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सद्‌गुरुप्रदत्त महामन्त्र "नाम" अमोघ है पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
मंगलवार, 30 मार्च 2010 12:31

सद्‌गुरुप्रदत्त महामन्त्र "नाम" अमोघ है
(लेखक - श्री श्री १०८श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस)

           श्री सद्‌गुरु का दिया हुआ "नाम" ही तारक मन्त्र है, यही ब्रम्हमन्त्र या महामन्त्र है। यह सभी सुखों की खान है, सभी कामनाओं को पूरा करने वाला है। आदि काल से लेकर अब तक सभी सन्त महात्माओं ने इस मन्त्र के सहारे इस अगाध संसार सागर को सहज ही पार किया है। सद्‌गुरु द्वारा प्रदत्त इस "नाम" को हर स्वाँस से जपते हुये इष्ट के रूप का ध्यान माथे पर करने का विधान है। धर्म ग्रन्थों में इसी स्थान को जहाँ इष्ट के रूप का ध्यान किया जाता है, काशी भी कहा गया है। रामचरित मानस में कहा गया है--
            मुक्ति जन्म महि जान ज्ञान खानि अघ हानि कर ।
            जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइय कस न ॥

भगवान शंकर ने स्वयं इसी काशी का सेवन किया है तथा इसी काशी में स्थित होकर मन्त्र के द्वारा उपदेश देकर जीवों को काशी में मुक्ति प्रदान करने का अधिकार प्राप्त किया है।
            महामन्त्र जेहि जपत महेसू । कासी मुकुति हेतु उपदेसु ॥
यहाँ भी काशी भौतिक काशी न होकर जहाँ सद्‌गुरु के स्वरूप का ध्यान होता है वही काशी या त्रिकुटी से मतलब है। यह मन्त्र सामान्य शब्द या संज्ञा न होकर पूर्ण रूप से सजीव है, चेतन है। सगुण परमात्मा सद्‌गुरुदेव के श्रीमुख से निःसृत यह "नाम" ही शब्द ब्रम्ह है, यह अमरबीज होता है। जिस भाग्यशाली के कान में पड़ जाता है, उसका फिर कभी नाश नहीं होता।
यह मन्त्र अमोघ मन्त्र है, इसे गुरु कृपा से पा लेने पर मुक्ति सुनिश्चित हो जाती है । निरंतर अखंडित साधना में लगे साधक जहाँ एक ही जन्म में मुक्ति लाभ कर लेते है, वहीं यदि किसी साधक की साधना में कमी रही तो कदाचित्‌ दूसरे या आगे के जन्मों में मुक्ति प्राप्त हो, परन्तु उसे इसी मन्त्र द्वारा एक न एक दिन भव वारिधि के पार जाना ही है , इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नही है।
          यह मन्त्र महा दयावान मन्त्र है। इसके भजने से परमात्मा सद्‌गुरुदेव प्रसन्न होकर भजन करने वाले को इस लोक में सुख तथा परलोक में भी सुख देते है, ज्ञान, भक्ति प्रदान करके उसे सांसारिक बंधनो से मुक्त करते है। यह मन्त्र पाप नाशक मन्त्र है, यह भव रोगो की अचूक औषधि है, इसके जप के प्रभाव से अपराध वृत्ति के लोग भी साधु बन जाते है। सद्‌गुरुदेव अपनी कृपा से इस मन्त्र के साधक को अपने दिव्य धाम में पहुँचा देते है। जिसने भी इस मन्त्र के साथ सद्‌गुरुदेव के रूप को ह्रदय में स्थायी रूप से बसा लिया, सद्‌गुरु धाम में उसकी पहुँच सुनिश्चित है। सन्त ने कही है--
                सतगुरु चढ़ गइलैं जेकरी नजरिया में।
                ते पवलैं मौज अगमपुर कचहरिया में ॥

