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Science of Sant Mat

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सगुण ही भक्ति का आश्रय पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
मंगलवार, 11 मई 2010 22:15

सगुण ही भक्ति का आश्रय
     (लेखक - श्री श्री १०८श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस)
      
      सन्त सद्‌गुरु जीवों के उद्धार के लिये पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। पृथ्वी के जिस भाग्यशाली भूखण्ड को पवित्र करना चाहते हैं, उसे अपने पावन चरण कमल के स्पर्श से पूज्यनीय और दर्शनीय बना देते हैं। जहाँ जाना चाहते है वहाँ जाने के लिये कोई न कोई बहाना बना लेते हैं तथा जिज्ञासुओं को नाम-दान देकर उनके आत्मिक कल्याण हेतु उन्हें भक्ति मार्ग पर आरूढ़ करते हैं। भक्ति मार्ग की उपासना पद्धति तथा अपने सदुपदेशों से सदा उन्हे भक्ति-रसामृत का पान कराते रहते हैं। भक्त सदा प्रसन्नचित रहकर गुरु की सेवा तथा भजन सुमिरन में तल्लीन रहकर अपना जीवन सार्थक बनाते हैं। जो प्रेमी भक्त भाव सहित सद्‌गुरु की अनन्य सेवा में रहता है वह उन्हें तीनों लोकों में सबसे अधिक प्रिय होता है। सद्‌गुरु की भक्ति और उनकी एकनिष्ठ सेवा ही जीव के उद्धर का एकमात्र उपाय है। कबीर साहब ने कहा है--
        गुरु की सेवा चाकरि करिये मन चित लाय ।
        कहै कबीर निज तरन को नाहीं और उपाय ॥

अर्थात श्री सद्‌गुरु की सेवा, उनका भजन मन-चित्त लगाकर पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ करना चाहिये क्योंकि संसार सागर से पार होने के लिये इससे उत्तम कोई अन्य उपाय नहीं है। ज्ञान, ध्यान, योग और जप-तप आदि जितने भी साधन हैं, वे भी स्वयं फलदायी नहीं होते जब तक गुरुभक्ति न हो। सद्‌गुरु भक्ति ही एक ऐसा साधन है, जिसमें योग, यज्ञ, तप सबका फल अपने आप समाहित रहता है। यही वह मार्ग है जिसके लिये कहा गया है-- एकहि साधे सब सधै ।
रामचरित मानस में भगवान रामचन्द्रजी ने स्वयं अयोध्यावासियों को उपदेश देते हुये कहा है--
         जो परलोक इहाँ सुख चहहू । सुनि मम वचन ह्रदय दृढ़ गहहू ॥
        सुलभ सुखद मारग यह भाई । भगति मोर पुरान श्रुति गाई ॥

हे भाई! यदि लोक परलोक सब जगह सच्चा सुख चाहते हो तो मेरे इस वचन को ह्रदय से ग्रहण कर लो कि वह सुख भक्ति से ही प्राप्त होने वाला है। मेरा भक्ति मार्ग अत्यन्त सहज सुलभ है। इस भक्ति की महिमा का गान सब वेदों और पुराणों में किया गया है। यह भक्ति सद्‌गुरु की भक्ति है अतः मै भी अपने सद्‌गुरु वशिष्ठ जी की भक्ति में ही सब कुछ प्राप्त कर रहा हूँ। अन्यत्र कहा गया है कि--
    बिन गुरु भव निधि तरै न कोई । जौ विरंचि संकर सम होई ॥
बिना गुरु को प्राप्त किये और बिना उनकी भक्ति किये कोई भी संसार सागर पार करने में सक्षम नहीं है, चाहे वह ब्रह्मा और शंकर के समान ही क्यों न हो । ज्ञान, ध्यान योगादि साधन बिना गुरुभक्ति के सभी निष्फल जाते हैं। बिना भक्ति का मार्ग अपनाये जीव को मुक्ति प्राप्तयर्थ अन्यत्र कहीं ठिकाना नहीं मिलता। कहा गया है--
            बिना भक्ति के योग नहिं, बिना भक्ति के ध्यान ।
            बिना भक्ति ऊपर चढ़े, कबहुँ न मिले ठिकान ॥

