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शाश्वत गुरु-परम्परा गुरुकृपा का सतत प्रवाह है पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
शनिवार, 03 अप्रैल 2010 11:06

शाश्वत गुरु-परम्परा गुरुकृपा का सतत प्रवाह है
       (लेखक - श्री श्री १०८श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस)
           भौतिक दृष्टि से पिता का उत्तराधिकारी होने के कारण पुत्र अपने माता-पिता का प्यारा होता है। सच्चा शिष्य तो सद्‌गुरु का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी होता है। वह अपने परमपिता गुरु का  कितना प्यारा होता है इसका वर्णन किया ही नहीं जा सकता। पुत्र-पिता कभी एक नहीं हो सकते परन्तु शिष्य तो अपने पिता गुरुदेव से अभेद स्थापित करता है, वह भी वही हो जाता है। अतः सांसारिक वात्सल्य कभी भी शिष्य के प्रति सद्‌गुरु के स्नेह और कृपा की बराबरी नहीं कर सकता, उसके सामने वह नगण्य है। सद्‌गुरुदेव स्वयं कहते हैं- जैसे सूर्य की शोभा धूप से होती है, चन्द्रमा की चाँदनी से, वृक्षों की फूल और फलों से, पिता की शोभा पुत्रों से, राजा की न्याय से उसी प्रकार गुरु की शोभा श्रद्धा भाव से भरे हुये प्रिय शिष्य से होती है। जल प्रवाहित होने से नदी कहलाती है, जिसमें जल नहीं वह नदी नहीं। ऐसे ही बिना शिष्य के कोई गुरु नहीं कहला सकता गुरु सूर्य होता है तो शिष्य उसकी धूप होता है, गुरु चंदन के सदृश है, शिष्य उसकी कीर्ति रूप सुगंध को फैलाने वाला पवन के समान होता है जो सत्य ज्ञान की सुगंध से दूसरे को ज्ञानी बना देता है।
                  सच्चा शिष्य अपनी निर्मल, निःस्वार्थ अनन्य भक्ति भाव से की गई सेवा से सद्‌गुरु की उस दिव्यतम कृपा का अधिकारी बन जाता है जिससे शिष्य-गुरु का भेद भी मिट जाता है जिससे शिष्य-गुरु का भेद भी मिट जाता है, अभेद स्थिति प्राप्त हो जाता है। कहा गया है--
                  सेवक स्वामी एक मत मति में मति मिल जाय ।  
                  चतुराई  रीझे  नहीं  रीझे  मन  के  भाय ॥
सत्‌शिष्य गुरुकॄपा से एकत्व स्थापित करने पर गुरु होता है। सत्‌शिष्य हुये बिना सद्‌गुरु होने की कल्पना भी नहीं जा सकती। हंसयोग प्रकाश में कहा गया है---
                 गुरु हो पूरा शिष्य हो सूरा वागमोरि रण पैठ ।
                 शब्द सुरत को चीन्ह के एक तख्त चढि़ बैठ ॥
सद्‌गुरु ही अपनी कृपा से सत्‌शिष्य को पूर्ण बना देते हैं। वही सत्‌शिष्य अपने गुरुदेव का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी सद्‌गुरु होता है। उनके ज्ञान प्रकाश को सतत प्रकशित करने वाले ये सद्‌गुरु पुनः अपनी मानव जीवन लीला समाप्त करने के पहले ही अपने ज्ञान प्रकाश से उसी प्रकार अपने सत्‌शिष्य को प्रकाशित कर जाते हैं। एक दीपक से जलते हुये जैसे अनेक दीप क्रमशः जलते चले जायँ उसी प्रकार ज्ञान ज्योति एक गुरु से होती हुयी शिष्य दर शिष्य चलते हुये सदा प्रकाशित रहती है। इसी को सन्त परम्परा कहते हैं। बडे़-बडे़ राजवंश मिट गये, इतिहास में उनकी चर्चा के अतिरिक्त धरती पर उनकी कोई निशानी शेष नहीं रह गई परन्तु सन्त की परम्परा अमर होती है वह सदा रही है और सदा रहेगी । क्षणभंगुर दैहिक पुत्रों से चलने वाली वंश परम्परा का एक न एक दिन मिट जाना स्वाभाविक, उसी प्रकार अमर आत्मिक पुत्रों(शिष्यों) से चलने वाली सन्त परम्परा का अमर रहना स्वाभाविक है।
