने योग्य है। सांसारिक विद्यायें जितनी हैं आंशिक हैं, खण्ड-खण्ड हैं, तथा उनमें पारंगत होने के बाद भी सब कुछ जान लेने की इच्छा पूरी नही होती, अतृप्ति बनी ही रहती है। पर जो परा विद्या है, ब्रम्हज्ञान है वह पूर्ण है, उसे जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है, उसका ज्ञान तृप्त ज्ञान है। यहीं नहीं उसे जान लेने पर जानने वाला वही हो जाता है। आत्मज्ञानी स्वयं परमात्मा हो जाता है। कहा गया है--
                                                       प्रज्ञानं ब्रम्ह
इसी को रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रकार व्यक्त किया है-
      सो जानै जेहि देहु जनाई । जानत तुमहिं तुमहिं होइ जाई ॥
अपरा विद्या के क्षेत्र में कोई कितना बडा़ विद्वान्‌ क्यों न हो वह ज्ञानमय नहीं हो सकता, केवल परा विद्या का पारंगत ही "प्रज्ञानं ब्रम्ह" रूप होता है वही यह कहने का अधिकारी होता है कि--
                                                   अहं ब्रम्हास्मि
पराज्ञान इन्दियों का नही आत्मा का विषय है, इसमें पुस्तकें, प्रवचन तथा अन्य कोई भी साधन सफल नहीं होता। जो आत्मज्ञान प्राप्त कर चुका है, आत्मरूप हो चुका है, वही इस विद्या को दान करने का अधिकारी होता है, उसी की शरण में जाकर उसकी प्रार्थना और सेवा से प्रसन्न करके ही उसे पाया जा सकता है।
             मनुष्य को उसका स्वरूप पहचान  कराने वाली, उसको नया आध्यात्मिक जीवन प्रदान करने वाली यह पराविद्या संजीवनी शक्ति है जो पुस्तको या अन्य सांसारिक ज्ञान के साधनो द्वारा नहीं मिल सकती। यह देह या इन्द्रिय का विषय नहीं है, यह विषय देहातीत है, इन्द्रियातीत है, आत्मिक है, अतः इसे एक आत्मा दूसरी आत्मा से सीख सकती है सीखने वाला जीवात्मा है तथा सिखाने वाला नरदेह में सगुण रूप से विद्यमान परमात्मा है जिन्हें सद्‌गुरु कहा जाता है! इस विद्या की प्राप्ति सद्‌गुरु के अतिरिक्त किसी से भी संभव नहीं है। कठोपनिषद्‌ कहता है--
                                 नयनात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
                                 यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम॥    
         
अर्थात यह परमात्मा प्रवचन, बुद्धि अथवा श्रवणादि द्वारा प्राप्त नहीं होता अपितु यह जिसे अनुग्रह पूर्वक स्वीकार कर लेता है उसी के द्वारा प्राप्त हो सकता है; क्योकि वह साधक को अपना स्वरूप दिखा देता है। अर्थात जिस तत्वदर्शी में परमात्मा स्वयं विराजमान है ऐसे सद्‌गुरु से ही ब्रम्ह विद्या प्राप्त की जा सकती है।
              जिसके पाने से अपने स्व का विवेक जागृय होता है, अखण्ड शांती का अनुभव किया जा सकता है, परमानन्द में विहार किया जा सकता है उसकी प्राप्ति बिना सद्‌गुरु कृपा से कैसे संभव है। अपने अनंत अखण्ड जीवन को पहचाने तथा क्षणभंगुर संसार के विषय-विकारों से छुटकारा पाने के लिए सद्‌गुरु के नाम का जप और उनकी बताई विधि के अनुसार साधना, सेवा करने से ही परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करने की युक्ति मिलती है। परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करना सद्‌गुरु से ही तादात्म्य स्थापित करना या उन्हीं का रूप हो जाना है। उनकी ही महती कृपा से यह संभव है। कहा है--
                              दुर्लभ नर तन पाई के कर ले सद्‌गुरु ध्यान ।
                              सेवा पूजा अर्चना पा ले आतम ज्ञान ॥