जिस साधक के मन में सद्‌गुरु के प्रति अगाध प्रेम और अचल श्रद्धा हो जाये तथा उनके महामन्त्र "नाम" के भजन सुमिरन में निरंतर तल्लीनता आ जाय तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है। संसार में रहते हुये भी कमल पत्र की भांति सांसारिकता से अलिप्त रहते हुये सम्सत दुखो से निवृत्त होजा है। जिन कारणों से मनुष्य क्षणभंगुर भौतिक सुखों का भोग करता है वे तो प्रत्यक्ष दिखाई देते है, परन्तु गुरु भक्त जिस अलौकिक शाश्वत सुख की अनुभूति में मगन रहता है वह सुख किसी कारण या क्रिया से नहीं होता वह स्व सुख है। वही आत्म सुख है जो शाश्वत है। यह सुख सद्‌गुरु की भक्ति से ही प्राप्त होने वाला है। इसी से भक्ति को सुख की खानि कहा जाता है। इसकी पुष्टि अनेक स्थलों पर हुई है, जैसे-
                भगति सुतंत्र सकल सुख खानी ।
                      *    *    *
                सब सुख कानि भगति तै मांगी ।

इसी से भक्तो ने जहाँ गुरु के प्रसन्न होने पर उनसे वरदान पाने का संकेत पाया है तो उन्होंने तीनों लोकों का राज्य , सभी लौकिक , पारलौकिक संपदायें यहाँ तक की मुक्ति की भी कामना नहीं की, केवल उन्होंने सद्‌गुरु की भक्ति की ही याचना किया है। जैसे-        
               भक्ति दान मुझे दीजिये गुरुदेवन के देवा हो ।
                चरण कमल बिसरौं नहीं करिहौं पद सेवा हो ॥
                आठ सिद्धि नौ निद्धि हो बैकुंठ निवासा हो ।
                 सो मैं कछू न मांगऊ मेरे समरथ दाता हो ॥
                 सुख सम्पति परिवार धन सुन्दर बर नारी हो ।
                 सपनेहु इच्छा न उठे गुरु आन तुम्हारी हो ॥  

