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शिष्य के लिये गुरु कृपा सर्वोपरि है पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
मंगलवार, 11 मई 2010 20:57

शिष्य के लिये गुरु कृपा सर्वोपरि है
       (लेखक - श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस)   
 ईश्वर की अहैतुकी कृपा से मनुष्य को चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव शरीर प्राप्त हुआ है। यह नर तन बड़े भाग्य से प्राप्त हुआ है। रामचरित मानस में कहा गया है--
                                                                             कबहुँक करि करूना नर देही । देत ईस बिन हेतु सनेही ॥
इस मनुष्य शरीर को देवताओं के लिये भी दुर्लभ कहा गया है क्योंकि देवताओं को स्थूल शरीर नहीं प्राप्त है। साधन, भजन तथा ईश्वर के चिन्तन के लिये स्थूल शरीर का होना अति आवश्यक है। अन्य जीवों को भी स्थूल शरीर मिला है परन्तु इन सभी स्थूल शरीरधारियों में सृष्टिकर्ता ने मनुष्य में विशेष बुद्धि और ज्ञान दिया है। सबमें व्याप्त परमेश्वर मनुष्य में अपने विशेष अंश में विद्यमान है। यही नहीं मानव देह की रचना कुछ इस प्रकार हुयी है कि उसमें सभी ब्रह्माण्डों या आध्यात्मिक मण्डलों की सूक्ष्म रूप से स्थिति है, या उनका अक्श है। अतः यह नर देह एक प्रकार से सृष्टि का सारांश है । इसलिये इसे सभी साधनों से युक्त मोक्ष का द्वार कहा गया है। रामचरितमानस में भगवान राम ने स्वयं कहा है--
                                                                            बड़े भाग मानुष तन पावा । सुर दुर्लभ सदग्रन्थन गावा ॥
                                                                       साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेही पर लोक सँवारा ॥
                                                                                  सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि-धुनि पछिताइ ।
                                                                                     कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं मिथ्या दोस लगाइ ॥

           यदि इस मानव तन की प्राप्ति के बाद भी मनुष्य ने अपने लक्ष्य की प्राप्ति नही किया, आत्मसाक्षात्कार या जीवन-मरण से मुक्ति का प्रयत्न नहीं किया, अपने परमार्थ को नहीं साध लिया तो उसका यह मनुष्य जीवन का अमूल्य अवसर व्यर्थ चला गया, अब उसे पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा। उसका ईश्वर, कर्म और काल पर मिथ्या दोष मढ़ना व्यर्थ है। परमेश्वर प्राप्ति के साधनधाम इस नर शरीर में रहते रहते मनुष्य अपने परम लक्ष्य को प्राप्त कर ले तभी उसका मानव तन धारण करना सार्थक है अन्यथा नहीं ।
     सभी मनुष्यों को यह मानव तन प्राप्त है परन्तु अज्ञानवश मनुष्य ने उसे साधनधाम न बनाकर सांसारिक भोगों का उपकरण मात्र बना लिया है, इसलिए उसे यह तन मोक्ष का द्वार न होकर जन्म-मरण के चक्र में घुमाने का कारण रूप हो जाता है। अतः मनुष्य तन प्राप्त करने पर भी मनुष्य के लिये आवश्यक है कि वह कुछ ऐसा उपाय सोचे और करे जिससे इस दुर्लभ मानव देह द्वारा उसका उद्धार हो सके तथा वह अपने परम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति कर ले। यह तभी संभव है जब स्वयं संसार सागर से पार माया से अतीत नर देह में परमात्मा श्रीसद्‌गुरुदेव की शरण उसे प्राप्त हो जाय। इसीलिये गुरु प्राप्त करना ही मनुष्य का अभीष्ट होना चाहिये।
        संसार में जितने भी बहुमूल्य पदार्थ हैं, मानव अपने स्वभावानुसार सबको प्राप्त कर लेना चाहता है। लेकिन सभी इच्छित वस्तुयें उसे प्राप्त हो जायँ तो भी उसे न तो सन्तोष प्राप्त होगा न शान्ति। ये सभी क्षणभंगुर भोग्य पदार्थ अन्त तक उसके साथ रहने वाले नहीं है और कुछ भी मरणोपरान्त साथ नहीं जाता। एक ही ऐसी वस्तु है जो अन्त तक साथ देती है और मरने पर भी साथ नहीं छोड़ती, वह है गुरुकृपा, यही मनुष्य का यथेष्ट अभीष्ट है। गुरुकृपा ही मनुष्य के लिये सबसे मूल्यवान्‌ और महान्‌ है क्योंकि शान्ति, प्रेम, सुख, आनन्द एवं ईश्वर तत्व का बोध गुरु की कृपा द्वारा ही संभव है। मनुष्य तन रहते रहते यदि इस कार्य की सिद्धि हो जाय तो मानव तन सार्थक हो जाय। सद्‌गुरुदेव जीवों के उद्धार हेतु ही अपनी कृपा से मनुष्य रूप में नित्यावतार, पारब्रम्ह परमेश्वर होते हैं। उनकी महिमा में कहा गया है--
                                                                                सत्य पुरूष सतरूप जो गुरु सत करतार ।
                                                                          अपने भगतन के हितु लीन्ह मनुज अवतार ॥

