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Science of Sant Mat

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Objective

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गुरु-तत्व पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010 23:49

 

   गुरु-तत्व

(यह लेख ’श्रीसद्‌गुरु-रहस्य ’ नामक सत्साहित्य का अंश है)
जिस प्रकार सन्त महापुरूष की सेवा करने से साधक खुश हो जाता है , उसी प्रकार गुरु की सेवा करने से गुरु-मन्त्र प्रसन्न होता है । गुरु-मन्त्र एवं  इष्ट में कोई भेद नहीं मानना चहिये। गुरु ही ईश्वर है, भगवान है। गुरु को कभी भी मानव नहीं मानना चाहिये । जिस स्थान में गुरु निवास करते हैं वह स्थान काशी, वाराणसी,व कैलाश के समान है । उनके पावन चरणों का पानी गंगा जी स्वयं हैं । उनके पावन मुख से उच्चारित मन्त्र  स्वयं ब्रह्म ही हैं ।
गुरु के मुख से बोला हुआ शब्द महामंत्र है । गुरु की मूर्ति ध्यान का मूल , गुरु के चरण-कमल पूजा का मूल है । गुरू का उपदेश मोक्ष का मूल है । गुरु तीर्थ स्थान है । गुरु सूर्य है । गुरु अपने शिष्य का उद्धारक है । समस्त विश्व के तीर्थधाम गुरु के चरण कमल में बस रहे हैं । सारे देवी देवता गुरु में ही समाहित है । गुरु और इष्ट में कोई भेद नहीं है । जो साधना या योग के विषय में शिष्य को सिखलाते है वे ही दीक्षा गुरु कहे जाते है । श्रीसद्‌गुरुजी महराज अपने शिष्य को भक्ति योग सिखाते हुये कहते हैं कि गुरू भक्ति में पूर्ण श्रद्धा व आत्मसमर्पण करना ही शिष्य का कर्तव्य है । गुरु भक्ति योग के आठ महत्वपूर्ण अंग इस प्रकार हैं -
. गुरु भक्ति योग के अभ्यास के लिये सच्चे ह्रदय की स्थिर व गहन इच्छा
२. श्री सद्‌गुरु के विचार, वाणी, व कार्यों में सम्पूर्ण श्रद्धा
३. श्री सद्‌गुरु के नाम का उच्चारण यानी उनके बताये हुये नाम-मंत्र का भजन , सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान नियमित नियमानुसार पूर्ण श्रद्धा के साथ करें, यही सद्‌गुरु रहस्य
है। श्रीसद्‌गुरु महराज को नम्रतापूर्वक साष्टांग डण्डवत्‌ प्रणाम करें ।
४. सम्पूर्ण आज्ञाकारिता के साथ  गुरु की आदेशों का पूर्ण भाव के साथ पालन करें ।       
५. फल प्राप्ति की इच्छा के बिना गुरु की सेवा करें अर्थात्‌ निःस्वार्थ सेवा करें ।
६. श्रद्धा व भक्तिभाव पूर्वक हर रोज श्री सद्‌गुरु महराज के चरण कमलों की पूजा करते रहना चाहिये ।
७. श्री सद्‌गुरु के दैवीय कार्यों के लिये तन , मन, धन के साथ आत्मसमर्पण      
८. श्री सद्‌गुरु की कल्याणकारी कृपा प्राप्त करने के लिये एवं उनके पवित्र उपदेश सुनकर उनका आचरण करने के लिये श्री सद्‌गुरु के परम पवित्र श्रीचरण कमलों का ध्यान करें।

  • गुरु-भक्ति योग का एक स्वतंत्र प्रकार है ।
  • मुमुक्षु यानी साधक जब तक गुरु-भक्ति योग का अभ्यास नहीं करता तब तक ईश्वर के साथ एकरूप होनें के लिये आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश करना उसके लिये संभव नहीं ।
  •  जो साधक गुरु भक्ति योग की सीख को पूर्ण रूप से समझता है वही शिष्य अपने को श्रीसद्‌गुरु के श्रीचरणों में आत्मसमर्पण कर सकता है ।

 एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं ।
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्‌गुरुं तं नमामि ॥