परमपिता परमात्मा श्री सद्‌गुरु द्वारा प्रदत्त मनुष्य शरीर को प्राप्त करके इस अनमोल सुन्दर अवसर को, अपने मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने में लगा देना चाहिये। ऐसा करने से लौकिक जीवन आनन्दमय हो जाता है और परलोक भी सँवर जाता है। सन्त महापुरूषों का कहना है कि मनुष्य को चाहिये कि अपने लक्ष्य को हर समय अपने सामने रक्खे तथा यह तय करे कि जीवन को किस लक्ष्य की ओर ले जाना है। जब तक यह तय नहीं कर लिया जाता है कि मुझे कहाँ जाना है तब तक मार्ग चयन की चर्चा ही निरर्थक रहती है। निरूद्देश्य भतकते रहना मनुष्य जीवन के लिये आत्मघात के समान है। प्रकृति के प्रवाह में अन्धे होकर बहते रहना ईश्वरीय वरदान स्वरूप प्राप्त मानव जीवन को पशुतुल्य बना देना है। ऐसा लक्ष्यहीन जीवन बिताने वाला व्यक्ति अपने मनुष्य तन से अपने लोक परलोक सुधारने और सँवारने के अवसर से वंचित होकर, सांसारिक बाधाओं से त्रस्त होकर व्यर्थ ही काल, कर्म और ईश्वर को दोष देता फिरता है। रामचरित मानस में भगवान ने स्वयं कहा है--
                               सो परत्र दुख पावै सिर धुनि धुनि पछताय ।
                               कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं मिथ्या दोष लगाय ॥

जीव का मुख्य उद्देश्य परमात्मा को प्राप्त करना है, जिसका वह स्वयं अंश है। अपने अंशी से एक रूप हो जाना ही उसकी मंजिल है। यही उसका केन्द्र बिन्दु है। अभिप्राय यह है कि अपनी मंजिल पर पहुँचने के लिये अपने ध्यान को भी लक्ष्य पर केन्द्रित करना पडे़गा। लक्ष्य कैसे प्राप्त होगा? यह स्थूल चक्षु जब अपने ध्यान की समस्त धारा को भीतर की ओर मोड़कर श्री सद्‌गुरु के भजन, सुमिरन,सेवा, पूजा में लगा देगा तो यही स्थूल रूप में परमात्मा (सद्‌गुरु) अपने सूक्ष्म वास्तविक रूप या आत्मज्योति का दर्शन करा देगा। परमात्मा सूक्ष्म सत्ता से साकार श्री सद्‌गुरु के रूप में स्थूल देह इसलिये धारण करते हैं कि इस स्थूल रूप की ज्योति के भजन, सुमिरन से  सूक्ष्म ज्योति को भी देखा जा सके। जब श्री सद्‌गुरु के स्थूल रूप की पावन ज्योति हृदय में जग जाती है तो परमात्मा की ज्योति के दर्शन हो जाते हैं। कबीर साहब कहते हैं--
                                मूल ध्यान गुरु रूप है पूजा मूल गुरु पांव ।
                                मूल मंत्र गुरु वचन है मूल सत्य सतभाव ॥

       यदि परमात्मा की ज्योति देखने की अभिलाषा है तो श्री सद्‌गुरु का ध्यान ही मूल मंत्र है; उपासना के लिये सद्‌गुरु चरण की सेवा ही मूलपूजा है, आचरण के लिये सद्‌गुरु का वचन ही मूलमंत्र है, गुरु का नाम ही जपनीय है तथा सद्‌गुरु में सत्‌भाव या परमात्मभाव बनाये रखना ही सत्यभाव है।
        मानव स्वभाव की यह विशेषता है कि जिस ओर उसका ध्यान केन्द्रित हो जाता है वही स्वप्रावस्था अथवा उनींदी या जागृत अवस्था में आकार के रूप में आँखो के सम्मुख घूमते दिखाई देता है। जब स्मपूण ध्यान एकमेव उसी पर केन्द्रित कर दे तो  वही आकार या मूर्ति वास्तविक रूप से स्पष्ट दिखाई देना आरम्भ कर देती है, यहाँ तक कि कई बार एकरूपता की स्थिति भी बन जाती है। इसी प्रकार ध्यान की क्रिया के सतत अभ्यास से सद्‌गुरुदेव का साकार रूप दिखाई देने लगता है। आध्यात्मिक साधना की यह महान उपलब्धि है।
        श्रीसद्‌गुरु से बढ़कर और कोई नहीं है। वही अपने स्वरूप में परमात्मा का मिलाप कराते है। वे स्वयं हरि है, ब्रम्ह ज्ञान प्राप्त स्वयं परब्रम्ह है, अपने सूक्ष्म सत्स्वरूप में वे ही अलख अगम तथा अगोचर हैं। वही मूल सार है उन्हीं को प्राप्त करना है। अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक मात्र उन्हीं की आवश्यकता है। अतः हर जिज्ञासुओं के लिए ब्रम्हवेत्ता आचार्य अथवा श्रोत्रिय ब्रम्हनिष्ठ श्री सद्‌गुरु की शरण में जाकर उनकी कृपा प्राप्त करना परम आवश्यक है। सन्त बसनाजी कहते है--
                               संगत कीजै सन्त की जिनका पूरा मन ।
                               अनमोल ही देत है नाम सरीखा धन ॥  

