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गुरुभक्ति सुखद , सुलभ और सुगम साधन पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
मंगलवार, 11 मई 2010 22:23

 

गुरुभक्ति सुखद , सुलभ और सुगम साधन
      (लेखक - श्री श्री १०८श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस)   
       अतः भक्ति मुक्ति के जिज्ञासु का प्रथम कर्तव्य है कि वह सद्‌गुरु की खोज करे, उनकी प्रार्थना करके उनकी शरण प्राप्त करके उनसे नाम तत्त्व का उपदेश ले तथा उनके द्वारा बतायी विधि के उनुसार प्रेम और भक्ति के साथ उनका भजन- सुमिरन और सेवा करे। पूर्ण पुरूष सद्‌गुरु की छ्त्रछाया में जाकर जीव पूर्णकाम हो जाता है, उसे कुछ पाना शेष नहीं रहता सन्तवाणी है--
           पूर्ण पुरूष सद्‌गुरु मिले जागे भाग हमार ।
            किरपा कर सत्गुरु दिया नाम अमोलक सार ॥
            ऐसी अनुकम्पा करी सद्‌गुरु पूरण काम ।
            पल पल सुमिरे दास यह सत्गुरु तुमरो नाम ॥

वह परम पावन योगिराज श्री सद्‌गुरु महाराज निरन्तर जीव को परमात्मा में या अपने साथ लगाता हुआ सुखपूर्वक अपनी प्राप्ति करा कर भक्त को अनन्त आनन्द का अनुभव कराते रहते हैं। धन्य हैं वे जिज्ञासु भक्त जो ह्रदय में निरन्तर पूरी श्रद्धा से सद्‌गुरु महराज के नाम का भजन-सुमिरन तथा सेवा करते हुये अपने जीवन को सार्थक बना रहे हैं।
              पर ब्रह्म सत्गुरु मिले, सँवर गई तकदीर ।
              दासनदास की मिट गई जन्म जन्म की पीर ॥

सद्‌गुरुदेव की प्रशस्ति में सन्त ज्ञानेश्वर ने कहा है कि ऐसे सद्‌गुरु को कोटि कोटि प्रणाम है जो परमात्मा की प्राप्ति के साधन रूपी जंगल के बसंत,ब्रह्मविद्या के मंगलसूत्र और अकारण करूणा की प्रत्यक्ष मूर्ति हैं। श्रीसद्‌गुरु अविद्या के वन जीव-भाव को भोगने वाले चैतन्य स्वरूप जीव की पुकार पर करूणा से द्रवित हो उठते हैं। जिनकी कृपादृष्टि होने पर बन्धन मोक्ष में बदल जाता है और ज्ञानार्थी ज्ञानमय हो जाता है। श्रीसद्‌गुरु महाराज के यहाँ बड़े-छोटे का विचार नहीं है, वे सबको एकभाव से कल्याण मार्ग पर लगाकर उनका उद्धार करते हैं। सद्‌गुरु के नाम-भजन, सेवा से ही मन निर्मल बनता है और वायु की गति के समान चंचल मन स्थिर हो जाता है। जीव को सच्चे सुख और शान्ति का अनुभव होता है। सन्तवाणी है--
         चंचल मन थिर ना रहे लाख कोई समझावे ।
         गुरु शब्द का चाबुक लागे तब यह वस में आवे ॥
         पारब्रह्म पूरण गुरु धराधम पर आते ।
         देकर के निज नाम का अंकुश मन पर वार लगाते ॥
        जो कोई इनकी शरण में जाये मुक्ति भक्ति बतलाते ।
        सुमिरन सेवा ध्यान भजन का सच्चा नियम सिखाते ॥
       इस पर जो भी अमल है करता मन वश में हो जाये ।
       जीव शान्ति, सुख,  परमान्द में वास निरन्तर पावे ॥

परमपूज्य स्वामीजी कहा करते थे कि करने वाले के लिये गुरुभक्ति का मार्ग बहुत सरल है, बस पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ सद्‌गुरु नाम के भजन- सुमिरन में निर्देशित विधि के अनुसार लीन रहे तथा गुरु की आज्ञा का पालन और उनकी सेवा में कभी भी तनिक भी कमी न आने दे। इतना सध जाने पर तो सद्‌गुरु की कृपा प्राप्त करने में कोई कठिनाई शेष नहीं रहती। यह ऐसा मार्ग है जिसमें केवल प्रेम से लगे रहने की आवश्यकता है। सद्‌गुरु-शरण में जाने के बाद फिर कहीं जाना है, वहीं हर कामना पूरी हो जायेंगी।
            सन्त के द्वार पर पड़ा मनमूरख तूँ कौन सी आस दस द्वार धावै ।
            दयानिधि दया की दृष्टि जब फेरिहैं, सहज ही मुक्ति फल हाथ आवै ॥
            स्वर्ग और सिद्धि की चाह को छोड़कर सन्त के चरण जो भक्ति लावै ।
            एक ना एक दिन पाइहै मुक्तिफल, नाहिं सन्देह संपूर्ण गावै ॥

