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आदि जिज्ञासा शिष्य का प्रथम प्रश्न पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
रविवार, 20 जून 2010 20:19

 

 आदि जिज्ञासा शिष्य का प्रथम प्रश्न

(यह लेख ’श्रीसद्‌गुरु-रहस्य ’ नामक सत्साहित्य का अंश है)
         गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर प्रत्येक शिष्य श्रीसद्‌गुरु की कृपा के लिए प्रार्थनाशील रहता है । वह उस साधना विधि को पाना व अपनाना चाहता है जिससे उसे अपने श्रीसद्‌गुरु की चेतना का संस्पर्श मिले एवं गुरु तत्व का बोध हो। जीवन के सभी लौकिक दायित्वों का  निर्वाह करते हुए उसे सद्‌गुरुदेव की कृपानुभूतियों का लाभ मिल पाये। शिष्यों की इन सभी चाहतों को पूरा करने के लिए प्राचीन ॠषियों ने सद्‌गुरु की महिमा के चिन्तन मनन व निदिध्यासन को समर्थ साधन विधि के रूप में बताया था। इस गुरु की महिमा का उपदेश श्रीसद्‌गुरु भगवान ने शिष्यों को दिया था। फिर इसी को गुरु गीता के रूप में भगवान शंकर ने माता पार्वतीजी को दिया था। बाद में यही गुरुगीता सूत जी ने  नैमिषारण्य के तीर्थ स्थानो में ऋषि गणों को सुनाई। फिर भगवान व्यास जी ने स्कन्दपुराण के उत्तरखण्ड में इसी प्रसंग का बडी़ भावपूर्ण रीति से वर्णन किया है। शिष्य साधक हजारों वर्षों से इससे लाभान्वित होते रहे हैं। गुरु तत्व का बोध करने की यह एक गोपनीय साधन विधि है। अनुभवी साधकों का कहना है कि गुरुवार का व्रत रखते हुए, विनियोग,भजन,सुमिरन,और ध्यान के साथ सम्यक विधि से इसका पाठ किया जाय तो शिष्यों को अवश्य ही अपने श्रीसद्‌गुरुदेव का दिव्य संदेश मिलता है। स्वप्न में, ध्यान में या फिर साक्षात्‌ उसे श्रीसद्‌गुरु की कृपा अनुभूति होती है। शिष्य के अनुराग व प्रगाढ़ भक्ति से प्रसन्न होकर श्री सद्‌गुरुदेव उसकी आध्यात्मिक व लौकिक इच्छाओं को पूरा करते है। यह कथन केवल काल्पनिक विचार नहीं बल्कि अनेकों साधकों की साधनानुभूति है। हम सब भी श्रीसद्‌गुरु की महिमा का गान, अर्थ चिन्तन, मनन, व निदिध्यासन से गुरु तत्व का बोध पा सकें एवं परमपूज्य श्रीसद्‌गुरुदेवजी की कृपा से लाभान्वित हो सकें, इस हेतु इस ज्ञान की मंत्र क्षमता वाले श्रीसद्‌गुरु की महिमा  का भाव पूर्ण वर्णन इस लेख में किया जा रहा है।
       सर्वप्रथम साधकों को भजन, सुमिरन, ध्यान, सेवा, पूजा, दर्शन तथा उनके गुणगान की विधि बताई जा रही है, ताकि जो साधक इस भजन, सुमिरन, ध्यान को नियमित करे वह अवश्य ही लाभान्वित हो।  श्रीसद्‌गुरु की महिमा के गान को शास्त्रकारों ने मंत्र जप के समतुल्य माना है, उनका मत है कि श्रीसद्‌गुरु की महिमा का सदैव गान करने मात्र से ही शिष्य को भक्ति, मुक्ति, तथा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
     दरअसल में यह गुरुमंत्र शिष्य के मन की पवित्रता को बनाये रखता है तथा भजन, सुमिरन, ध्यान का स्मरण कराता है। श्रीसद्‌गुरु महराज के बतलाये हुए महामंत्र की शक्ति को ऋषि, मुनि, देवता  सदा ही याद करते रहते हैं। यह गुरुमंत्र  ही शिष्य को मन एकाग्र करने की विधि  बताता रहता है। वास्तव में श्रीसद्‌गुरु के नाम मंत्र का भजन-सुमिरन, शिष्य की ध्यान-शक्ति को जाग्रत करता रहता है। यह गुरुमंत्र शिष्य को श्रीसद्‌गुरु के बतलाये नियमों के पालन करने की याद भी कराता रहता है। इस मंत्र के देवता या इष्ट परमात्मा-स्वरूप श्री सद्‌गुरु महराज है। इस महा मंत्र को सदा जपने से भक्ति की शक्ति सदा मिलती रहती है। इस मंत्र के भजने या जपने के लिए व  श्री सद्‌गुरु की कृपा पाने के लिए साधक को सदा प्रयत्न शील रहना चाहिये। क्योकि बिना उनकी कृपा के कुछ भी नहीं हो सकता है।
          कारूण्यामृतसागरं शिष्यभक्तादि सेवितम्‌ ।
             श्री रामं(शिष्यम्‌) सद्‌गुरुं ध्यायेत तमाचार्यवरं प्रभुम्‌ ॥