    श्री सद्‌गुरु महराज स्वयं तो नित्यानंद हैं ही , शिष्यों व साधकों को भी अपना पारस स्पर्श देकर अपने शिष्यों को आनंद की अनुभूति करा देते है । द्वन्द्व वस्तु तो उनके पास जा ही नहीं सकती । वे आनंद व ज्ञान के सागर है । वे अपने शिष्य के लिये गगन की भांति अनंत है । तत्वमसि आदि जो वेद के महावाक्य है उनका लक्ष्य श्रीसद्‌गुरु ही हैं । वे अपने भक्तों के लिये तत्वस्वरूप विश्वात्मक और विश्वव्याप्त है । श्री सद्‌गुरु महराज अपने शिष्यों के उत्थान के लिये नित्य व सदैव तैयार रहते है, शिष्य के लिये यही सद्‌गुरु रहस्य है ।
 श्री सद्‌गुरुमहराज हर वक्त अपने शिष्य के उत्थान के लिये सदा ही तत्पर रहते हैं ।  अपने शिष्य का हर वक्त निरख परख करते रहते हैं तथा वे अपने शिष्यों को आध्यात्मिक चढ़ाई के लिये हर वक्त तैयार करते रहते है एवं चढ़ाई चढ़ते रहते हैं । यही गुरु-भक्ति योग की सच्ची एवं सुरक्षित साधना है जिसका अभ्यास करनें में किसी भी प्रकार का कोई भय नहीं है क्योंकि उसके रक्षक श्रीसद्‌गुरु महाराज हर वक्त उसके साथ साथ मौजूद रहते है ।
इस प्रकार श्री सद्‌गुरु महराज अपने शिष्य की बराबर देखरेख करते रहते हैं । श्री सद्‌गुरु अपनी दया से शिष्य के स्थूल, सूक्ष्म, एवं कारण मल अर्थात्‌ अणु, तनु, एवं कर्म मल को नष्ट कर एवं अन्नमय , प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय इन पाँच कोषों की जड़ता को दूर कर विशुद्ध ब्रह्मतेज अपने परमप्रिय शिष्य में प्रकाशित करते रहते हैं । श्रीसद्‌गुरु महराज सद्‌गुरु-रहस्य के इसी मूल को अपने शिष्य को सभी प्रकार की विद्या द्वारा अवगत कराते रहते है ।
   सकल जीव को दुखी देखकर लिया प्रभु अवतार ।
   भक्तिपंथ बताय सभी पर किया अमिट उपकार ॥