शरीर के जीवन-यापन चलाने, उसकी रक्षा और चतुर्दिक विकास हेतु अनेक प्रकार की विद्याओं तथा कलाओं की शिक्षा देने के लिए एक नही अनेक गुरु मिल जाते हैं, धनादि सांसारिक साधन भी सहायक होते है, परन्तु आध्यात्मिक विकास के लिए पराविद्या की शिक्षा देने वाले मात्र एक गुरु ही होते है, जिन्हें दीक्षागुरु या सद्‌गुरु कहा जाता है। पारब्रम्ह का साक्षात्कार परमात्मा बन चुकी प्रज्ञावान आत्मा से ही होता है। जैसे जलते हुए दीपक से दूसरा दीपक जलता है वैसे ही अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित जागृत आत्मा से सोई हुई आत्मा जगाई जाती है।
इसलिए आध्यात्मिक मार्ग के जिज्ञासु के लिए आवश्यक है कि वह ऐसे ही महापुरूष से दीक्षा ग्रहण करे जिसे स्वयं आत्म दर्शन हो चुका हो। जिसने स्वयं ब्रम्ह साक्षात्कार कर लिया हो। ऐसा ही परमसन्त दीक्षा गुरु बनने का अधिकारी होता है।
       मूलतः परमात्मा ही जो हमारी घट में रम रहा है हमारा वास्तविक गुरु है। दुर्भाग्यवश  आँखें होते हुए भी हम उसे देख नही पाते और कान होते हुए भी उसकी आवाज सुन नहीं पाते। यह आन्तरिक गुरु हर समय  हमें सचेत किया करता है परन्तु अपनी कामनाओं और आसक्तियों के शोरगुल में हमें उसकी आवाज नहीं सुनाई देती। इस सांसारिक भाग दौड़ और शोरगुल में  इस प्रकार की अन्तर्ध्वनि न सुनाई देना स्वाभाविक भी है। हमें वही सुनाई देगा जो बाहर से कान में पडे़। इसलिए साकार या शरीररधारी गुरु की आवश्यकता है। ऐसा गुरु यद्यपि शिष्य से पृथक प्रतीत होता है तथापि उसकी आवाज ही हमारी आत्मा की आवाज है। उसके द्वारा हम अपनें भीतर रमे परमेश्वर की ही आवाज अपने कान से सुनते हैं। सद्‌गुरु ही हमारे आत्मा के रूप हैं। इसलिए कहा गया है--
                          सद्‌गुरु सिष की आत्मा सिष सद्‌गुरु की देह ।
                          लखा जो चाहे अलख को इनही में लख लेय ॥

यदि हमारे ह्रदय के द्वार बिल्कुल ही बंद न हों तो ऐसे वचन हम स्वाभावतः ही पहचान लेते हैं। हमारे दिल की गहराईयों में वह तत्व मौजूद है जो कि ऐसे वचन की सत्यता समझ जाता है क्योकि यह वचन ऐसे तत्वदर्शी के मुख से निःसृत हो रहा है जो स्वयं हमारी अन्तरात्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप है। ऐसे सद्‌गुरु की प्राप्ति परम सौभाग्य की बात है।       
  ( उपरोक्त लेख श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित "श्रीसद्‌गुरु‍-कृपा का महत्व" नामक साहित्य का अंश है।)

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