सच्चे नाम साधक को गुरु की भक्ति,उनकी सेवा,भजन,सुमिरन ही संसार की सर्वश्रेष्ठ संपदा है। इसमें उन्हें जिस दिव्य आनंद की अनुभूति होती है वैसा सुख अन्यत्र कहीं नहीं  उपलब्ध हो सकता। गुरु की भक्ति के अतिरिक्त उनके ह्रदय में कोई कामना शेष नही रहती। गुरु भक्ति में जो सुख है उसकी तुलना में सब सांसारिक सुख मिलकर भी नगण्य है तब फिर भला गुरु भक्त अन्य भौतिक सुखों की ओर आँख उठाकर क्यों देखे ? सद्‌गुरु के सानिध्य में जो अनुपम सुख है , उनकी अमृतमयी वाणी सुनने से जिस शांति और आनंद की प्राप्ति होती है उसे अन्यत्र कहाँ पाया जा सकता है। सत्संग ही में सुख है। यह कभी कम नहीं हो सकता निरंतर बढ़ता रहता है। हम गुरुदेव का जितना दर्शन पाते हैं, उनकी सुधामयी वाणी का जितना श्रवण करते हैं, उनके प्रति प्रेम उतना ही प्रगाढ़ हो जाता है, भक्ति दिन-दिन विकसित और विमल होती जाती है, उसी प्रकार आन्तरिक सुख में भी वृद्धि होती जाती है। इस सुख में एक व्याकुलता भी होती है, वह भी दुखद नहीं सुखद ही होती है। यह व्याकुलता इस बात की होती है कि यदि एक क्षण के लिये भी गुरुदेव का ध्यान छूट गया तो ह्रदय उद्विग्न हो जाता है। दर्शन पाने के लिये मन मचला करता है, कब दर्शन मिले इसकी आतुरता बनी रहती है। जब सद्‌गुरु के चरण कमल की ओर इस प्रकार का खिंचाव हो जाय तो प्रकाश की ओर दौड़ते हुये पतंग के समान मन की दशा हो जाती है। यह भी प्रभु की कृपा ही है। ह्रदय को सद्‌गुरु के चरण कमल की छ्त्र छाया के अतिरिक्त सभी भौतिक सुख पीडा़दायक लगने लगते हैं। सद्‌गुरु की शरण में प्राप्त होने वाले परम आनंद को छोड़कर कौन ऐसा नादान होगा जो पारसमणि को छोड़कर कौड़ियों से प्यार करेगा। साधक का मन हर समय गुरु के चरण कमल का भ्रमर बना रहता है। वास्तव में भक्ति का मार्ग, जैसा रामचरित मानस में कहा गया है "सुलभ सुखद मारग यह भाई" आद्योपान्त सुख से भरपूर है। साधना भी सुखमय है और परिणाम भी परमसुख ही है।
           जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति हेतू सद्‌गुरु शरण में जाना अनिवार्य है। इस मानव जीवन के परमलक्ष्य की प्राप्ति हेतू सद्‌गुरु की परम आवश्यकता है। जिस प्रकार मुक्तिदाता एकमेव सद्‌गुरु हैं उसी प्रकार सद्‌गुरु द्वारा प्रदत्त महामन्त्र "नाम" ही एकमेव मन्त्र है। जिससे संसार सागर से पार जाया जा सकता है। मन्त्र तो । इन मन्त्रो को सिद्ध करने  के उद्देश्य भी अलग-अलग हैं। सर्प कतने, बिच्छू के डंक मरने, रोगग्रस्त होने पर मन्त्र से झाड़-फूँक करके कष्ट कम करने या जीवन रक्षा करने के बहुत से मन्त्रों द्वारा उपचार के उदाहरण हमें नित्यप्रति देखने को मिला करते हैं। इसके अतिरिक्त किसी को वश में करने, शत्रु को समाप्त करने, युद्ध में विजय प्राप्त करने, पद, प्रतिष्ठा, समृद्धि प्राप्त करने के भी मन्त्र होते हैं, जिनको साधने से इच्छित फल की प्राप्ति हो सकती है। देवताओं को प्रसन्न करके उनसे वरदान प्राप्त करने के भी मन्त्र होते हैं। परन्तु ये जितने भी मन्त्र होते हैं, उनका एक ही उद्देश्य है वह है सांसारिक सुख भोग की प्राप्ति या भोग मार्ग में आने वाली बाधाओं से छुटकारा। कुल मिलाकर इन मन्त्रों की सिद्धि से सांसारिक बन्धन छूट्ने की अपेक्षा और कसते जाते हैं। इनसे दुखों का क्षणिक निवारण भले ही हो जाय, सुख की जो शाश्वत स्थिति है उसका स्पर्श भी नहीं हो पाता। ये सभी मन्त्र-तन्त्र सांसारिक माया जाल में फँसाने वाले हैं। इस माया जाल से छुट्कारा दिलाने वाला एकमात्र सद्‌गुरु द्वारा प्रदत्त महामन्त्र "नाम" ही है। अन्य मन्त्रों की भाँति इसे उच्चारित नहीं किया जा सकता इसलिए इसे गुप्त मन्त्र भी कहा जाता है। इस साधना को गुह्य साधना कहा जाता है। इसे स्वाँस से जपा जाता है और अभ्यास दृढ़ हो जाने पर सुरति द्वारा जपे जाने पर यह आत्म जप हो जाता है। अतः इस मन्त्र का संबध संसार या शरीर से न होकर सीधे आत्मा से ही है, इसलिये इसे दयालु दाता भी परमात्मा के सगुण स्वरूप श्रीसद्‌गुरु ही होते हैं। क्योंकि आत्मा का उद्धार परमात्मपद पर प्रतिष्ठित आत्म द्वारा ही संभव है।
                महामन्त्र "नाम" का अनुच्चरित, स्वाँस या सुरति से जप और साथ ही इष्ट सद्‌गुरु के भ्रूमध्य में ध्यान की साधना ही गुप्त साधना है। इस साधना का संबल सद्‌गुरु में अचल विश्वास और उनके प्रति ह्रदय में निर्मल, निःस्वार्थ प्रेम ही है। यही भक्ति योग है, यही राज योग है जिसके विषय में गीता में कहा गया है--
                        राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌ ।
                         प्रत्यक्षावगमं धमर्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌ ॥