शिष्यों तथा भक्तों से सेवित श्रीसद्‌गुरुदेव करूणा के अमृत सागर हैं। शिष्यों को ऐसे परम वन्दनीय  श्री सद्‌गुरुदेव का भजन सुमिरन, ध्यान सदा ही  करते रहना चाहिये। ध्यान की प्रगाढ़ता में  अपने श्री सद्‌गुरुदेव से अपना आत्म निवेदन करने के बाद,साधक को श्री सद्‌गुरुदेव की महिमा के गुणगान में सदा ही लिप्त रहना चहिये। श्री सद्‌गुरुदेवजी के गहन चिन्तन से ही साधकगण गुरु तत्व का बोध प्राप्त कर सकेंगे। सभी वेदों में निहित ज्ञान के स्रोत श्री सद्‌गुरुदेवजी प्रेम की साकार मूर्ति, योग की सभी साधनाओं में पूर्ण, तपोनिष्ठ व तेजस्वी है। गुरु महिमा का चिन्तन, साधक द्वारा नित्य प्रति की जाने वाली भजन, सुमिरन, ध्यान, सेवा, पूजा और दर्शन की साधना का अविभाज्य अंग होना चाहिये।
            जीव रूप एक अन्तर वासा । अन्तर ज्योति गुरु कीन्ह प्रकाशा ॥
            इच्छा रूप सद्‌गुरु अवतारी। तासु नाम सब सुखों की खानी ॥

गुरु-शिष्य रहस्य को गूढ़ से भी गुह्मतर विशेष ब्रह्मविद्या कहा गया है। आदि काल से ही इस गुरु-शिष्य रहस्य को समझने हेतु अनेकोंनेक साधकों द्वारा इस ब्रह्मविद्या पर अनुसंधान किया जाता रहा है। इस संदर्भ में तपोभूमि मठ गड़वाघाट आश्रम का नाम सबसे अग्रणी है।
                 मुक्ति धाम काशी जहाँ, पावन सुरसरि पाट ॥
                  सब  तीरथ में श्रेष्ठ  है,   तीरथ गड़वाघाट ॥

इस गुरु शिष्य रहस्य के महाज्ञान का उद्‌गम तपोभूमि गड़वाघाट के अत्यन्त रमणीय वातावरण में तब हुआ, जब श्री गड़वाघाट के तीर्थ स्थल  में भजन, कीर्तन, आरती, और पूजा के समय गुरुभक्ति तत्व या गुरु शिष्य रहस्य के अनुसन्धान में अग्रणी दासनदास ने भक्ति पूर्वक श्रीसद्‌गुरुदेवजी से याचना की-
जै जै गड़वाघाट के स्वामी । तृतीय पादशाही गुरु नामी ॥
                   पूर्ण तत्वदर्शी गुरु नंदन । अनुचर करत कोटिन वन्दन ॥
केहि विधि नाथ करूँ गुन गाना। सन्त सनातन कृपा निधाना॥
                      पाप आप भक्तों का लेते। नाम रतन धन मुक्त में देते ॥
रहते लीन सदा सुमिरन में । फिर भी वास करे निज जन में ॥
              फहरावैं प्रभु नाम पताका । झुकैं चरण में रवि शशि राका ।।
विनती करत दास चरणन में । मन मेरा रम जाय भजन में ॥
                 मैं मूरख अनभिज्ञ अनारी । सुन लीजे प्रभु विनय हमारी ।।
श्रद्धा भक्ति भाव भर दीजै । सद्‌गुरु पूर्ण मनोरथ कीजै ॥
                        बस इतना ही माँगन माँगूँ । भजन करूँ सोऊँ या जागूँ ॥
विसरै कभी नहीं गुरुद्वारा । काशी भागीरथी किनारा ॥
                       गड़वाघाट तीर्थ में आऊँ । गुरु सेवा का अवसर पाऊँ ॥
कृपा सिन्धु गुरुदेव प्रभु, श्री दयालू सरकार ।।
                                 याचक दीन अनाथ की, विनती हो स्वीकार ।।