श्रीसद्‌गुरु महाराज के इन अमृत वचनों को सुनकर प्रेमी शिष्य की बुद्धि पर पडा़ हुआ माया का आवरण दूर हो गया । उसने विनय की कि हे प्रभु, आप कृपा करके इन भूले भटके जीवों को सन्मार्ग पर लगावें । श्रीसद्‌गुरु महराज के प्रगट प्रणव की साकार मूर्तियों में सारी  शक्तियाँ भरी पड़ी रहती हैं । देखनें, समझनें और अनुमान करनें से भी यह सत्यता मालूम होती है कि हर शक्ति के दाता श्री सद्‌गुरु ही होते है  तथा सभी साधकों को उनकी शक्ति भक्ति से सदा सदा लाभ उठाते रहना चाहिये।
इसी प्रकार श्रीसद्‌गुरु महाराज  के अंगों की दिव्य गन्ध और मुखारविन्द से निकसी शुद्ध, शान्त, अमृतमय, रसपूर्ण, दिव्य, और आकर्षक शब्द लहरी के आनन्दमय स्पर्श से साधक व सत्‌शिष्य के मन की शुद्धि हो जाती है । तत्वतः श्रीसद्‌गुरु महराज  शिष्यों पर अनुग्रह करने के लिये प्रगट हुये हैं। ब्रह्म आत्मा श्रीसद्‌गुरु महाराज  मूल अविद्या का नाश कर शिष्यों की आत्मा को शुद्ध कर देते हैं। माया की जबरगाँठ को खोल देते हैं। श्रीसद्‌गुरु  पर, अपरा, और परा-परा नामक त्रिविध शक्तियों का सद्‌भाव हैं अर्थात्‌ उनमें तीनों शक्तियाँ समाहित हैं।
यह गुरु मंत्र अत्यन्त रहस्यमय है । यह बुद्धि और प्राण के मूल में स्थित है । इसीलिये उपनिषद कहते है कि वह आत्मतत्व वाक्‌ का भी वाक्‌ है , बुद्धि की भी बुद्धि है, और प्राण का भी प्राण है ।
श्री सद्‌गुरु की संग्रह-शक्ति की महिमा यह है कि वह शिष्य की सदातन बहिर्मुखी वृत्तियों को अन्तर्मुखी कर आत्मनिष्ठ और स्वरूप-साधना में अपेक्षित अपूर्व धैर्यवान बना देती है । यही तो श्री सद्‌गुरु रहस्य है । इस तरह शिष्य धैर्यशाली और आत्मनिष्ठ हो जाता है । विषयों की ओर उन्मुख वृत्ति स्वरूप की ओर मुड़ जाती है । दूसरी शक्ति है प्रतिग्रह । गुरु जब जीव को शिष्य रूप से प्रतिग्रहित कर देता है तब मात्र परिग्रह से ही वह दुखद स्थितियों से उबर जाता है । इतना ही नहीं वह ब्रहानन्द का भी अनुभव करने लगता है । उसकी तीसरी शक्ति है विग्रह-शक्ति । गुरु-तत्व निराकार, व्यापक, व तेजोमय है। वही विग्रह शक्ति द्वारा अमूर्त से मूर्त हो जाता है, निर्गुण से सगुण हो जाता है, अशरीरी से शरीरी बन जाता है। इस प्रकार स्वयं अमूर्त होकर भी वह मूर्त हो जाता है । उसका कारण घट-घट आदि दृश्यराशि का आकार बनना है । वह आत्मविलीयन करवाता है । श्री सद्गुरु अपने शिष्यों के सभी क्लेशों का अपनी अमोघ अनुग्रह शक्ति से विनाश कर डालते हैं। इस प्रकार श्री
सद्‌गुरु  का भी प्रत्यक्ष प्राकट्य शिष्य द्वारा सम्पाद्य स्वकीय अभ्युदय यज्ञ के भरण-पोषण के लिये होता है ।
इसी प्रकार श्रीसद्गुरु भगवान शिष्य के उद्धार हेतु बीजमंत्र का श्रोत्रपथ में संचार, शिष्य के आत्ममन्थन का आधारापादन, उसका क्लेश नाशन, तथा भरण पोषण करते ही रहते है । यानी शिष्य की हर प्रकार से देख-रेख किया ही करते है । यही तो सद्गुरु रहस्य है ।
    श्री
सद्‌गुरु की महिमा व्यवहारिक और आध्यात्मिक दोनो क्षेत्रों में लोकविश्रुत है। शिष्य की आँखो में अज्ञान की रतौंधी छाई हुई है । अतः उस अन्धे को पास-पड़ोस  की भी असलियत दिखाई नहीं देती, फिर दूर की तो बात ही क्या है । यह श्रीसद्‌गुरु ही हैं जो ज्ञान की अन्जन शलाका से शिष्य की चेतना पर पड़े मल को समाप्त कर देते हैं और तब सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लग जाता है । इसीलिये कहा गया है कि गुरु ही ब्रह्म है, गुरु विष्णु, और महेश्वर है, वह साक्षात्‌ परब्रह्म है, इसलिये उनके समक्ष सबको नतसिर होना चाहिये । गुरु ब्रह्म ही अपने शिष्यों का हर प्रकार से उत्थान व उद्धार करने में लगे रहते है यही तो है श्रीसद्गुरु रहस्य- शिष्य के प्रति हर वक्त तत्पर रहना ही गुरु का काम है।

       
     
सद्‌गुरु की कृपा बिना कबहुँ न होत कल्याण ।
      तिस सौभागी जीव के , निश्चय पूरण भाग ॥

फलतः श्री
सद्‌गुरु की दया से शिष्य कृत-कृत्य हुआ और श्रीसद्गुरु की विनय, प्रार्थना, सेवा, पूजा, व दर्शन करते हुये कहा कि भगवन्‌ आप ही हमारे माता, पिता, गुरु, एवं पालक हैं । हे मालिक आप ही हम जैसे अभागे को संसार सागर से पार लगाने वाले है । आपको बारंबार सादर दंड़वत प्रणाम है ।
 
 