सन्तमत में सद्‌गुरु की आवश्यकता, उनमें पूर्ण विश्वास, अनन्य प्रेम और उनकी निःस्वार्थ सेवा को ही साधना के सबसे आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। सद्‌गुरु साधना के केन्द्र और परिधि दोनों होते है, इसलिये साधना के श्री गणेश से लेकर समापन तक प्रेरक से लेकर स्वयं साध्य बन जाने तक साथ-साथ रहते हैं। सद्‌गुरु की भक्ति के सहारे उनकी मौज के अनुसार चलना वाला सेवक अवश्य ही मुक्ति का अधिकारी बन जाता है। अतः सच्चा सुख, सच्ची शान्ति और परम आनंद की प्राप्ति सद्‌गुरु की ही शरण में संभव है। नाम भक्ति से रहित व्यक्ति तीनों लोको का राज्य प्राप्त कर लेने पर भी कभी न सुखी रह सकता है और न एक क्षण के लिये भी उसे शान्ति प्राप्त हो सकती है।
            प्रभु का नाम भुलाकर जग में कौन चैन सुख पायेगा ।
            तब सुख इच्छा होगी पूरी जब दिल में नाम बसायेगा ॥

अन्यत्र कहा गया है--
            भक्ति सुख का मूल है भक्ति सुख की खान ।
            जाके मन भक्ति बसे पावे पद निर्वान ॥

सद्‌गुरु की भक्ति में किसी प्रकार की बाधा व्यवधान नहीं उत्पन्न कर सकती क्योंकि सदा रहने वाले गुरुदेव सदा भक्त की रक्षा किया करते हैं। इसकी निर्बाधता पर भक्त शिरोमणि काकभुशुण्डि जी ने कहा है कि भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है, यह जिसके ह्रदय में बस जाती है उसके ह्रदय में दिन रात ज्ञान का प्रकाश जगमगाता रहता है। इस मणि के प्रकाश को दीपक की भाँति तेल-बाती की आवश्यकता नहीं, इसके लिये किसी सहायक साम्रगी की आवश्यकता नहीं, साथ ही इसकी यह विशेषता है कि इसे मोह, लोभ, माया रूपी झंझावात बुझा नहीं सकते तथा इसके प्रभाव से मोह रूपी दारिद्र्य निकट नहीं आ पाता। तात्पर्य यह है कि जिनका ह्रदय गुरु के प्रति अनन्य भति भाव से भरा है, उस पर सांसारिक आसक्तियों का प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिये भक्ति मार्ग बाधा रहित होता है।
         राम भगति चिन्तामनि सुन्दर । बसई गरुड़ जाके उर अन्तर ॥
         परम प्रकास रूप दिन राती । नहिं कछु चाहिय दिया घृत बाती ॥
         मोह दरिद्र निकट नहिं आवा । लोभ बात नहिं ताहि बुझावा ॥