हे मालिक हमारे अन्दर भजन, सुमिरन, सेवा, पूजन,दर्शन, ध्यान, तथा ज्ञान-भक्ति की शक्ति आपकी दया दृष्टि से ही मिलती है। हे मालिक, वही साधक तत्व ज्ञान का अधिकारी होता है जिसे आप चाहते है या देते है। हे मालिक, आपकी दया से अहंकार का लेश मात्र न रहने पर ही ज्ञान, भक्ति, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजन, दर्शन,और ध्यान की साधना फलित होती है।  श्रीसद्‌गुरुदेव महराज आपने हम सभी को शिष्यत्व का अनुकरणीय उदाहरण समझाया है। आप हम सब के लिए माता के समान देख रेख करने वाले तथा कृपा बरसाने वाले है, आपकी ही कृपा से भजन, सुमिरन, ध्यान, भक्ति, ज्ञान की वर्षा होती है।
     कृपा धार वर्षा करे, शिष्य ह्रदय ल्र धार ।
     जीवन सफल होत है, मोक्ष मिले निज धार ॥

जिज्ञासु साधु सन्तों ने श्री स्वामी जी से कहा कि, हे श्रीसद्‌गुरु महराज जी ! हे मालिक आप हम सभी जिज्ञासुओं को इस गूढ़तम विद्या की शिक्षा व उपदेश दें। हे मालिक, आप की कृपा से हम सब भी उसे सुनकर उससे लाभ प्राप्त करना चाहते हैं। हे देवाधिदेव ! हे परात्पर ब्रह्म, हे मेरे श्री सद्‌गुरु महराज आप मुझे दीक्षा प्रदान करें। हे स्वामी आप मुझे बतायें कि किस मार्ग से जीव ब्रह्म स्वरूप को प्राप्त करता है। हे स्वामी आप मुझ पर कृपा करें। मै आपके श्री चरणों में प्रणाम करता हूँ ।       
श्रीसद्‌गुरुदेवजी समझाते हुए कहते हैं कि हे जिज्ञासु शिष्यो, यह ब्रह्मविद्या तथा भक्ति योग की बड़ी प्यारी कथा है। यही है आदि जिज्ञासा । यही है प्रथम प्रश्न । यही वह बीज है जिससे गुरु शिष्य रहस्य के बोध का बोधि-तरू अंकुरित हुआ । श्री सद्‌गुरु भगवान की कृपा से पुष्पित पल्लवित होकर महावृक्ष बना। इस मधुर प्रसंग में शिष्य भाव से यह प्रश्न पूछा गया है। इस प्रसंग का सुखद साम्य परम पुज्य श्रीसद्‌गुरुदेव की गाथा से भी है। इस परम विशाल महाव्यापक श्री सद्‌गुरु का दिया हुआ महामंत्रराज का जप, भक्ति मुक्ति प्रदान करता है।  जो शिष्य अपने संपूर्ण अन्तःकरण को श्री सद्‌गुरु के श्री चरणों में समर्पित करके गुरुदीक्षा प्राप्ति की प्रार्थना करता है और स्वयं को अपने श्री सद्‌गुरुदेवजी के चरणों में अर्पित कर देता है , श्री सद्‌गुरुदेवजी की कृपा उन्ही का वरण करती है। करूणा सागर कृपालु श्री सद्‌गुरुदेवजी उन्ही को अपनी कृपा का वरदान देते है, यही गुरु शिष्य रहस्य है।
    मोह जनित भ्रम हरने वाले, भक्ति भाव को भरने वाले ।
    जीव शरण में जो भी आवें, भजन करा के मुक्ति दिलावें ॥