श्री श्री १०८ श्रीसद्‌गुरु स्वामी सरनानंदजी महाराज की हस्तलिपि में इस लेख का अंश

 श्री
सद्‌गुरु महराज जी समझाते हुए कहते हैं कि श्रीसद्‌गुरु का हर वाक्य शिष्य के ह्रदय का गीत है । गीतों की गूँज श्रीसद्‌गुरु की दया से ही शिष्य के ह्रदय के आँगन में गूँजती है तथा अंकुरित होती है । मस्तिष्क में तो सदा तर्कों के संजल रचे जाते हैं । मस्तिष्क की सीमा बुद्धि की चहार दीवारी तक ही रहती है पर ह्रदय की श्रद्धा सदा विराट और असीम है । इस अदृश्य, असंभव, असीम एवं अनंत का तो पता नहीं परन्तु मनुष्य में गुरु को ढूँढ़ लेना  और गुरु में परमात्मा को पहचान लेना ह्रदय की श्रद्धा का चमत्कार है । गुरु अपने शिष्य को जो मंत्र देते है वह मंत्र बड़ा चमत्कार पूर्ण होता है । इसकी अनोखी अनूठी समर्थ का अनुभव श्रद्धावान शिष्य कभी भी कर सकता है । योगेश्वर श्री कृष्ण भगवान कहते है कि श्रद्धावान लभते ज्ञानं - जो शिष्य श्रद्धावान है वे भक्ति का ज्ञान पाते है । यह श्रद्धा बडे़ दुःसाहस की बात है कमजोर दिल वाले के वश की बात  नहीं है । श्रद्धा ऐसी दीवानी है कि जब चारों तरफ़ मरूस्थल हो और कहीं हरियाली का नाम न दिखाई पड़्ता हो तब भी श्रद्धा भरोसा करती है कि हरियाली अवश्य आयेगी और फूल खिलेंगे । श्रद्धा मानती है कि जल के झरने बहेंगे और प्यास बुझेगी । जब चारो तरफ़ पतझड़ हो तब भी श्रद्धा में बसंत ही आता है या होता है ।
जो शिष्य है उनका अनुभव यही कहता है कि गुरु भक्ति में सदा ही श्रद्धा का मौसम होता है । साधक की श्रद्धा एक ही मौसम जानती है । गुरु की दया व भक्ति में सदा ही बसंत की बहार होती है और श्रद्धा सदैव बसंत ही मनाती है । इस बसंत में भक्ति का गीत गूँजता है । समर्पण का सुरीला संगीत महकता है । जिसका ह्रदय गुरु भक्ति से भरपूर(सिक्त) है ऐसे शिष्य के जीवन में श्री
सद्‌गुरु का महामंत्र सभी चमत्कार करनें में सक्षम है । अपने ह्रदय मंदिर में परमपूज्य श्रीसद्‌गुरुदेव की प्राण प्रतिष्ठा करके जो भाव भरे मन से गुरु की प्रर्थना का गान करे तथा भाव भक्ति सहित भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, तथा ध्यान नियमित व नियमानुसार करे तो उसका अस्तित्व गुरुदेव के दुर्लभ आशीषों की वृष्टि से भीगता रहेगा । श्री सद्‌गुरु की दुर्लभ भजन की अनुभूति होती रहेगी। ऐसे श्रद्धावान शिष्य की आँखों से करूणामय परमपूज्य श्री सद्गुरुदेव की झाँकी कभी ओझल न होगी ।
  करूणा, दया के पुन्ज है सद्गुरु करूणागार ।
  चरण शरण जो जन गहे जीवन देत सँवार ॥