अर्थात्‌ यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनियों का राज, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल वाला, धर्म युक्त, साधना करने में बडा़ सुगम और अविनाशी है। सुख देने वाला है।
                     आत्मोद्धार का साधन होने के कारण आत्मा से संबद्ध इस महामन्त्र नाम के जप का फल भी आत्मिक होता अहि जैसे आत्मा का विकास, आत्मारोहण तथा अन्त में आत्मसाक्षात्कार या सद्‌गुरु में विलय। इससे कभी सांसारिक फल की कामना नहीं करनी चाहिये, न ही इस प्रकार की किसी कामना से युक्त होकर इसकी साधना करनी चाहिये। कभी-कभी यह प्रश्न उठता है कि जब यह साधना पूर्णरूप से एकान्तिक है, इसका फल संसार से विरक्ति है, तो यह भी संभव है कि इसके साधक को संसार के सुखों से वंचित रहकर कष्टप्रद जीवन बिताना पड़े। ऐसा सोचना नितान्त भ्रम हैं। जिन क्षणभंगुर, दुख परिणामी सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिये लोग अनेक प्रकार की युक्ति करते है, कठिन साधन करते है वे सभी सुख बिना इच्छा किये ही गुरु भक्त को प्राप्त हो जाते हैं। परमात्मा को सच्चिदानन्द कहा जाता है, परम-तत्व में सत्‌ (अमरत्व), चित्‌ (ज्ञान) और आनंद तीनो अपनी परम अवस्था में समाविष्ट हैं। उसके सत्‌ में संपूर्ण काल समाया हुआ है, उस सर्वज्ञ में सभी ज्ञान समाये हुये हैं। जैसे सभी जीव एक परम तत्व के अंश हैं उसी प्रकार सभी सांसारिक क्षण भंगुर सुख भी उसी परमानंद के अंश मात्र हैं। अंश अपूर्ण होता है परन्तु पूर्ण में अंश समाया रहता है । अतः गुरुभक्त के आत्म सुख में सभी सुख अपने आप समाये रहते हैं, वे अन चाहे प्राप्त होते रहते हैं।
                        आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌ ।
                         तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

                                                                                                        -गीता,२\७०
 जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुये समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरूष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किये बिना समा जाते हैं, वही पुरूष परम शांति को प्राप्त होता है; भोगों को चाहने वाला नहीं ।
          कहने का तात्पर्य यह है कि "नाम" के भजन, सुमिरन का वास्तविक फल आत्मोद्धार है परन्तु जिन्हें हम सांसारिक सुख समृद्धि कहते हैं वह भी "नाम" साधक को अतिरिक्त फल के रूप में प्राप्त हो जाते हैं, फिर भी उन समृद्धियों और सुखों से गुरुभक्त प्रभावित नहीं होता, विचलित नहीं होता। सांसारिक सुख समृद्धि जहाँ सामान्य जन के लिये बंधन का कारण बनती है वहीं गुरुभक्त की सेवा में वे स्वयं अपने को पवित्र बनाती हुयी धन्य हो जाती है।
सद्‌गुरुदेव परम दयालु होते हैं, उन्होनें अपने महामन्त्र "नाम" की साधना को इतना सरल और सुखद इसलिये बनाया है कि हमारे समान अल्पज्ञ, निर्बल जीव भी उसे कर सकें। जैसा पहले कहा गया है संसार में जितने भी मन्त्र है, सबको साधने की कठिन प्रक्रियायें होती हैं, उसके विधान होते हैं, जप का निश्चित समय तथा आसन भी होते हैं। परन्तु इस आत्मोद्धारक एकमात्र तारक मन्त्र का कोई निश्चित स्थान नहीं, निश्चित समय नहीं,हर समय, हर स्थान, हर स्थिति में किया जाता है, इसमें स्थान की पवित्रता, अपवित्रता का विचार नहीं किया जा सकता क्योकि जो परम पवित्र है, उसके समीप जो कुछ भी होगा पवित्र ही हो जायेगा। इसलिये यह सर्वग्राह्य और सदा सुखद है। अन्य मन्त्र को साधनें में उसके विधान के विपरीत यदि कुछ हो जाय तो इतना ही नहीं होता कि इच्छित फल की प्राप्ति न हो अपितु उसका उल्टा परिणाम या दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है। परन्तु महामन्त्र नाम को जप का परिणाम सदा कल्याणकारी ही होता है। प्रेम, श्रद्धा के साथ भजने से तो संसार का सर्वोतम सुख प्राप्त होता ही है यदि कुभाव, आलस्य, अनख के साथ भी जप होता रहे तो कभी भी इसका दुष्परिणाम नहीं होता, उसमें भी साधक का कल्याण ही होता है। कहा गया है--
               भाव कुभाव अनख आलसहू । नाम जपत मंगल दिसि दसहू ॥
     भक्ति सभी सुखो का भन्डार है उसमें किसी प्रकार के कष्ट की कल्पना करना ही व्यर्थ है । किसी सन्त ने कहा है---
                भरपूर सुख से केवल है भक्ति । यही भव तारन की एक युक्ति ॥                                                                 
 
 ( उपरोक्त लेख श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित "श्रीसद्‌गुरु‍-कृपा का महत्व" नामक साहित्य का अंश है।)

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