     जिस जीव पर श्री सद्‌गुरु कृपा करते हैं उसे "नाम" दान देकर, भजन, सेवा, सुमिरन का मार्ग बताकर उससे साधना कराते हैं, साधना की पूर्णता पर उसे अपना रूप बना लेते हैं आत्मा परमात्मा बन जाता है। सद्‌गुरुदेव सर्वसमर्थ होते हैं, उनमें वह शक्ति है जो क्षण मात्र में जड़ को चेतन बना देती है, मात्र उनका एक स्पर्श जीव की मुक्ति हेतु पर्याप्त है। यह तो गुरुदेव की परम उदारता है कि वे अपने जीव की मुक्ति का श्रेय भी अपने नहीं लेते, साधक बनाकर यह श्रेय भी अपने भक्त जीव को ही देते हैं। यही उनकी परम दया है। सत्य यही है कि मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता, सब कुछ गुरुकृपा पर ही निर्भर है। परमपूज्य स्वामीजी ने इस भजन में यही दर्शाया है।
                                                                                 कब से करत पुकार हरी।
                                                              जाचक हौं प्रभु तू दानी हौ तोरे चरन पर माथा परी ॥
                                                              देहु दया कर भक्ति आपनी कमल चरन मेरे माथा हरी ।
                                                             दुख मिटावे द्वन्द्व छोडा़वै नाथ चरन रज जेकरे पर परी ॥
                                                            तुमरी कृपा से जे उबरल प्रभु आपन करतब कछू न करी ।
                                                                   दासनदास खाकसार सरनागत तुमही मेरे एक हरी ॥

            नित्यावतार पारब्रम्ह परमेश्वर ही गुरु हैं। वे ही भक्तो के इष्ट होते हैं। सभी देवताओं की समवेत शक्ति से भी वे अधिक शक्ति सम्पन्न हैं, उनमें पूर्ण परमात्मशक्ति और सामर्थ्य है, उनकी वंदना में कहा गया है--
                                                                                     गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
                                                                               गुरुः साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

सन्तों ने जगत में गुरु को ही सर्वश्रेष्ट माना है । गुरु भक्तों के एक मात्र हितैषी हैं, वे सब कुछ करने वाले हैं, बिना उनकी कृपा के कुछ भी नहीं होने वाला है। गुरु के अतिरिक्त किसी और पर भरोसा करने वाला भक्ति प्राप्त नहीं कर सकता।
          गुरु हैं सब कुछ जगत में गुरु से सब कुछ होय ।
          गुरु बिन और जो जानहीं भक्ति न पावै सोय ॥
गुरु की कृपा प्राप्त करने का एकमात्र उपाय निश्छल, निर्मल और निष्काम भाव से तन, मन, धन तथा उनकें चरणों में सर्वस्व अर्पित कर उनकी प्रेम पूर्वक सेवा ही है। इसीलिये यह सन्तवाणी है--
                                                                     ज्ञान ध्यान अरु जोग जप गुरु सेवा सम नाहिं ।
                                                                         भक्ति मुक्ति औ परमपद सब गुरु सेवा माहिं ॥