 श्री सद्‌गुरुदेवजी का महामंत्र शिष्य के लिए संजीवनी है। यहाँ जिस गुरु शिष्य रहस्य की जिज्ञासा का प्रसंग आया है, इस जिज्ञासा पर श्री सद्‌गुरुदेव भगवान अति प्रसन्न होते है। उच्चतम गुरु शिष्य रहस्य के प्रति जिज्ञासा भी उच्चतम चेतना में अंकुरित होती है। उत्कृष्टता एवं पवित्रता की उर्वरता में ही यह अंकुरण सम्भव हो पाता है। जिज्ञासा, जिज्ञासु की भाव-दशा का प्रतीक है, इसमें शिष्य की अन्तर्चेतना प्रतिबिंबित होती है। जिज्ञासा के स्वरूप में जिज्ञासु की भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान, तथा ज्ञानभक्ति की तप साधना शिष्य के स्वाध्याय, चिन्तन, मनन, व निदिध्यासन आदि के  रूप में झलकती में है। हे शिष्य आपका यह प्रश्न बड़ा लोकहितकारी है । ऐसा लोकहितकारी प्रश्न समय समय पर साधक उठाया करते है ।शिष्यों ने अपनी भक्तिपूर्ण तथा दीनभाव से प्रार्थना युक्त जिज्ञासा से भूत वर्तमान और भविष्य के सभी शिष्यों व साधको के समक्ष विनयात्‌ याति पात्रताम का आदर्श सामने रखा। शिष्य की यह जिज्ञासा भी  सब गुरु भक्तों की कल्याण कामना के उद्देश्य से ही उपजी है। यह उत्तर तीनों लोक में अत्यन्त ही दुर्लभ है परन्तु इसे मैं कहूँगा । आप सुनें - श्रीसद्‌गुरु के सिवाय कोई ब्रह्म नहीं हैं। हे शिष्य यह सत्य है, सत्य है ,सत्य है । कुछ इसी प्रकार का प्रश्न श्री पार्वतीजी के पूछने पर भगवान शंकरजी ने कहा-
       मम रूपासी देवित्वं त्वत्प्रीत्यर्थ वदाम्यह्मं ।
       लोकोपकारकः प्रश्नो न केनाइपि कृतः पुरा ॥

       हे देवि, आप तो मेरा स्वरूप है। आपका यह प्रश्न बड़ा ही कल्याणकारी है । ऐसा प्रश्न पहले कभी किसी ने नहीं पूछा । आपकी प्रीति के कारण मै इसे आपसे अवश्य कहूँगा। हे देवी यह उत्तर तीनों लोको में अत्यन्त दुर्लभ है। आप सुनिये - सद्‌गुरु के सिवाय कोई उच्चतम तत्व नहीं है । यह  सत्य है, सत्य है  । भगवान शिवजी के इस कथन के प्रथम चरण में गुरु और शिष्य की अन्यन्यता , एकात्मकता और तादात्म्यता है । गुरु और शिष्य दोनों अलग अलग नहीं होते, बस उनके शरीर अलग दिखते है। उनकी अन्तर्चेतना आपस में घुली मिली होती है, सच्चा शिष्य गुरु का अपना स्वरूप होता है । उसमें श्री सद्‌गुरु की चेतना प्रकाशित होती है । शिष्य के प्राणो में श्री सद्‌गुरु के नाम का भजन, सुमिरन, ध्यान का तप प्रवाहित होता रहता है । शिष्य के ह्रदय में श्री सद्‌गुरु की भावना का उद्धरेख होता है। शिष्य के विचारों में श्री सद्‌गुरुदेव का ज्ञान प्रस्फुटित होता है। ऐसे गुरुगत प्राण शिष्य के कुछ भी अदेय नहीं होता है । श्री सद्‌गुरु उसे दुर्लभतम तत्व एवं सत्य बताने के लिए सदा ही तैयार रहते है। शिष्य के भी समस्त क्रिया कलाप अपने श्री सद्‌गुरु की अन्तर्चेतना की अभिव्यक्ति के लिए होते है।