तथा--
          ज्ञान ध्यान अरू जप तप पढ़िये वेद पुरान ।
          बिन गुरु भक्ति जीव का कबहुँ न हो कल्यान ॥

जीव के उद्धार के लिये या जन्म-मरण से मुक्ति पाने के लिये, आवागमन के चक्र को निर्मित करने वाले कर्मो के विनाश के लिये तथा दुःखमय संसार से छुटकारा पाकर सच्चे शाश्वत सुख या परमानन्द को प्राप्त करने के लिये जिस भक्ति का उल्लेख शास्त्रों-पुराणों में है, तथा सन्त सत्पुरूषों ने अपने श्रीमुख से जिसका उपदेश दिया है, वह किसी अन्य की भक्ति नहीं केवल सद्‌गुरु की ही भक्ति है और स्पष्ट कहा जाय तो समय के सद्‌गुरु की भक्ति है, जो अपने सगुण रूप में वर्तमान में विद्यमान हों। क्योंकि सदेह सगुण परमात्मा ही भक्ति के आश्रय होते है, वे ही मन के टेक होते हैं, तथा सुमिरन, सेवा का आधार बनते हैं और सबसे बढ़कर वे ही कर्मो के जाल को जलाने में सक्षम होते हैं, अन्य कोई नहीं। परमात्मा के निराकार स्वरूप से यह संभव नहीं है क्योंकि करूणामय बनकर जीवों को तारना उनका काम नहीं है, वे समदर्शी है फिर किसी पर करूणा कैसे करे, इसलिये वे ही जीवोद्धार के लिये सगुण रूप में बनकर अवतरित होते है। निर्गुण निराकार कभी ध्यान का आश्रय नहीं हो सकता न ही प्रेम का आधार, क्योंकि मनुष्य का प्रेम पाने के लिये मनुष्य होना परमात्मा के लिये आवश्यक है। अतः निराकार, साकार बनकर ही हमारा प्रेमास्पद हो सकता है क्योंकि वही हमारी आसक्तियों को अपनी और खींचकर परम प्रेम के रूप में उनका रूपान्तरण करता है। यही भक्ति का मूल है। यही सच्चे प्रेम का अभ्युदय का सर्वोतम और सरल मार्ग है। इसलिये ज्ञानमार्ग से या निराकार उपासना से सद्‌गुरु भक्ति को श्रेष्ठ माना गया है। रामचरित मानस में भगवान ने कहा है--
    ज्ञान अगम प्रत्यूह अनेका । साधन कठिन न मन कहुँ टेका ॥
   करत कष्ट बहु पावै कोऊ । भगति हीन मोहि नहिं प्रिय सोऊ ॥
   भगति सुतन्त्र सकल सुख खानी । बिनु सत संग न पावहिं प्रानी ॥