गुरु की सेवा तभी संभव है जब मनुष्य उनका सान्निध्य प्राप्त करे। गुरु को सद्‌ग्रन्थों में पारस की उपमा दी गई है। उनके पावन स्पर्श से जड़ जीव चेतन हो जाता है जैसे पारस के संपर्क से लोहा सोना हो जाता है। कहा गया है--
                                                                                ज्यों पारस के परस से लोहा कंचन होय ।
                                                                                त्यों सन्तन के संग से जड़ से चेतन होय ॥

   पारस लोहा को सोना बना देता है परन्तु शर्त यह है कि दोनो में अभिन्न संबध हो। यदि पारस और लोहे के मध्य कोई भी विजातीय पदार्थ रहेगा तो लोहे पर पारस का प्रभाव नही पड़ेगा। अतः उनके बीच किसी प्रकार का पर्दा नहीं होना चाहिये। ठीक इसी प्रकार मानवरूपी लोहा गुरुरूपी पारस के साथ जब तक अभिन्नता को नहीं प्राप्त होता तब तक उसका जीवन स्वर्ण समान नहीं बन सकता। अतः शिष्य का गुरु के साथ अभिन्न संबंध होना अनिवार्य है। यह अभिन्न संबंध श्रद्धा, विश्वास एवं प्रेम का संबंध है, जो हर प्रकार से निश्छ्ल, निर्मल और निष्काम हो। जब तक शिष्य का अभिन्न प्रेम गुरु के चरण कमलों के साथ नहीं होता, तब तक बात बनने वाली नहीं है। यदि कोई गोबर भरा पात्र लेकर किसी के यहाँ दूध लेने जाय तो दूध देने वाला पात्र अशुद्ध होने के नाते उसमें दूध नहीं दे सकता। उसी प्रकार गुरु भी शिष्य की पात्रता से तुष्ट होकर ही बहुमूल्य कृपा रूपी अनुभूति शिष्य के ह्रदय में उतारते हैं। वे दयालु स्वयं साधना करा करा कर शिष्य के भीतर की गंदगी को हटाकर उसे अपनी कृपा के द्वारा सुयोग्य पात्र बना लेते हैं। गुरु के प्रति अचल विश्वास और एकनिष्ठ प्रेम ही गुरुकृपा प्राप्त करने के लिये शिष्य की पात्रता है। गुरु शिष्य के अन्तर्दोषों को क्रमशःदूर करते रहते हैं। इस प्रक्रिया कभी-कभी कृपालु गुरु में शिष्य को कठोरता का भी दर्शन होता है। परन्तु यह उसी प्रकार है जैसे पुत्र के फोड़े को चीर फाड़ कर स्वच्छ रखने में माता की कठोरता दिखाई देती है। जैसे माता कठोर नहीं होती पुत्र के प्रति प्रेम ही उसे उसके भले के लिये ऊपर से कठोर बनाता है, उसी प्रकार गुरु की कृपा ही शिष्य को सुधारने में कठोरता के रूप में दिखाई पड़ती है। कबीर साहब ने कहा है--
                                                           गुरु कुम्हार शिष्य कुभ्भ है गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट ।
                                                                      अन्तर  हाथ  सहाय  दे बाहर  बाहै  चोट ॥

  कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है तो बाहर से उसे ठोकता-पीटता है, परन्तु भीतर हाथ से सहारा देता है कि कहीं घड़ा टूट न जाय क्योंकि उसका उद्देश्य घड़े को सुन्दर से सुन्दर बनाना होता है। इसी प्रकार कभी कभी गुरु की ताड़ना शिष्य को सुधारने के लिये होती है परन्तु वे उस दशा में भी अपनी कृपा रूपी  हाथ शिष्य के ऊपर रखे रहते हैं। इसलिये गुरु भक्त के लिये गुरु कृपा ही सार वस्तु है। गुरु के चरण कमलों में प्रेम हो जाना ही जीवन की सबसे महान्‌ उपलब्धि है। गुरु की कृपा से यदि उनके प्रति निश्छल, निर्मल,निश्चल प्रेम ह्रदय में उत्पन्न हो गया तो समझना चाहिये सब कुछ हस्तगत हो गया।
 ( उपरोक्त लेख श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित "श्रीसद्‌गुरु‍-कृपा का महत्व" नामक साहित्य का अंश है।)