 
श्री श्री १०८ श्रीसद्‌गुरु स्वामी सरनानंदजी महाराज की हस्तलिपि में इस लेख का अंश

    श्री सद्‌गुरु जी महराज अपने शिष्यों को समझाते हुए कहते है कि श्री सद्‌गुरु ही ब्रह्म है। यह संक्षिप्त कथन बड़ा ही सारभूत है। इसे किसी बौद्धिक क्षमता से नहीं, भावनाओं की गहरायी से समझा जा सकता है। इसकी सार्थक अवधारणा के लिए शिष्य की छलकती भावनायें एवं समर्पित प्राण चाहिये। जिसमें यह पात्रता है वह आसानी से श्री सद्‌गुरुजी के कथन का अर्थ बड़ी आसानी से समझ सकेगा। श्री सद्‌गुरु  ही ब्रह्म है, उनमें अनकों गूढ़ार्थ समाये हैं। जो गुरु शिष्य रहस्य को समझ सका वही ब्रह्म तत्व का साक्षात्कार कर पायेगा। श्री सद्‌गुरु की कृपा से जिसे दिव्य-दृष्टि मिल सकी, वही ब्रह्म दर्शन करने में सक्षम हो सकेगा। इस अपूर्व दर्शन में दृष्टा, दृश्य एवं दर्शन सब एकाकार हो जायेगे अर्थात्‌ शिष्य, श्री सद्‌गुरु  एवं ब्रह्मतत्व के बीच सभी भेद अपने आप ही मिट जायेंगे। यह सत्य सूर्य प्रभाव की तरह उजागर हो जायेगा कि श्री सद्‌गुरु ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही अपने श्री सद्‌गुरु  के रूप में साकार हुए है ।
          विद्या चाहे कोई भी हो लौकिक या आध्यात्मिक, उसके सार तत्व को समझने के लिए श्री सद्‌गुरु  की आवश्यकता होती है । विद्या के विशेषज्ञ श्री सद्‌गुरु  ही उसका बोध कराने में सक्षम एवं समर्थ होते है । यदि गुरु कृपा साथ हो तो ये काले अक्षर रौशनी के दिये बन जाते है ।

 
श्री श्री १०८ श्रीसद्‌गुरु स्वामी सरनानंदजी महाराज की हस्तलिपि में इस लेख का अंश      
  श्री सद्‌गुरु  से मिलना  चारों ओर रौशनी फैलाते हुये दिये से मिलने जैसा है । दासनदास ने कहा कि मेरा श्रीसद्‌गुरु से मिलन ऐसे ही हुआ है, वह कहते है कि प्रकाश स्वरूप श्री सद्‌गुरुदेव जी के सन्मुख हो तो भला भ्रान्तियों एवं भटकनों का अंधेरा कितनी देर तक टिका रह सकेगा? यह कोई गणित का प्रश्न चिन्ह नहीं है । इसका जवाब जोड़, घटाव, गुणा, भाग में नहीं बल्कि श्री सद्‌गुरु जी की कृपा की अनुभूति में है। जीवन में यह अनुभूति आये तो सभी विद्यायें, सारे शास्त्र स्वयं ही अपना रहस्य खोलने लगते है । शास्त्र और पुस्तकें न भी हों तो भी श्रीसद्‌गुरु कृपा से तत्व-बोध होने लगता है। यही गुरु शिष्य रहस्य है ।
              ज्ञान प्रकाश गुरु से पावा, ब्रह्मनिष्ठ लह मुक्ति निवासा ।
              श्री सद्‌गुरु कृपा से ही , होता सदा विकास रहस्य ॥            

श्री सद्‌गुरु की दया व कृपा ही बोध वृक्ष है। इसकी छाँव तले होनें वाली श्री सद्‌गुरु की कृपा की अनुभूति साधक को सम्यक्‌ सम्बुद्ध बनाती है। श्री सद्‌गुरुदेवजी के वचन बड़े ही मार्मिक है। इनको आत्मसात् करने के लिये गहन श्रद्धा एवं प्रखर विवेक की जरूरत है। श्रद्धा एवं विवेक के संयोग से ही यह गुरु शिष्य रहस्य समझ में आता है।  समस्त शास्त्र सार गर्भित है और सारी विद्यायें अर्थवान है इसका ज्ञान तभी होता है जब श्री सद्‌गुरु कृपा करके इनका सम्यक बोध करायें। श्री सद्‌गुरु के सानिध्य के आभाव में कल्याणकारी विद्यायें भी अकल्याणकारी बन जाती है । यह ऐसा अनुभव सिध्द और सत्य है जिसे अनेकों बार अनेकों ने अनुभव किया है। श्री सद्‌गुरुदेव भगवान अपने परमप्रिय शिष्य से कहते हैं कि
          गुरुर्बुद्धयात्मनो नान्यत्‌ सत्यं सत्यं न संशयः ।
          तल्लाभार्थ प्रयत्नस्तु कर्तव्यो हि मनीषिभिः ॥