सद्‌गुरु भक्ति से प्रकाशित ह्रदय अज्ञान मुक्त हो जाता है। भक्त के ज्ञान नेत्र खुल जाते हैं। इसी से कहा गया है कि ज्ञान- भक्ति का अनुगामी होता है जबकि भक्ति स्वतन्त्र होती है। ज्ञान- भक्ति से युक्त ह्रदय सांसारिक आसक्ति रूपी मानस रोगों से अप्रयास मुक्त हो जाता है, वह हर प्रकार से स्वस्थ मन, स्वस्थ आत्मा होता है। गुरु भक्त में संसार का कोई दुःख नहीं व्यापता। दुख-भन्जन केवल नाम है, परन्तु अज्ञानी पुरूष इसका आश्रय न लेकर दुःख निवारण के लिये निरर्थक नाना प्रकार के कर्मकाण्डों का अनुष्ठान किया करते हैं। सुखी वही है जिसे सद्‌गुरु-नाम का मजबूत सहारा मिल गया है। नानकजी ने कहा है--
             नानक दुखिया सब संसार । सुखी वही जो नाम अधार ॥
             श्रुति, पुराण तथा सभी धर्मग्रन्थ यही कहते हैं कि श्रीसद्‌गुरु महाराज के भजन-सुमिरन और सेवा-भक्ति के बिना सुख की प्राप्ति कभी भी नहीं हो सकती। रामचरित मानस में कहा गया है--
          श्रुति, पुराण सब ग्रन्थ कहाहीं । रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥
सन्त महापुरूष कहते है कि सद्‌गुरु के चरण कमल से प्रवाहित भक्ति-रूपी गंगा में जो भक्त श्रद्धा के साथ गोते लगाता है, उसके सभी दोष मिट जाते हैं और वह पाप रहित हो जाता है। मोह और अज्ञान का नाश हो जाता है, आत्मज्ञान का उदय होता है तथा मन के सभी संशय दूर हो जाते हैं, ऐसा सद्‌गुरुदेव की भक्ति का प्रताप है। पूर्व कर्मों के परिणाम स्वरूप एकत्रित पाप, सांसारिक वासनायें, जिनके कारण मनुष्य दुख भोगता है, सब गुरुकृपा से ही निर्बीज होते हैं और तभी सुख की प्राप्ति होती है। बिना सन्त-सद्‌गुरु के अनुकूल हुये, बिना उनकी कृपा के सुख-प्राप्ति असम्भव है। सद्‌गुरुभक्ति ही सभी सुखों का मूल है। रामचरित मानस में कहा गया है--
     तात भक्ति अनुपम सुखमूला । मिलई जो सन्त होहिं अनुकूला ॥

शाश्वत सुख देने वाली भक्ति-रूपी अमूल्य निधि बिना सद्‌गुरु की कृपा के कदापि नहीं मिल सकती। अतः सभी साधनों का सहारा छोड़कर केवल एक सद्‌गुरु की शरण ग्रहण करके उनके नाम भजन-सुमिरन और सेवा में रत हो जाना ही भक्ति प्राप्त का एकमात्र साधन है,अन्य सभी साधनाओं का फल भी इस गुरुभक्ति में ही समाया हुआ है। काकभुशुण्डि जी द्वारा गरुड़ से यही विचार व्यक्त किया गया है--
      सब कर फल हरि भगति सुहाई । बिनु सतसंगा न काहू पाई ॥
      अस बिचारि जोई कर सतसंगा । रामभगति तेहि सुलभ विहंगा ॥

जिस जिज्ञासु के ह्रदय में जीवोद्धारक गुरुभक्ति की चाह हो, उसके लिये यही श्रेयष्कर है कि वह यथा शीघ्र सन्त-सद्‌गुरु की शरण में जाकर उनकी सेवा में लग जाय। निःस्वार्थ शुद्ध सेवा से कोमल ह्रदय सन्त अवश्य द्रवित होते हैं और वे अपने सेवक को भक्ति की अनमोल सम्पदा से सम्पन्न कर देते हैं। उस भक्त का जीवन सफल हो जाता है। इसलिये सन्त-सद्‌गुरु की सविनय प्रार्थना की जाती है--
        अब तो तेरे नाम में ही मग्न यह दास रहे।
        यूँ ही नजरें करम तेरी मुझ पे खास रहे ।
        भूले से भी भूले न कभी तेरा ध्यान प्रभु॥

    हे मेरे स्वामी! दीन बन्धु, दीनानाथ मेरे ह्रदय में आपके नाम की दौलत पाने की तमन्ना बराबर बनी रहती है। आपसे यही प्रार्थना है कि आप ऐसी कृपा करें कि मेरा मन सदा आपके भजन-सुमिरन और सेवा में लगा रहे, अन्यत्र कहीं न जाय। आप मुझे मानसिक शान्ति दें और सांसारिक मोह-माया के आक्रमण से मेरी रक्षा करें। आपके दर्शन की लालसा सदा मेरे ह्रदय में बनी रहे। तथा सद्‌गुरु विषयक निर्मल ज्ञान से मेरा ह्रदय प्रकाशित रहे। आपका दर्शन करने, आपकी सेवा करने की ऐसी प्यास लगी रहे जो कभी कम न हो।
             (उपरोक्त लेख श्री श्री १०८ श्रीस्वामी सतगुरु सरनानंदजी महाराज परमहंस द्वारा रचित "सद्‌गुरु‍- दयासागर" नामक साहित्य का अंश है।)

 

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