                     गुरुभक्त ही सगुण परमात्मा सद्‌गुरुदेव को अन्दर चाहे बाहर प्रगट करता है। सत्‌शिष्य सद्‌गुरु का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी होने के नाते स्वयं सद्‌गुरु पद प्राप्त करके उनके तत्व ज्ञान का प्रचारक और प्रसारक बनता है। आदिकाल से चली आ रही ज्ञानज्योति को जलाये रखता है उससे अपनी शरण आये जीवों के आन्तरिक अन्धकार को मिटाता और उसमें ज्ञान का संचार करता है। आत्मकल्याण ही उसका एकमात्र कर्म होता है। इसके अतिरिक्त संसार में उसे कुछ लेना-देना नहीं होता । ऐसे सन्त महापुरूष से गुरु परम्परा आज तक अक्षुण्य है और अमर है। सभी तत्व ज्ञानी महापुरूष अपने शिष्य में तत्वज्ञान के रूप में प्रविष्ट होकर (प्रज्ञानं ब्रह्म) सदा परम्परा के रूप में धरती पर विराजमान रहते हैं। आदिकाल से लेकर आज तक तत्वज्ञानी ऋषि, मुनि अपनी परम्परा कायम रखे हुये है। प्रागैतिहासिक काल की बात छोड़ दें तो इतिहास में तो सन्त परम्परा के अनेक प्रत्यक्ष प्रमाण है। गुरु नानक देव की शिष्य परम्परा ही सिख धर्म में विराजमान है। कबीर साहब आदे जितने भी सन्त हुये हैं, सबके संदेश वाहक उनके प्रिय शिष्य ही तो हुये। भले ही उनके मूल स्थान में कोई न हो परन्तु उनके शिष्यों द्वारा कहीं न कहीं उनका मौलिक तत्वज्ञान प्रकाशित हो रहा है और होता रहेगा। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है। राधास्वामी सम्प्रदाय में सद्‌गुरु की मात्र चार पीढ़ियां भले ही चली हो परन्तु जहाँ सच्चे सन्त का आश्रम होगा उसमें उन आध्यात्मिक शिक्षाओं का समावेश अवश्य मिलेगा, क्योंकि सन्तों की देह भिन्न- भिन्न हो सकती है, स्थान अलग-अलग हो सकते हैं, समय भी अलग-अलग होता है परन्तु आत्मिक दृष्टि से सभी सन्त सद्‌गुरु एक ही होते हैं। जैसे तत्वज्ञान एक है उसी प्रकार तत्वज्ञानी भी एक हैं क्योंकि वह स्वयं परमात्मा स्वरूप होते हैं।
              स्वामी रामकृष्ण परमहंस के निजधाम के बाद स्वामी विवेकानंद जी ने उनकी आध्यात्मिक कीर्ति पताका को बड़ी ऊँचाई तक फहराया। इस अमर परम्परा की कथा तो अनंत है। परन्तु आज जो हमारे सामने है वह तो प्रत्यक्ष है। इस वर्तमान काल में मठ गड़वाघाट आश्रम शुद्ध सनातन धर्म और सन्तमत का एकमात्र प्रतिनिधि आश्रम है। यहाँ सन्त सद्‌गुरु की चौथी पीढ़ी विराजमान है। इसके प्रथम सन्त सद्‌गुरु परमपूज्य श्री श्री १००८ श्री स्वमी आत्मविवेकानन्दजी महाराज परमहंस अपने आराध्य सद्‌गुरुदेव पूज्यपाद श्री श्री १००८ श्री स्वामी स्वरूपानन्दजी महाराज के सत्‌शिष्य थे। इन्होंने ब्रह्म का ज्ञान कराने वाली पराविद्या की ज्योति को अपने सत्‌शिष्य पूज्यपाद श्री श्री १००८ श्री स्वामी हरसेवानन्दजी महाराज परमहंस के रूप में प्रकाशित किया। पुनः उनके सत्‌शिष्य पूज्यपाद श्री श्री १००८ श्री स्वामी हरशंकरानन्दजी महराज परमहंस के रूप में वही पराविद्या का परम प्रकाश प्रगट हुआ। इन सन्त शिरोमणी के सत्‌शिष्य  श्री १०८ श्री स्वामी सतगुरुसरनानन्दजी महाराज परमहंस इस मठ के पीठाधीश सद्‌गुरु के पद पर विराजमान हैं। हर सत्‌शिष्य ने सद्‌गुरु पद पर प्रतिष्ठित होकर अपने आराध्य गुरुदेव की कीर्ति को निरंतर बढ़ाते हुये आज इस पुनीत आश्रम को इस स्थिति में पहुँचा दिया है कि आध्यात्मिक क्षेत्र में इसकी तुलना का कोई दूसरा तीर्थ नहीं हैं। इसलिये स्वयं सद्‌गुरु स्वामी जी कहते हैं कि जैसे सूर्य की शोभा धूप से होती है, चन्द्रमा की शोभा चन्द्रिका से , वृक्षों की फूल-फल से , पिता की सुपूत्र से उसी प्रकार गुरु की शोभा सत्‌शिष्य से होती है।
 ( उपरोक्त लेख श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित "श्रीसद्‌गुरु‍-कृपा का महत्व" नामक साहित्य का अंश है।)

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