अर्थात्‌ ज्ञान अगम है और उसकी प्राप्ति में अनेक विघ्न हैं। उसका साधन कठिन है और उसमें मन के लिये कोई आधार नहीं है। बहुत कष्ट करने पर यदि कोई उसे पा भी लेता है तो वह भी भक्ति रहित होने के कारण मुझको प्रिय नहीं होता। भक्ति स्वतन्त्र है ( इसमें किसी अन्य साधन की सहायता अपेक्षित नहीं है।) और सभी सुखों की खान है। परन्तु कोई भी प्राणी बिना सन्त सद्‌गुरु का संग किये या बिना उनकी शरण ग्रहण किये भक्ति नहीं पा सकता। तात्पर्य यह है कि जिस सन्त सद्‌गुरु के संग में भक्ति उपलब्ध होती है वह कोई अतीत कालीन नहीं, वर्तमान में नरदेह में विराजमान होना चाहिये। अतः उसके द्वारा प्राप्त भक्ति उसी की ही होनी चाहिये क्योंकि वही सगुण परमात्मा है, जिसका पाना आध्यात्मिक साधन का उद्देश्य होता है।
सन्त सद्‌गुरु इस धरती पर वर्तमान है, वे जंगम प्रयाग है, सब उनके पास जा सकते है, वे भी अपनी मौज से सबके पास जा सकते है,इसलिये वे सहज हैं, सुलभ हैं। इसलिये उनकी भक्ति को सरल और सुलभ कहा गया है, परन्तु परमात्मा सद्‌गुरु के प्रति क्षणमात्र के लिये ह्रदय में मनुष्यभाव पैदा होने के कारण भक्ति विचलित हो जाती है। इसलिये इसे कठिन भी कहा गया है। मानव देह में विराजमान सद्‌गुरु में निरन्तर ब्रह्म भाव बनाये रखना ही भक्ति मार्ग का सबसे बड़ा सम्बल है। बिना रूप के भगवान के अनेकों नामों में किसी का जप करना आसान है परन्तु रूप का आभाव उस जप को अधूरा ही रखता है क्योंकि ध्यान का यथार्थ आधार नहीं होता। परन्तु सरलतापूर्वक नाम जपकर लोग संतोष करते हैं और उसे मुक्ति का साधन मानने का भ्रम पालते रहते हैं। इसी प्रकार मूर्ति पूजक भी जिसकी मूर्ति है उसे साक्षात्‌ बिना कभी देखे अपनी उपासना की  प्यास बुझाकर भक्त बनने का स्वाँग रचते हैं। इससे मनोभाव में कुछ एकाग्र्ता भले ही प्राप्त हो परन्तु इससे आवागमन का चक्र नहीं समाप्त होता। जिसे हम देख रहे हैं, जिसका उपदेश अपने कानों से सुन रहे हैं, जिसकी प्रत्यक्ष सेवा का अवसर हमें उपलब्ध होता है, वही भगवान हमारे लिये तारक रूप में मान्य है, ग्रहणीय है। उसी से हमारा उद्धार होगा। वही भगवान हमारे सद्‌गुरुदेव हैं। परमपूज्य स्वामीजी ने सगुण भक्ति का रूप अपने भजन में स्पष्ट दिया है--
           निरगुन भक्ति सुलभ अति होई ।
           सरगुन भक्ति जाने कोई कोई सहजै मुक्ति होई ॥
           राम अवतार भये जेहि अवसर जानै नहिं कोई ।
           आँख देखे परतीति न होई बिन देखी भक्ति करै सब कोई।
          सतगुरु मिलें भेद बतावै नाम तत्व सबमें है सोई सन्त जाने कोई कोई ।
          बिन सन्त के नाम न पाई गीता, रामायण, उपनिषद्‌ सब बानी में होई।
         दासनदास खाकसार सरणागत सतगुरु के जिन नाम तत्व दिखावैं सोई ॥

राम, कृष्ण के समान अवतारी महापुरूषों ने भी सन्त सद्‌गुरु की शरण में जाकर ही ज्ञान भक्ति का उपदेश और नाम तत्त्व की प्राप्ति का उपाय बताया है तथा स्वयं भी सद्‌गुरु से उपदेश लेकर भक्ति योग की ही साधना किया है। सबने कहा है कि मुझसे बढ़कर गुरु को मानना चाहिये। भले ही जब तक वे मानव देह में विराजमान रहे उनकी भक्ति कुछ लोगो को ही प्राप्त हुई  क्योंकि सगुण रूप में उनमें परमात्मभाव रखना सबके लिये कठिन था। आज उनका रूप नहीं है तो बिना रूप देखे, उनके नाम को रटने से आधी ही साधना तो होगी, उससे क्या होगा। अतः स्वामीजी ने कहा है कि समय के सद्‌गुरु जो नाम तत्त्व के ज्ञाता हैं, जो स्वयं तत्त्वरूप हैं, उन्ही के उपदेश, ध्यान और सेवा से सुलभ उनकी अनन्य भक्ति ही एकमात्र मुक्ति का साधन है। उनके द्वारा उद्‌घाटित रहस्य नाम के भजन-सुमिरन में वह शक्ति है जिससे सभी बाधायें अपने आप दूर हो जाती है तथा प्रकृति की समस्त शक्तियाँ गुरुभक्त की सहायता करने में अपने को धन्य मानती है।
     (उपरोक्त लेख श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित "सद्‌गुरु‍- दयासागर" नामक साहित्य का अंश है।)

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