 श्री
सद्‌गुरु की दया साधक के लिये संजीवनी है । ऐसी शिष्य की जिज्ञासा सुनने पर श्री सद्गुरु भगवान प्रसन्न होकर कहते हैं कि श्रीसद्गुरु की महिमा का वर्णन, गुरु शिष्य संवाद का संबंध इस धरती का सर्वाधिक पावन अति निकट और अति निकटतम संबंध है । यदि गुरु अपने शिष्य के लिये सीधे अवतरित होते हैं तो गुरु शिष्य के समर्पण भाव के बदले आध्यात्मिक अनुदान उदारता पूर्वक दे देते हैं ।
श्री
सद्‌गुरु महाराज हर प्रकार से अपने शिष्य के लिये साधना का एक श्रेष्ठ माध्यम हैं । इससे गुरु कृपा सतत्‌ और अनवरत पाई जा सकती है ।
    अपनी कृपा से सद्गुरु कर दो मम उद्धार । आया हूँ तव शरण में बख्शो बख्सनहार ॥
गुरु शिष्य परंपरा में गुरु अपने शिष्य के लिये सत्य का बोध कराने वाले पारब्रह्म परमेश्वर हैं । वे अपने शिष्य की गुरुभक्ति को प्रगाढ़ करते हुये भजन, सेवा, पूजा, दर्शन, व ध्यान की प्रक्रिया को सदा पुष्ट कराते रहते है । वे अपने भक्तों की साधना निरंतर अविराम व तीव्रतम कराते हुये शिष्य में एकाकार होते हैं । ध्यान की प्रक्रिया प्रगाढ़ होती जाती है और श्री सद्गुरु की दिव्य चेतना के रूपों का साक्षात्कार होता है । इसी को श्री
सद्‌गुरु रहस्य कहते है ।
यह जो आध्यात्मिक ज्ञान है वह श्री
सद्‌गुरु महाराज जी का दिया हुआ है। इस लेख में परम पूज्य श्री सद्‌गुरुदेवजी के अनेकों उदाहरण उनके जीवन के प्रसंगो व चिन्तन के साथ साथ प्रस्तुत हैं। इसमें सभी कुछ है जो पुराणों, और वेद शास्त्रों में वर्णित है । यदि निवेदक ने अपना कुछ जोड़ा है तो वह ज्ञान भी गुरु का ही दिया हुआ  है, जो वास्तव में श्लोकों , छंदों, दोहों, व चौपाईयों के साथ नवयुग की परिस्थितियों में हर साधक के लिये मनन करने योग्य है ।
आदि शक्ति श्री
सद्‌गुरु द्वारा शिष्य भाव से जिज्ञासा व्यक्त की गई है । जगन्नियन्ता देवों के देव श्रीसद्गुरु भगवान उसका समाधान करते हैं । इसी तरह शक्ति स्वरूपा परमपूज्य श्री सद्‌गुरुदेव का जीवन, जिनका सानिध्य हम सभी शिष्यों को मिला है, इस ऋषि युग में गुरु शिष्य परंपरा का श्रेष्ठतम उदाहरण  है। लाखों, करोड़ों शिष्यों पर निरंतर अनुकम्पा बरसाने वाले प्रखर ज्ञान रूपी हमारे श्री सद्‌गुरु  एवं सजल श्रद्धा रूपी हमारे त्याग व तपस्यामय जीवन को समर्पित है यह संकलन।  स्वान्तः सुखाय लिखे गये इस श्रीसद्‌गुरु -रहस्य नामक ग्रन्थ का मनन, चिन्तन निश्चित ही श्रीसद्‌गुरु की महिमा का सबको बोध करायेगा एवं शिष्य रूप में कर्त्तव्य की जानकारी भी देगा । यह सद्‌ज्ञान हमारे जीवन में श्रद्धा, सद्‌विचार, एवं सुसंस्कार की त्रिवेणी बनकर प्रवाहित हो तब ही इसका महत्व है । श्रद्धा जिसके आदर्शों में होती है वही गुरुकृपा का पात्र होता है । हमारी श्रद्धा गुरु कार्यों के प्रति नित्य हर पल बढ़े, हम उनके निमित्त जीना और कर्त्तव्यों का पालन करना सीखें । हम श्रीसद्‌गुरु के बताये हुये चिन्हों का ‍सतत्‌ चिन्तन करें । उनकी दया रूपी छाँव में बने रहने का प्रयास सदैव करते रहेंगे तो सद्‌विचारों की गंगोत्री हमारे अंदर प्रवाहित होने लगेगी । हमारे परमपूज्य श्रीसद्‌गुरु महराज जी द्वारा निस्सृत ज्ञानगंगा विचार क्रान्ति का मूल केन्द्र बनी एवं देखते देखते अच्छे विचारों को अपनाने वालो का एक परिवार खड़ा हो गया । यदि ये सद्‌विचार श्रीसद्‌गुरु कृपा से संस्कार में परिवर्तित होते चले जायें तो हमारा श्रीसद्गुरुदेवजी के प्रति समर्पण सार्थक है । हमारी श्रद्धा बुद्धि और विवेक पर आधारित होकर दिनों दिन बढ़्ती जाय तथा आदर्शों के अनुकूल हो तभी हमें श्री सद्‌गुरु  की रहस्यमयी कृपा मिल पायेगी । वही कृपा हमें भव बंधनों से तार देगी, हमारे अंदर श्रेष्ठ संस्कारों की स्थापना कर हमें देवमानव बना देगी । श्री सद्‌गुरु  रहस्य का यह पहला संस्करण है । यह साधकों के लिये अनुपम संग्रहणीय ग्रन्थ है । इसके श्रद्धापूर्वक मनन एवं पाठ से साधक निश्चित ही लाभान्वित होंगे , ऐसा मेरा विश्वास है।

--- सत्‌गुरुसरनानंद  

                    

 

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