प्रबुद्ध आत्मा और श्री सद्‌गुरु एक ही है भिन्न नहीं है यह सत्य है, सत्य है । इसमें तनिक भी संशय नहीं है इसलिए सभी बुद्धिजीवी श्रद्धावान शिष्यों को इसकी प्राप्ति हेतु ही सभी श्रेष्ठ कर्तव्य करना चाहिए। श्री सद्‌गुरु की कृपा से ही आत्म-चेतना में जागृति आती है और जब आत्म-चेतना जागृत होती है तो यह सत्य अनुभूति का रूप ले लेता है कि श्री सद्‌गुरु की कृपा चेतना ही अपनी आत्मचेतना है। इन दोनों में कोई भिन्नता नहीं हैं । इसलिए गहन अर्थ में श्री सद्‌गुरु के सत्य स्वरूप का साक्षात्कार ही आत्मसाक्षात्कार है । श्री सद्‌गुरु की प्राप्ति ही आत्म प्राप्ति है । मनुष्य जीवन का केन्द्रीय उद्देश्य एवं आधार भी यही है  । इसलिए जो भी कर्म किये जाये वे सभी इसी उद्देश्य एवं अभीप्सा के साथ हों । श्री सद्‌गुरु के बतलाये हुए नाम भजन,सुमिरन, सेवा ,पूजा, दर्शन, ध्यान, तथा भक्ति की साधना आदि सभी श्रेष्ठ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिये परन्तु इन कर्मों के पवित्र अनुष्ठान के साथ श्री सद्‌गुरु की प्राप्ति का संकल्प अवश्यमेव जुड़ा हो । इस संकल्प के जुड़ने मात्र से ही सभी कर्म श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम होते चले जायेंगे और इनके अनुष्ठान में तत्पर व्यक्ति की अन्तर्चेतना मूढ़ता से ज्ञानदाता श्रीसद्‌गुरुदेव की ओर यात्रा कर सकेगी ।
श्री सद्‌गुरु की अभीप्सा संकल्प को संतों ने गूढ़ विद्या कहा है। क्योंकि यह तत्व साधारणतया किसी की समझ में नही आता। कामनाओं व वासनाओं के अँधेरे से घिरे लोग गुरु शब्द का महत्व ही नहीं समझ पाते। गुरु में पहला अक्षर ’गु’ अंधकार का वाचक है और ’रु’ प्रकाश का वाचक है। इस तरह गुरु वह तत्व है जो अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करके ज्ञानरूपी तेज का प्रकाश करता है। ऐसे श्रीसद्‌गुरु के लिये लगन, उनको पाने के लिये गहरी चाहत व श्री सद्‌गुरु के श्री चरणों में अपने सर्वस्व समर्पण के लिये आतुरता में ही इस मनुष्य जीवन की सार्थकता है। यह कार्य आसान नहीं हैं और आसान न होने का पहला कारण है कि यह समस्त जगत अपने वास्तविक रूप में तो ब्रह्ममय है, किन्तु इसमें माया का छद्म आवरण है। इसी कारण इस दुनिया में प्रायः सभी लोग तेरा-मेरा करने में लगे हुए हैं। श्री सद्‌गुरु प्राप्ति की लगन में अगली बाधा है शरीर। यहां शरीर का अर्थ केवल देहमात्र से नहीं है बल्कि इसके अर्थ में दैहिक कष्ट और दैहिक वासना भी शामिल है, जो मनुष्य की आत्म-चेतना को अपनें से कसे व जकडे़ रहती है। इन बाधाओं और अवरोधों को दूर हटाकर जो श्री सद्‌गुरु की प्राप्ति  के लिये संकल्पित होते हैं, वे धन्य है।  वे कृतार्थ और कृत-कृत्य होते हैं जो श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में भक्तिपूर्वक अपनें को न्यौछावर करने के लिये आगे बढ़ते हैं क्योंकि  श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों की महिमा अपार है।

 -- सत्‌गुरुसरनानंद

 

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